Jyamiti
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भारतीय स्त्री-कविता को बहुत दिनों से तलाश थी एक ऐसे स्त्री-स्वर की जिसके लेखन में निराला की नायिका पूरे ठस्से के साथ हँसती दिखाई दे, सबको दाँव देती हुई-सी हँसी। शान्ति नायर के कविता-संग्रह ‘ज्यामिति’ की कविताओं में सबको दाँव देती उसी हँसी का ताना-बाना मुझे विस्मय-विमुग्ध कर गया। उनमें बृहत्तर जगत के सरोकार अधिक मुखर और स्पष्ट रूप से सामने आते हैं, पर कविता की व्यंजना शक्ति की तिलांजलि दिये बग़ैर। संग्रह की ‘मैच द फ़ॉलोइंग’, ‘संजीवनी’, ‘दूध फटना’, ‘अनुष्ठान’ जैसी कविताओं में हमारे राजनीतिक-सामाजिक जीवन की समस्त विडम्बनाएँ जिस सजग बाँकपन के साथ व्यक्त हैं, वह किसी को भी एक झटके में उठाकर बैठा सकती हैं। ‘ट्रैफ़िक जाम’ कविता भास्वर प्रमाण है इस बात का कि पढ़ी-लिखी मध्यवर्गीय स्त्रियों पर अब कोई यह अभियोग लगा नहीं सकता कि दमित वर्गों-वर्णों की स्त्रियों का दुख उनके निजी दुखों में शामिल नहीं। चौके-चूल्हे, पास-पड़ोस, हाट-बाज़ार, दैनन्दिन जीवन के अन्य जीवंत प्रसंगों से धारोष्ण बिम्ब उठाकर जैसे भक्त-कवयित्रियाँ ध्वनि और रस-बोध से उच्छल कविताएँ सहज ही रच देती थीं, शान्ति नायर भी घरेलू बिम्बों को अद्भुत दार्शनिक उठान दे लेती हैं—‘अनिद्रा’ कविता में उदासीनता में ख़मीर का उठकर रात की सीमा के पार फूल जाना एक ऐसा बिम्ब है जो स्त्री ही साध सकती है। इसी तरह ‘पुट्टू’ कविता में तैयार पुट्टू को साँचे के बाहर कर देने की ख़ातिर जो धक्का दिया जाता है, उसका मर्म स्त्री, एक समधीत स्त्री ही समझ सकती है जो घर के काम ही नहीं करती, सब कामों से समय चुराकर पढ़ती भी है, जिसमें यह समझने की भी विलक्षण प्रज्ञा है कि जीवन की असल चुनौती है ज्ञान का संज्ञान में बदलना। दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना—कैसे—यह आपको शान्ति नायर की कविताएँ बख़ूबी समझा देती हैं। स्त्री की पसलियों का ‘लाड़ला दर्द’, ‘कर्तव्य के बिछावन’ पर यहाँ कुनमुनाकर सोता है पर नींद में मुस्कुराता हुआ।
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भारतीय स्त्री-कविता को बहुत दिनों से तलाश थी एक ऐसे स्त्री-स्वर की जिसके लेखन में निराला की नायिका पूरे ठस्से के साथ हँसती दिखाई दे, सबको दाँव देती हुई-सी हँसी। शान्ति नायर के कविता-संग्रह ‘ज्यामिति’ की कविताओं में सबको दाँव देती उसी हँसी का ताना-बाना मुझे विस्मय-विमुग्ध कर गया। उनमें बृहत्तर जगत के सरोकार अधिक मुखर और स्पष्ट रूप से सामने आते हैं, पर कविता की व्यंजना शक्ति की तिलांजलि दिये बग़ैर। संग्रह की ‘मैच द फ़ॉलोइंग’, ‘संजीवनी’, ‘दूध फटना’, ‘अनुष्ठान’ जैसी कविताओं में हमारे राजनीतिक-सामाजिक जीवन की समस्त विडम्बनाएँ जिस सजग बाँकपन के साथ व्यक्त हैं, वह किसी को भी एक झटके में उठाकर बैठा सकती हैं। ‘ट्रैफ़िक जाम’ कविता भास्वर प्रमाण है इस बात का कि पढ़ी-लिखी मध्यवर्गीय स्त्रियों पर अब कोई यह अभियोग लगा नहीं