Fijeedvip Mein Mere 21 Varsh
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ब्रिटिशकालीन भारतीय पराधीनता का एक त्रासद अध्याय है गिरमिटिया। गिरमिटिया यानी एग्रीमेंट के तहत देश के बाहर कुलीगीरी करने के लिए जबरन भेजा जाना। भूख, बेरोजगारी, उत्पीड़न या गृह कलह के चलते घर-परिवार छोड़नेवाले स्त्री-पुरुषों की मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें झाँसा देकर अज्ञात देश में भेज देना। सन् 1879 से लेकर सन् 1916 तक 60553 भारतीय ‘गिरमिटिया’ बनाकर फिजीद्वीप भेजे जा चुके थे। इन अभिशप्त भारतीयों के शापमोचन के लिए जो लोग आगे आये उनमें एक नाम था पण्डित तोताराम सनाढ्य का। कौन थे ये तोतारामजी? क्या रिश्ता बनता था उनका फिजी से और गिरमिटिया भारतीयों से? परदुखकातर एक सामान्य भारतीय जिन्होंने खुद इक्कीस वर्षों तक गिरमिटिया की यातना-भरी जिन्दगी जी; मुक्ति संघर्ष का आगाज किया। यूँ तो ‘गिरमिटिया’ प्रथा पर प्रेमचन्द और प्रसाद समेत कई दिग्गजों ने लिखा है पर स्वयं का भोगा हुआ सच सिर्फ और सिर्फ तोताराम सनाढ्य का ही है। इतिहास के अध्येताओं से लेकर आम पाठकों तक के लिए जानकारियों से भरी एक रोचक और जरूरी किताब!
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ब्रिटिशकालीन भारतीय पराधीनता का एक त्रासद अध्याय है गिरमिटिया। गिरमिटिया यानी एग्रीमेंट के तहत देश के बाहर कुलीगीरी करने के लिए जबरन भेजा जाना। भूख, बेरोजगारी, उत्पीड़न या गृह कलह के चलते घर-परिवार छोड़नेवाले स्त्री-पुरुषों की मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें झाँसा देकर अज्ञात देश में भेज देना। सन् 1879 से लेकर सन् 1916 तक 60553 भारतीय ‘गिरमिटिया’ बनाकर फिजीद्वीप भेजे जा चुके थे।
इन अभिशप्त भारतीयों के शापमोचन के लिए जो लोग आगे आये उनमें एक नाम था पण्डित तोताराम सनाढ्य का। कौन थे ये तोतारामजी? क्या रिश्ता बनता था उनका फिजी से और गिरमिटिया भारतीयों से? परदुखकातर एक सामान्य भारतीय जिन्होंने खुद इक्कीस वर्षों तक गिरमिटिया की यातना-भरी जिन्दगी जी; मुक्ति संघर्ष का आगाज किया।
यूँ तो ‘गिरमिटिया’ प्रथा पर प्रेमचन्द और प्रसाद समेत कई दिग्गजों ने लिखा है पर स्वयं का भोगा हुआ सच सिर्फ और सिर्फ तोताराम सनाढ्य का ही है। इतिहास के अध्येताओं से लेकर आम पाठकों तक के लिए जानकारियों से भरी एक रोचक और जरूरी किताब!
Book Details
-
ISBN9788189914615
-
Pages127
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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