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Harishankar Parsai : Vyangya Ki Vaicharik Prishthbhoom

  • Author Name:

    Radhe Mohan Sharma +2

  • Book Type:
  • Description:

    हरिशंकर परसाई सही मायनों में व्यंग्य-लेखन में ‘मास्टर माइंड’ हैं। एक ऐसे लौह-लेखक जिनके कारण ही व्यंग्य एक विधा के रूप में स्थापित हो सका । प्रो. राधेमोहन शर्मा ने अपने लघु शोध-प्रबन्ध में विस्तार से विवेचन-विश्लेषण कर हिंदी गद्य साहित्य में परसाई की शिखर-स्थिति को रेखांकित किया है। व्यंग्य के स्वरूप और प्रकार, युग की बात युग के लिए, व्यक्तित्व की पहचान जैसे विश्लेषणों में परसाई के व्यंग्य की समग्रता को समेटा गया है। हरिशंकर परसाई के पाठकों, छात्रों, अध्यापकों, शोधार्थियों के लिए यह पुस्तक उन्हें गहरे तक समझने के लिए श्रेष्ठ मार्गदर्शक है।

Harishankar Parsai : Vyangya Ki Vaicharik Prishthbhoom

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Radhe Mohan Sharma

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495

₹ 396

Available

Bharatiya Shiksha

  • Author Name:

    Rajendra Prasad

  • Book Type:
  • Description:

    ‘भारतीय शिक्षा’ डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के शिक्षा-सम्बन्धी भाषणों का संकलन है। समय-समय पर दिये गए इन भाषणों का अपना अलग महत्त्व है लेकिन इस पुस्तक में एक साथ उनकी प्रस्तुति से जानने में मदद मिलती है कि एक राष्ट्रनिर्माता के रूप में राजेन्द्र बाबू, देश की शिक्षा-व्यवस्था को किस रूप में देखने के आकांक्षी थे और शिक्षा मात्र के बारे में उनके विचार और अनुभव क्या थे। मसलन, भारत को अपने लिए कैसी शिक्षा-व्यवस्था बनानी चाहिए, शिक्षा का माध्यम क्या होना चाहिए, नारी शिक्षा कैसी होनी चाहिए और वह क्यों आवश्यक है, शिक्षा में विज्ञान का क्या महत्त्व है आदि-आदि। यही नहीं, वे विद्यार्थियों के अधिकारों और कर्तव्यों का तथा विद्यार्थी और राजनीति के पारस्परिक रिश्ते का जिक्र भी करते हैं। कहना न होगा कि देश के प्रथम राष्ट्रपति की लेखनी से निकले ये शब्द किसी भी सुधी पाठक को प्रेरित करने वाले है।

Bharatiya Shiksha

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Rajendra Prasad

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695

₹ 556

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Upanyas Ki Pahchan : Divya

  • Author Name:

    Gopal Ray

  • Book Type:
  • Description:

    यशपाल के उपन्यास ‘दिव्या’ का प्रकाशन 1945 में हुआ था। उपन्यास के प्रकाशन के साथ ही यह ऐतिहासिक कथानक का उपन्यास होने के कारण उसी रूप में अपनी पैठ बना रहा था। कई बार इसके कथ्य को ध्यान में रखते हुए इसे बौद्धकालीन उपन्यास कहा गया है। जैसा कि ऐतिहासिक उपन्यासों के साथ अक्सर होता है 'दिव्या' के साथ भी वही परम्परा चल पड़ी अर्थात् उपन्यास के कथानक को बौद्धकालीन प्रामाणिकता पर परखना आलोचकों ने समीचीन समझा। बहरहाल। गोपाल राय की ‘उपन्यास की पहचान’ शृंखला में ‘दिव्या’ पाँचवीं पुस्तक है। आलोचक ने अपने स्तर पर न केवल कथानक की समीचीनता की पड़ताल की है बल्कि ‘अतीत, इतिहास और उपन्यास’ पर एक अध्याय भी इस पुस्तक के आरम्भ में रख दिया है। मूलत: मूल रचनाओं की पड़ताल करते हुए आलोचक मूल पाठ की व्यावहारिक आलोचना को भी प्राथमिकता देते हैं। ‘दिव्या’ के मूल पाठ पर गोपाल राय ने इन्हीं क​ड़ियों को सूत्रबद्ध करने का कार्य किया है। जैसे कि ‘दिव्या’ का कथा-संसार और उसके मार्मिक प्रसंग, पात्र, ऐतिहासिकता की कसौटी, दिव्या में चित्रित समाज और भारतीय संस्कृति अस्मितामूलक नारी-विमर्श की झलक, शिल्प और भाषा आदि-आदि की रचनात्मकता के स्तर पर गोपाल राय ने उपन्यास को खँघालने का महत्ती कार्य पूरा किया है। अत: उक्त आयामों की विविधता में उपन्यास की दृष्टि से दिव्या का मूल्यांकन गोपाल राय का इस आलोचनात्मक पुस्तक में प्राथमिक ध्येय रहा है। इस कार्य में वे कितनी उत्कृष्टता प्राप्त कर पाए हैं यह इस पुस्तक के अध्ययन से स्पष्ट होगा। यह भी ज्ञान होगा कि पाठ्यक्रमों की सीमाओं को पार करते हुए कोई आलोच्य कृति कितनी समयानुकूल और प्रासंगिक ठहरती है।

Upanyas Ki Pahchan : Divya

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Gopal Ray

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₹ 200

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Upanyas Ki Pahchan : Mahabhoj

  • Author Name:

    Gopal Ray

  • Book Type:
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Upanyas Ki Pahchan : Mahabhoj

Upanyas Ki Pahchan : Mahabhoj

Gopal Ray

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Ajneya Aur Unke Upanyas

  • Author Name:

    Gopal Ray

  • Book Type:
  • Description:

