Main Ek Pheriwala

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Language:

Hindi

Category:

Poetry

199

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राही मासूम रज़ा मूलतः कवि हैं और उनकी आन्तरिक अनुभूतियों को कविताओं में ही तीव्रतम अभिव्यक्ति मिली है। ‘मैं एक फेरीवाला’ की कविताओं में ज़िन्दगी की कटुताओं से जूझने की ज़िद है और उसी ज़िन्दगी को गरम-गरम पीने की प्यास भी! संग्रह में लगभग 18 वर्षों के लम्बे अन्तराल में लिखी गई कविताएँ संगृहीत हैं। ‘मैं एक फेरीवाला’ की कविताएँ ‘हिज्र’, ‘प्यास’ और ‘तनहाई’ की कविताएँ है। स्वयं कवि के शब्दों में, “मेरी शायरी की बुनियादी लय उदासी की है। यह उदासी हमारे युग की सबसे बड़ी और जीवित वास्तविकता है।” इन भावनाओं को विभिन्न कविताओं में प्रतिबिम्वित होते देखा जा सकता है। इतनी लम्बी अवधि की कविताओं का संग्रह होने की वजह से काव्यरूप और विषयवस्तु के स्तर पर इसमें बड़ा वैविध्य है। रूमानियत से भरपूर गीतों से लेकर एक सामान्य आदमी की लाचारी और आकांक्षा का चित्रण करनेवाली छोटी-छोटी कविताएँ भी इस संग्रह में मिलेंगी । यह संग्रह राही मासूम रज़ा के कवि-व्यक्तित्व का वैविध्य पाठकों के सामने प्रस्तुत करता है ।

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ISBN
9789360861414
Pages
112
Avg Reading Time
4 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

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About the Book

राही मासूम रज़ा मूलतः कवि हैं और उनकी आन्तरिक अनुभूतियों को कविताओं में ही तीव्रतम अभिव्यक्ति मिली है। ‘मैं एक फेरीवाला’ की कविताओं में ज़िन्दगी की कटुताओं से जूझने की ज़िद है और उसी ज़िन्दगी को गरम-गरम पीने की प्यास भी! संग्रह में लगभग 18 वर्षों के लम्बे अन्तराल में लिखी गई कविताएँ संगृहीत हैं। ‘मैं एक फेरीवाला’ की कविताएँ ‘हिज्र’, ‘प्यास’ और ‘तनहाई’ की कविताएँ है। स्वयं कवि के शब्दों में, “मेरी शायरी की बुनियादी लय उदासी की है। यह उदासी हमारे युग की सबसे बड़ी और जीवित वास्तविकता है।” इन भावनाओं को विभिन्न कविताओं में प्रतिबिम्वित होते देखा जा सकता है। इतनी लम्बी अवधि की कविताओं का संग्रह होने की वजह से काव्यरूप और विषयवस्तु के स्तर पर इसमें बड़ा वैविध्य है। रूमानियत से भरपूर गीतों से लेकर एक सामान्य आदमी की लाचारी और आकांक्षा का चित्रण करनेवाली छोटी-छोटी कविताएँ भी इस संग्रह में मिलेंगी ।

यह संग्रह राही मासूम रज़ा के कवि-व्यक्तित्व का वैविध्य पाठकों के सामने प्रस्तुत करता है ।

Book Details

  • ISBN
    9789360861414
  • Pages
    112
  • Avg Reading Time
    4 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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Main Ek Pheriwala is Rahi Masoom Raza's definitive poetry collection, gathering verses written across 18 years that chart the inner life of a writer better known for his novels and screenplays. At its core, these poems speak to hizr (separation), pyaas (thirst), and tanhai (solitude)—three states Raza identifies as the fundamental rhythm of contemporary existence. The poet himself describes his work as rooted in udaasi, a melancholy he considers the most authentic reality of our age. Yet this is not passive sorrow: the collection balances resignation with a fierce determination to drink life hot and whole, even as it scalds. Raza's language draws on Urdu's lyrical inheritance while remaining accessible to Hindi readers, creating a hybrid diction that mirrors the cultural confluences of mid-20th-century North India. Readers seeking poetry that refuses easy consolation will find in Main Ek Pheriwala a voice that honours both ache and appetite.

