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धीमी आँच पर धरती की मोटी सतह के भीतर हलके-हलके खदबदाता कुछ—फट पड़ने की तरफ़ एक-एक क़दम रखता हुआ। रवीन्द्र भारती की इन कविताओं की तुलना में अगर कोई बिम्ब गढ़ना चाहे तो वह कुछ ऐसा होगा। जो मन इन कविताओं में न्यस्त है। यह मुँडेर पर खड़ा चीख़ता हुआ मन नहीं है, यह गली के कोलाहल को परत-परत छील चुका और उसके परदे में छिपी तमाम मामूलियत को पहचान चुका मन है, और अब बदलाव को उतनी ही गहराई और सच्चाई से शुरू होते देखना चाहता है जितने गहरे उसकी बेचैनी खदबदा रही है।</p> <p>बिलकुल हमारे आसपास के सन्दर्भों में एकदम सहज तत्त्वों और तथ्यों को वे तिनके की तरह उठाते हैं, एक दुर्लभ शान्त तन्मयता के साथ इशारों में ही उनको स्पर्श करते हैं, और हमें मालूम भी नहीं होता कि हमारी सोई संवेदना क़तई भिन्न-आलोक में जाग पड़ती है। उनकी कविताओं में प्रतीकों का एक अनन्त विस्तार है जिसकी पहुँच प्रकृति, अन्तरिक्ष और सृष्टि के आदि-अन्त तक है। ये कविताएँ हमें कभी बहुत ऊँचे से, लगभग किसी सिद्ध भिक्षु की तरह सम्बोधित करती हैं और कभी ठीक हमारे सामने आकर किसी संगी-साथी की तरह, ऐसा साथी जो हमसे ज़्यादा अक्लमन्द है लेकिन उस अक्लमन्दी को भी जिसने अपनी अर्जित अनाक्रमकता की पवित्र तहों में कहीं पिरो लिया है।</p> <p>इस नज़रिए से वे अब भी एक ताज़ा कवि हैं, जो हमें हमारे अभ्यस्त पुरानेपन की ज़द से बाहर ले जाते हैं और चीज़ों को देखने की नई दृष्टि देते हैं जिससे हमारा आन्तरिक स्पेस रचनात्मक हो उठता है। कहना होगा कि हिन्दी कविता के कुछ तत्त्व जो बहुप्रतीक्षित थे, इन कविताओं में प्रकट होते हैं।
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धीमी आँच पर धरती की मोटी सतह के भीतर हलके-हलके खदबदाता कुछ—फट पड़ने की तरफ़ एक-एक क़दम रखता हुआ। रवीन्द्र भारती की इन कविताओं की तुलना में अगर कोई बिम्ब गढ़ना चाहे तो वह कुछ ऐसा होगा। जो मन इन कविताओं में न्यस्त है। यह मुँडेर पर खड़ा चीख़ता हुआ मन नहीं है, यह गली के कोलाहल को परत-परत छील चुका और उसके परदे में छिपी तमाम मामूलियत को पहचान चुका मन है, और अब बदलाव को उतनी ही गहराई और सच्चाई से शुरू होते देखना चाहता है जितने गहरे उसकी बेचैनी खदबदा रही है।</p>
<p>बिलकुल हमारे आसपास के सन्दर्भों में एकदम सहज तत्त्वों और तथ्यों को वे तिनके की तरह उठाते हैं, एक दुर्लभ शान्त तन्मयता के साथ इशारों में ही उनको स्पर्श करते हैं, और हमें मालूम भी नहीं होता कि हमारी सोई संवेदना क़तई भिन्न-आलोक में जाग पड़ती है। उनकी कविताओं में प्रतीकों का एक अनन्त विस्तार है जिसकी पहुँच प्रकृति, अन्तरिक्ष और सृष्टि के आदि-अन्त तक है। ये कविताएँ हमें कभी बहुत ऊँचे से, लगभग किसी सिद्ध भिक्षु की तरह सम्बोधित करती हैं और कभी ठीक हमारे सामने आकर किसी संगी-साथी की तरह, ऐसा साथी जो हमसे ज़्यादा अक्लमन्द है लेकिन उस अक्लमन्दी को भी जिसने अपनी अर्जित अनाक्रमकता की पवित्र तहों में कहीं पिरो लिया है।</p>