    उपन्यास की रचना-प्रक्रिया तो सैद्धान्तिकी गढ़ती ही है लेकिन एक आलोचक का दायित्व होता है कि वह रचना को व्यावहारिक मनोभूमि पर परखे। गोपाल राय ने अज्ञेय के उपन्यासों को उपन्यास की सैद्धान्तिकी के आधार पर देखते हुए उसके विश्लेषण को व्यावहारिक धरातल पर उकेरा है। यह पुस्तक वस्तुत: अज्ञेय के उपन्यासों की व्याख्या के क्रम में एक आरम्भिक मूल्यांकन का प्रयास है। अज्ञेय का उपन्यास-संसार मूल रूप में ‘शेखर : एक जीवनी’ (भाग-एक 1940 एवं भाग-दो 1944), ‘नदी के द्वीप’ (1951) और ‘अपने-अपने अजनबी’ (1961) तक विस्तृत है। आलोचक गोपाल राय ने इन्हीं उपन्यासों की रचना-भूमि पर अपनी लेखनी चलाई है। इस पुस्तक में अज्ञेय की जीवनी-रेखा, रचना परिवेश, साहित्य सम्बन्धी विचार का परिचयात्मक मूल्यांकन करते हुए; अज्ञेय के औपन्यासिक-संसार की व्यावहारिक समीक्षा लिखी गई है। ‘हिन्दी उपन्यास साहित्य में अज्ञेय का स्थान’ शीर्षक अध्याय उपन्यासकार अज्ञेय के लिए मूल्यांकन के प्रतिमान बनाने का कार्य भी करता है। इस तरह यह पुस्तक अज्ञेय के उपन्यासों के रूप और वस्तु की संरचना पर मूल्यांकन की प्राथमिक पहल करती जान पड़ती है। आशा है कि गोपाल राय की यह आलोचना कृति रचनकार अज्ञेय और उनके उपन्यासों की पड़ताल में पाठकों के बीच एक सेतु-निर्माण का कार्य करेगी।

Ajneya Aur Unke Upanyas

Ajneya Aur Unke Upanyas

Gopal Ray

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Available

Upanyas Ki Pahchan : Maila Aanchal

  • Author Name:

    Gopal Ray

  • Book Type:
  • Description:

    गोपाल राय द्वारा ‘उपन्यास की पहचान’ शृंखला में व्यावहारिक आलोचना को आधार बनाकर फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की अप्रतिम रचना ‘मैला आँचल’ को परखने की प्रा​थमिक कोशिश की गई है। कहते हैं कि ‘मैला आँचल’ के प्रकाशन के बाद हिन्दी में आंचलिक उपन्यासों का आन्दोलन-सा चल पड़ा। ऐसा नहीं है कि भारतीय ग्रामीण जीवन को केन्द्र रखकर उपन्यास न रचे गए हों; किन्तु आंचलिक उपान्यासालोचना का मानदंड रचने में ‘मैला आँचल’ की महत्ती भूमिका रही है। गोपाल राय ने ‘उपन्यास की पहचान’ शृंखला की कड़ी में इन्हीं तथ्यों का उद्घाटन करने के साथ, उपन्यास की व्यावहारिक आलोचना की सैद्धान्तिक पहचान का आधार ‘मैला आँचल’ के कथ्य और शिल्प में तराशने की समग्र कोशिश की है। यह पुस्तक आंचलिक उपन्यास की अवधारणा और हिन्दी उपन्यास की परम्परा को रेखांकित करने के साथ-साथ फणीश्वरनाथ रेणु की उपन्यास-यात्रा पर भी अपनी बात रखती है। ‘मैला आँचल’ के कथ्य, शिल्प, पात्र-योजना, भाषा आदि के रचनात्मक तत्त्वों पर प्राथमिक बयान दर्ज करती है। कह सकते हैं कि उपन्यास के रचनात्मक मानकों की व्यावहारिक परख करते हुए ‘मैला आँचल’ की पढ़त को यह पुस्तक नये आयाम प्रदान करेगी।

Upanyas Ki Pahchan : Maila Aanchal

Upanyas Ki Pahchan : Maila Aanchal

Gopal Ray

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695

₹ 556

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Pramanik Hindi-Angrezi-Urdu Shabdkosh

  • Author Name:

    Zubair Ahmad Bhagalpuri

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  • Description:

    प्रख्यात कोशकार ज़ुबैर अहमद भागलपुरी द्वारा सम्पादित यह डिक्शनरी एक नई अवधारणा पर आधारित है। यह एक ही समय में हिन्दी-अंग्रेज़ी शब्दकोश भी है और हिन्दी-उर्दू शब्दकोश भी। इस प्रकार दो शब्दकोशों के कुशलतापूर्वक मेल से तैयार यह त्रैभाषिक डिक्शनरी न केवल अत्यधिक उपयोगी बन गई है बल्कि कोश-निर्माण के क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान है। इसमें संकलित शब्दों की दृष्टि से देखें तो जनसामान्य के उपयोग की शब्दावली की प्रविष्टि तो इसमें है ही, राजकीय और प्रशासनिक स्तर पर इस्तेमाल में आने वाले पारिभाषिक शब्दों को भी इसमें शामिल किया गया है। शब्द-संकलन करते समय रोज़मर्रा के इस्तेमाल में आने वाले शब्दों को प्राथमिकता दी गई है। भाषा के स्वभाव और स्वरशास्त्र (फोनेटिक्स) को ध्यान में रखते हुए डिक्शनरी में शब्दों के उच्चारण में व्यावहारिकता पर बल दिया गया है। इसी कारण उर्दू के शब्द ‘ख्वाब’, ‘ख्वाजा’ और ‘ख्वाहिश’ जैसे शब्दों को इसमें ‘खाब’, ‘खाजा’ और ‘खाहिश’ लिखा गया है। उर्दू के किसी शब्द के अन्तिम अक्षर के अन्त में आने वाले ‘हा-ए-ख़फ़ी’ का देवनागरी लिप्यन्तरण करते समय अमूमन विसर्ग का उपयोग किया जाता है, लेकिन उच्चारण को ध्यान में रखते हुए यहाँ ऐसे शब्दों के लिप्यन्तरण में विसर्ग के बजाय ‘आ’ की मात्रा अर्थात ‘अलिफ़’ का उपयोग किया गया है। समान स्वर लेकिन भिन्न अर्थ रखने वाले शब्दों का अन्तर स्पष्ट करने के लिए उनके लिप्यन्तरण में नुक़्ते का प्रयोग किया गया है। इसमें अनेक बहुचर्चित तकनीकी शब्दों के उर्दू विकल्प भी दिये गए हैं। निश्चय ही यह सबके लिए अन्यन्त उपयोगी और संग्रहणीय है।

