Pratinidhi Shairy : Akhtar Sheerani
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1905 में रियासत टोंक में जन्मे दाउद ख़ान शीरानी, जो आगे चलकर ‘अख़्तर’ शीरानी के नाम से मशहूर हुए, एक बहुत ही अमीर और प्रभावशाली पिता के पुत्र थे। देश-विभाजन से पहले ही उनके पिता हाफ़िज़ महमूद ख़ान शीरानी लाहौर आकर बस गए और यहाँ भी उनको वही मर्तबा हासिल हुआ जो टोंक में हुआ करता था। ज़ाहिर है कि नौजवान दाउद ख़ान के लिए पैसे-कौड़ी की कोई समस्या नहीं थी; शायरी भी उनके लिए पैसा कमाने का ज़रिया नहीं, शौक़ थी। फिर क्या कारण है कि यही दाउद ख़ान शीरानी बीच में ही तालीम से बेज़ार होकर आवारागर्दी को अपना मशग़ला बना बैठे? क्या कारण है कि ‘अख़्तर’ बनकर उन्होंने ख़ुद को शराब में डुबो लिया? वह कौन सी प्रेरणा थी जिसने उनके और उनके वालिद या घरवालों के बीच कोई सम्बन्ध लगभग छोड़ा ही नहीं? वह कौन सी कसक थी जो उनको हिन्दुस्तान के कोने-कोने में लिए फिरी? इस और ऐसे ही दूसरे अनेक सवालों के जवाब अभी भी पूरी तरह और सन्तोषजनक ढंग से सामने नहीं आए हैं। लेकिन इतना तय है कि ‘अख़्तर’ शीरानी एक बहुत ही निराशाजनक सीमा तक अपने माहौल से कटे हुए थे, और उनके व्यक्तित्व की ठीक यही विशेषता उनके कृतित्व की निर्धारक शक्ति भी बनी।</p> <p>रहा सवाल ‘अख़्तर’ साहब की शायरी का, तो इसमें शक़ नहीं कि वे बहुत कम उम्र में ही कुल-हिन्द शोहरत के शायरों में गिने जाने लगे थे और पत्र-पत्रिकाओं में उनका कलाम छपने के लिए होड़-सी लगी रहती थी। लेकिन उनकी उदासीनता का, दुनिया से बेज़ारी का आलम यह था कि अपने जीवनकाल में उन्होंने अपना संग्रह प्रकाशित कराने की तरफ़ ध्यान तक नहीं दिया; उनकी रचनाओं का संकलन उनकी मृत्यु के बाद ही हुआ। नागरी लिपि में ‘अख़्तर’ की अभी तक बहुत छोटे-छोटे दो-एक चयन ही सामने आए हैं जो कि पाठक की प्यास को बुझाने का पारा नहीं रखते। मगर यह शिकायत प्रस्तुत संकलन को लेकर नहीं आएगी, इसका हमें विश्वास है।
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1905 में रियासत टोंक में जन्मे दाउद ख़ान शीरानी, जो आगे चलकर ‘अख़्तर’ शीरानी के नाम से मशहूर हुए, एक बहुत ही अमीर और प्रभावशाली पिता के पुत्र थे। देश-विभाजन से पहले ही उनके पिता हाफ़िज़ महमूद ख़ान शीरानी लाहौर आकर बस गए और यहाँ भी उनको वही मर्तबा हासिल हुआ जो टोंक में हुआ करता था। ज़ाहिर है कि नौजवान दाउद ख़ान के लिए पैसे-कौड़ी की कोई समस्या नहीं थी; शायरी भी उनके लिए पैसा कमाने का ज़रिया नहीं, शौक़ थी। फिर क्या कारण है कि यही दाउद ख़ान शीरानी बीच में ही तालीम से बेज़ार होकर आवारागर्दी को अपना मशग़ला बना बैठे? क्या कारण है कि ‘अख़्तर’ बनकर उन्होंने ख़ुद को शराब में