<p>इस नज़रिए से वे अब भी एक ताज़ा कवि हैं, जो हमें हमारे अभ्यस्त पुरानेपन की ज़द से बाहर ले जाते हैं और चीज़ों को देखने की नई दृष्टि देते हैं जिससे हमारा आन्तरिक स्पेस रचनात्मक हो उठता है। कहना होगा कि हिन्दी कविता के कुछ तत्त्व जो बहुप्रतीक्षित थे, इन कविताओं में प्रकट होते हैं।
Book Details
-
ISBN9788183617796
-
Pages92
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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मोरनाच देवनागरी में आनेवाला निदा फ़ाज़ली का ऐसा संकलन है जिसमें उनकी अब तक की अधिकांश कविताएँ निरखी और परखी जा सकती हैं। इसमें पिछले पच्चीस बरसों की उनकी सोच-समझ और सरोकार का फैलाव है और अब तक आए तीनों मजमूओं में से ख़ुद लेखकीय चुनाव—इसीलिए एक अर्थ में यह निदा की प्रतिनिधि कविताओं का संग्रह भी कहा जा सकता है। इसमें ग़ज़लें भी हैं, नज़्में भी और कुछ गीत भी। शुरू का दौर भी है, बीच का भी और इधर का भी, लेकिन जो बात अव्वल से अब तक मुसलसिल बनी हुई है, वह है कवि का हर एक के लिए एक बेलौस लगाव—कुछ लोगों को यह सिनिसिज़्म की हदों को छूने वाला भी लग सकता है लेकिन शायद यह हर आधुनिक रचनाकार की मजबूरी है कि वह माँ, बाप, भाई, बहन, परिवार, स्त्री, प्रेम, समाज और देश—किसी को भी जस का तस स्वीकार नहीं करता। वह उन्हें सन्देह के कठघरे में धकेलकर सवाल करता है—ऐसे कि पहले वह सवाल पलटकर एक-एक कर ख़ुद उसका गिरेबान पकड़ ले और फिर अन्तत: समाज का होकर रह जाए। यही वह सच है जिसे अपने समय का हर सही रचनाकार अपने अनुभव की रोशनी में ही देखना और परखना चाहता है जैसाकि ख़ुद निदा फ़ाज़ली का ही एक दोहा है: वो सूफ़ी का कौल हो, या पंडित का ज्ञान जितनी बीते आप पर, उतना ही सच मान। —शानी
Main Boond Swayam, Khud Sagar Hoon
- Author Name:
Ashutosh Agnihotri
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‘मैं बूंद स्वयं, खुद सागर हूँ’ कवि आशुतोष अग्निहोत्री का चौथा कविता-संग्रह है। इस कविता-पुस्तक में उन्होंने अपनी जिन कविताओं को प्रस्तुत किया है, वे एक सजग, संवेदनशील और संवादधर्मी सामाजिक मनुष्य के सम्पूर्ण संसार को प्रतिबिम्बित करती है। प्रकृति, ईश्वर, समाज, परिवार और देश ने कवि को जो दिया, यह संकलन उसका कृतज्ञता ज्ञापन है, कोई भी पाठक जिसे पढ़ते हुए अपने ही भावोद्गार समझेगा। ‘स्नेह’, ‘प्रेम’, ‘धर्म’, ‘देश’, ‘दर्शन’ और ‘प्रेरणा’—इन छह उपशीर्षकों के तहत कवि ने यहाँ उन तमाम स्रोतों को अपने भाव समर्पित किए हैं जो मनुष्य मात्र के जीवन का आधार हैं, जहाँ से वह जीने की, सिरजने की, आगे बढ़ने और स्वयं को सार्थक करने की प्रेरणा ग्रहण करता है।