Pramanik Hindi-Angrezi-Urdu Shabdkosh

Pramanik Hindi-Angrezi-Urdu Shabdkosh

Zubair Ahmad Bhagalpuri

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₹ 559.2

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Hindi Aandolan Aur Nagari Pracharini Sabha

  • Author Name:

    Amish Verma

  • Book Type:
  • Description:

    उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्द्ध हिन्दी भाषा के स्वरूप निर्माण के लिए एक महत्त्वपूर्ण दौर था। इस समय हिन्दी को एक सुनिश्चित रूप देने के लिए कई स्तरों पर संगठित प्रयास भी हो रहे थे। हिन्दी को राष्ट्रीयता का आधार-बिन्दु मानकर जहाँ विदेशी शासकों का मुकाबला किया जा रहा था, वहीं उसे हिन्दू धर्म से जोड़कर उसे एक धार्मिक प्रतीक के रूप में भी खड़ा किया जा रहा था। नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना इसी सामाजिक, सांस्कृतिक वातावरण में 1893 में हुई। यह आश्चर्यजनक है कि हिन्दी भाषा और साहित्य के लिए समर्पित इस संस्था को लेकर हिन्दी में कोई महत्त्वपूर्ण अध्ययन अब तक नहीं हुआ है। युवा अध्येता अमिष वर्मा का यह अध्ययन ‘हिन्दी आन्दोलन और नागरीप्रचारिणी सभा’ इस कमी को दूर करता है। सभी उपलब्ध स्रोतों की श्रम-साध्य पड़ताल के आधार पर सम्पन्न यह शोध हिन्दी आन्दोलन के सन्दर्भ में सभा की शुरुआती गतिविधियों और उसकी भाषा-नीति का विश्लेषण करता है। इस पुस्तक से हम हिन्दी-उर्दू के अन्तर्सम्बन्धों के इतिहास से भी परिचित होते हैं। इसमें उन ऐतिहासिक कारणों को समझने का प्रयास किया गया है जिनके चलते ये दोनों भाषाएँ न सिर्फ अलग हो गईं, बल्कि दो अलग धर्मों से भी जुड़ गईं, और अभिव्यक्त‌ि का माध्यम न रहकर राजनीतिक औजार बन गईं। नागरीप्रचारिणी सभा की 1893-1902 की रिपोर्ट और पदाधिकारियों सम्बन्धी अन्य जानकारियाँ इस पुस्तक की विशेष उपलब्धि है जिसे परिशिष्ट में संयोजित किया गया है।

Hindi Aandolan Aur Nagari Pracharini Sabha

Hindi Aandolan Aur Nagari Pracharini Sabha

Amish Verma

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250

₹ 200

Available

Bhasha Ki Rajneeti, Gyan Ki Parampara

  • Author Name:

    Shubhneet Kaushik

  • Book Type:
  • Description:

    पिछले दो-तीन दशकों में हिन्दी नवजागरण और हिन्दी-नागरी आन्दोलन पर केन्द्रित अध्ययनों ने हिन्दी लोकवृत्त की हमारी समझ को निश्चित ही समृद्ध किया है। लेकिन जहाँ तक हिन्दी के भाषाई संगठनों का सवाल है तो ये अध्ययन हिन्दीभाषी क्षेत्र के इन भाषाई संगठनों के समूचे वजूद को प्रायः भाषायी राजनीति के चश्मे से ही देखते हैं। कहना न होगा कि ऐसा कोई भी मूल्यांकन उन भाषायी संगठनों की बहुआयामी गतिविधियों के आकलन का एक संकीर्ण और सीमित नजरिया है। ऐसे मूल्यांकनों में इन भाषायी संगठनों की वह भूमिका परिदृश्य से ओझल हो जाती है, जो वे हिन्दी लोकवृत्त में ज्ञानोत्पादन की प्रक्रिया में निभा रहे थे। इसलिए मौजूदा पुस्तक में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का इतिहास लिखते हुए उसे सिर्फ भाषा की राजनीति या हिन्दी-नागरी आन्दोलन में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की भूमिका तक ही सीमित नहीं किया गया है, बल्कि हिन्दी साहित्य सम्मेलन की बहुआयामी गतिविधियों और हिन्दी लोकवृत्त में ज्ञान के सृजन में सम्मेलन के योगदान को समग्रता से विश्लेषित करने का प्रयास भी इसमें हुआ है।

    ‘भाषा की राजनीति, ज्ञान की परम्परा’ एक संस्था के रूप में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के इतिहास को उसकी समग्रता में प्रस्तुत करने का प्रयास है। इसमें हिन्दी लोकवृत्त के निर्माण में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की भूमिका और उसके योगदान का विस्तृत विश्लेषण तो हुआ ही है। साथ ही, हिन्दी साहित्य सम्मेलन के स्थापना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसकी शुरुआती गतिविधियों, सम्मेलन के वार्षिक अधिवेशनों, सम्मेलन द्वारा कराई जाने वाली परीक्षाओं और उसके प्रकाशनों की चर्चा भी इस पुस्तक में विस्तार से की गई है। हिन्दी-नागरी आन्दोलन से सम्बद्ध अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर सम्मेलन ने कैसे काम किया, इसका विश्लेषण भी इसमें हुआ है। बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में भाषा की राजनीति ने कैसे करवट ली और हिन्दी साहित्य सम्मेलन की इसमें क्या भूमिका रही, इतिहास-लेखन के क्षेत्र में हिन्दी साहित्य सम्मेलन और उससे जुड़े विद्वानों और इतिहासकारों के मत और उनके योगदान की पड़ताल के साथ ही हिन्दी में विज्ञान सम्बन्धी लेखन के क्षेत्र में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के योगदान को भी इस पुस्तक में विश्लेषित किया गया है.

