Udte Hain Ababeel
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Poems
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Poems
Book Details
-
ISBN9789380044842
-
Pages200
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
‘बोली बात’ युवा कवि श्रीप्रकाश शुक्ल का दूसरा काव्य-संकलन है जिसमें कवि ने न सिर्फ़ अपनी विकास यात्रा को रेखांकित किया है, बल्कि समाज और उसके जन-जीवन के प्रति अपनी सरोकारों को और भी गहरे ढंग से जताया है। संग्रह में शामिल ‘ग़ाज़ीपुर’ कविता की ये पंक्तियाँ स्पष्ट रूप से बताती हैं कि कवि अपने आसपास को कितनी संवेदनशीलता के साथ ग्रहण कर रहा है: “यह एक ऐसा शहर है/जहाँ लोग धीरे-धीरे रहते हैं/और धीरे-धीरे रहने लगते हैं/यहाँ आनेवाला हर व्यक्ति कुछ सहमा-सहमा रहता है/कुछ-कुछ अलग-अलग रहता है/जैसे उमस-भरी गर्मी में दूसरे का स्पर्श/लेकिन धीरे-धीरे ससुराल गई महिला की तरह/जीना सीख लेता है।”
कवि का पहला संकलन कुछ वर्ष पहले आया था, जिसका नाम था—‘जहाँ सब शहर नहीं होता’। ‘बोली बात’ पिछले संग्रह के नाम से ध्वनित होनेवाली भाव-भूमि और दृष्टि-भंगिमा का ही अगला सोपान है, यह कहा जा सकता है। एक नए कवि का दूसरा संग्रह एक तरह से उसके विकास की कसौटी भी होता है और इस संग्रह की कविताओं को देखते हुए यह आश्वस्तिपूर्वक कहा जा सकता है कि इस संग्रह में काफ़ी कुछ ऐसा है जो कवि के रचनात्मक विकास की ओर ध्यान आकृष्ट करता है और कहें तो प्रमाणित भी। इस पूरे संग्रह को एक साथ पढ़ा जाए तो इसकी एक-एक कविता के भीतर से एक ऐसी दुनिया उभरती हुई दिखाई पड़ेगी, जिसे समकालीन विमर्श की भाषा में ‘सबाल्टर्न’ कहा जाता है। संग्रह की पहली कविता ‘हड़परौली’—इसका सबसे स्पष्ट और मूर्त्त उदाहरण है। इस प्रवृत्ति को सूचित करनेवाली एक साथ इतनी कविताएँ यहाँ मिल सकती हैं, जो कई बार एक पाठक को रोकती-टोकती-सी लगें। पर एक अच्छी बात यह है कि इसी के चलते अनेक नए देशज शब्द भी यहाँ मिलेंगे, जिन्हें पहली बार कविता की दुनिया की नागरिकता दी गई है।
कुल मिलाकर यह एक ऐसा संग्रह है जो अपने खाँटी देसीपन के कारण अलग से पहचाना जाएगा। कविता के एक पाठक के रूप में मैं यह निस्संकोच कह सकता हूँ कि इस विशिष्टता के अलावा भी यहाँ बहुत कुछ मिलेगा जो कविता-प्रेमियों को आकृष्ट करेगा और बेशक आश्वस्त भी।
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‘एक लड़का मिलने आता है...’ में ‘नींद की बदगुमानी’, ‘हाथों में लम्स की ठंडक’, ‘शाम की ख़ुशबू’, ‘खिलखिलाहट का बचपन’, ‘रोशनी की धड़कन पर सियाही का ख़ौफ़नाक हमला’ और ‘लरज़ते काँपते क़दमों की आहट’ ही नहीं है, बल्कि ‘महीन खद्दरों में क़ैद बड़े-बड़े तोंद की क़लम से लिखी कहानियों को जलाकर ख़ाक कर देने’ का अज़्म, ‘कारख़ाने के वहशी तगो-दौ में राख में दबी हुई आग की किरचियों को कुदेरने’ की मशक़्क्त और ‘कितने शहरों, कितने बाग़ों, कितनी मिट्टी से होकर गुज़रने वाले आवारा लम्हों’ का कर्ब भी शामिल है। ऐसा महसूस होता है शायरी संजय कुमार ‘कुन्दन’ की महबूबा है जिसने ज़िन्दगी के इस लम्बे, वीरान और डगमगाते हुए क़दमों पर उसे और उसके पढ़नेवालों को सहारा दिया है। मुस्तकिल तरक़्क़ी की मंज़िलों को तय कर रही इस शायरी की नज़र एक शेर :
