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मगध में संगृहीत कविताएँ इतिहास नहीं हैं, इतिहास का सम्मोहन हैं, मायालोक हैं; जिनमें नगर एवं गणराज्य, ‘मगध’, ‘अवन्ती’, ‘कोसल’, ‘काशी’, ‘श्रावस्ती’, ‘चम्पा’, ‘मिथिला’, ‘कोसाम्बी’ धूल में आकार लेते और धूल में निराकार हो जाते हैं बवंडर की तरह। इन कविताओं के नायक और नायिकाएँ हैं, इतिहास के निर्माता और गवाह, चन्द्रगुप्त, अशोक, बिंबिसार, अजातशत्रु, कालिदास, शकटार, वसंतसेना, वासवदत्ता, अम्बपाली...जिनका नाम लेते ही न जाने कितनी कहानियाँ जाग उठती हैं, कितने संस्मरण कौंध जाते हैं। जरा, मरण, रोग, शोक, पतन, उत्थान, युद्ध, हत्या, जय, पराजय! मनुष्य की समग्र गाथा में महाकाव्यत्व होता है। ये कविताएँ उसी समग्रता और उसी महाकाव्यत्व को प्रस्तुत करने का एक उपक्रम हैं। ये पाठक को स्तब्ध करती हैं, चौंकाती हैं, भयभीत करती हैं, शोक-सन्देश की तरह उन पर छा जाती हैं, अनहोनी की तरह मँडराती हैं और होनी की तरह आकर बैठ जाती हैं। ये बिना चेतावनी दिए पाठक को अपनी गिरफ़्त में ले लेती हैं। इनका असर जादुई है। जैन और बौद्ध दर्शन का स्मरण दिलाती हुई मगध में संगृहीत कविताएँ काल की एक झाँकी हैं और महाकाल की स्तुति! ये अतीत का स्मरण हैं, वर्तमान से मुठभेड़ और भविष्य की झलक! मगध श्रीकान्त वर्मा की कविताओं में एक नया मोड़ है।
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मगध में संगृहीत कविताएँ इतिहास नहीं हैं, इतिहास का सम्मोहन हैं, मायालोक हैं; जिनमें नगर एवं गणराज्य, ‘मगध’, ‘अवन्ती’, ‘कोसल’, ‘काशी’, ‘श्रावस्ती’, ‘चम्पा’, ‘मिथिला’, ‘कोसाम्बी’ धूल में आकार लेते और धूल में निराकार हो जाते हैं बवंडर की तरह। इन कविताओं के नायक और नायिकाएँ हैं, इतिहास के निर्माता और गवाह, चन्द्रगुप्त, अशोक, बिंबिसार, अजातशत्रु, कालिदास, शकटार, वसंतसेना, वासवदत्ता, अम्बपाली...जिनका नाम लेते ही न जाने कितनी कहानियाँ जाग उठती हैं, कितने संस्मरण कौंध जाते हैं।
जरा, मरण, रोग, शोक, पतन, उत्थान, युद्ध, हत्या, जय, पराजय! मनुष्य की समग्र गाथा में महाकाव्यत्व होता है। ये कविताएँ उसी समग्रता और उसी महाकाव्यत्व को प्रस्तुत करने का एक उपक्रम हैं। ये पाठक को स्तब्ध करती हैं, चौंकाती हैं, भयभीत करती हैं, शोक-सन्देश की तरह उन पर छा जाती हैं, अनहोनी की तरह मँडराती हैं और होनी की तरह आकर बैठ जाती हैं। ये बिना चेतावनी दिए पाठक को अपनी गिरफ़्त में ले लेती हैं। इनका असर जादुई है।
जैन और बौद्ध दर्शन का स्मरण दिलाती हुई मगध में संगृहीत कविताएँ काल की एक झाँकी हैं और महाकाल की स्तुति! ये अतीत का स्मरण हैं, वर्तमान से मुठभेड़ और भविष्य की झलक!
