Mornaach

(3)

Author:

Nida Fazli

Language:

Hindi

Category:

Poetry

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मोरनाच देवनागरी में आनेवाला निदा फ़ाज़ली का ऐसा संकलन है जिसमें उनकी अब तक की अधिकांश कविताएँ निरखी और परखी जा सकती हैं। इसमें पिछले पच्चीस बरसों की उनकी सोच-समझ और सरोकार का फैलाव है और अब तक आए तीनों मजमूओं में से ख़ुद लेखकीय चुनाव—इसीलिए एक अर्थ में यह निदा की प्रतिनिधि कविताओं का संग्रह भी कहा जा सकता है। इसमें ग़ज़लें भी हैं, नज़्में भी और कुछ गीत भी। शुरू का दौर भी है, बीच का भी और इधर का भी, लेकिन जो बात अव्वल से अब तक मुसलसिल बनी हुई है, वह है कवि का हर एक के लिए एक बेलौस लगाव—कुछ लोगों को यह सिनिसिज़्म की हदों को छूने वाला भी लग सकता है लेकिन शायद यह हर आधुनिक रचनाकार की मजबूरी है कि वह माँ, बाप, भाई, बहन, परिवार, स्त्री, प्रेम, समाज और देश—किसी को भी जस का तस स्वीकार नहीं करता। वह उन्हें सन्देह के कठघरे में धकेलकर सवाल करता है—ऐसे कि पहले वह सवाल पलटकर एक-एक कर ख़ुद उसका गिरेबान पकड़ ले और फिर अन्तत: समाज का होकर रह जाए। यही वह सच है जिसे अपने समय का हर सही रचनाकार अपने अनुभव की रोशनी में ही देखना और परखना चाहता है जैसाकि ख़ुद निदा फ़ाज़ली का ही एक दोहा है: वो सूफ़ी का कौल हो, या पंडित का ज्ञान जितनी बीते आप पर, उतना ही सच मान। —शानी

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ISBN
9789360868765
Pages
152
Avg Reading Time
5 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

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मोरनाच देवनागरी में आनेवाला निदा फ़ाज़ली का ऐसा संकलन है जिसमें उनकी अब तक की अधिकांश कविताएँ निरखी और परखी जा सकती हैं। इसमें पिछले पच्चीस बरसों की उनकी सोच-समझ और सरोकार का फैलाव है और अब तक आए तीनों मजमूओं में से ख़ुद लेखकीय चुनाव—इसीलिए एक अर्थ में यह निदा की प्रतिनिधि कविताओं का संग्रह भी कहा जा सकता है। इसमें ग़ज़लें भी हैं, नज़्में भी और कुछ गीत भी। शुरू का दौर भी है, बीच का भी और इधर का भी, लेकिन जो बात अव्वल से अब तक मुसलसिल बनी हुई है, वह है कवि का हर एक के लिए एक बेलौस लगाव—कुछ लोगों को यह सिनिसिज़्म की हदों को छूने वाला भी लग सकता है लेकिन शायद यह हर आधुनिक रचनाकार की मजबूरी है कि वह माँ, बाप, भाई, बहन, परिवार, स्त्री, प्रेम, समाज और देश—किसी को भी जस का तस स्वीकार नहीं करता। वह उन्हें सन्देह के कठघरे में धकेलकर सवाल करता है—ऐसे कि पहले वह सवाल पलटकर एक-एक कर ख़ुद उसका गिरेबान पकड़ ले और फिर अन्तत: समाज का होकर रह जाए। यही वह सच है जिसे अपने समय का हर सही रचनाकार अपने अनुभव की रोशनी में ही देखना और परखना चाहता है जैसाकि ख़ुद निदा फ़ाज़ली का ही एक दोहा है:

वो सूफ़ी का कौल हो, या पंडित का ज्ञान
जितनी बीते आप पर, उतना ही सच मान।
—शानी

Book Details

  • ISBN
    9789360868765
  • Pages
    152
  • Avg Reading Time
    5 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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Mornaach is Nida Fazli's own selection from 25 years of poetic work, rendered in Devanagari for Hindi readers who cherish the intimacy of Urdu diction. The collection draws from three earlier volumes, spanning ghazals, nazms, and lyric compositions written between the poet's early career and the present. What endures across decades is Fazli's belaus lagaav — an unguarded affection for every person, regardless of station or creed. His verse does not perform wisdom; it listens. It refuses grand claims and instead records the daily negotiation between longing and acceptance, between what we hope for and what we forgive. For readers seeking poetry that speaks without raising its voice, Mornaach offers a steady companion — lucid, humane, and alert to the quiet dignity of ordinary life.

