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स्त्रीमुग़ल की कविताएँ इस अर्थ में विशेष हैं क्योंकि इन्हें लिखने के क्रम में हिन्दी के किसी कवि के द्वारा दो सौ वर्षों के साम्राज्य-इतिहास का विस्तृत और वेधक शोध-अध्ययन किया गया है। कवि ने इसके लिए मुग़ल इतिहास का प्रतिनिधित्व करती पुस्तकों, उपन्यासों, टीपों, लेखों और समीक्षाओं को संवेदित मानस से पढ़ा। दुनिया-भर के साम्राज्यों में उल्लिखित स्त्रियों की तरह मुग़ल इतिहास में भी स्त्रियों की विशेषता कमतर नहीं।</p> <p>अध्ययन के दौरान मुग़ल स्त्रियों में से किसी-किसी स्त्री का कविता में ढलते जाना रोचक रहा। बरास्ते-कवि कई महत्त्वपूर्ण मुग़ल स्त्रियाँ इस वजह से स्वयं को कविता में नहीं बदल सकीं, क्योंकि वहाँ उनसे जुड़ी कोई घटना अथवा कहानी मौजूद नहीं थी। किंतु कई साधारण आनुषंगिक स्त्रियाँ स्वयं को कविता में बदलने में इसलिए कामयाब हो गईं क्योंकि मुग़ल इतिहास में वे किसी ख़ास घटना की गवाह थीं।</p> <p>दो सौ से अधिक वर्षों के मुग़लकाल में मुग़ल स्त्रियों ने मुग़ल बादशाहों, शहज़ादों, सेनापतियों और सूबेदारों के साथ उत्तर और दक्षिण की कठिनतम यात्राएँ कीं। क़िलों के साथ-साथ उनका जीवन यात्रा-शिविरों में शहज़ादों और शहज़ादियों को जनते, उनके निकाह-विवाह होते देखते बीत गया। कोई मुग़ल बेगम अपनी छाप छोड़ने में सफल हो सकी तो कई बेगमें बादशाहों के हरम में खोकर रह गईं। कोई शहज़ादी अपने मन की कर सकी, तो कोई शहज़ादी मात्र सत्ता के सूत्र छूने में कामयाब हो सकी। मगर किसी मुग़ल स्त्री को सुल्तान रज़िया की तरह हिन्दुस्तान की बादशाहत नहीं मिली।</p> <p>क़िलों की अभेद्य और ऊँची दीवारें, हाथियों की चिंघाड़, नक़्क़ारों की आवाज़ें, बादशाहों की रत्नजड़ित पोशाकें-टोपियाँ, तोप-तलवारें, मुग़ल स्त्रियों को हरम और हरम के भीतर पलते षड्यंत्रों तक सीमित रखने में कामयाब हो गईं। मुग़ल स्त्रियों की बिजली-सी कौंध से हमारा परिचय इस संग्रह की कविताओं में होता है। मुग़ल स्त्रियों की पीड़ा, रुदन, तड़प, बेचैनी और समझ जो मुग़ल इतिहास से एक हद तक ग़ायब है, स्त्रीमुग़ल की कविताएँ उससे हमारा परिचय कराने की कोशिश करती हैं।</p> <p>पवन करण इससे पहले भी प्राचीन भारतीय साहित्य से खोजकर स्त्रीशतक (खंड-एक एवं दो) में भी दो सौ स्त्रियों के परिचय, पीड़ा और प्रतिरोध का अद्यतन आख्यान रच चुके हैं, इन कविताओं में मुग़ल इतिहास की एक सौ मुग़ल स्त्रियों ने नवजीवन पाया है।
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स्त्रीमुग़ल की कविताएँ इस अर्थ में विशेष हैं क्योंकि इन्हें लिखने के क्रम में हिन्दी के किसी कवि के द्वारा दो सौ वर्षों के साम्राज्य-इतिहास का विस्तृत और वेधक शोध-अध्ययन किया गया है। कवि ने इसके लिए मुग़ल इतिहास का प्रतिनिधित्व करती पुस्तकों, उपन्यासों, टीपों, लेखों और समीक्षाओं को संवेदित मानस से पढ़ा। दुनिया-भर के साम्राज्यों में उल्लिखित स्त्रियों की तरह मुग़ल इतिहास में भी स्त्रियों की विशेषता कमतर नहीं।</p>
<p>अध्ययन के दौरान मुग़ल स्त्रियों में से किसी-किसी स्त्री का कविता में ढलते जाना रोचक रहा। बरास्ते-कवि कई महत्त्वपूर्ण मुग़ल स्त्रियाँ इस वजह से स्वयं को कविता में नहीं बदल सकीं, क्योंकि वहाँ उनसे जुड़ी कोई घटना अथवा कहानी मौजूद नहीं थी। किंतु कई साधारण आनुषंगिक स्त्रियाँ स्वयं को कविता में बदलने में इसलिए कामयाब हो गईं क्योंकि मुग़ल इतिहास में वे किसी ख़ास घटना की गवाह थीं।</p>