डुबो लिया? वह कौन सी प्रेरणा थी जिसने उनके और उनके वालिद या घरवालों के बीच कोई सम्बन्ध लगभग छोड़ा ही नहीं? वह कौन सी कसक थी जो उनको हिन्दुस्तान के कोने-कोने में लिए फिरी? इस और ऐसे ही दूसरे अनेक सवालों के जवाब अभी भी पूरी तरह और सन्तोषजनक ढंग से सामने नहीं आए हैं। लेकिन इतना तय है कि ‘अख़्तर’ शीरानी एक बहुत ही निराशाजनक सीमा तक अपने माहौल से कटे हुए थे, और उनके व्यक्तित्व की ठीक यही विशेषता उनके कृतित्व की निर्धारक शक्ति भी बनी।</p>
<p>रहा सवाल ‘अख़्तर’ साहब की शायरी का, तो इसमें शक़ नहीं कि वे बहुत कम उम्र में ही कुल-हिन्द शोहरत के शायरों में गिने जाने लगे थे और पत्र-पत्रिकाओं में उनका कलाम छपने के लिए होड़-सी लगी रहती थी। लेकिन उनकी उदासीनता का, दुनिया से बेज़ारी का आलम यह था कि अपने जीवनकाल में उन्होंने अपना संग्रह प्रकाशित कराने की तरफ़ ध्यान तक नहीं दिया; उनकी रचनाओं का संकलन उनकी मृत्यु के बाद ही हुआ। नागरी लिपि में ‘अख़्तर’ की अभी तक बहुत छोटे-छोटे दो-एक चयन ही सामने आए हैं जो कि पाठक की प्यास को बुझाने का पारा नहीं रखते। मगर यह शिकायत प्रस्तुत संकलन को लेकर नहीं आएगी, इसका हमें विश्वास है।
Book Details
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ISBN9788183613132
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Pages211
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Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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नरेश यह किसी अध्यात्म या आधिभौतिकी से नहीं लेते—वे शायद हिन्दी के पहले कवि हैं जिन्होंने अपने अर्जित वैज्ञानिक ज्ञान को मानवीय एवं प्रतिबद्ध सृजन-धर्म में ढाल लिया है और इस जटिल प्रक्रिया में उन्होंने न तो विज्ञान को सरलीकृत किया है और न कविता को गरिष्ठ बनाया है। यांत्रिकी उनका अध्यवसाय और व्यवसाय रही है और नरेश ने नवगीतकार के रूप में अपनी प्रारम्भिक लोकप्रियता को तजते हुए धातु-युग की उस कठोर कविता को वरा, जिसके प्रमुख अवयव लोहा, क्रंक्रीट और मनुष्य-शक्ति हैं। एक दृष्टि से वे मुक्तिबोध के बाद शायद सबसे ठोस और घनत्वपूर्ण कवि हैं और उनकी रचनाओं में ख़ून, पसीना, नमक, ईंट, गारा बार-बार लौटते हैं। दूसरी ओर उनकी कविता में पर्यावरण की कोई सीमा नहीं है। वह भौतिक से होता हुआ सामाजिक और निजी विश्व को भी समेट लेता है। हिन्दी कविता में पर्यावरण को लेकर इतनी सजगता और स्नेह बहुत कम कवियों के पास है। विज्ञान, तकनीकी, प्रकृति और पर्यावरण से गहरे सरोकारों के बावजूद नरेश सक्सेना की कविता कुछ अपूर्ण ही रहती यदि उसके केन्द्र में असन्दिग्ध मानव-प्रतिबद्धता, जिजीविषा और संघर्षशीलता न होती। वे