Shunye ki Awaz Suno
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इन दिनों प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों का एक छोटा-सा वर्ग है जो जीवन और समाज के अपने विविध अनुभवों को समेटकर गंभीर साहित्य की रचना करने में लगा है। इसे प्रशासन की यांत्रिकता में मानवीय मूल्यों और संवेदना की वापसी की तरह देखा जाना चाहिए। भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी अशोक शाह लंबे अरसे से लिखते रहे हैं - कविताएं भी और पुरातात्विक शोध भी। उनके पिछले सत्रह कविता संकलनों ने उन्हें गंभीर, लेकिन आत्मीय रचनाकर्मी के रूप में पहचान दी है। ऐसा रचनाकर्मी जिसमें पाठकों के साथ एक सहज, आत्मीय रिश्ता बनाने की बेचैनी दिखती है। उनकी चुनी हुई कविताओं का संकलन 'शून्य की आवाज़ सुनो' में कवि को उसकी संपूर्णता में जाना जा सकता है। संकलन की कविताओं में समकालीन जीवन की समस्याओं से सार्थक टकराव भी है, इस अराजक समय में जो कुछ कोमल और मानवीय है उसे बचा ले जाने की चिंता भी, मनुष्य और प्रकृति के सनातन रिश्ते को फिर से स्थापित करने की कोशिशें भी। संकलन की तमाम कविताओं में प्रेम और पारिवारिक संबंधों की आत्मीयता की जो अंतर्धारा हर कहीं मौजूद हैं, वह कविताओं को यांत्रिक नहीं होने देती। कविता दर कविता पाठकों की अंतरात्मा से उनका सीधा संवाद चलता रहता है। कथ्य के अनुरूप कविताओं की भाषा में प्रवाह भी है और साथ बहा ले जाने वाली तरलता भी। उम्मीद है कि बौद्धिक और यांत्रिक होते जा रहे कविताओं के इस दौर में संवेदनाओं से सराबोर अशोक शाह की चुनी हुई कविताओं के इस संकलन 'शून्य की आवाज़ सुनो' का निश्चित तौर पर स्वागत होगा। -ध्रुव गुप्त
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इन दिनों प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों का एक छोटा-सा वर्ग है जो जीवन और समाज के अपने विविध अनुभवों को समेटकर गंभीर साहित्य की रचना करने में लगा है। इसे प्रशासन की यांत्रिकता में मानवीय मूल्यों और संवेदना की वापसी की तरह देखा जाना चाहिए। भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी अशोक शाह लंबे अरसे से लिखते रहे हैं - कविताएं भी और पुरातात्विक शोध भी। उनके पिछले सत्रह कविता संकलनों ने उन्हें गंभीर, लेकिन आत्मीय रचनाकर्मी के रूप में पहचान दी है। ऐसा रचनाकर्मी जिसमें पाठकों के साथ एक सहज, आत्मीय रिश्ता बनाने की बेचैनी दिखती है। उनकी चुनी हुई कविताओं का संकलन 'शून्य की आवाज़ सुनो' में कवि को उसकी संपूर्णता में जाना जा सकता है। संकलन की कविताओं में समकालीन जीवन की समस्याओं से सार्थक टकराव भी है, इस अराजक समय में जो कुछ कोमल और मानवीय है उसे बचा ले जाने की चिंता भी, मनुष्य और प्रकृति के सनातन रिश्ते को फिर से स्थापित करने की कोशिशें भी। संकलन की तमाम कविताओं में प्रेम और पारिवारिक संबंधों की आत्मीयता की जो अंतर्धारा हर कहीं मौजूद हैं, वह कविताओं को यांत्रिक नहीं होने देती। कविता दर कविता पाठकों की अंतरात्मा से उनका सीधा संवाद चलता रहता है। कथ्य के अनुरूप कविताओं की भाषा में प्रवाह भी है और साथ बहा ले जाने वाली तरलता भी। उम्मीद है कि बौद्धिक और यांत्रिक होते जा रहे कविताओं के इस दौर में संवेदनाओं से सराबोर अशोक शाह की चुनी हुई कविताओं के इस संकलन 'शून्य की आवाज़ सुनो' का निश्चित तौर पर स्वागत होगा। -ध्रुव गुप्त
Book Details
-
ISBN9788196206314
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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माया गोविन्द हिन्दी काव्य मंचों की श्रीवृद्धि करती रही हैं। उन्होंने हिन्दी सिनेमा में अपने स्तरीय गीतों से गीतात्मकता की गुणवृद्धि की है। यही कारण है कि उनके गीतों में लय की अद्भुत छटाएँ मिलती हैं। ऐसा लगता है कि गीत गाए जाने के बाद लिखे गए हैं। इनमें जीवन की विभिन्न स्थितियाँ हैं। फिर भी, यह कहना अधिक उचित होगा कि माया गोविन्द ने एक स्त्री की दृष्टि से इस सृष्टि को देखा है। इसीलिए ये गीत स्त्री की पीड़ा को सशक्त ढंग से अभिव्यक्त करते हैं। आसक्ति और अनासक्ति के बीच व्याकुल मन की थाह माया गोविन्द ने भली-भाँति लगाई है। सावन और होली आदि के बहाने जीवन के उत्सव की विविध छटाएँ व्यंजित हुई हैं। कहीं-कहीं अद्भुत कथन उभरे हैं—‘प्यास की रुक्मिणी का करो तुम हरण’ या ‘अधरों पर अधर जैसे, इन्द्रधनुष की लकीर’।