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आवेग और जीवन से संपृक्त सूत्र उसमें विद्यमान नहीं होते और सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि एक
अपरिभाषित विकलता उसमें नहीं आ जाती। विवेक गुप्ता के पहले संग्रह की ये कविताएँ अपने समय
के दबावों के बीच जीवित मनुष्य की विकलता की कविताएँ हैं। ये कवि होने की इच्छा से नहीं,
मनुष्य हो सकने की आकांक्षाजन्य रचनात्मकता से अपना उत्स पाती हैं। यही कारण है कि कवि
अपने अवसाद के क्षणों में भी, सर्जनात्मकता को सम्भव कर पाता है।
‘मोक्ष प्रश्न’ एवं ‘बुद्ध’ शृंखला की कविताएँ कई प्रश्नों को नए तरह से रखने में समर्थ हुई हैं। दर्शन
और जीवन के बीच उपस्थित रूढ़ि, अन्धश्रद्धा और अन्धविश्वास की वे स्थूल रूप में नहीं, उनके
सूक्ष्म विध्वंसकारी रूप में पहचान करती हैं। कवि की दृष्टि अपनी सहजता में जीवन के सौन्दर्य
को, जीवन की अमरता को चुन लेती है और चीज़ों की रहस्यात्मकता को व्यर्थ कर देती है। वहाँ
‘निर्वाण की आभा की चमक’ में अन्तर्निहित उपहास, काव्य-शक्ति का उदाहरण हो जाता है। इन
कविताओं में शोरगुल को संयम से बताने का धीरज है, चीज़ों को बहुत क़रीब से देखने का उपक्रम
है और वह दृढ़ता भी है जो ‘झंडा उठाए अकेले आदमी’ की सहायता को एक अनन्त जिजीविषा में
बदल देती
है।
यह सब नारेबाजी अथवा सतही राजनीतिक शब्दावली से नहीं, कवि की जीवन में निष्ठा और
प्रतिबद्धता से सम्भव हुआ है, इस बात के सूत्र इस संग्रह की कविताओं में बार-बार मिलते हैं। ‘वह
एक घर था ऐसा’, ‘जुलूस’, ‘विस्थापन’, ‘इस तरह थे हम वहाँ’ जैसी कविताएँ हमारे परिवार और
समाज में लगातार बढ़ती जा रही यंत्रणा और अलगाव की ट्रेजडी की गहन पड़ताल ही नहीं करतीं,
बल्कि ‘ऐसा नहीं होना चाहिए’—इस उत्कट इच्छा का भी प्रकटीकरण करती हुई चलती हैं। एक युवा
कवि के पहले ही संग्रह में भाषा का संयम, शब्दों से नए अर्थ ले सकने की क्षमता, एक पंक्ति से
दूसरी पंक्ति के बीच लम्बी दिखनेवाली कठिन दूरी तय करने का सहज सामर्थ्य और इन सबके बीच
की जगहों में कविता का रचाव देखना सुखद प्रतीति है। अपने समय की पहचान करने का
विश्वसनीय प्रयास भी इन कविताओं में है। ‘न्याय को सबसे क्रूर और ख़तरनाक हथियार में बदल60
देने’ वाले इस समय में ‘मृत्यु के भय के बीच प्रेम की सम्भावना’ को टटोलते हुए यह भी समझना
कि ‘अब वैसा कुछ भी नहीं है, जो जैसा दिखाई देता है’ और ‘अकेले पड़ते जाने की नियति को’
सर्वाधिक उल्लेखनीय भयावहता की तरह रेखांकित करना, कवि की गहरी दृष्टि और क्षमता का ही
प्रमाण है। नयापन और नएपन की खोज भी इन कविताओं को विचारणीय बनाती है।
विडम्बनाजन्य व्यंग्य के सहारे ‘प्रेम के टूटने’ को उपलब्धि कह देना एक नए तरीक़े को इंगित करता
है। उनकी अनेक कविताओं में कहन की नई कला और दीप्ति है। अपने से पूर्व की कविता की सुदीर्घ
परम्परा के सूत्र उनकी कविता में हैं और साथ ही वह प्राणवान प्रखरता भी, जिससे वे अपने तरह के
काव्यलोक का निर्माण करते दिखते हैं।