ऐसी ईंटें चाहते हैं जिनकी ‘रंगत हो सुर्ख/बोली में धातुओं की खनक/ऐसी कि सात ईंटें चुन लें तो जलतरंग बजने लगे’ और जो घर उनसे बने उसे जाना जाए ‘थोड़े से प्रेम, थोड़े से त्याग और/थोड़े से साहस के लिए’, किन्तु वे यह भी जानते हैं कि उन्हें ढोनेवाली मज़दूरिन और उसके परिवार के लिए वे ईंटें क्या-क्या हो सकती हैं। जब वे दावा करते हैं कि दुनिया के नमक और लोहे में हमारा भी हिस्सा है तो उन्हें यह ज़िम्मेदारी भी याद आती है कि ‘फिर दुनिया-भर में बहते हुए ख़ून और पसीने में/हमारा भी हिस्सा होना चाहिए।’ पत्थरों से लदे ट्रक में सोए या बेहोश पड़े आदमी को वे जानते हैं जिसने ‘गिट्टियाँ नहीं अपनी हड्डियाँ तोड़ी हैं/और हिसाब गिट्टियों का भी नहीं पाया’। उधर हिन्दुत्ववादी फासिस्ट ताक़तों द्वारा बाबरी मस्जिद के ध्वंस पर उनकी छोटी-सी कविता—जो इस शर्मनाक कुकृत्य पर हिन्दी की शायद सर्वश्रेष्ठ रचना है—अत्यन्त साहस से दुहरी धर्मान्धता पर प्रहार करती है : ‘इतिहास के बहुत से भ्रमों में से/ एक यह भी है/कि महमूद गज़नवी लौट गया था/लौटा नहीं था वह/यहीं था/सैकड़ों बरस बाद अचानक/वह प्रकट हुआ अयोध्या में/सोमनाथ में उसने किया था/अल्लाह का काम तमाम/इस बार उसका नारा था/जय श्रीराम।’
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हिन्दी साहित्य में आलोकधन्वा की कविता और काव्य-व्यक्तित्व एक
अद् भुत सतत घटना, एक ‘फ़िनोमेनॅन’ की तरह हैं। वे पिछली चौथाई सदी से भी अधिक से कविताएँ लिख रहे हैं लेकिन बहुत संकोच और आत्म-संशय से उन्होंने अब यह अपना पहला संग्रह प्रकाशित करवाना स्वीकार किया है और इसमें भी रचना-स्फीति नहीं है। हिन्दी में जहाँ कई वरिष्ठ तथा युवतर कवि ज़रूरत से ज़्यादा उपजाऊ और साहिब-ए-किताब हैं, वहाँ आलोकधन्वा का यह संयम एक कठोर वग्रत या तपस्या से कम नहीं है और अपने-आप में एक काव्य-मूल्य है। दूसरी तरफ़ यह तथ्य भी हिन्दी तथा स्वयं आलोकधन्वा की आन्तरिक शक्ति का परिचायक है कि किसी संग्रह में न आने के बावजूद ‘जनता का आदमी’, ‘गोली दागो पोस्टर’, ‘भागी हुई लड़कियाँ’ और ‘ब्रूनो की बेटियाँ’ सरीखी कविताएँ मुक्तिबोध, नागार्जुन, रघुवीर सहाय तथा चन्द्रकान्त देवताले की काव्य-उपस्थितियों के समान्तर हिन्दी कविता तथा उसके आस्वादकों में कालजयी-जैसी स्वीकृत हो चुकी हैं। 1970 के दशक का एक दौर ऐसा था जब आलोकधन्वा की ग़ुस्से और बग़ावत से भरी रचनाएँ अनेक कवियों और श्रोताओं को कंठस्थ थीं तथा उस समय के परिवर्तनकामी आन्दोलन की सर्जनात्मक देन मानी गई थीं। आलोकधन्वा की ऐसी कविताओं ने हिन्दी कवियों तथा कविता को कितना प्रभावित किया है, इसका मूल्यांकन अभी ठीक से हुआ नहीं है। श्रोताओं और पाठकों के मन-मस्तिष्क में प्रवेश कर उन्होंने कौन-से रूप धारण किए होंगे, यह तो पता लगा पाना भी मुश्किल है।कवि आलोचक यदि चाहते तो अपना शेष जीवन इन बेहद प्रभावशाली तथा लोकप्रिय प्रारम्भिक रचनाओं पर काट सकते थे—कई रचनाकार इसी की खा रहे हैं—किन्तु उनकी सर्जनात्मक प्रतिभा को यह मंजूर न था तो नितान्त अप्रगल्भ तरीक़े से अपना निहायत