सकता कि दमित वर्गों-वर्णों की स्त्रियों का दुख उनके निजी दुखों में शामिल नहीं। चौके-चूल्हे, पास-पड़ोस, हाट-बाज़ार, दैनन्दिन जीवन के अन्य जीवंत प्रसंगों से धारोष्ण बिम्ब उठाकर जैसे भक्त-कवयित्रियाँ ध्वनि और रस-बोध से उच्छल कविताएँ सहज ही रच देती थीं, शान्ति नायर भी घरेलू बिम्बों को अद्भुत दार्शनिक उठान दे लेती हैं—‘अनिद्रा’ कविता में उदासीनता में ख़मीर का उठकर रात की सीमा के पार फूल जाना एक ऐसा बिम्ब है जो स्त्री ही साध सकती है। इसी तरह ‘पुट्टू’ कविता में तैयार पुट्टू को साँचे के बाहर कर देने की ख़ातिर जो धक्का दिया जाता है, उसका मर्म स्त्री, एक समधीत स्त्री ही समझ सकती है जो घर के काम ही नहीं करती, सब कामों से समय चुराकर पढ़ती भी है, जिसमें यह समझने की भी विलक्षण प्रज्ञा है कि जीवन की असल चुनौती है ज्ञान का संज्ञान में बदलना।
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना—कैसे—यह आपको शान्ति नायर की कविताएँ बख़ूबी समझा देती हैं। स्त्री की पसलियों का ‘लाड़ला दर्द’, ‘कर्तव्य के बिछावन’ पर यहाँ कुनमुनाकर सोता है पर नींद में मुस्कुराता हुआ।
Book Details
-
ISBN9789360862275
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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ख़ुशी इस बात की है कि ये रवायत बड़ी ख़ूबसूरत अकेला ने शुरू की है ताके उनके शायरों को जिनके पीछे कोई काम करनेवाला नहीं था या जिन्हें लोगों ने नेग्लेक्ट किया या जिन लोगों का राइटर्ज़ एसोसिएशन ये काम करती या कुछ इस तरह के आर्गेनाइज़ेशन काम करती, उन शायरों के कलाम को विजय अकेला ने सँभालने का एक सिलसिला शुरू किया है वरना फ़िल्मों में लिखा हुआ कलाम या फ़िल्मों में लिखी हुई शायरी को ऐसा ही ग्रेड दिया जाता था जैसे ये किताबों के काबिल नहीं है; ये तो सिर्फ़ फ़िल्मों में है...बाक़ी आपकी शायरी कहाँ है? ये हमेशा शायरों से पूछा जाता था। ये एक बड़ा ख़ूबसूरत कदम अकेला ने उठाया है...।
—गुलज़ार
मैं सम्पादक विजय अकेला साहब के बारे में यह कहना चाहूँगा कि ये बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। इन्होंने इसी तरह की आनन्द बख़्शी और जाँ निसार अख्तर पर जो किताबें की थीं, उनसे मैं वाक़िफ़ हूँ। उम्मीद करता हूँ कि शायरों से महब्बत रखनेवाली दुनिया में इनकी भी क़द्र होगी।
—जावेद अख़्तर
I Love You (Hindi Translation )
- Author Name:
Kaajal Oza Vaidya
- Book Type:

- Description: प्रेम में डूबा हर व्यक्ति विवाह को ही जीवन का अंतिम ध्येय समझता है। अन्य लोगों के विवाह देखने के बाद भी ऐसा ही सोचता है कि हमारा विवाह दूसरों की अपेक्षा अलग ही होगा! विवाह के बाद के सात वर्षो के दौरान अधिकतर विवाह सामान्य विवाहों जैसे ही हो जाते हैं। रोमांस और आदर्श विवाह की सारी कल्पनाएँ, सारे वचन और प्रतिज्ञाएँ धीरे-धीरे मंद पड़ती जाती हैं। विवाहित जीवन खंडित हो जाने के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते