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Ravindra BhartiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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रवीन्द्र भारती का उपन्यास ‘जगदम्बा’ हिन्दी कथा-साहित्य के मौजूदा ‘तुमुल कोलाहल कलह में’ ‘हृदय की बात’ की मानिन्द है। ऐसा इसलिए क्योंकि उत्तर भारत का आँचलिक जनजीवन जिस गहरी आत्मीयता, सूक्ष्मता तथा संगीतमय भाषा के साथ इस उपन्यास में अभिव्यक्त हुआ है, वह इधर के दिनों में दुर्लभ से दुर्लभतर होता गया है। लेकिन जो बात इस उपन्यास को खास बनाती है वह है उन दारुण स्थितियों का विश्वसनीय उद्घाटन जिनकी टीस स्थानीय बोली-बानी, आस्था-अन्धविश्वास और तमाम चीज-बतुस के संक्रामक आकर्षण के बावजूद, पाठक गहरे महसूस करता है। इस उपन्यास में ऐसी स्त्रियाँ आती हैं जो अपने बनाए आकाश में उड़ना चाहती हैं। लेकिन उन्हें उड़ना पड़ता है मर्द के बनाए आकाश में। उन्हें अपने आकाश में उड़ने की आज़ादी नहीं। उड़ेंगी तो पतुरिया कहलाएँगी। इससे बात न बने तो देवी कहकर, जगदम्बा करार देकर उनके पंख तोड़ दिए जाएँगे। उपन्यास सवाल उठाता है— इनसान कोई बाँधने की चीज है? और, जवाब भी देता है—दरअसल जानवर भी बाँधने की चीज नहीं है मगर, आदमी अपने स्वार्थ में क्या नहीं करता! न हाथ बाँधने की चीज है, न मन। जहाँ कहीं बन्धन की गाँठ पड़ेगी, वह दिखे न दिखे, इनसान कुम्हला जाता है। यहाँ हम मर्द के साथ सोने से इनकार करने पर जगदम्बा बना दी जाने वाली एक स्त्री को, समाज और परिवार ने मुक्ति की जो स्थापना दी है, उससे अलग, नई राह पर कदम बढ़ाते देखते हैं जो उसने खुद चुनी है। वह किसी मिथ जैसी मालूम पड़ती है; लेकिन वह यथार्थ है, वर्तमान में भविष्य की दिशासूचक! उपन्यास में हमें ऐसे अनेक किरदार मिलते हैं। मसलन चटपट और खटपट जो भले ही अनगढ़, गंवार लगते हैं लेकिन अन्याय को समझने और उसका प्रतिकार करने की अपनी सहज वृत्ति के कारण अलग से ध्यान आकर्षित करते हैं। बागुन बाबा, नकछेदी, सिस्टर क्रेजी भी ऐसे ही अनूठे किरदार हैं। <p>वस्तुतः आँचलिक उपन्यास का यह नया आख्यान है जो न केवल बेहद पठनीय है बल्कि संग्रहणीय भी है।
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रवीन्द्र भारती का उपन्यास ‘जगदम्बा’ हिन्दी कथा-साहित्य के मौजूदा ‘तुमुल कोलाहल कलह में’ ‘हृदय की बात’ की मानिन्द है। ऐसा इसलिए क्योंकि उत्तर भारत का आँचलिक जनजीवन जिस गहरी आत्मीयता, सूक्ष्मता तथा संगीतमय भाषा के साथ इस उपन्यास में अभिव्यक्त हुआ है, वह इधर के दिनों में दुर्लभ से दुर्लभतर होता गया है। लेकिन जो बात इस उपन्यास को खास बनाती है वह है उन दारुण स्थितियों का विश्वसनीय उद्घाटन जिनकी टीस स्थानीय बोली-बानी, आस्था-अन्धविश्वास और तमाम चीज-बतुस के संक्रामक आकर्षण के बावजूद, पाठक गहरे महसूस करता है।