Bhasha Ki Rajneeti, Gyan Ki Parampara

Bhasha Ki Rajneeti, Gyan Ki Parampara

Shubhneet Kaushik

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250

₹ 200

Available

Gopan Aur Ayan : Khand���1-Pape

  • Author Name:

    Sitanshu Yashashchandra

  • Book Type:
  • Description:

    गुजराती आदि भारतीय भाषाएँ एक विस्तृत सेमिओटिक नेटवर्क अर्थात संकेतन-अनुबन्ध-व्यवस्था का अन्य-समतुल्य हिस्सा हैं। मूल बात ये है कि विशेष को मिटाए बिना सामान्य अथवा साधारण की रचना करने की, और तुल्यमूल्य संकेतकों से बुनी हुई एक संकेतन-व्यवस्था रचने की जो भारतीय क्षमता है, उसका जतन होता रहे। राष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय राज्यसत्ता, उपभोक्तावाद को बढ़ावा देनेवाली, सम्मोहक वाग्मिता के छल पर टिकी हुई धनसत्ता एवं आत्ममुग्ध, असहिष्णु विविध विचारसरणियाँ/आइडियोलॉजीज़ की तंत्रात्मक सत्ता आदि परिबलों से शासित होने से भारतीय क्षमता को बचाते हुए उस का संवर्धन होता रहे।

    गुजराती से मेरे लेखों के हिन्दी अनुवाद करने का काम सरल तो था नहीं। गुजराती साहित्य की अपनी निरीक्षण परम्परा तथा सृजनात्मक लेखन की धारा बड़ी लम्बी है और उसी में से मेरी साहित्य तत्त्व-मीमांसा एवं कृतिनिष्ठ तथा तुलनात्मक आलोचना की परिभाषा निपजी है। उसी में मेरी सोच प्रतिष्ठित (एम्बेडेड) है। भारतीय साहित्य के गुजराती विवर्तों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जाने बिना मेरे लेखन का सही अनुवाद करना सम्भव नहीं है, मैं जानता हूँ। इसीलिए, इन लेखों का हिन्दी अनुवाद टिकाऊ स्नेह और बड़े कौशल्य से जिन्होंने किया है, उन अनुवादक सहृदयों का मैं गहरा ऋणी हूँ।

    ये पुस्तक पढ़नेवाले हिन्दीभाषी सहृदय पाठकों का सविनय धन्यवाद, जिनकी दृष्टि का जल मिलने से ही तो यह पन्ने पल्लवित होंगे।    

    —सितांशु यशश्चन्द्र (प्रस्तावना से)

     

    ''हमारी परम्परा में गद्य को कवियों का निकष माना गया है। रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत हम इधर सक्रिय भारतीय कवियों के गद्य के अनुवाद की एक सीरीज़ प्रस्तुत कर रहे हैं। इस सीरीज़ में बाङ्ला के मूर्धन्य कवि शंख घोष के गद्य का संचयन दो खंडों में प्रकाशित हो चुका है। अब गुजराती कवि सितांशु यशश्चन्द्र के गद्य का हिन्दी अनुवाद दो जिल्दों में पेश है। पाठक पाएँगे कि सितांशु के कवि-चिन्तन का वितान गद्य में कितना व्यापक है—उसमें परम्परा, आधुनिकता, साहित्य के कई पक्षों से लेकर कुछ स्थानीयताओं पर कुशाग्रता और ताज़ेपन से सोचा गया है। हमें भरोसा है कि यह गद्य हिन्दी की अपनी आलोचना में कुछ नया जोड़ेगा।"         —अशोक वाजपेयी

Gopan Aur Ayan : Khand���1-Pape

Gopan Aur Ayan : Khand���1-Pape

Sitanshu Yashashchandra

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₹ 280

Available

Gopan Aur Ayan : Khand 1

  • Author Name:

    Sitanshu Yashashchandra

  • Book Type:
  • Description:

    गुजराती आदि भारतीय भाषाएँ एक विस्तृत सेमिओटिक नेटवर्क अर्थात संकेतन-अनुबन्ध-व्यवस्था का अन्य-समतुल्य हिस्सा हैं। मूल बात ये है कि विशेष को मिटाए बिना सामान्य अथवा साधारण की रचना करने की, और तुल्यमूल्य संकेतकों से बुनी हुई एक संकेतन-व्यवस्था रचने की जो भारतीय क्षमता है, उसका जतन होता रहे। राष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय राज्यसत्ता, उपभोक्तावाद को बढ़ावा देनेवाली, सम्मोहक वाग्मिता के छल पर टिकी हुई धनसत्ता एवं आत्ममुग्ध, असहिष्णु विविध विचारसरणियाँ/आइडियोलॉजीज़ की तंत्रात्मक सत्ता आदि परिबलों से शासित होने से भारतीय क्षमता को बचाते हुए उस का संवर्धन होता रहे। गुजराती से मेरे लेखों के हिन्दी अनुवाद करने का काम सरल तो था नहीं। गुजराती साहित्य की अपनी निरीक्षण परम्परा तथा सृजनात्मक लेखन की धारा बड़ी लम्बी है और उसी में से मेरी साहित्य तत्त्व-मीमांसा एवं कृतिनिष्ठ तथा तुलनात्मक आलोचना की परिभाषा निपजी है। उसी में मेरी सोच प्रतिष्ठित (एम्बेडेड) है। भारतीय साहित्य के गुजराती विवर्तों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जाने बिना मेरे लेखन का सही अनुवाद करना सम्भव नहीं है, मैं जानता हूँ। इसीलिए, इन लेखों का हिन्दी अनुवाद टिकाऊ स्नेह और बड़े कौशल्य से जिन्होंने किया है, उन अनुवादक सहृदयों का मैं गहरा ऋणी हूँ। ये पुस्तक पढ़नेवाले हिन्दीभाषी सहृदय पाठकों का सविनय धन्यवाद, जिनकी दृष्टि का जल मिलने से ही तो यह पन्ने पल्लवित होंगे। —सितांशु यशश्चन्द्र (प्रस्तावना से) ''हमारी परम्परा में गद्य को कवियों का निकष माना गया है। रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत हम इधर सक्रिय भारतीय कवियों के गद्य के अनुवाद की एक सीरीज़ प्रस्तुत कर रहे हैं। इस सीरीज़ में बाङ्ला के मूर्धन्य कवि शंख घोष के गद्य का संचयन दो खंडों में प्रकाशित हो चुका है। अब गुजराती कवि सितांशु यशश्चन्द्र के गद्य का हिन्दी अनुवाद दो जिल्दों में पेश है। पाठक पाएँगे कि सितांशु के कवि-चिन्तन का वितान गद्य में कितना व्यापक है—उसमें परम्परा, आधुनिकता, साहित्य के कई पक्षों से लेकर कुछ स्थानीयताओं पर कुशाग्रता और ताज़ेपन से सोचा गया है। हमें भरोसा है कि यह गद्य हिन्दी की अपनी आलोचना में कुछ नया जोड़ेगा।" —अशोक वाजपेयी