मगध श्रीकान्त वर्मा की कविताओं में एक नया मोड़ है।
Book Details
-
ISBN9788126720729
-
Pages111
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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देश-काल के शर से बिंधकर
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शंख घोष की कविता का स्वर सान्द्र है, उसमें गहरी करुणा है। और उसकी शब्द सम्पदा हमें दृश्यों/परिस्थितियों की एक बड़ी रेंज के बीच खड़ा कर देती है—जहाँ से दैनंदिन जीवन को समझने-बूझने के साथ, हम सृष्टि और प्रकृति के बहुतेरे मर्मों को भी चिह्नित कर पाते हैं। वह संकेतों में भी बहुत कुछ कहती है। बिम्ब तो वह कई तरह के रचती ही है। और उपमाओं का जहाँ-जहाँ प्रयोग है, वे अनूठी ही हैं। उनकी कविताओं में अर्थ-गाम्भीर्य है और इस गाम्भीर्य के स्रोत विनोद और प्रखर उक्तियों में भी छिपे हैं। गहन-गम्भीर चिन्तन में तो हैं ही। वह उन कवियों में से हैं जिनकी कविता अपनी एक विशिष्ट पहचान मानो आरम्भ से आँकती आई है, पर अपने विशिष्ट स्वर की रक्षा करते हुए, वह अपने को हर चरण में कुछ ‘नया’ भी करती आई है, जिसमें सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों के ‘गूढ़ार्थ’ भी पढ़े जा सकते हैं। उसमें एक ज़बरदस्त नैतिक और मानवीय आग्रह है। वह मनुष्य-प्रकृति के अनिवार्य सम्बन्ध की पक्षधर है। उसकी पर्यावरणीय चिन्ताएँ भी हैं, और वह मानवीय सम्बन्धों में एक निखार, परिष्कार के साथ, उनमें एक बराबरी की आकांक्षी है। उनकी कविता में जल-जनित बिम्ब बार-बार लौटते हैं। जल-धारा, और जलाशय—सिर्फ़ पोखर-ताल तक सीमित नहीं हैं, उनमें जल के आशय निहित हैं, और जल की निर्मलता, मन की निर्मलता का पर्याय बन जाती है।
उसमें पशु-पक्षियों की, विभिन्न ग्रह-नक्षत्रों की उपस्थिति है, और वर्षा के प्रसंग से तो वह वर्षा-सौन्दर्य से आप्लावित भी है। उनकी कविता की जड़ें बंगभूमि में, उसकी भाषा और संस्कृति में बहुत गहरी हैं, पर उसकी ‘स्थानिकता’ हरदम सर्वदेशीय या सार्वजनीन होने की क्षमता रखती है!
उसमें आधुनिकता/समकालीनता की स्वीकृति है तो एक सघन विडम्बना-बोध भी है। कुल मिलाकर उसमें खासा वैविध्य है—अनुभव क्षेत्रों का, आत्मिक प्रतीतियों का, रचना-विधियों का भी। यही कारण है कि उसे पढ़ते हुए हरदम एक ताज़गी का, कुछ नया पाने का अनुभव होता है। यह संकलन उनकी कविता के विभिन्न चरणों की बानगी प्रस्तुत करने का एक उपक्रम है। सहज ही हमें यह विश्वास है कि हिन्दी-जगत् में इसका भरपूर स्वागत होगा।
Kuchh Rafoo Kuchh Thigare
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
- Book Type:

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Description:
“यह तो अच्छा हुआ कि कविता मेरे साथ है/जो यह भरोसा दिलाती है कि/कोई भी पथ कभी समाप्त नहीं होता/और सब कुछ गँवा देने के बाद भी/कुछ बचा रहता है।”
अशोक वाजपेयी की अथक और अदम्य जिजीविषा इन कविताओं में उदास विवेक और आत्मस्वीकार के बीच गहरे संयम के साथ नाजुक ढंग से सन्तुलित है। कुल एक वर्ष की अवधि में लिखी गई ये कविताएँ कई बार उदासी से घिरी होने के बावजूद अपनी पारदर्शिता में उजली और निर्मल हैं। सारे ध्वंस और नाश के विरुद्ध कविता को अपने लिए एकमात्र बचाव माननेवाले इस कवि की भाषा, सयानापन और शिल्प पर सहज अधिकार एक बार फिर सत्यापित करते हैं कि हमारे समय में कविता मनुष्य की हालत, उसकी उलझनों और जीवट का सूक्ष्म बखान करती है और ऐसा करते हुए हमें सचाई में ऐन्द्रिय शिरकत का अवसर देती है।
अशोक वाजपेयी की आवाज़, हमेशा की तरह, निजी और समाजधर्मी एक साथ है और वे लगातार अपने को वेध्य और बेबाक बनाए हुए हैं। उनकी कविता के केन्द्र में साधारण जीवन की आभा और छवियाँ हैं जिन्हें उनकी भाषा अनूठे शब्दालोक और समयातीत आशयों से उद्दीप्त करती है।
Main Yahin Rahna Chahta Hoon
- Author Name:
Suresh Sen Nishant
- Book Type:

- Description: Collection of Poems
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