ये कविताएँ हमें हमारी उन अनुभूतियों को व्यक्त करने का बहाना बनती हैं, जिन्हें हम अपने भीतर तो रखते हैं लेकिन उचित शब्दावली और सम्यक लय के साथ व्यक्त नहीं कर पाते। इसीलिए ये कविताएँ सबकी हैं—उनकी भी जो काव्य-आस्वाद के अनुभवी लोग हैं, और उनकी भी जो पहली बार इन्हें पढ़ेंगे, और सदैव के लिए अपने अन्तस में सँजो लेंगे। एक भाव सम्पन्न कविता-संग्रह जिसकी कविताओं का पाठ आप अपनों के बीच बैठकर बार-बार करना चाहेंगे।
Cheentiyon Ke Paanv
- Author Name:
Satyamohan Verma
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आज कोई भी संवेदनशील प्राणी युग, देश की विसंगतियों से अछूता नहीं रह सकता। प्रतिक्रिया प्रायः व्यंग्यात्मक होती हैं—निर्ममता और क्रूरता लिये हुए। सत्यमोहन की प्रतिक्रिया व्यंग्यात्मक होकर भी कोमल है, उनके व्यक्तित्व—चरित्र के अनुकूल। उनसे जब भी मिला हूँ उनके मृदु स्वभावी होने की छाप मेरे मन पर पड़ी है।
—डॉ. हरिवंश राय बच्चन
सब पार्थिव और अपार्थिव दीवारों के ख़िलाफ़ हैं। सत्यमोहन भी इस ‘मुक्तिबोध’ के प्रति लापरवाह नहीं हैं। जीवन के प्रति यह स्वस्थ दृष्टिकोण है। वे ऐसा कुछ लिखते हैं, जो सबका जाना-समझा और अनुभूत होता है।
—पं. भवानी प्रसाद मिश्र
सत्यमोहन की प्रसन्न सकारात्मकता उनकी संक्रामक आत्मीयता का मूल है। दूब जैसे भीतर ही भीतर फैलती है वैसे ही उनकी रचनात्मकता विभिन्न विधाओं में फैलती है। वे जीवन के पात्र को कभी आधा ख़ाली नहीं देखते—आधा भरा हुआ देखते हैं। वे सफलता की तुलना में सार्थकता को श्रेयस्कर मानते हैं।
—प्रो. कांति कुमार जैन
सत्यमोहन से 'सर्जना-77' के दौरान पहचान हुई और 'गंगा' के प्रकाशन के समय प्रगाढ़ता बढ़ी। वे बेहद शालीन और प्रिय व्यक्तित्व के धनी हैं। उनकी रचनाएँ समय सापेक्ष हैं। छोटी-छोटी कविताओं में वे बड़ी बात कह जाते हैं। उनकी गजलें उद्वेलित करती हैं और उनका तरन्नुम बेहद प्रभावी है।
—कमलेश्वर
सत्यमोहन की साहित्य और रंगकर्म की गतिविधियों में उत्साही और सक्रिय सहभागिता रही है। उम्र के इस पड़ाव पर साहित्यिक जागरूकता और संलग्नता बनाए रखना प्रशंसनीय उपलब्धि है। उम्मीद है कि उनकी कल्पनाशील और आस्थावान रुचियाँ अभी भी जीवन्त रहेंगी।
—प्रो. मनोहर वर्मा
सत्यमोहन जी के लेखन में साफ़-सुथरी भाषा और सम्प्रेषण क्षमता है। उनकी रचनात्मकता की उड़ान काफ़ी ऊँची है। वे इस पड़ाव पर भी सक्रिय हैं यह क्या कम है, उनके जीवन की अपेक्षाएँ पूरी हों यही हमारी कामना है।
—डॉ. रमाकान्त श्रीवास्तव
Seepiyaan
- Author Name:
Javed Akhtar
