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Author:
Krishna KumarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences₹
199
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यह पुस्तक लड़कियों के मानस पर डाली जानेवाली सामाजिक छाप की जाँच करती है। वैसे तो छोटी लड़की को बच्ची कहने का चलन है, पर उसके दैनंदिन जीवन की छानबीन ही यह बता सकती है कि लड़कियों के सन्दर्भ में 'बचपन' शब्द की व्यंजनाएँ क्या हैं। कृष्ण कुमार ने इन व्यंजनाओं की टोह लेने के लिए दो परिधियाँ चुनी हैं। पहली परिधि है घर के सन्दर्भ में परिवार और बिरादरी द्वारा किए जानेवाले समाजीकरण की। इस परिधि की जाँच संस्कृति के उन कठोर और पैने औज़ारों पर केन्द्रित है जिनके इस्तेमाल से लड़की को समाज द्वारा स्वीकृत औरत के साँचे में ढाला जाता है। दूसरी परिधि है शिक्षा की जहाँ स्कूल और राज्य अपने सीमित दृष्टिकोण और संकोची इरादे के भीतर रहकर लड़की को एक शिक्षित नागरिक बनाते हैं। लड़कियों का संघर्ष इन दो परिधियों के भीतर और इनके बीच बची जगहों पर बचपन भर जारी रहता है। यह पुस्तक इसी संघर्ष की वैचारिक चित्रमाला है।
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यह पुस्तक लड़कियों के मानस पर डाली जानेवाली सामाजिक छाप की जाँच करती है। वैसे तो छोटी लड़की को बच्ची कहने का चलन है, पर उसके दैनंदिन जीवन की छानबीन ही यह बता सकती है कि लड़कियों के सन्दर्भ में 'बचपन' शब्द की व्यंजनाएँ क्या हैं।
कृष्ण कुमार ने इन व्यंजनाओं की टोह लेने के लिए दो परिधियाँ चुनी हैं। पहली परिधि है घर के सन्दर्भ में परिवार और बिरादरी द्वारा किए जानेवाले समाजीकरण की। इस परिधि की जाँच संस्कृति के उन कठोर और पैने औज़ारों पर केन्द्रित है जिनके इस्तेमाल से लड़की को समाज द्वारा स्वीकृत औरत के साँचे में ढाला जाता है। दूसरी परिधि है शिक्षा की जहाँ स्कूल और राज्य अपने सीमित दृष्टिकोण और संकोची इरादे के भीतर रहकर लड़की को एक शिक्षित नागरिक बनाते हैं।
लड़कियों का संघर्ष इन दो परिधियों के भीतर और इनके बीच बची जगहों पर बचपन भर जारी रहता है। यह पुस्तक इसी संघर्ष की वैचारिक चित्रमाला है।
Book Details
-
ISBN9788126730131
-
Pages148
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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प्रस्तुत पुस्तक में जाहेदा हिना ने पाकिस्तान में औरतों की दशा-दिशा का प्रामाणिक विवरण दिया है। हमारे एशियाई मुल्कों में रंग-भेद, नस्ल-भेद आदि की समस्याओं पर जिस तरह मिलकर सोचने की प्रक्रिया शुरू हुई, उसके परिणामस्वरूप बहुत परिवर्तन आया है। लेकिन औरत की ज़िन्दगी के प्रति जो दृष्टि रही है, उसमें अपेक्षाकृत अभी वांछित परिवर्तन ने गति नहीं पकड़ी है। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान, दोनों मुल्कों की स्त्रियों को यदि समान रूप से चेतनावान बनाया जाए तो यह भी दोनों मुल्कों को नज़दीक लाने की एक सार्थक कोशिश साबित हो सकती है। इसलिए डॉ. ताहिरा परवीन ने जाहेदा हिना की किताब का हिन्दी में यह जो अनुवाद किया है, उससे हमारा हिन्दी समाज यह जान सकेगा कि औरतों के प्रति नज़रिए के मामले में दोनों देशों की दशा एक-सी है। यह किताब हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की औरतों को मिलकर अपने आज़ाद वजूद के प्रति जागरूक बनाने के लिए बहुत उपयोगी साबित होगी।
Krishnakali
- Author Name:
Shivani