मोरनाच पढ़ने से मुझे किस तरह का अनुभव मिलेगा?

यह संग्रह आपको एक शांत, सहानुभूतिपूर्ण आवाज़ के साथ छोड़ता है जो चीख़ती नहीं, बल्कि ध्यान से सुनती है। निदा फ़ाज़ली की कविता तेज़ नहीं है — यह धीरे-धीरे आपके भीतर उतरती है और रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातों में गहरी करुणा खोजती है। हर ग़ज़ल और नज़्म आपको किसी इंसान के करीब ले जाती है — कोई बड़ा दर्शन नहीं, बस ईमानदार बातचीत। यह उन पाठकों के लिए है जो कविता में सुकून और समझ ढूँढते हैं, न कि नाटकीयता।

यह किताब किस तरह के पाठक के लिए सबसे उपयुक्त है?

यह उन पाठकों के लिए आदर्श है जो उर्दू शायरी की सादगी और गहराई को हिंदी देवनागरी में पढ़ना चाहते हैं। अगर आप ऐसी कविता की तलाश में हैं जो बनावटी न हो, जो हर इंसान के दुख-सुख को समान सम्मान दे, तो यह संग्रह आपके लिए है। इसे समझने के लिए साहित्यिक पृष्ठभूमि ज़रूरी नहीं — बस एक खुला मन और धैर्य चाहिए। यह उन्हें भी पसंद आएगा जो गुलज़ार, बशीर बद्र या जावेद अख़्तर की सहज शायरी को पसंद करते हैं।

आज के भारतीय पाठकों के लिए इस किताब का सांस्कृतिक महत्व क्या है?

निदा फ़ाज़ली ऐसे दौर में लिख रहे थे जब हिंदी-उर्दू की सीमाएँ कम थीं और शायरी आम जीवन का हिस्सा थी। मोरनाच उस परंपरा को जीवित रखता है जहाँ कविता धर्म, जाति और भाषा की दीवारों को पार करती है। आज जब समाज में बँटवारे की बातें ज़्यादा हैं, उनकी बेलौस लगाव वाली शायरी याद दिलाती है कि इंसानियत सबसे बड़ी पहचान है। यह किताब उस साझा संवेदनशीलता का दस्तावेज़ है जो हिंदुस्तानी तहज़ीब की असली ताकत है।

निदा फ़ाज़ली का लहजा दूसरे शायरों से कैसे अलग है?

निदा फ़ाज़ली बड़े-बड़े रूपकों या जटिल भाषा का इस्तेमाल नहीं करते — उनकी खासियत सरलता में है। वे रोज़मर्रा की ज़बान में ऐसी बातें कहते हैं जो दिल को छू जाती हैं। उनकी कविता में कोई अहंकार नहीं, कोई उपदेश नहीं — सिर्फ़ एक साथी की तरह बात करना। जहाँ दूसरे शायर तीखे तेवर या रूमानियत दिखाते हैं, वहाँ निदा साधारण इंसान के दुख-दर्द को शांत और गहरी संवेदना से पेश करते हैं। यह चुनाव ख़ुद कवि ने किया है, इसलिए उनकी प्रतिनिधि आवाज़ इस संग्रह में साफ़ सुनाई देती है।

यह किताब पाठक के साथ लंबे समय तक क्या छोड़ जाती है?

यह संग्रह आपको एक शांत समझ देता है कि ज़िंदगी में बड़ी बातें छोटे पलों में छुपी होती हैं। निदा की शायरी आपको कोई जवाब नहीं देती, बल्कि सवालों के साथ जीना सिखाती है — बिना कड़वाहट के। आप इसे बंद करने के बाद भी महसूस करेंगे कि हर इंसान के प्रति थोड़ी ज़्यादा नरमी और करुणा आ गई है। यह भावनात्मक रूप से आपको ज़्यादा खुला और सांस्कृतिक रूप से अपनी हिंदुस्तानी विरासत से जुड़ा हुआ महसूस कराती है। यह वह किताब है जिसे आप बार-बार खोलेंगे जब सुकून चाहिए।

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