Gopan Aur Ayan : Khand 1

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Sitanshu Yashashchandra

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Available

Drishya Aur Dhwaniyan : Khand 2

  • Author Name:

    Sitanshu Yashashchandra

  • Book Type:
  • Description:

    गुजराती आदि भारतीय भाषाएँ एक विस्तृत सेमिओटिक नेटवर्क अर्थात् संकेतन-अनुबन्ध-व्यवस्था का अन्य-समतुल्य हिस्सा हैं। मूल बात ये है कि विशेष को मिटाए बिना सामान्य अथवा साधारण की रचना करने की, और तुल्य-मूल्य संकेतकों से बुनी हुई एक संकेतन-व्यवस्था रचने की जो भारतीय क्षमता है, उसका जतन होता रहे। राष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय राज्यसत्ता, उपभोक्तावाद को बढ़ावा देनेवाली, सम्मोहक वाग्मिता के छल पर टिकी हुई धनसत्ता एवं आत्ममुग्ध, असहिष्णु विविध विचारसरणियाँ/आइडियोलॉजीज़ की तंत्रात्मक सत्ता, आदि परिबलों से शासित होने से भारतीय क्षमता को बचाते हुए, उस का संवर्धन होता रहे। गुजराती में से मेरे लेखों के हिन्दी अनुवाद करने का काम सरल तो था नहीं। गुजराती साहित्य की अपनी निरीक्षण परम्परा तथा सृजनात्मक लेखन की धारा बड़ी लम्बी है और उसी में से मेरी साहित्य तत्त्व-मीमांसा एवं कृतिनिष्ठ तथा तुलनात्मक आलोचना की परिभाषा निपजी है। उसी में मेरी सोच प्रतिष्ठित (एम्बेडेड) है। भारतीय साहित्य के गुजराती विवर्तों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जाने बिना मेरे लेखन का सही अनुवाद करना सम्भव नहीं है, मैं जानता हूँ। इसीलिए इन लेखों का हिन्दी अनुवाद टिकाऊ स्नेह और बड़े कौशल्य से जिन्होंने किया है, उन अनुवादक सहृदयों का मैं गहरा ऋणी हूँ। ये पुस्तक पढ़नेवाले हिन्दीभाषी सहृदय पाठकों का सविनय धन्यवाद, जिनकी दृष्टि का जल मिलने से ही तो यह पन्ने पल्लवित होंगे। —सितांशु यशश्चन्द्र (प्रस्तावना से) 'हमारी परम्परा में गद्य को कवियों का निकष माना गया है। रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत हम इधर सक्रिय भारतीय कवियों के गद्य के अनुवाद की एक सीरीज़ प्रस्तुत कर रहे हैं। इस सीरीज़ में बाङ्ला के मूर्धन्य कवि शंख घोष के गद्य का संचयन दो खण्डों में प्रकाशित हो चुका है। अब गुजराती कवि सितांशु यशश्चन्द्र के गद्य का हिन्दी अनुवाद दो जि़ल्दों में पेश है। पाठक पाएँगे कि सितांशु के कवि-चिन्तन का वितान गद्य में कितना व्यापक है—उसमें परम्परा, आधुनिकता, साहित्य के कई पक्षों से लेकर कुछ स्थानीयताओं पर कुशाग्रता और ताज़ेपन से सोचा गया है। हमें भरोसा है कि यह गद्य हिन्दी की अपनी आलोचना में कुछ नया जोड़ेगा।"     —अशोक वाजपेयी

Drishya Aur Dhwaniyan : Khand 2

Drishya Aur Dhwaniyan : Khand 2

Sitanshu Yashashchandra

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₹ 280

Available

Stree Kavita : Paksh Aur Pariprekshya

  • Author Name:

    Rekha Sethi

  • Book Type:
  • Description:

    एक मानवीय इकाई के रूप में स्त्री और पुरुष, दोनों अपने समय व यथार्थ के साझे भोक्ता हैं लेकिन परिस्थितियाँ समान होने पर भी स्त्री-दृष्टि दमन के जिन अनुभवों व मन:स्थितियों से बन रही है, मुक्ति की आकांक्षा जिस तरह करवटें बदल रही है, उसमें यह स्वाभाविक है कि साहित्यिक संरचना तथा आलोचना, दोनों की प्रणालियाँ बदलें। स्त्री-लेखन स्त्री की चिन्तनशील मनीषा के विकास का ही ग्राफ़ है जिससे सामाजिक इतिहास का मानचित्र गढ़ा जाता है और जेंडर तथा साहित्य पर हमारा दिशा-बोध निर्धारित होता है। भारतीय समाज में जाति एवं वर्ग की संरचना जेंडर की अवधारणा और स्त्री-अस्मिता को कई स्तरों पर प्रभावित करती है। स्त्री-कविता पर केन्द्रित प्रस्तुत अध्ययन जो कि तीन खंडों में संयोजित है, स्त्री-रचनाशीलता को समझने का उपक्रम है, उसका निष्कर्ष नहीं। पहले खंड, 'स्त्री-कविता : पक्ष और परिप्रेक्ष्य' में स्त्री-कविता की प्रस्तावना के साथ-साथ गगन गिल, कात्यायनी, अनामिका, सविता सिंह, नीलेश रघुवंशी, निर्मला पुतुल और सुशीला टाकभौरे पर विस्तृत लेख हैं। एक अर्थ में ये सभी वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य में विविध स्त्री-स्वरों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। उनकी कविता में स्त्री-पक्ष के साथ-साथ अन्य सभी पक्षों को आलोचना के केन्द्र में रखा गया है, जिससे स्त्री-कविता का बहुआयामी रूप उभरता है। दूसरा खंड, 'स्त्री-कविता : पहचान और द्वन्द्व' स्त्री-कविता की अवधारणा को लेकर स्त्री-पुरुष रचनाकारों से बातचीत पर आधारित है। इन रचनाकारों की बातों से उनकी कविताओं का मिलान करने पर उनके रचना-जगत को समझने में तो सहायता मिलती ही है, स्त्री-कविता सम्बन्धी उनकी सोच भी स्पष्ट होती है। स्त्री-कविता को लेकर स्त्री-दृष्टि और पुरुष-दृष्टि में जो साम्य और अन्तर है, उसे भी इन साक्षात्कारों में पढ़ा जा सकता है। तीसरा खंड, 'स्त्री-कविता : संचयन' के रूप में प्रस्तावित है...। इन सारे प्रयत्नों की सार्थकता इसी बात में है कि स्त्री-कविता के माध्यम से साहित्य और जेंडर के सम्बन्ध को समझते हुए मूल्यांकन की उदार कसौटियों का निर्माण हो सके जिसमें सबका स्वर शामिल हो।

Stree Kavita : Paksh Aur Pariprekshya

Stree Kavita : Paksh Aur Pariprekshya

Rekha Sethi

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299

₹ 239.2

Available

Stree Kavita : Pahachan Aur Dwand

  • Author Name:

    Rekha Sethi

  • Book Type:
  • Description:

    एक मानवीय इकाई के रूप में स्त्री और पुरुष, दोनों अपने समय व यथार्थ के साझे भोक्ता हैं लेकिन परिस्थितियाँ समान होने पर भी स्त्री-दृष्टि दमन के जिन अनुभवों व मन:स्थितियों से बन रही है, मुक्ति की आकांक्षा जिस तरह करवटें बदल रही है, उसमें यह स्वाभाविक है कि साहित्यिक संरचना तथा आलोचना, दोनों की प्रणालियाँ बदलें। स्त्री-लेखन स्त्री की चिन्तनशील मनीषा के विकास का ही ग्राफ़ है जिससे सामाजिक इतिहास का मानचित्र गढ़ा जाता है और जेंडर तथा साहित्य पर हमारा दिशा-बोध निर्धारित होता है। भारतीय समाज में जाति एवं वर्ग की संरचना जेंडर की अवधारणा और स्त्री-अस्मिता को कई स्तरों पर प्रभावित करती है। स्त्री-कविता पर केन्द्रित प्रस्तुत अध्ययन जो कि तीन खंडों में संयोजित है, स्त्री-रचनाशीलता को समझने का उपक्रम है, उसका निष्कर्ष नहीं। पहले खंड, 'स्त्री-कविता : पक्ष और परिप्रेक्ष्य' में स्त्री-कविता की प्रस्तावना के साथ-साथ गगन गिल, कात्यायनी, अनामिका, सविता सिंह, नीलेश रघुवंशी, निर्मला पुतुल और सुशीला टाकभौरे पर विस्तृत लेख हैं। एक अर्थ में ये सभी वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य में विविध स्त्री-स्वरों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। उनकी कविता में स्त्री-पक्ष के साथ-साथ अन्य सभी पक्षों को आलोचना के केन्द्र में रखा गया है, जिससे स्त्री-कविता का बहुआयामी रूप उभरता है। दूसरा खंड, 'स्त्री-कविता : पहचान और द्वन्द्व' स्त्री-कविता की अवधारणा को लेकर स्त्री-पुरुष रचनाकारों से बातचीत पर आधारित है। इन रचनाकारों की बातों से उनकी कविताओं का मिलान करने पर उनके रचना-जगत को समझने में तो सहायता मिलती ही है, स्त्री-कविता सम्बन्धी उनकी सोच भी स्पष्ट होती है। स्त्री-कविता को लेकर स्त्री-दृष्टि और पुरुष-दृष्टि में जो साम्य और अन्तर है, उसे भी इन साक्षात्कारों में पढ़ा जा सकता है। तीसरा खंड, 'स्त्री-कविता : संचयन' के रूप में प्रस्तावित है...। इन सारे प्रयत्नों की सार्थकता इसी बात में है कि स्त्री-कविता के माध्यम से साहित्य और जेंडर के सम्बन्ध को समझते हुए मूल्यांकन की उदार कसौटियों का निर्माण हो सके जिसमें सबका स्वर शामिल हो।

Stree Kavita : Pahachan Aur Dwand

Stree Kavita : Pahachan Aur Dwand

Rekha Sethi

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Fijeedvip Mein Mere 21 Varsh

  • Author Name:

    Totaram Sanadhya

  • Book Type:
  • Description:

    ब्रिटिशकालीन भारतीय पराधीनता का एक त्रासद अध्याय है गिरमिटिया। गिरमिटिया यानी एग्रीमेंट के तहत देश के बाहर कुलीगीरी करने के लिए जबरन भेजा जाना। भूख, बेरोजगारी, उत्पीड़न या गृह कलह के चलते घर-परिवार छोड़नेवाले स्त्री-पुरुषों की मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें झाँसा देकर अज्ञात देश में भेज देना। सन् 1879 से लेकर सन् 1916 तक 60553 भारतीय ‘गिरमिटिया’ बनाकर फिजीद्वीप भेजे जा चुके थे। इन अभिशप्त भारतीयों के शापमोचन के लिए जो लोग आगे आये उनमें एक नाम था पण्डित तोताराम सनाढ्य का। कौन थे ये तोतारामजी? क्या रिश्ता बनता था उनका फिजी से और गिरमिटिया भारतीयों से? परदुखकातर एक सामान्य भारतीय जिन्होंने खुद इक्कीस वर्षों तक गिरमिटिया की यातना-भरी जिन्दगी जी; मुक्ति संघर्ष का आगाज किया। यूँ तो ‘गिरमिटिया’ प्रथा पर प्रेमचन्द और प्रसाद समेत कई दिग्गजों ने लिखा है पर स्वयं का भोगा हुआ सच सिर्फ और सिर्फ तोताराम सनाढ्य का ही है। इतिहास के अध्येताओं से लेकर आम पाठकों तक के लिए जानकारियों से भरी एक रोचक और जरूरी किताब!

Fijeedvip Mein Mere 21 Varsh

Fijeedvip Mein Mere 21 Varsh

Totaram Sanadhya

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Ram Manohar Lohiya : Bharat Ki Himalay Niti

  • Author Name:

    Ashok Pankaj

  • Book Type:
  • Description:

    लोहिया पूछते हैं कि 'हिमालय भारत का संतरी है' यह ख्याल कहाँ से आया? जिस हिमालय का भारत के लिए चातुर्दिक महत्त्व है क्या उसको लेकर भारत की कोई नीति है? तिब्बत का जितना गहरा संबंध भारत से रहा है क्या उसी तरह के संबंध उसके चीन से रहें हैं? नेपाल, भूटान जिसे उन्होंने 'भाई हिमालय' कहा है, के साथ भारत के संबंधों का आधार क्या होना चाहिए? तिब्बत में स्थित कैलाश-मानसरोवर किसकी विरासत है? भारत-चीन संबंधों का आधार और समझने का दृष्टिकोण क्या होना चाहिए? एशिया की दो पुरातन सभ्याताएँ जो आज दो विभिन्न प्रणालियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, और जिनकी प्रतिस्पर्द्धात्मक महत्त्वकांक्षाएँ हैं, में सामंजस्य कैसे हो ? इन प्रश्नों का उत्तर लोहिया भारत की हिमालय नीति के माध्यम से देते हैं और इसी क्रम में भारत की विदेश एवं रक्षा नीति को लेकर कुछ स्थूल सिद्धांत देते हैं, जिसके कुछ सूत्र को 'बांह और मुट्ठी', 'कबूतर एवं बाज' की उपमा से भी स्पष्ट करते हैं। लोहिया नीतिगत परामर्श देते हैं कि, भारत को इतिहास की गलतियों से सबक सीखना चाहिए और अपनी अंदरूनी कमजोरियों को भी दुरुस्त करना चाहिए। इसी क्रम में वे एक ओर शिवाजी और प्रताप को पुकारते हैं तो दूसरी ओर गांधी को ही गुरू मानते हैं। क्या भारत लोहिया के विचारों से कुछ सीख ले सकता है? यही इस पुस्तक की मूल भावना है।

Ram Manohar Lohiya : Bharat Ki Himalay Niti

Ram Manohar Lohiya : Bharat Ki Himalay Niti

Ashok Pankaj

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Smritiyon Ki Basti

  • Author Name:

    Abdul Bismillah

  • Book Type:
  • Description:

    ‘स्मृतियों की बस्ती’ कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह के संस्मरणों का संग्रह है। इन संस्मरणों के केन्द्र में हैं हिन्दी के वे महान व्यक्तित्व जिनसे उनकी भेंट-मुलाक़ात हुई, जिनसे उन्होंने सीखा और जिन्हें उन्होंने अपने ढंग से समझा। संस्मरणों की विशेषता यह है कि वे उनके व्यक्तित्व को ही नहीं, उनकी रचनात्मकता, उनके अवदान को रेखांकित करते हुए उनका चित्र पाठक के सामने रखते हैं। बहुभाषाविद् त्रिलोचन के बारे में लिखते हुए उनकी इस मान्यता पर विशेष ज़ोर देते हैं कि शब्द का अर्थ शब्दकोश से नहीं बोध से खुलता है, प्रत्यक्ष अनुभव से खुलता है। इसी तरह अमृतलाल नागर से जुड़े संस्मरण में वे उनके साथ लखनऊ शहर के कुछ सजीव चित्र भी आँकते हैं जो नागर जी के व्यक्तित्व को और अच्छे ढंग से समझने में सहायक होते हैं। उनकी तुलना वे बरगद से करते हैं, तो अमरकान्त की अशोक वृक्ष से। बताते हैं कि अमरकान्त हिन्दू-मुस्लिम समस्या पर बहुत सोचते थे। कहते थे कि ‘विभाजन सिर्फ़ वही नहीं जो भारत-पाकिस्तान के बीच हुआ, यह एक सार्वभौम प्रक्रिया है। इस पर गम्भीरतापूर्व सोचा नहीं गया।’ इसी प्रकार हजारीप्रसाद द्विवेदी, नागार्जुन, केदारनाथ सिंह, हरिवंश राय बच्चन, हरिशंकर परसाई, दूधनाथ सिंह, सोमदत्त, काशीनाथ सिंह, चित्रकार भाऊ समर्थ तथा फ़िराक़ गोरखपुरी, अलग-अलग समय पर हुई मुलाक़ातों-वार्ताओं को जोड़कर उन्होंने इनमें से हर किसी को हमारे और नज़दीक ला दिया है। ज़ाहिर है इनके साथ इन संस्मरणों में हम उस दौर के साहित्यिक वातावरण और उनके समकालीन अन्य लोगों को भी देखते हैं। एक संग्रहणीय पुस्तक।