पति-पली धीरे-धीरे एक-दूसरे से विपरीत दिशा में प्रवास करने लगते हैं। किसी भी रिश्ते को थोड़ा सँभालने की आवश्यकता होती है। विवाह जैसा नाजुक रिश्ता रख-रखाव एवं समभाव के अभाव में एकदम टूट जाता है। इसके बावजूद विवाह को सफल बनाकर दो व्यक्ति सुख व संतोष से जीवन भर साथ जी सकते हैं। टूट चुके और मृतप्राय हो चुके विवाह भी फिर से नवपल्लवित हो सकते हैं। जरूरत है थोड़ी समझदारी की, थोड़ा स्वीकार करने की, थोड़ी कोशिश और थोड़ा समझौता करने की। यह पुस्तक धीरे-धीरे आपको एक नई दुनिया में ले जाएगी और आपको आपकी गलतियाँ समझाएगी। आप कहाँ और किस प्रकार से गलत थे, यह भी आपके मन को समझाएगी।
Atikraman
- Author Name:
Kumar Ambuj
- Book Type:

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हमारे दौर की कविता के बारे में कभी-कभी एक आलोचना यह भी सुन पड़ती है कि ज़्यादातर कवियों के पहले कविता-संग्रह ही उनके सबसे अच्छे संग्रह साबित होते हैं, दूसरे संग्रहों तक आते-आते उनका प्रकाश मन्द हो जाता है, यथार्थ की काली गहराइयों में जाकर उनकी लालटेनें बुझने लगती हैं। इस बात में अगर कोई सचाई है तो कुमार अंबुज को उसके अपवाद की तरह देखा जा सकता है। अंबुज का पहला कविता-संग्रह 1992 में प्रकाशित हुआ था और सिर्फ़ दस वर्ष के अन्तराल में उनके चौथे संग्रह का छपना सबसे पहले यह बतलाता है कि इस कवि के पास कहने के लिए बहुत कुछ है : निरवधि काल और विपुल पृथ्वी है, बल्कि एक पूरा सौरमंडल है, निर्वात और सघन पदार्थों में से गुज़रना उसका रोज़ का काम है। वायुमंडल की सैर करते-करते वह ग्रह-नक्षत्रों को खँगाल लेता है, मंगल ग्रह के लोहे को अपने शरीर और रक्त में महसूस करता है और अन्तत: अपनी पृथ्वी पर लौट आता है। इस अछोर कायनात को खोजने-जानने के लिए कुमार अंबुज के पास उतनी ही विस्तृत भाषा भी है जिस पर उन्हें इतना विश्वास है कि एक कविता में वे ‘भाषा से परे का यह दुर्गम पहाड़’ भी ‘भाषा की लाठी के सहारे ही’ पार करना चाहते हैं। इस संग्रह की पहली और बीज-कविता जैसी रचना में वे ख़ुद को एक ऐसे पुराने ताँबे के पात्र की तरह देखते हैं जिसे कोई ‘इतिहास की राख से माँजता है’ और ‘एक शब्द माँजता है मुझे/एक पंक्ति माँजती रहती है/अपने खुरदुरे तार से।’
जीवन और कविता की उदात्तता को कुमार अंबुज बार-बार रचते हैं, प्राय: उसका एक नया स्थापत्य बनाने की कोशिश करते हैं लेकिन इतना-भर इस कविता का अभीष्ट नहीं है, बल्कि एक महाविमर्श के छोटे-छोटे ब्योरों, उसके बारीक ताने-बाने में प्रवेश करते हुए उसके अर्थों को खोजना ही उसकी मूल प्रतिज्ञा है और इसीलिए अंबुज यह देख पाते हैं कि ‘एक तारा टूटने से भी वीरान होता है आकाश’ और ‘इस एक के लिए/इस एक के विश्वास से/लड़ता हूँ हज़ारों से/इस एक की परवाह करता हूँ।’ एक महाजीवन के इसी ‘एक’ को लेकर कुमार अंबुज के सरोकार इतने व्यापक हैं कि वे ‘अभी-अभी दर्ज हुई एक नई ऋतु’ को ‘एक कीड़े के अपूर्व राग में गाते हुए’ सुन पाते हैं और यह संकल्प भी व्यक्त कर सकते हैं कि ‘यह एक कमज़ोर इच्छा है जिसकी चहलक़दमी की आवाज़/एक तानाशाह की इच्छा की आवाज़ से टकराती है।’ दरअसल इस एक का हालचाल जानने की तड़प ही कुमार अंबुज को अनेकता के सौरमंडल तक ले जाती है। अनेक कविताओं में वे जीवन का एक रूपक खड़ा करते प्रतीत होते हैं लेकिन सहसा उस रूपक को भेदकर उसके दारुण यथार्थ में प्रवेश कर जाते हैं।