भाषा, भाव और शैली की दृष्टि से ‘माया राग’ के गीत निश्चित रूप से पाठकों के हृदय को आन्दोलित करेंगे।
Har Koshish Hai Ek Baghawat
- Author Name:
Rajendra Kumar
- Book Type:

- Description: collection of poems
Matdan Kendra Par Jhapaki
- Author Name:
Kedarnath Singh
- Book Type:

-
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ये कविताएँ एक कवि का पक्ष रखती हैं जिसे केदार जी इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई में आकर पक्षहीन हो चुके हम लोगों को सौंप रहे हैं। ये कविताएँ हिंसा के विशाल परदे के आगे एक मनुष्य का हिंसक होने से इनकार हैं—देखने में बहुत विनम्र, विनीत, लेकिन चट्टान-सा सख़्त, दृढ़ और निर्णायक।
ज़रूरी नहीं कि उनकी सूची में हमारा नाम हो ही, जिनका नाम किसी सूची में नहीं, उनकी भी एक दुनिया है, जिसका नेतृत्व पेड़ करते हैं, और आपस में टकराते सत्ता के काले-पीले-सफ़ेद नारों के बरक्स जिसके पास पृथ्वी के सबसे सटीक और सबसे सुन्दर नारे हैं। वे नारे जो नदियों को उनका पानी, चींटियों को उनके बिल और आँखों को उनकी झपकी लौटा देने की पैरवी कर रहे हैं। इस संग्रह को पढ़ते हुए हमें इन रवहीन नारों की ताक़त का अहसास होता है।
केदार जी अब हमारे बीच नहीं हैं, उनकी कविताओं का यह संकलन एक वसीयत की तरह हमारे पास रहेगा जिसमें संसार की सबसे मूल्यवान वस्तु, मनुष्यता की देखरेख की ज़िम्मेदारी वे हमें सौंप रहे हैं।
‘‘पृथ्वी के सारे ख़ून एक हैं/एक ही यात्रा में/एक ही पृथ्वी-भर लम्बी देह में/दौड़ रहे हैं वे/...अरबों धड़कनें एक ही लय में/घुमा रही हैं दुनिया को/ हर ख़ून हर ख़ून से बतियाता है।''
ये कविताएँ अपने सहज, निरायास आग्रह के साथ हमें ख़ून से बातें करते ख़ून की आवाज़ सुनने को कहती हैं। ''क्षमा करें भद्रजन/यदि फिर पूछ रहा हूँ/...मेरे देश के एक हाथ को/एक खुले हुए भूखे मुँह तक पहुँचने में/कितने बरस लगते हैं?’’ यह एक निर्दलीय प्रश्न है, लेकिन निरपेक्ष नहीं, यह मनुष्यता की आहत कोख में चीख़ता प्रश्न है; उम्मीद है हम इसका जवाब ढूँढ़ने का प्रयास करेंगे!
Aur Meera Nachti Rahi
- Author Name:
Mamta Tiwari
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- Description: Awating description for this book
Tao-Te-Chhing
- Author Name:
Laotse
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Description:
‘ताओ जिसे परिभाषित किया जा सके, शाश्वत ताओ नहीं।’ यह शब्द संसार के धार्मिक साहित्य में सर्वाधिक लोकप्रिय है। ताओ-ते-छिङ के इक्यासी अध्याय ढाई हज़ार वर्ष पूर्व हमारे समीपवर्ती राष्ट्र, चीनी जनसमूह को सम्बोधित थे। ये इक्यासी अध्याय बाइबल, भागवत गीता, क़ुरान आदि की तरह बहुत-सी भाषाओं में अनूदित हुए हैं। ताओ का मार्ग हमें दिखाता है कि ब्रह्मांड और हमारे अन्तरलोक की ऊर्जाएँ परस्पर कैसे प्रतिबिम्बित होती हैं। धूलिकण के समान तुच्छ होते हुए भी हम उस विराट का भाग हैं। दर्शन के अभाव में जीवनयापन करते हुए हम स्वयं सरल मूल्यों को जटिल बनाकर जीवन-प्रवाह में अवरोध उत्पन्न करते हैं।
‘ताओ-ते-छिङ’ मनुष्य की आध्यात्मिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, दैनिक-दैहिक स्थिति-परिस्थितियों का सूक्ष्म अध्ययन है। यह मनुष्य की योग्यता के उन स्तरों का आग्रह करता है जो सामान्यतः हमारे बोध का हिस्सा नहीं हैं। यह पुस्तक धार्मिक व सामाजिक कर्मकांडी विलक्षणताओं से उपजी समस्याओं के सरलीकरण की अद्भुत सूक्तियाँ उपलब्ध कराती है, साथ ही वर्तमान में पश्चिमी संस्कृति की देन तर्कमूलक चिन्तन के औचित्य को प्रश्नचिह्नित करते हुए मनुष्य के जीवन की सार्थकता का आह्वान करती है।
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