इस उपन्यास में ऐसी स्त्रियाँ आती हैं जो अपने बनाए आकाश में उड़ना चाहती हैं। लेकिन उन्हें उड़ना पड़ता है मर्द के बनाए आकाश में। उन्हें अपने आकाश में उड़ने की आज़ादी नहीं। उड़ेंगी तो पतुरिया कहलाएँगी। इससे बात न बने तो देवी कहकर, जगदम्बा करार देकर उनके पंख तोड़ दिए जाएँगे। उपन्यास सवाल उठाता है— इनसान कोई बाँधने की चीज है? और, जवाब भी देता है—दरअसल जानवर भी बाँधने की चीज नहीं है मगर, आदमी अपने स्वार्थ में क्या नहीं करता! न हाथ बाँधने की चीज है, न मन। जहाँ कहीं बन्धन की गाँठ पड़ेगी, वह दिखे न दिखे, इनसान कुम्हला जाता है।
यहाँ हम मर्द के साथ सोने से इनकार करने पर जगदम्बा बना दी जाने वाली एक स्त्री को, समाज और परिवार ने मुक्ति की जो स्थापना दी है, उससे अलग, नई राह पर कदम बढ़ाते देखते हैं जो उसने खुद चुनी है। वह किसी मिथ जैसी मालूम पड़ती है; लेकिन वह यथार्थ है, वर्तमान में भविष्य की दिशासूचक! उपन्यास में हमें ऐसे अनेक किरदार मिलते हैं। मसलन चटपट और खटपट जो भले ही अनगढ़, गंवार लगते हैं लेकिन अन्याय को समझने और उसका प्रतिकार करने की अपनी सहज वृत्ति के कारण अलग से ध्यान आकर्षित करते हैं। बागुन बाबा, नकछेदी, सिस्टर क्रेजी भी ऐसे ही अनूठे किरदार हैं।
<p>वस्तुतः आँचलिक उपन्यास का यह नया आख्यान है जो न केवल बेहद पठनीय है बल्कि संग्रहणीय भी है।
Book Details
-
ISBN9789349159440
-
Pages248
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘मंत्र-विद्ध’ प्यार की खुरदरी कहानी है—आज की मूर्तिकला की तरह... तारक और सुरजीत कौर के बीच एक तीसरा ‘व्यक्ति’ और है, और वह है प्यार! तारक अपने को समझाते हुए, दूसरे आदमी की निग़ाह से सारी स्थिति को देखता है और स्वयं आतंकित रहता है कि क्या सचमुच वीरता का वह क्षण उसी ने धारण किया था...क्षण अथवा आवेश-भरे दबाव का शायद एक ऐसा विस्फोट, जिसका अनुभव केवल कायर ही कर सकता है। यानी परम वीरता के काम पक्के कायर के सिवा कोई दूसरा नहीं कर सकता! प्यार जैसे रिश्ते और मानवीय आशा-आकांक्षा के साथ प्रायः ही उठ खड़े होने वाले द्वन्द्व का एक अलग ही कोण दिखाती है यह कथाकृति। तारक स्वयं को जिस रूप में प्रस्तुत करता है, वास्तव में वह उसके विपरीत है अर्थात भीरु, शंकालु और जिम्मेदारियों से भागने वाला। उसके विपरीत स्वाभिमानी और जिम्मेदार सुरजीत सामन्ती घुटन से मुक्ति के लिए तारक का साथ स्वीकार करती है और अपनी शक्ति और अभावों की तरफ से आँखें मूँदकर प्रेम को हासिल कर लेने का स्वप्न देखती है। परस्पर विपरीत ध्रुवों की नजदीकी का यह त्रासद यथार्थ इस उपन्यास को प्रेम और व्यक्ति-सम्बन्धों के बारे में एक भिन्न ही कोण से सामने लाता है। अपने समय का एक चर्चित उपन्यास।
Rah Dar Badar
- Author Name:
Govind Mishra
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‘राह दर बदर’ गोविन्द मिश्र का नया उपन्यास है जिसे हम उपन्यास विधा के सन्दर्भ में भी एक ‘नया उपन्यास’ कह सकते हैं। जो चीज़ इसे एक औपन्यासिक कृति बनाती है वह किसी एक पात्र की केन्द्रीय अथवा आद्योपान्त उपस्थिति नहीं बल्कि एक ‘थीम’ का क्रमशः विकास है। इस थीम का ताल्लुक़ भारतीय स्त्री से, उसके अस्मिता-बोध की पिछली आधी सदी से भी ज़्यादा लम्बी यात्रा से है। गोविन्द मिश्र स्वयं इसे ‘मध्यवर्गीय भारतीय नारी की अन्तश्चेतना का 1940 से 