एक मूलभूत सरलता से संश्लिष्टता की ओर कुमार अंबुज की यह यात्रा एक उल्लेखनीय अनुभव है जिसका साक्ष्य उनकी इन कविताओं की संरचना, उनके ख़ास पैटर्न में भी मिलता है। वे शुरू में प्राय: एक शान्त-सुन्दर प्रवेश-द्वार की तरह दिखती हैं लेकिन उसके खुलते ही जैसे एक जटिल यथार्थ के आयाम प्रकट होने लगते हैं, जहाँ ‘ग़रीब की बुदबुदाहट का अनुवाद’ कुछ इस तरह होता है कि ‘लकड़ी का बुरादा भी जगा देता है मेरी भूख’ और ‘जीवन में एकदम ख़ाली’ एक दिन भी पूरे जीवन की गतिविधि में इतना स्पन्दित और स्मृति में इतना चिन्हित दिखता है कि उसे ‘न उम्र में से घटाया जा सकेगा/और जोड़कर देखने में होगा एक अपराध।’ यह एक लगभग सिनेमाई शिल्प है जिसमें एक सुन्दर शुरुआत एक विरूप विस्तार की ओर जा सकती है, एक प्रतीक, एक अमूर्तन हमें एक यथार्थपरक और ठोस संसार में ले जाता है, फिर सहसा अपने मूल बिम्ब में लौटता है और दूसरी वास्तविकता की ओर बढ़ने लगता है। इस संग्रह की एक कविता ‘रेखागणित’ अंबुज की इस काव्य-प्रविधि का उकृष्ट उदाहरण है जिसमें एक सीधी-सरल रेखा के गणित में एक पूरे जीवन को, उसके आश्चर्यों और रोमांचों, उसकी निश्छलता और ऐन्द्रियता को, उसके न्याय और अन्याय की परस्पर न मिलनेवाली समान्तर लकीरों को अन्तत: इस उम्मीद के साथ देखा गया है कि ‘वहीं कहीं छिपा हो सकता है/ज़िन्दगी को आसान कर सकनेवाला प्रमेय।’
किसी भी रचनाकार के लिए अपने शिल्प को लाँघना कठिन काम होता है, लेकिन अंबुज की संवेदना अपने कथ्य के अनुरूप शिल्प सहजता से उपलब्ध कर लेती है, क्योंकि एक समृद्ध काव्य-भाषा उनका सबसे कारगर औज़ार है। इसीलिए ‘रेखागणित’, ‘चुम्बक’, ‘जीवाश्म’, ‘मेढक’, ‘मुर्गी’, ‘हस्तलिपि’ जैसे नए अनुभवों की मार्मिक शक्लें निर्मित होती हैं और ‘एक कम है’, ‘अतिक्रमण’, ‘मानकीकरण’, ‘मैं एक आततायी को जानता हूँ’, ‘कवि व्याप्ति’, ‘कला का कोना’, ‘भाषा से परे’, ‘एक और शाम’ और ‘मध्यवर्गीय ओट’ जैसी किंचित् परिचित भावभूमि के अपरिचित आयाम खुलते हैं। करुणा और नैतिकता, जो कि कविता के स्थायी-अपरिवर्तनीय सुर हैं, जैसे अंबुज की कविताओं में ताने-बाने की तरह मौजूद हैं—इसीलिए ‘असाध्य रोग’ में सहज, गद्यात्मक लोकोक्ति जैसी बात को वे विचलित करनेवाले तरीक़े से लिख सकते हैं : ‘आँसुओं से कोई दवा तैयार हो सकती होती/तो कोई रोग असाध्य नहीं रह जाता।’ ‘पगडंडी’ कविता बताती है कि ‘जब सारी दुनिया चमकदार सड़कों से भर जाएगी, तब भी एक राह को दूसरी राह से जोड़ती पगडंडी बची रहेगी।’ कुमार अंबुज ख़ुद किसी राजमार्ग पर नहीं, बल्कि कविता की एक पगडंडी पर चलते उसी हाशिये, उसी किनारे से राजमार्गों के जाल को देखते आए हैं, क्योंकि न्याय और अन्याय की समान्तर रेखाएँ भले ही आपस में न मिलें, अन्याय का प्रतिरोध और न्याय की प्रतिष्ठा इसी राह से सम्भव है।
