Prem Ki Umr Ke Chaar Padaav
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Book Details
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ISBN9789387310834
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Pages120
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Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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श्यामपलट पांडेय वर्तमान समय और उससे जन्मे प्रत्यक्ष आवेग के कवि हैं। हमारा सामाजिक परिवेश जीवन-मूल्यों की टूटन और त्रासद स्थितियों के तनाव से भरा हुआ है। एक संवेदनशील कवि के लिए हमारे इस वर्तमान की कोई भी शक्ल अनिवार्यतः एक विडम्बना-बोध से ही जन्म लेती है। इन कविताओं में रोज़मर्रा के जीवन के सन्दर्भ हैं, छोटे-बड़े प्रसंग और परिस्थितियाँ हैं। पांडेय जीवन के विद्रूप से सीधे मुठभेड़ करते हैं। कहीं इन कविताओं में एक विकलता है तो कहीं एक प्रश्नाकुलता। कहीं अपने रचना-कर्म के प्रति ही एक बुनियादी संशय का भाव भी। दरअसल यही हमारे समय के अनुभव के विभिन्न शेड्स हैं। विसंगतियों के चित्रों के साथ इन कविताओं में परिवर्तन की एक बुनियादी कामना भी है।
तिक्त अनुभवों के बीच से उठी ये कविताएँ जीवन के किसी बेशक़ीमती तत्त्व को बचाए रखने की विकलता की कविताएँ हैं। महत्त्वपूर्ण यह भी है कि श्यामपलट पांडेय का कवि-मन अपने जातीय अनुभव-बोध की ज़मीन से गहरा जुड़ा हुआ है। विडम्बनाओं के चक्रव्यूह में फँसे हुए रचनाकार की अपनी जड़ों की ओर लौटने की एक बेचैनी इन कविताओं में दिखाई पड़ती है। इसीलिए आस-पास की दुनिया और घर-परिवार की अन्तरंगता के अनेक चित्र इन कविताओं में मौजूद हैं। कहना न होगा कि कुटुम्ब से जुड़ी संवेदना हमारे समय में अमानवीय ताक़तों के बरक्स एक नया अर्थ ग्रहण करती है। उसके नए सामाजिक-मनोवैज्ञानिक आशय बनते हैं। अपने पास-पड़ोस से यह लगाव इस दौर में या शायद किसी भी दौर में कविता को हमेशा आत्मीय और प्रामाणिक बनाता रहा है। पांडेय की ये कविताएँ वादों और मुहावरों के शोरगुल से दूर अपनी नैसर्गिक ऊर्जा, जीवन-राग और सहज अनुभूति के बल पर ‘अपने वजूद’ का एहसास कराती हैं।
—विजय कुमार
Vishwarath : Vishwamitra
- Author Name:
Krishnakant 'Eklavya'
- Book Type:

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Description:
कृष्णकान्त 'एकलव्य' के प्रबन्ध काव्य ‘विश्वस्थ’ से गुज़रना सुखद लगा। दरअसल जब पौराणिक कथा काव्य-रचना के लिए ली जाती है तो वह अपने मूल रूप में होकर भी समय के अनुसार कुछ परिवर्तित होती है। कवि उस पुरा-कथा के माध्यम से अपने समय के सत्य को उद्घाटित करता है। कवि इसीलिए पुराण या इतिहास की ऐसी कथाएँ या पात्र लेता है जिनमें नए समय के साथ जुड़कर कुछ नया कहने की क्षमता हो। वशिष्ठ और विश्वामित्र ऐसे महर्षि हैं जिनके चरित्रों की अलग-अलग छवियाँ हैं जो परस्पर टकराती भी हैं। 'एकलव्य' जी ने इन्हीं दो महर्षियों के माध्यम से आज के समय में व्याप्त अनेक समस्याओं को रूपायित किया है और कथा को समकालीनता की दीप्ति देकर अधिक प्रासंगिक बना दिया है।
—रामदरस मिश्र
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