<p>दो सौ से अधिक वर्षों के मुग़लकाल में मुग़ल स्त्रियों ने मुग़ल बादशाहों, शहज़ादों, सेनापतियों और सूबेदारों के साथ उत्तर और दक्षिण की कठिनतम यात्राएँ कीं। क़िलों के साथ-साथ उनका जीवन यात्रा-शिविरों में शहज़ादों और शहज़ादियों को जनते, उनके निकाह-विवाह होते देखते बीत गया। कोई मुग़ल बेगम अपनी छाप छोड़ने में सफल हो सकी तो कई बेगमें बादशाहों के हरम में खोकर रह गईं। कोई शहज़ादी अपने मन की कर सकी, तो कोई शहज़ादी मात्र सत्ता के सूत्र छूने में कामयाब हो सकी। मगर किसी मुग़ल स्त्री को सुल्तान रज़िया की तरह हिन्दुस्तान की बादशाहत नहीं मिली।</p>
<p>क़िलों की अभेद्य और ऊँची दीवारें, हाथियों की चिंघाड़, नक़्क़ारों की आवाज़ें, बादशाहों की रत्नजड़ित पोशाकें-टोपियाँ, तोप-तलवारें, मुग़ल स्त्रियों को हरम और हरम के भीतर पलते षड्यंत्रों तक सीमित रखने में कामयाब हो गईं। मुग़ल स्त्रियों की बिजली-सी कौंध से हमारा परिचय इस संग्रह की कविताओं में होता है। मुग़ल स्त्रियों की पीड़ा, रुदन, तड़प, बेचैनी और समझ जो मुग़ल इतिहास से एक हद तक ग़ायब है, स्त्रीमुग़ल की कविताएँ उससे हमारा परिचय कराने की कोशिश करती हैं।</p>
<p>पवन करण इससे पहले भी प्राचीन भारतीय साहित्य से खोजकर स्त्रीशतक (खंड-एक एवं दो) में भी दो सौ स्त्रियों के परिचय, पीड़ा और प्रतिरोध का अद्यतन आख्यान रच चुके हैं, इन कविताओं में मुग़ल इतिहास की एक सौ मुग़ल स्त्रियों ने नवजीवन पाया है।
Book Details
-
ISBN9788119092697
-
Pages216
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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बीसवीं सदी के तीसरे दशक से लेकर नौवें दशक की शुरुआत तक कवि भवानी प्रसाद मिश्र की अनथक संवेदनाएँ लगातार सफ़र पर रहीं।
हिन्दी भाषा और उसकी प्रकृति को अपनी कविता में सँजोता और नए ढंग से रचता यह कवि न केवल घर, ऑफ़िस या बाज़ार, बल्कि समूची परम्परा में रची-पची और बसी अन्तर्ध्वनियों को जिस तरकीब से जुटाता और उन्हें नई अनुगूँजों से भरता है, वे अनुगूँजें सिर्फ़ कामकाजी आबादी की अनुगूँजें नहीं हैं, उस समूची आबादी की भी हैं जिसमें सूरज, चाँद, आकाश-हवा, नदी-पहाड़, पेड़-पौधे और तमाम चर-अचर जीव-जगत आता है। स्वभावत: इस सर्जना में मानव-आत्मा का सरस-संगीत अपनी समूची आत्मीयता और अन्तरंगता में सघन हो उठा है। कविता में मनुष्य और लोक-प्रकृति और लोक-जीवन की यह संयुक्त भागीदारी एक ऐसी जुगलबन्दी का दृश्य रचती है जिसे केवल निराला, किंचित् अज्ञेय और यत्किंचित् नागार्जुन जैसे कवि करते हैं।
कविता के अनेक रूपों, शैलियों और भंगिमाओं को समेटे यह कवि पारम्परिक रूपों के साथ-साथ नवीनतम रूपों का जैसा विधान रचता है, वह उसकी सामर्थ्य की ही गवाही देता है। मुक्त कविता, गीत-ग़ज़ल, जनगीत, खंडकाव्य, कथा-काव्य, प्रगीत कविता के साथ उसकी सीधी-सादी प्रत्यक्ष भावमयी शैली के साथ आक्रामक, व्यंग्य और उपहासमयी, सांकेतिक और विडम्बनादर्शी भंगिमाएँ भी यहाँ मौजूद हैं। कई एक साथी कवियों में जैसी एकरसता देखी जाती है, भवानी प्रसाद मिश्र ने उसे अपनी भंगिम-विपुलता और शैली-वैविध्य से बार-बार तोड़ा है।
Sarkti Parchhaiyan
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Seepiyaan