कविता के उत्सुक पाठक के रूप में मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि ये कविताएँ, इस दौर
में लिखी जा रही ढेर सारी कविता के बीच ‘सच्ची कविता’ की पहचान के संकट को हल करने में
सहायक होनेवाली कविताएँ हैं। यह संग्रह सब दूर एक रचनात्मक दबाव पैदा करेगा, यह उम्मीद भी
इन्हीं कविताओं से पैदा होती है।
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रघुवीर सहाय की कविताओं में हम एक ऐसे आधुनिक मानस को देख पाते हैं जो बौद्धिक और रागात्मक अनुभूतियों से सन्तुष्ट होकर अपने लिए एक सुरक्षित संसार की सृष्टि नहीं कर लेता; उसमें रहने लगना कवि के लिए एक भयावह कल्पना है। आज के पतनशील समाज में ऐसे अनेक सुरक्षित संसार विविध कार्य–क्षेत्रों में बन गए हैं—साहित्य में भी—और इनमें बूड़ जाने का ख़तरा पिछले कुछ वर्षों में बढ़ते–बढ़ते तीव्रतम हो गया है। परन्तु (बातचीत में रघुवीर सहाय कहते हैं कि) समाज कविताओं से भरा पड़ा है : सड़क पर चलते ही हम उनसे टकराएँगे और हर कविता एक नया परिचय कराएगी। इस संग्रह की रचनाएँ कवि के निरन्तर बढ़ते हुए परिचयों के पीछे उसकी सामाजिक चेतना के विकास का भी संकेत देती हैं : कवि की चिन्ता है कि उस विकास के बिना कविता लिखते जाने का कोई मतलब ही नहीं होगा।
आज के पतनशील समाज के प्रति कवि की दृष्टि विरोध की है, परन्तु वह अपने काव्यानुभव से जानता है कि वह रचना जो पाठक के मन में पतन का विकल्प जाग्रत् नहीं करती, न साहित्य की उपलब्धि होती है न समाज की। ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की परम्परा में वह उस शक्ति को बचा रखने को आतुर है जो उसने ‘दूसरा सप्तक’ और ‘सीढ़ियों पर धूप में’ पाई थी और जिस पर आए हुए ख़तरे को उसने ‘हँसो, हँसो जल्दी हँसो’ में दिखाया था। वह मानता है कि यही खोज नए समाज में न्याय और बराबरी की सच्ची लोकतंत्रीय समझ और आकांक्षा जगाती है और ऐसे समाज की रचना के लिए साहित्यिक और साहित्येतर क्षेत्रों में संघर्ष का आधार बनती है। जहाँ कहीं जन की यह शक्ति पतनोन्मुख संस्कृति के माध्यमों द्वारा भ्रष्ट की जा रही हो वहाँ वह चेतावनी देता है और जहाँ वह बची रहने पर भी देखी नहीं जा रही हो, उसकी पहचान कराता है। वह बचाने के लिए तोड़ता है और तोड़ने के लिए तोड़ने के व्यावसायिक उद्देश्य का विरोध करता है। पीड़ा को पहचानने की कोशिश वह ऐसे करता है कि उसी समय पीड़ा का सामाजिक अर्थ भी प्रकट हो जाए—वह मानता है कि सामाजिक चेतना का कोई अक्षर भंडार नहीं हो सकता, उसकी समृद्धि लोकतंत्र के पक्ष में संघर्ष से करती रहनी पड़ती है और इसी तरह सामाजिक नैतिकता की भी। ये कविताएँ इसी परम्परा की आज के दौर की अभिव्यक्तियाँ हैं।