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कबीर, तुलसी, वृंद, रहीम और बिहारी आदि कवियों ने सदियों पहले अपनी गहरी अन्तर्दृष्टि और मानव-स्वभाव की समझ की बुनियाद पर कुछ बातें कहीं, और इसके लिए उन्होंने कविता का जो रूप चुना, वह था—दोहा। दो पंक्तियों में गुँथी-गठी एक सम्पूर्ण कविता जो तीर की तरह जाकर हमारी चेतना में गड़ जाती है। सैकड़ों सालों से ये दोहे हमारे साथ रहते आए हैं, कभी ये हमें हमारी ख़ामियाँ दिखाते हैं, कभी हमारे रहबर बन जाते हैं, और कभी कोई ऐसा सच बता जाते हैं जिसे हमारी दुनियावी निगाह देखकर भी नहीं देखती। ‘सीपियाँ’ में जावेद अख़्तर ने ऐसे ही कुछ दोहों को चुनकर उनके भीतर छिपे सत्य को आमफ़हम ज़बान में हर किसी के लिए सुलभ कर दिया है। जो बातें इनसे निकलकर आई हैं वे आज भी उतनी ही सच हैं, आज भी उतनी ही उपयोगी हैं, जितनी उस समय थीं, और आगे भी उतनी ही सार्थक रहेंगी। जावेद अख़्तर हमारी आज की रोज़मर्रा ज़िन्दगी से उन्हें जोड़ते हैं और बताते हैं कि कैसे उन पर अमल करके, उनसे मिलनेवाली सीख को अपनाकर हम ख़ुद को बेहतर इनसान और अपनी दुनिया को एक बेहतर समाज बना सकते हैं।
Karmanasha
- Author Name:
Sidhheshwar Singh
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Hindi Poems Karmnasha written by Sidheshwar Singh
Jhukna Kisi Ko Ropna Hai
- Author Name:
Shriprakash Shukla
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नब्बे के बाद की हिन्दी कविता को कवियों की जिस पीढ़ी ने अपने सरोकारी एवं सतत लेखन से सँवारा-बनाया है उनमें श्रीप्रकाश शुक्ल एक महत्त्वपूर्ण कवि हैं। उनकी कविताई का विस्तार तीन दशकों में फैला हुआ है, लेकिन इसकी खासियत है इसका सातत्य। 1999 में श्रीप्रकाश शुक्ल का पहला संग्रह ‘अपनी तरह के लोग’ के आने से लेकर 2022 में सातवें संग्रह ‘वाया नई सदी’ तक की यात्रा में एक निरन्तरता है। ये कृतियाँ क्रमशः संस्कृति, दर्शन और राजनीतिक चेतना की धुरी पर अपने समय को कातती हैं। इनके पूरे परिस्पन्द के बीच एक चीज सर्वनिष्ठ है और वह है लोकभाषा और जनपदीयता। बनारस अंचल श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताओं की शिराओं में रक्त बनकर दौड़ रहा है। सोनभद्र, मिर्जापुर, प्रयाग और गाजीपुर का ‘लोकेल’ उनकी कविता में बुनियाद की तरह बिछा हुआ है। उनकी कविताओं पर इस क्षेत्र की लोककथाओं, लोक धुनों और गीतों का गहरा असर है। आख्यान-परम्परा का तो सबसे गहरा और व्यापक। श्रीप्रकाश शुक्ल की आख्यान शैली में लोक और शास्त्र दोनों में मौजूद दन्तकथाओं, किंवदन्तियों और मिथकीयता के आधुनिक सन्दर्भों का काव्यमय सन्धान अद्भुत और व्यापक है। लोककथाओं व मिथकीय पृष्ठभूमि के साथ श्रीप्रकाश शुक्ल ने बहुत साभिप्राय लोक देवों-देवियों, लोकनायकों और अति साधारण किरदारों के साथ मामूली जगहों, पेशों, रिवाजों व चीजों को अपनी कविताओं का विषय बनाया है। प्रशस्त इतिहासबोध और जनपदीयता के भीतर से कविता में इतिवृत्त और प्रकृति के संश्लेष के कारण श्रीप्रकाश शुक्ल इस प्रवृत्ति के प्रतिनिधि कवि हैं।
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