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संजय चतुर्वेदी लगभग चालीस वर्षों से हिंदी कविता के केंद्र में प्रखर हस्तक्षेप की तरह अडिग हैं। सच कहा जाय तो उनकी अद्वितीय कविताई आज हिंदी के आँगन में वह अकेला दिया है जो अपसंस्कृति के अंधकार और झंझावात से निडर जूझ रहा है। यह सचमुच हमारे देश के हृदय में बसे हुए 'देस' की कविता है जिसमें पाठक खुद अपना झिलमिलाता हुआ प्रतिबिम्ब भी देख पायेगा।अद्भुुत भाषा और कहन वाली यह औघड़ कविता अपने शब्द और बिम्ब धरती के कोने-कोने से चुन कर हमारे लिए लाई है। एकदम समसामयिक काव्यरूप के साथ-साथ भक्तिकालीन कविता का मर्मस्पर्शी संगीत और ओज आपको अचानक द्रवित कर देगा। कहीं पद, कहीं सवैया, कहीं घनाक्षरी, कहीं दोहे, कहीं निर्द्वंद्व निर्झर सा बहता हुआ गीत तो कहीं मुक्त छंद का तरंगित विस्तार। भाषा और काव्यसृष्टि पर ऐसा अधिकार दूर-दूर तक किसी समकालीन का नहीं। इसके पीछे तगड़ी साधना और सत्य की अविचल टेक है। इस कविता में हमारे अस्तित्व पर आक्रांता आततायी सांस्कृतिक पाखंड के खिलाफ सीधे-सीधे आमने-सामने की लड़ाई है। संजय चतुर्वेदी संभवत: अकेले ऐसे कवि हैं जिनकी कविता इस देशव्यापी छल-छद्म का पर्दाफाश करती है।यह लड़ाई कविता में ही नहीं स्वयं अपने भीतर भी अपनी काहिली, गफलत और आत्मविस्मृति के विरुद्ध सतत चलने वाली लड़ाई है। बार-बार ऐसा लगता है जैसे हमारा सामना अपने समय की सबसे प्रतिभाशाली, जागृत और ईमानदार सृजनदृष्टि से है। यह संग्रह हिंदी कविता के आत्म के विस्तार और दुर्गम रास्तों की यात्रा है। और यह भी—कि जैसे बहुत दिनों बाद आप अपने घर लौटें।—दिनेश कुमार शुक्ल
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About the Book
संजय चतुर्वेदी लगभग चालीस वर्षों से हिंदी कविता के केंद्र में प्रखर हस्तक्षेप की तरह अडिग हैं। सच कहा जाय तो उनकी अद्वितीय कविताई आज हिंदी के आँगन में वह अकेला दिया है जो अपसंस्कृति के अंधकार और झंझावात से निडर जूझ रहा है। यह सचमुच हमारे देश के हृदय में बसे हुए 'देस' की कविता है जिसमें पाठक खुद अपना झिलमिलाता हुआ प्रतिबिम्ब भी देख पायेगा।अद्भुुत भाषा और कहन वाली यह औघड़ कविता अपने शब्द और बिम्ब धरती के कोने-कोने से चुन कर हमारे लिए लाई है। एकदम समसामयिक काव्यरूप के साथ-साथ भक्तिकालीन कविता का मर्मस्पर्शी संगीत और ओज आपको अचानक द्रवित कर देगा। कहीं पद, कहीं सवैया, कहीं घनाक्षरी, कहीं दोहे, कहीं निर्द्वंद्व निर्झर सा बहता हुआ गीत तो कहीं मुक्त छंद का तरंगित विस्तार। भाषा और काव्यसृष्टि पर ऐसा अधिकार दूर-दूर तक किसी समकालीन का नहीं। इसके पीछे तगड़ी साधना और सत्य की अविचल टेक है। इस कविता में हमारे अस्तित्व पर आक्रांता आततायी सांस्कृतिक पाखंड के खिलाफ सीधे-सीधे आमने-सामने की लड़ाई है। संजय चतुर्वेदी संभवत: अकेले ऐसे कवि हैं जिनकी कविता इस देशव्यापी छल-छद्म का पर्दाफाश करती है।यह लड़ाई कविता में ही नहीं स्वयं अपने भीतर भी अपनी काहिली, गफलत और आत्मविस्मृति के विरुद्ध सतत चलने वाली लड़ाई है। बार-बार ऐसा लगता है जैसे हमारा सामना अपने समय की सबसे प्रतिभाशाली, जागृत और ईमानदार सृजनदृष्टि से है। यह संग्रह हिंदी कविता के आत्म के विस्तार और दुर्गम रास्तों की यात्रा है। और यह भी—कि जैसे बहुत दिनों बाद आप अपने घर लौटें।—दिनेश कुमार शुक्ल
Book Details
-
ISBN9789391925161
-
Pages112
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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