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- Description: मानव-दुर्दशाक बढ़ैत परिमाण, मानव-मूल्यक खुल्लमखुल्ला अपमानक वातावरण सँ मुक्तिक कामना हरदम सँ जन-आकांक्षा रहलए। कविताक लेल ई आकांक्षा, जीवन-राग छी जे पीड़ा आ कचोटक ताल पर बजैत रहैए। वैद्यनाथ मिश्रक कविता अही कचकैत पीड़ाक माझ सँ गमन करैए। आइ जाहि तथाकथित 'जनतांत्रिक व्यवस्था' सँ शासित छी हमरा लोकनि, ताहि मे पद-प्राप्ति होइते 'सेवक' अधिनायक भ' जाइए, भाग्य-विधाता बनि जाइए। अपेक्षा करैए जे ओकरा सँ जन-अधिकारक बात नइँ कयल जाए। कोनो प्रश्न नइँ पूछल जाए। कर्तव्यक चर्चा नइँ कयल जाए। जन के लेल एकमात्र उपाय छै, ठेहुनिया रोपि दसो नह जोड़ि, अनुनय, विनय, प्रार्थना, मनुहार, चिरौरी कयल जाए—हे प्रभो! (भक्तक) आनंददाता, कनी एम्हरो तकियउ! खाली ओएह सब मनुख नइँ जकर संपत्ति दिनानुदिन विशाल भेल जाइए। बाकी जनता सेहो अही देशक वासी छी... एम्हरो तकियउ... जनतंत्रक नाम पर एहि विकराल बिडम्बना सँ सोझाँ-सोंझी होइत वैद्यनाथ मिश्रक कविता गंहीर उतरैत तीक्ष्ण व्यंग्य मे परिणत भ' जाइए। सूक्ष्म-पर्यवेक्षण आ स्पष्ट संलिप्तता सँ भरल-पुरल वैद्यनाथ मिश्रक कविता, विम्ब-विधानक सरलता सँ अपरूप काव्यानुभूतिक सृष्टि करैए, सोचबाक लेल बिलमबैए आ चेतना केँ हिलकोरैए। वैद्यनाथ मिश्रक कविता स्वयं आ समय सँ साक्षात्कार करबैए। एहि अनुभूतिक लेल पढऩाइ आवश्यक शर्त। —कुणाल
Pran-Bhang Tatha Anya Kavitayen
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

- Description: ं वर्तमान संग्रह को अपनी प्रारम्भिक रचनाओं का संग्रह बनाना चाहता था और इसका मुख्य रूप वही है भी। किन्तु पुरानी बहियों को उलटते-पलटते समय कुछ कविताएँ और मिल गईं, जिन्हें प्रारम्भिक रचनाएँ तो नहीं कहा जा सकता; किन्तु जो उसी न्याय से प्रकाश में आने के योग्य हैं, जिस न्याय से कवि की प्रारम्भिक रचनाएँ प्रकाशित की जाती हैं।' दिनकर जी के इस कथन से स्पष्ट है कि यह उनकी प्रारम्भिक कविताओं का संग्रह है। बावजूद इसके यह उनका एक ऐसा संग्रह भी है जिसके महत्त्व को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपनी पुस्तक 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में उल्लेख किया है। प्रस्तुत संग्रह में एक लघु खंड काव्य 'प्रण-भंग' नाम से है जो महाभारत युद्ध में घटित श्रीकृष्ण के शस्त्र-ग्रहण की घटना पर आधारित है जिसे दिनकर जी ने खुद 'जयद्रथ-वध' के अनुकरण पर लिखा गया माना है। इस खंड काव्य में परम्परा और आधुनिकता का अन्तर्विरोध अपनी तार्किकता के साथ है। यही नहीं, इसमें भक्ति भी अपनी आस्था के साथ रूपायित हुई है। ‘प्रण-भंग’ के अलावा संग्रह की स्फुट कविताओं–‘शहीद अशफाक के प्रति’, ‘वायसराय की घोषणा पर’, ‘महात्मा गांधी’, ‘शहीदों के नाम पर’, ‘मूक बलिदान’, ‘तपस्या’, ‘शहीद’ आदि–में हम स्वर्णिम अतीत के प्रति संवेदनशीलता और अपने यथार्थ के प्रति अन्तर्विरोध को गहरे लक्षित कर सकते हैं। वहीं पुस्तक के अन्त में संगृहित अट्ठाईस क्षणिकाओं में सामाजिक पीड़ा और सांस्कृतिक चिन्तन है, तो सत्ता की शोषक-प्रवृत्ति के प्रति धारदार नज़रिया भी है जिसे इन पंक्तियों में देखा जा सकता है–‘राजा/तुम्हारे अस्तबल के/घोड़े मोटे हैं।/प्रजा भूखी और नंगी है।/घोड़ों को कोई अभाव नहीं।/लेकिन लोगों को हर तरफ़ की तंगी है।’ ‘प्रण-भंग और अन्य कविताएँ’ संग्रह के बारे में दिनकर जी के ही शब्दों को लेकर कहें तो यह उनके 'सम्पूर्ण काव्य-यात्रा पर प्रकाश डालता है
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