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पाठक किसी पात्र से एकत्व स्थापित कर लेता है; जब उसका अपमान उसकी वेदना बन जाता है, तब ही लेखनी की सार्थकता को हम मान्यता दे पाते हैं। जब ‘कृष्णकली’ लिख रही थी तब लेखनी को विशेष परिश्रम नहीं करना पड़ा, सब कुछ स्वयं ही सहज बनता चला गया था। जहाँ क़लम हाथ में लेती, उस विस्तृत मोहक व्यक्तित्व को, स्मृति बड़े अधिकारपूर्ण लाड़-दुलार से खींच, सम्मुख लाकर खड़ा कर देती, जिसके विचित्र जीवन के रॉ-मैटीरियल से मैंने वह भव्य प्रतिमा गढ़ी थी। ओरछा की मुनीरजान के ही ठसकेदार व्यक्तित्व को सामान्य उलट-पुलटकर मैंने पन्ना की काया गढ़ी थी। जब लिख रही थी तो बार-बार उनके मांसल मधुर कंठ की गूँज कानों में गूँज उठती। वही विस्तृत मधुर गूँज, उनके नवीन व्यक्तित्व के साथ, ‘कृष्णकली’ में उतर आई। —शिवा
Khari Nadi
- Author Name:
Richa Nagar
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खारी नदी को आप मुमताज़ बेगम की कहानी कहिए, या फिर उनकी कहानी से हिम्मत बटोरती कई कहानियाँ कहिए, आपबीती कहिए, ज़िन्दगी के तजुर्बे कहिए, पर यह कहानी हमें अपने आप से और दुनिया की कठोर सच्चाई से रू-ब-रू कराती है और आगे के रास्ते भी दिखाती है। इसलिए ये महज़ कहानी या आपबीती नहीं रह जाती बल्कि खारी नदी कहलाती है। खारा तो समुन्दर भी होता है, लेकिन इस नदी का खारापन आँसुओं से जुड़ा है। उसके बावजूद इसमें उमंगों की लहरें हैं जो इस कहानी को ख़ास बनाती हैं। हमारे आसपास की दुनिया ने कुछ दस्तूर बना दिए हैं, कुछ ठप्पे बना दिए हैं, जो बस इनसानों पर लगा दिए जाते है, कि ये तो ऐसा ही होगा। एक तयशुदा नज़रिया और तयशुदा सज़ा... लेकिन खारी नदी तो इन सब नज़रियों से परे एक औरत का संघर्ष दिखाती है जो किसी भी वंचित समुदाय की औरत का संघर्ष हो सकता है। खारी नदी में बयाँ की गई मुमताज़ बेगम, नन्दा, और चन्द्रभागा के साथ-साथ तमाम औरतों की आपबीतियाँ हमें झकझोर कर रख देती हैं। हर कहानी किसी एक औरत की नहीं, बल्कि तमाम औरतों का बयान है जो उन पर लगाए गए असंख्य बन्धनों और दुखों को उजागर करता है। और ये सारे बन्धन और दुख कहीं-न-कहीं धर्म और जाति के साथ उलझकर अलग-अलग जगहों पर अपना जाल बिछाए हुए हैं, औरत गाँव-देहात की हो या शहर की, अनपढ़ हो चाहे पढ़ी-लिखी। लेकिन खारी नदी की हर कहानी में एक ज़िन्दा मन भी है, और संघर्ष की तैयारी भी। खारी नदी औरतों के दुख, आँसू और शोषण के साथ-साथ उनकी ज़िन्दगी को बेहतरीन बनाने के लिए किया गया संघर्ष है। उम्मीद है यह संघर्ष पाठक को बहुत कुछ सोचने, समझने, आँकने और उसे जीवन में उतारने पर मजबूर करेगा; एक नया नज़रिया देगा।
Devi
- Author Name:
Mrinal Pande
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स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु तव देवि भेदा:। सम्पूर्ण सृष्टि की महिलाएँ, हे देवि, वस्तुत: तुम्हारे ही विभिन्न स्वरूप हैं। स्त्रियों के विभिन्न स्वरूपों की डोर पकड़कर आदिशक्ति के मूल स्वरूप को समझना; और शक्ति के नाना रूपों के आईनों में आज से लेकर आर्षकालीन समाज की स्त्रियों की ढेरों लोकगाथाओं, महागाथाओं, आख्यानों को नए सिरे से पकड़कर व्याख्यायित कर पाना—यही इस विचित्र पुस्तक का मूल अभीष्ट है। यह न विशुद्ध कथापरक उपन्यास है, न कपोलकल्पित मिथकों की लीला और न ही एक वैज्ञानिक इतिहास। मानव–मन के गोपनीय और रहस्यमय अंश से लेकर महाकाव्यकारों की उदात्त कल्पना के बिन्दुओं तक सभी यहाँ हैं; कभी जुड़ते, कभी छिटकते, कभी एक साथ जुड़ते–छिटकते हुए। जीवन की ही तरह देवी की ये गाथाएँ भी कभी कालातीत गहराइयाँ मापती हैं, तो कभी समकालीन इतिहास में क़दमताल करती हैं। इन गाथाओं में वे सभी द्वैत मौजूद हैं, जिनसे एक औसत भारतीय का मन–संसार बनता है, अपने सभी उजले–स्याह राग–विराग समेत। अपने मानाभिमान, दर्प, आक्रोश, करुणा और ममत्व में यही वे बिम्ब हैं, जिनसे सृष्टि चलती है, जीवन चलता है। साहित्य उपजता है और लोकगाथाएँ रची जाती हैं।
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