मैं एक फेरीवाला पढ़ते समय पाठक को कैसा अनुभव होता है?

यह संग्रह पाठक को एक धीमी, आत्मीय उदासी की यात्रा पर ले जाता है—जो न तो निराशा है, न ही रोमांटिक विलाप। राही मासूम रज़ा की कविताएँ जीवन की कड़वाहट को स्वीकारती हैं, फिर भी उसे पीने की ज़िद रखती हैं। हर पंक्ति में हिज्र, प्यास और तनहाई का स्वर है, लेकिन साथ ही एक शांत साहस भी। यह उन पाठकों के लिए है जो भावनात्मक ईमानदारी को सहन कर सकते हैं और जो कविता से सान्त्वना नहीं, बल्कि सच्चाई की माँग करते हैं। पढ़ने के बाद आप खाली नहीं, बल्कि भरे हुए महसूस करते हैं—एक गहरी, जीवित उदासी से।

यह संग्रह किन पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है?

  • वे पाठक जो उर्दू शायरी की लय से परिचित हैं या हिंदी कविता में उसकी छाया तलाशते हैं।
  • जो लोग राही मासूम रज़ा को उपन्यासकार या पटकथा लेखक के रूप में जानते हैं और उनकी आंतरिक दुनिया देखना चाहते हैं।
  • जो पाठक समकालीन जीवन की उदासी को—बिना किसी नाटकीयता के—स्वीकारने वाली कविता पसंद करते हैं।
  • जिन्हें 18 वर्षों में लिखी गई कविताओं की परिपक्वता और विकास में रुचि है।

आज के भारतीय पाठकों के लिए इस संग्रह का सांस्कृतिक महत्व क्या है?

राही मासूम रज़ा ने जिस 'उदासी' को अपनी शायरी की बुनियाद बताया, वह आज भी भारतीय शहरी और ग्रामीण जीवन में जीवित है—प्रवासन, अलगाव, और सांस्कृतिक जड़ों से दूरी की। यह संग्रह उस दौर की आवाज़ है जब हिंदी-उर्दू साहित्य की सीमाएँ धुंधली थीं और भाषा पहचान का हथियार नहीं, अभिव्यक्ति का माध्यम थी। आज, जब सांप्रदायिक और भाषाई विभाजन तीव्र हो रहे हैं, रज़ा की कविताएँ एक साझा मानवीय अनुभव की याद दिलाती हैं—हिज्र, प्यास, तनहाई किसी एक समुदाय की नहीं, सबकी हैं।

इस विषय पर राही मासूम रज़ा का दृष्टिकोण अन्य कवियों से कैसे अलग है?

राही मासूम रज़ा ने उदासी को रोमांटिक या दार्शनिक नहीं, बल्कि 'युग की सबसे बड़ी और जीवित वास्तविकता' माना। वे न तो उसे गौरवान्वित करते हैं, न छिपाते हैं—बस उसे पहचानते हैं। उनकी भाषा उर्दू शायरी की मिठास और हिंदी कविता की सहजता का संयोजन है, जो पढ़ने में सुलभ है लेकिन भावनात्मक रूप से गहरी। 18 वर्षों में लिखी गई इन कविताओं में एक कवि की अन्तर्यात्रा दिखती है—बिना किसी संपादकीय चमक के, बस कच्चा, ईमानदार स्वर।

यह संग्रह पढ़ने के बाद पाठक के पास क्या रह जाता है?

  • एक शांत स्वीकृति कि उदासी जीवन का शत्रु नहीं, बल्कि एक सच्चा साथी है।
  • यह बोध कि भाषा—चाहे हिंदी हो या उर्दू—अनुभव को साझा करने का माध्यम है, न कि विभाजन का।
  • राही मासूम रज़ा के लेखन के उस पक्ष की समझ जो उनके उपन्यासों में छिपा रहता है।
  • एक भावनात्मक साहस—जीवन को 'गरम-गरम पीने की प्यास' के साथ जीने का।

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