Ghar Ki Aurten Aur Chand
- Author Name:
Renu Hussain
- Book Type:

- Description: रेणु हुसैन की कविताओं की जो दुनिया है, उसकी केन्द्रीय धुरी है प्रेम। उनकी कविताओं के विषय अपनी पूरी विविधताओं के बावजूद घूम-फिर कर इसी धुरी पर लौट आते हैं लेकिन प्रेम की यह धुरी किसी भी मायने में एकांगी या एकरूपीय नहीं है, बल्कि अपनी पूरी सघनता और विस्तार के साथ बहुआयामी और बहुरूपीय है। आज के समय में जब प्रेम की चारों तरफ़ से घेरा जा रहा है। ‘लव जेहाद’ जैसे फ्रेज़ेज का सायास निर्माण किया जा रहा है, यहाँ प्रेम से पोषित रेणु हुसैन की ये कविताएँ व्यवस्था तथा ऐसे शब्दों के समक्ष मुस्कुराती हुई दिखाई देती हैं। रेणु हुसैन की कविताओं की एक दूसरी धुरी है घर और स्त्री। बात चाहे जो हो रेणु जी की कविताओं में घूमघामकर घर और स्त्री आ ही जाते हैं। लेकिन उनकी कविताओं में स्त्री जितना घर के भीतर है, उतनी वह घर के बाहर नहीं है। हालाँकि ऐसा नहीं है कि घर के भीतर की स्त्री घर के बाहर नहीं देखती। देखती है लेकिन कम देखती है, मगर जब देखती है तो उसका फ़लक बहुत विस्तृत होता है। इस संग्रह में बहुत-सी कविताएँ इस बात का सशक्त उदाहरण हैं। घर और स्त्री से जुड़ी रेणु जी की कविताएँ इस बात का पता देती हैं कि घर के भीतर स्त्री जितनी है उतना ही स्त्री के भीतर घर। लेकिन रेणु जी की कविताओं में घर और स्त्री का यह सम्बन्ध उन अर्थों में बिल्कुल नहीं है जिन अर्थों में वह जाना जाता है। इन कविताओं में घर बिल्कुल अलग तरीक़े से आता है। अगर घर कहीं किसी रूप में स्त्री को बाँध रहा है तो उतना ही वह उसे आज़ाद भी कर रहा है। स्त्री जितना घर के बाहर जाती है, उतना ही लौटकर घर में वापिस आती है लेकिन अपनी पूरी ठसक, आज़ादी और सम्मान के साथ। ऐसा लगता है कि जैसे स्त्री और घर दोनों एक दूसरे के भीतर लगातार यात्रा कर रहे हैं। लेकिन इस यात्रा में स्त्री लगातार घर से आगे निकलती दिखाई देती है। रेणु हुसैन की कविताओं को देखकर लगता है कि जैसे पेड़ में पत्ते फूटते हैं और फूल आते हैं, ठीक उसी तरह ये कविताएँ काग़ज़ पर चली आई हैं। इन कविताओं में छलक पड़ता और सजीव हो उठता-सा रोमानीपन लगातार हमें अपनी तरफ़ खींचता है। इन कविताओं की भाषा में एक अलग क़िस्म का नयापन और अनोखापन है जो मुसलसल एक वाक्य से दूसरे में गूँजता और दृश्यमान होता हुआ दिखाई देता है। उनकी कविताएँ पढ़ते हुए लगातार ऐसा लगता रहता है मानो शब्द और वाक्य कवयित्री ने चुने नहीं हैं, बल्कि वे चुन लिए गए हैं भावों के द्वारा अपनी अभिव्यक्ति के लिए। रेणु हुसैन की कविताएँ और उनकी भाषा हमें इस बात का पता देती हैं कि ये रेणु हुसैन की कविताएँ हैं और रेणु हुसैन की भाषा। —रजनी अनुरागी
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