Smritiyon Ki Basti

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Abdul Bismillah

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Hawaon Kee Dastak

  • Author Name:

    Anurag Chaturvedi

  • Book Type:
  • Description:

    ‘हवाओं की दस्तक’ यादों से भरी ऐसी आत्मकथात्मक किताब है जो बदलते समय की दास्तान अपने तरीक़े से सुनाती है। बदलाव की आहट देती हवाओं की दस्तक आपको बरास्ता उदयपुर, दिल्ली, मुम्बई और बिहार ले जाती है, जहाँ समय बदल रहा है, शताब्दी बदल रही है। यह समाजवादी मन वाले परिवार की मोहक दुनिया से जुड़ी वह कथा है जो समाजवादी सपने के टूट जाने की त्रासदी से जुड़ी है। इस यात्रा में लेखक न केवल पत्रकारिता के हिमालय के पिघलते चले जाने का गवाह बनता है बल्कि पूरी हिन्दी पत्रकारिता के ही अप्रासंगिक होने को महसूस करता है, उसे ख़त्म होते देखता है। मुम्बई जैसे शहर के सतरंगे मिज़ाज के बदलने की कथा कहती यह किताब आपके मन को कमजोर नहीं करती, उसे संकल्प और उम्मीद की शक्ति देती है। दुनिया को अलग रंग से उकेरती यह किताब समय का दस्तावेज है।

Hawaon Kee Dastak

Hawaon Kee Dastak

Anurag Chaturvedi

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Dastambu

  • Author Name:

    Mirza Ghalib

  • Book Type:
  • Description:

    मिर्ज़ा असद-उल्लाह ख़ाँ ग़ालिब का नाम भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के महान कवियों में शामिल है! मिर्ज़ा ग़ालिब ने 1857 के आन्दोलन के सम्बन्ध में अपनी जो रूदाद लिखी है, उससे उनकी राजनीतिक विचारधारा और भारत में अंग्रेज़ी राज के सम्बन्ध में उनके दृष्टिकोण को समझने में काफ़ी मदद मिल सकती है! अपनी यह रूदाद उन्होंने लगभग डायरी की शक्ल में प्रस्तुत की है। और फ़ारसी भाषा में लिखी गई इस छोटी-सी पुस्तिका का नाम है—‘दस्तंबू’। फ़ारसी भाषा में 'दस्तंबू' शब्द का अर्थ है पुष्पगुच्छ, अर्थात् बुके (Bouquet)। अपनी इस छोटी-सी किताब 'दस्तंबू' में ग़ालिब ने 11 मई, 1857 से 31 जुलाई, 1857 तक की हलचलों का कवित्वमय वर्णन किया है। 'दस्तंबू' में ऐसे अनेक चित्र हैं जो अनायास ही पाठक के मर्म को छू लेते हैं। किताब के बीच-बीच में उन्होंने जो कविताई की है, उसके अतिरिक्त गद्य में भी कविता का पूरा स्वाद महसूस होता है। जगह-जगह बेबसी और अन्तर्द्वन्द्व की अनोखी अभिव्यक्तियाँ भरी हुई हैं। इस तरह 'दस्तंबू' में न केवल 1857 की हलचलों का वर्णन है, बल्कि ग़ालिब के निजी जीवन की वेदना भी भरी हुई है। ‘दस्तंबू’ के प्रकाशन को लेकर ग़ालिब ने अनेक लम्बे-लम्बे पत्र मुंशी हरगोपाल ‘तफ़्त:’ को लिखे हैं। अध्येताओं की सुविधा के लिए सारे पत्र पुस्तक के अन्त में दिए गए हैं। भारत की पहली जनक्रान्ति, उससे उत्पन्न परिस्थितियाँ और ग़ालिब की मनोवेदना को समझने के लिए ‘दस्तंबू’ एक ज़रूरी किताब है। इसे पढ़ने का मतलब है सन् 1857 को अपनी आँखों से देखना और अपने लोकप्रिय शाइर की संवेदनाओं से साक्षात्कार करना। —भूमिका से

Dastambu

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Mirza Ghalib

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₹ 159.2

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Toofanon Ke Beech

  • Author Name:

    Rangeya Raghav

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  • Description:

    ‘तूफानों के बीच’ रांगेय राघव का मार्मिक रिपोर्ताज है। अपनी विशिष्ट वर्णन शैली और व्यापक मानवीय सरोकारों के चलते यह रचना अत्यन्त हृदयग्राही सिद्ध हुई है। रांगेय राघव ने पुस्तक की भूमिका में लिखा है, ‘बंगाल का अकाल मानवता के इतिहास का बहुत बड़ा कलंक है। शायद क्लियोपेट्रा भी धन के वैभव और साम्राज्य की लिप्सा में अपने ग़ुलामों को इतना भीषण दुख नहीं दे सकीं, जितना आज एक साम्राज्य और अपने ही देश के पूँजीवाद ने बंगाल के करोड़ों आदमी, औरतों और बच्चों को भूखा मारकर दिया है। आगरे के सैकड़ों मनुष्यों ने दान नहीं, अपना कर्तव्य समझकर एक मेडिकल जत्था बंगाल भेजा था। जनता के इन प्रतिनिधियों को बंगाल की जनता ने ही नहीं, वरन् मंत्रिमंडल के सदस्यों तक ने धन्यवाद दिया था। किन्तु मैं जनता से स्फूर्ति पाकर यह सब लिख सका हूँ। मैंने यह सब आँखों-देखा लिखा है।’ एक पठनीय और संग्रहणीय पुस्तक।

Toofanon Ke Beech

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