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कबीर, तुलसी, वृंद, रहीम और बिहारी आदि कवियों ने सदियों पहले अपनी गहरी अन्तर्दृष्टि और मानव-स्वभाव की समझ की बुनियाद पर कुछ बातें कहीं, और इसके लिए उन्होंने कविता का जो रूप चुना, वह था—दोहा। दो पंक्तियों में गुँथी-गठी एक सम्पूर्ण कविता जो तीर की तरह जाकर हमारी चेतना में गड़ जाती है। सैकड़ों सालों से ये दोहे हमारे साथ रहते आए हैं, कभी ये हमें हमारी ख़ामियाँ दिखाते हैं, कभी हमारे रहबर बन जाते हैं, और कभी कोई ऐसा सच बता जाते हैं जिसे हमारी दुनियावी निगाह देखकर भी नहीं देखती। ‘सीपियाँ’ में जावेद अख़्तर ने ऐसे ही कुछ दोहों को चुनकर उनके भीतर छिपे सत्य को आमफ़हम ज़बान में हर किसी के लिए सुलभ कर दिया है। जो बातें इनसे निकलकर आई हैं वे आज भी उतनी ही सच हैं, आज भी उतनी ही उपयोगी हैं, जितनी उस समय थीं, और आगे भी उतनी ही सार्थक रहेंगी। जावेद अख़्तर हमारी आज की रोज़मर्रा ज़िन्दगी से उन्हें जोड़ते हैं और बताते हैं कि कैसे उन पर अमल करके, उनसे मिलनेवाली सीख को अपनाकर हम ख़ुद को बेहतर इनसान और अपनी दुनिया को एक बेहतर समाज बना सकते हैं।
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भगवान शिव के क्रोध का लक्ष्य होकर काम भस्म हो जाता है। सम्पूर्ण देव-जगत और ब्रह्मा ने उसे भेजा था ताकि वह तपस्या-रत शिव को पार्वती के सौंदर्य की ओर प्रवृत्त कर सके और दोनों के मिलन से उत्पन्न संतान देवगण का नेतृत्व कर उपद्रवी तारकासुर को समाप्त कर सके। वसंत काम के साथ इसी कार्य की सिद्धि के लिए कैलास गया था।यह एक लम्बी कथा है जिसका केवल एक अंश— कैलास पर वसंत के अकस्मात आविर्भाव से लेकर काम के भस्म होने और तद्नंतर रति के विलाप की प्रतिक्रिया में मनुष्य मात्र को आश्वस्त करने वाली आकाशवाणी तक—यही ‘भस्मांकुर’ की विषयवस्तु है। इतनी-सी कथा को इस काव्य के केंद्र में रखकर नागार्जुन ने अपनी लोकदृष्टि,गहन सामाजिक सम्पृक्ति और उदात्त आशाबोध के साथ बड़े और व्यापक अर्थों में पाठक तक पहुँचाया है। काम के पुनरुद्भव,उसके भस्म से अंकुरित होने को उन्होंने मानव-जीवन के सातत्य से जोड़ा है। यह काम ही है जो सृष्टि का,जिजीविषा का और कामना का मूल है। बरवै छंद में एक हजार पंक्तियों में अनुस्यूत यह रचना नागार्जुन की उत्कृष्ट कृतियों में गिनी जाती है।
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राम-कथा में सीता सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पात्र हैं। कथा-विस्तार के केन्द्र में वही प्रमुख हैं। सीता नारी के उद्दाम स्वाभिमान की प्रतीक हैं। सीता का परित्याग जहाँ नारी-शोषण की व्यथा-कथा है, वहीं भूमि से उत्पन्न उस पुत्री का अपनी पवित्रता व शुचिता के प्रमाण हेतु दिव्य आवाहन—जिसके बाद धरती फटती है और वह भू-समाधि ले लेती है—उस शोषण से मुक्ति का चरम है। आज के सर्वाधिक लोकप्रिय एवं वरिष्ठ कवि नागार्जुन ने प्राचीन कथा-प्रसंगों को आधुनिक सन्दर्भों में बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। इस प्रबन्धकाव्य में प्रकृति के उद्दीपन रूप के यत्र-तत्र बड़े ही विलक्षण चित्र मिलते हैं। भावों की सहजता तथा यथार्थ से निकटता तो आकर्षित करती ही है, साथ ही छन्द, लय और गति इसे मुग्धकारी पठनीयता प्रदान करते हैं। रचनाकार का विस्तृत परिचय, कथा-प्रसंग, चर्चित पात्र-प्रसंग तथा शब्दार्थों के दिए जाने से ‘भूमिजा’ एक अधिक उपयोगी काव्यकृति बन गई है।
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