दिलचस्प, चौंकानेवाला और दूरगामी विकास कर रही थी। उनकी शुरुआती विस्फोटक कविताओं के केन्द्र में जो इनसानी क़दरें थीं, वे ही परिष्कृत और सम्पृक्त होती हुई उनकी ‘किसने बचाया मेरी आत्मा को’, ‘एक ज़माने की कविता’, ‘कपड़े के जूते’ तथा ‘भूखा बच्चा’ जैसी मार्मिक रचनाओं में प्रवेश कर गईं। यों तो आलोकधन्वा हिन्दी के उन कुछ कवियों में से एक हैं जिनकी काव्य-दृष्टि तथा अभिव्यक्ति हमेशा युवा रहती हैं (और इसलिए वे युवतर कवियों के आदर तथा आदर्श बने रहते हैं), किन्तु लगभग अलक्षित ढंग से उन्होंने क्रमशः ऐसी प्रौढ़ता प्राप्त की है जो सायास और ओढ़ी हुई नहीं है और बुज़ुर्गियत की मुद्रा से अलग है। विषय-वस्तु, शिल्प, शैली तथा रुझानों में एक साथ सातत्य तथा विकास, सरलता तथा जटिलता, ताज़गी और परिपक्वता देखनी हों तो ‘छतों पर लड़कियाँ’, ‘भागी हुई लड़कियाँ’ और ‘ब्रूनो की बेटियाँ’ को इसी क्रम में पढ़ना दिलचस्प होगा जिनमें भारतीय किशोरियों/स्त्रियों के स्निग्ध और त्रासद जीवन-सोपान तो हैं ही, आलोकधन्वा के कवि-जीवन तथा काव्य-चेतना के अग्रसर चरण भी साफ़ नज़र आते हैं।
अभिव्यक्ति के सभी ख़तरे उठाने की मुक्तिबोध की जिस जागरूक सर्जनात्मक प्रतिज्ञा को कुछ कवियों और अधिकांश आलोचकों ने एकांगी साहसिकता की पिष्टोक्ति बना डाला है, उसे आलोकधन्वा ने उसके सभी अर्थों में सही समझकर अपनी पिछली कविताओं से परे जाने का फ़ैसला किया है। किसी कवि के लिए अभिव्यक्ति का एक सबसे बड़ा जोखिम अपनी ही पिछली छवि में आगे या अलग जाने में रहता है और वह ऐसा किसी योजना या कार्यक्रम के तहत नहीं करता, बल्कि उसके द्वारा जिया तथा देखा जा रहा जीवन तथा उस जीवन की उसकी समझ उससे वैसा करवा ले जाते हैं। जब ‘गोली दागो पोस्टर’ और ‘जनता का आदमी’ का कवि एक असहायता जो कुचलती है और एक उम्मीद जो तकलीफ़ जैसी है तथा एक ऐसे अकेलेपन, एक ऐसे तनाव जिसमें रोने की भी इच्छा हुई लेकिन रुलाई फूटी नहीं की बात करता है तो वह दैन्य या पलायन नहीं, बल्कि उस विराट मानवता की इकाई होने का ही स्वीकार है जिसके ऐसी तकलीफ़ों से गुज़रे बिना कोई बदलाव सम्भव नहीं है, क्योंकि यही एहसास इस दुनिया को फिर से बनाने की संघर्ष-भरी अभिलाषा के केन्द्र में है।