2020 तक का क्रमिक विकास’ कहते हैं और यह भी कि इसी के चलते यह कृति जितनी साहित्यिक है, उतनी ही समाजशास्त्रीय भी। भारतीय स्त्री ने पिछली सदी के उत्तरार्द्ध और मौजूदा सदी के अब तक के वर्षों में एक लम्बा सफ़र अपने भीतर भी किया है, और समाज के सार्वजनिक स्पेस में भी। परिवार और विवाह के स्वरूप में भी काफ़ी बदलाव आया है, लेकिन शायद उतना नहीं, जितना गुणात्मक परिवर्तन भारतीय स्त्री की प्राथमिकताओं में आया है। यह उपन्यास इस परिवर्तन की धारा को रेखांकित करते हुए भविष्य के विषय में भी कुछ प्रश्न छोड़ता है, जो स्त्री के साथ समाज के लिए भी विचारणीय हैं, और पुरुष के लिए भी। एक दिलचस्प और विचारोत्तेजक कथा-कृति!
Arrowsmith
- Author Name:
Sinclair Lewis
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Arrowsmith is an early major novel dealing with the culture of science. It was written in the period after the reforms of medical education flowing from the Flexner Report on Medical Education in the United States and Canada: A Report to the Carnegie Foundation for the Advancement of Teaching, 1910, which had called on medical schools in the United States to adhere to mainstream science in their teaching and research. Arrowsmith is a Nobel Award-winning novel by Vishwa Classic Books Translated into Hindi.
Digant Ki Oar
- Author Name:
Bipin Bihari Mishra
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उम्र की ढलती साँझ में अपने गाँव में, अपने लोगों के बीच, अपने घर में रहने की इच्छा हरेक मनुष्य की होती है। ‘अपना घर’! कितना प्यारा शब्द है यह। लेकिन क्या सबको नसीब होता है। घर बनाने और बसाने में कितनी मुश्किलें आती हैं, यह किसी भी मध्यवित्त व्यक्ति का सबसे तल्ख़ और संजीदा अनुभव होता है।
‘दिगन्त की ओर’ इन्हीं अनुभवों का प्रवाहपूर्ण भाषा में औपन्यासिक विस्तार है। यह जीवन और समाज की विडम्बनाओं और विद्रूपताओं पर तो प्रकाश डालता ही है, जीवन–संध्या में बुजुर्गों की उपेक्षाओं और उम्मीदों को भी रेखांकित करता है। ओड़िया भाषा के इस महत्त्वपूर्ण उपन्यास का सुजाता शिवेन द्वारा किया सर्जनात्मक अनुवाद निश्चय ही हिन्दी पाठकों को रुचिकर और पठनीय लगेगा, ऐसा हमारा विश्वास है।
Purnamadah
- Author Name:
Saroj Kaushik
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प्रेम की न कोई भाषा होती है, न परिभाषा, न सीमाएँ उसे सीमित करती हैं, न दूरियाँ उसे ओझल करती हैं, वह दूरी जीवन और मृत्यु भी क्यों न हों! ‘पूर्णमिदम्’ के बाद सरोज कौशिक का यह उपन्यास ‘पूर्णमदः’; अलग-अलग होते हुए भी ये दोनों उपन्यास एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। वह अध्यात्म के आलोक में प्रकाशमान, तो यह जीवन के संघर्षों ने बीच के पवित्र दीप को अपने सचेत आत्मबोध की ओट में बचाते हुए एक सघन यात्रा। ‘पूर्णमदः’ में पीड़ा है, अतीत के दुखते घाव हैं, स्मृति में कौंधती विविधवर्णी छवियाँ हैं, चहुँओर व्याप्त कालिमा में अपने अन्तस की पवित्रता को निष्कलंक रखते अपने मूल्यों को बचाने का संघर्ष है; और जीवन तथा समाज में मनुष्य की आत्मा को कचोटतीं, खोखला करतीं अपूर्णताओं के बरक्स पूर्ण को बचाने और अगली पीढ़ियों के लिए संरक्षित रखने की कामना है। भावनाओं के सघन चित्रों से परिपूर्ण एक पठनीय औपन्यासिक कृति।