आलोकधन्वा ने शुरू नागार्जुन की परम्परा में किया था और जहाँ वे आज खड़े हैं वह नागार्जुन और शमशेर बहादुर सिंह की मिली-जुली ज़मीन लगती है जिसे उन्होंने दोनों वरिष्ठों की अलग-अलग उर्वरता से आगाह रहते हुए अपने समय और काव्य-समझ के मुताबिक़ अपने लिए तैयार किया है। आलोकधन्वा में एक वैश्विक तथा भारतीय दृष्टि तो हमेशा से थी, धीरे-धीरे वह अपने आसपास के तथा व्यापक सचराचर पर भी गई। हम कह सकते हैं कि यदि पहले वे मात्र सिंहावलोकन के कवि थे तो अब उनकी निगाह चीज़ों और ब्योरों में भी जाती है और उनके ज़रिए वे आदमी और व्यक्ति होने के गहरे एहसास तक पहुँचते हैं और उसे अपनी कविता में चरितार्थ करते हैं। उनके काव्य-संसार में अब इनसान और इनसानी सरोकार तो हैं ही, पेड़, पगडंडी, पतंग, पानी, रास्ते, रातें, सूर्यास्त, हवाएँ, बिकरियाँ, पक्षी, समुद्र, तारे, चाँद भी हैं। वे पगडंडी, चौक, रेल जंक्शन से निजी और सार्वजनिक दुनिया में पहुँचते हैं, थियेटर, मैटिनी शो और पहली फ़िल्म की रोशनी में स्मृतियों में जाकर अपनी संवेदना तथा सृजनशीलता के स्रोत खोजते-पाते हैं और समुद्र की आवाज़ उनके लिए किसी रहस्यमय अनादि-अनन्त की नहीं, आन्दोलन और गहराई की है। अति-मुखरता के लिए तो इसमें अवकाश ही नहीं है, आविष्ट भावातिरेक से भी वे अपनी ऐसी कविताओं में बचे हैं। आलोकधन्वा ने एक ऐसी भाषा और ऐसी तराशी हुई अभिव्यक्ति हासिल की है जिनमें सभी अतिरिक्त और अनावश्यक छीलकर अलग कर दिया गया है और तब ‘शरद की रातें/इतनी हलकी और खुली/जैसे पूरी की पूरी शामें हों सुबह तक/जैसे इन शामों की रातें होंगी/किसी और मौसम में’ या ‘समुद्र मुझे ले चला उस दोपहर में/जब पुकारना भी नहीं आता था/जब रोना ही पुकारना था’ सरीखी क्लासिकी रंगत की पंक्तियाँ प्राप्त होती हैं। यह अकारण नहीं है कि कवि मीर का ज़िक्र करता है। आलोकधन्वा ‘जो घट रहा है’ उसके कवि थे और रहेंगे लेकिन अब उसके भी प्रवक्ता हैं जिसका ‘होना’ सामान्यतः नहीं माना-पहचाना जाता। उन्हें उम्मीद है कि ‘कभी लिखेंगे कवि इसी देश में/इन्हें भी घटनाओं की तरह’ जबकि सच यह है कि वे स्वयं उस सबको घटना बनाने की क्षमता प्राप्त कर चुके हैं जो निश्चेष्ट, अमूर्त तथा अचल लगता है। चेतन में चेतना तो सभी देख लेते हैं, उसके साथ जड़ में चैतन्य को स्थापित कर पाना आलोकधन्वा जैसे अनन्य, दुस्साहसी सर्जक के बूते की ही बात है जो इस प्रक्रिया में अपनी प्रतिबद्धता को सम्पूर्ण बनाने की राह पर अग्रगामी नज़र आता है।
—विष्णु खरे
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‘आग जो जलाती नहीं’ में डोरिस कारेवा की चार दशकों से भी अधिक सुदीर्घ काव्य-यात्रा समाहित है, इस बात को दर्शाती कि वे अपनी कविता में सतत गहराई और सुस्पष्टता के साथ-साथ अर्थ-बाहुल्य और सुर-संगति को एक साथ साधने में सक्षम हैं। यह अनेकार्थता एक ओर सुस्पष्टता का विलोम रचती है और दूसरी ओर ऐसी व्यंजना जो अपने प्रदीपन के चरम पर आप्त वाणी का-सा प्रभाव पैदा करती है।
उनकी कविता की तात्त्विक संवेदना ऐसी है कि उसके नैतिक आवेश की प्रतीति एकदम दैहिक स्तर पर होती है। उन्हें प्रेम की ऐसी तपस्विनी भी कहा जाता है जो प्रेम के चित्रण में निर्भीक भी है और विचारशील भी। प्रेम का यह रचाव “पर्वतीय पवन-सा इतना विशुद्ध एवं उदात्त” है, कि वे किसी अन्य समय और आयाम से लिख रही प्रतीत होती हैं।
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‘युगान्तर के फूल’ ऐसे विषय से सम्बन्धित है, जो काव्य-रचना की परम्परा में सर्वस्वीकृत नहीं माने जा सकते। इसकी स्वीकार्यता के ख़तरे को जानते हुए भी मैंने जोखिम उठाया है। मैं साहित्य की समृद्धि के लिए ऐसे जोखिम को आवश्यक मानता हूँ। यदि पाठक ऐसे विषयों पर लिखी कविताओं को साहित्य की समृद्धि एवं दीन-दुखियों की सेवा के लिए अपरिहार्य मानें तो मैं उन्हें भरोसा दे सकता हूँ कि इस दिशा में अभिनवपन की ख़ुराक उन्हें भविष्य में भी मिलेगी।
यों भी विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने लेखकों को चुनौती दे रखी है कि अब नई पीढ़ी को अद्यतन जानकारी से सहज-सरल तरीक़ों से अवगत कराओ। ग्राह्य और विषयगत बनाने की जवाबदेही लेखक बिरादरियों की है। पुरातन परम्पराएँ बदलाव के साथ अपना विकास चाहती हैं।
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प्रकृति एक न्यायपूर्ण और समानता–आधारित समाज की स्थापना के लिए प्रेरणा और आधार प्रदान करती है। सभ्यता के तक़ाज़े जहाँ विभाजन और असमानता को बढ़ावा देते हैं, प्रकृति का मूल स्वर साहचर्य और जोड़ने का होता है। विश्व के जिन हिस्सों में प्रकृति अपने अक्षत रूप में आज भी हमें आश्वस्ति देती है, उनमें एक कैरेबियाई क्षेत्र भी है। हज़ारों किलोमीटर के क्षेत्र में फैली अनछुई, अक्षत प्रकृति समुद्र तट, पर्वत, झरने, नदियाँ, जंगली वृक्ष और पशु–पक्षी।
सूरीनाम में प्रवास के दौरान कवयित्री पुष्पिता की रची गई ये रचनाएँ इसी छवि का अन्वेषण करती हैं। साथ ही कैरेबियाई देशों का वह मानवी पक्ष भी इनमें ध्वनित होता है जिसके कारण इस क्षेत्र की
विश्व में अलग पहचान है। दुनिया के लगभग हर क्षेत्र के लोग यहाँ आकर बसे हैं एशियाई, अफ्रीकी, यूरोपीय और लैटिन अमेरिकी। विश्व की मानवशास्त्रीय विविधता का एक लघु संस्करण आप यहाँ पा सकते हैं।
कैरेबियाई देशों के लम्बे प्रवास के दौरान रची गई ये कविताएँ इस क्षेत्र के समूचे प्राकृतिक, सामाजिक और मानवीय वैशिष्ट्य के प्रति प्रेमोद्गार के रूप में प्रकट हुई हैं। कवयित्री ने इन पंक्तियों में उस वरदान की पुनर्रचना की है जो प्रकृति ने इस क्षेत्र को दिया है।
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