Chhavigriha Mein Andhera Hai
- Author Name:
Sunil Gangopadhyay
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बंगला-साहित्य के मूर्धन्य रचनाकार सुनील गंगोपाध्याय की यह कृति उनके महत्त्वपूर्ण औपन्यासिक रचनाओं में शुमार है। इसमें दो परिवारों की कहानी समानान्तर धाराओं में चलती है। एक परिवार पूँजीपति शिवशंकर लाहिड़ी का है जिसने अपने एक सिनेमा हॉल को अपनी ज़िद के कारण बन्द कर दिया है और हड़ताली कर्मचारियों के आगे झुकने को किसी भी हालत में तैयार नहीं है। दूसरी कहानी उसी सिनेमा हॉल के एक कर्मचारी रमेश मुखर्जी के परिवार की है जो इस हड़ताल के कारण खाने-पीने की बुनियादी सुविधाओं के लिए मोहताज है। लेकिन विडम्बना यह है कि दोनों के बेटे अपने-अपने पिताओं से झगड़ा करके अलग रह रहे हैं। लेखक ने इस दोनों परिवारों की स्थितियों के तनाव को इतने संवेदनशील रूप से रचा है कि वह पाठकों में एक रचनात्मक बेचैनी भर देता है। इन दोनों परिवारों की कहानियों के बीच धीमी मगर विरल लय में एक प्रेम कहानी की अन्तःसलिल धारा बढ़ रही है जो मीठी आँच की तरह प्यारी और सुखद लगती है। स्थितियों, चरित्रों और घटनाओं का रचनात्मक संयोजन पाठकों को अपने बहाव में इस तरह लिए चलता है कि पाठक इस कृति को एक ही बैठक में पूरा पढ़ जाना चाहेंगे, ऐसा हमारा विश्वास है।
Naya Nagar
- Author Name:
Tasneef Haidar
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ये नया नगर है जहाँ सड़क पर आँखों के सामने हुए एक्सीडेंट को लोग उतनी जल्दी तवज्जो नहीं देते जितनी जल्दी अचानक कानों में पड़ गए किसी शे'र और वाह-वाह को देते हैं। ग़ज़लें यहाँ परिन्दों की तरह उड़ती हैं, बरसाती पानी की तरह गलियों में बहती हैं और जहाँ चाहे वहाँ बैठकर नशिस्त जमा देती हैं। यहाँ जो लोग हैं, वे शायरी को ईमान की तरह जीते हैं; ऐसा अक्सर नहीं होता कि ज़िन्दगी की बाहरी ज़रूरतें उन्हें भटकाकर किसी दफ़्तर में ले जाकर बिठा दें; बिठा भी दें तो वहाँ से उठाकर वे फिर किसी शे'री नशिस्त में आकर बैठ जाते हैं; या किसी रेस्तराँ या चाय की टपरी पर जम जाते हैं। ये कहानी इसी नगर की है। उर्दू के सुपरिचित युवा शायर-कथाकार तसनीफ़ हैदर का यह उपन्यास हिन्दी पाठकों को एक ताज़ा हवा की तरह महसूस होगा। कहानी की रवानी और तंज़-ओ-मिज़ाह की तुर्श छौंक के साथ यह कहानी पढ़नेवाले को बाँध लेती है। और हाँ क्योंकि यह नगर ग़ज़लों से बसा है तो इसमें उर्दू शायरी से जुड़ी कुछ तकनीकी पेचीदगियाँ भी आपको जानने को मिलेंगी, कुछ क़िस्से और बहसें भी, मुस्लिम समाज के सामाजिक-आर्थिक हालात भी; मौजूदा भारतीय राजनीति के हवाले भी; और हाँ मुहब्बत का एक नाकाम क़िस्सा भी।
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