(0)
₹
550
456.5 (17% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
श्री गजेन्द्र पाठक हिंदी आलोचना में एक सार्थक और जीवंत उपस्थिति हैं। उन्होंने हिंदी नवजागरण पर प्रमुखता से काम करने के साथ-साथ आलोचना को अपने विमर्शात्मक लेखन से समृद्ध किया है। उनकी आलोचना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि वे कृति, व्यक्ति और विवेच्य विषय पर विचार करते हुए उसको अनेक संदर्भों के साथ देखते हैं और उसे वर्तमान परिप्रेक्ष्य में घटित कर उसके फलाफल का परीक्षण करते हैं। इससे उनकी आलोचना पाठक को अनेक स्तरों पर समृद्ध तो करती ही है, एक प्रबुद्ध नागरिक के रूप में भी उसे तैयार करती है। कृति के निहितार्थ के परीक्षण के साथ आज के आलोचक का यह बड़ा दायित्व है जिसे श्री पाठक बहुत मनोयोग से निभा रहे हैं। यह आलोचना अपनी संवादात्मकता में हमें साथ-साथ ले चलती है और विवेच्य विषय के साथ-साथ अनेक संदर्भों से परिचित कराती है। इसे पढ़ते हुए भान ही नहीं रहता कि हम कोई आलोचना पढ़ रहे हैं। श्री पाठक की आलोचना इसीलिए सर्जनात्मक आलोचना लगती है... इन सभी विशेषताओं को देखना हो, तो यह आलोचना पुस्तक ‘आलोचना की परिधि’ ध्यान आकृष्ट करती है। पुस्तक में बीस आलोचनात्मक निबंध हैं जो किसी एक विधा पर केन्द्रित नहीं हैं। इसमें कविता, उपन्यास, आत्मकथा और आलोचना की अनेक पुस्तकों पर विचार किया गया है, तो अनेक रचनाकार अपनी समस्त सर्जनात्मक उपादेयता में प्रकट भी होते है... इस रूप में उनकी आलोचना अपनी एक नागरिक जवाबदेही पूरी करती हुई हमें एक सचेत और आलोचनात्मक विवेक से सम्पन्न करती है। --ज्योतिष जोशी
Read moreDon’t Miss Out
Pick a membership and see exactly what it gets you
- 15 Free Deliveries
- 1 Free Book up to ₹500 MRP
- 0% off every book, every time
Subscribed already? Continue to your
benefits Login
You pay ₹1,499/Year
You will be auto-charged ₹1,499 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Connoisseur
1 Free Physical Book up to ₹500 MRP
Personal Recommendations
15 Free Deliveries Per Year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
श्री गजेन्द्र पाठक हिंदी आलोचना में एक सार्थक और जीवंत उपस्थिति हैं। उन्होंने हिंदी नवजागरण पर प्रमुखता से काम करने के साथ-साथ आलोचना को अपने विमर्शात्मक लेखन से समृद्ध किया है। उनकी आलोचना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि वे कृति, व्यक्ति और विवेच्य विषय पर विचार करते हुए उसको अनेक संदर्भों के साथ देखते हैं और उसे वर्तमान परिप्रेक्ष्य में घटित कर उसके फलाफल का परीक्षण करते हैं। इससे उनकी आलोचना पाठक को अनेक स्तरों पर समृद्ध तो करती ही है, एक प्रबुद्ध नागरिक के रूप में भी उसे तैयार करती है। कृति के निहितार्थ के परीक्षण के साथ आज के आलोचक का यह बड़ा दायित्व है जिसे श्री पाठक बहुत मनोयोग से निभा रहे हैं। यह आलोचना अपनी संवादात्मकता में हमें साथ-साथ ले चलती है और विवेच्य विषय के साथ-साथ अनेक संदर्भों से परिचित कराती है। इसे पढ़ते हुए भान ही नहीं रहता कि हम कोई आलोचना पढ़ रहे हैं। श्री पाठक की आलोचना इसीलिए सर्जनात्मक आलोचना लगती है... इन सभी विशेषताओं को देखना हो, तो यह आलोचना पुस्तक ‘आलोचना की परिधि’ ध्यान आकृष्ट करती है। पुस्तक में बीस आलोचनात्मक निबंध हैं जो किसी एक विधा पर केन्द्रित नहीं हैं। इसमें कविता, उपन्यास, आत्मकथा और आलोचना की अनेक पुस्तकों पर विचार किया गया है, तो अनेक रचनाकार अपनी समस्त सर्जनात्मक उपादेयता में प्रकट भी होते है... इस रूप में उनकी आलोचना अपनी एक नागरिक जवाबदेही पूरी करती हुई हमें एक सचेत और आलोचनात्मक विवेक से सम्पन्न करती है। --ज्योतिष जोशी
Book Details
-
ISBN9788195182749
-
Pages232
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Renu Ka Janpad
- Author Name:
Gajendra Pathak
- Book Type:

- Description:
Criticism
Upanyas Ki Pahchan : Divya
- Author Name:
Gopal Ray
- Book Type:

- Description:
यशपाल के उपन्यास ‘दिव्या’ का प्रकाशन 1945 में हुआ था। उपन्यास के प्रकाशन के साथ ही यह ऐतिहासिक कथानक का उपन्यास होने के कारण उसी रूप में अपनी पैठ बना रहा था। कई बार इसके कथ्य को ध्यान में रखते हुए इसे बौद्धकालीन उपन्यास कहा गया है। जैसा कि ऐतिहासिक उपन्यासों के साथ अक्सर होता है 'दिव्या' के साथ भी वही परम्परा चल पड़ी अर्थात् उपन्यास के कथानक को बौद्धकालीन प्रामाणिकता पर परखना आलोचकों ने समीचीन समझा। बहरहाल। गोपाल राय की ‘उपन्यास की पहचान’ शृंखला में ‘दिव्या’ पाँचवीं पुस्तक है। आलोचक ने अपने स्तर पर न केवल कथानक की समीचीनता की पड़ताल की है बल्कि ‘अतीत, इतिहास और उपन्यास’ पर एक अध्याय भी इस पुस्तक के आरम्भ में रख दिया है। मूलत: मूल रचनाओं की पड़ताल करते हुए आलोचक मूल पाठ की व्यावहारिक आलोचना को भी प्राथमिकता देते हैं। ‘दिव्या’ के मूल पाठ पर गोपाल राय ने इन्हीं कड़ियों को सूत्रबद्ध करने का कार्य किया है। जैसे कि ‘दिव्या’ का कथा-संसार और उसके मार्मिक प्रसंग, पात्र, ऐतिहासिकता की कसौटी, दिव्या में चित्रित समाज और भारतीय संस्कृति अस्मितामूलक नारी-विमर्श की झलक, शिल्प और भाषा आदि-आदि की रचनात्मकता के स्तर पर गोपाल राय ने उपन्यास को खँघालने का महत्ती कार्य पूरा किया है। अत: उक्त आयामों की विविधता में उपन्यास की दृष्टि से दिव्या का मूल्यांकन गोपाल राय का इस आलोचनात्मक पुस्तक में प्राथमिक ध्येय रहा है। इस कार्य में वे कितनी उत्कृष्टता प्राप्त कर पाए हैं यह इस पुस्तक के अध्ययन से स्पष्ट होगा। यह भी ज्ञान होगा कि पाठ्यक्रमों की सीमाओं को पार करते हुए कोई आलोच्य कृति कितनी समयानुकूल और प्रासंगिक ठहरती है।
Kavya-Pustak Samiksha Ka Swaroop
- Author Name:
Ramkishor Sharma
- Book Type:

- Description:
Awating description for this book
Ajneya Aur Unke Upanyas
- Author Name:
Gopal Ray
- Book Type:

- Description:
उपन्यास की रचना-प्रक्रिया तो सैद्धान्तिकी गढ़ती ही है लेकिन एक आलोचक का दायित्व होता है कि वह रचना को व्यावहारिक मनोभूमि पर परखे। गोपाल राय ने अज्ञेय के उपन्यासों को उपन्यास की सैद्धान्तिकी के आधार पर देखते हुए उसके विश्लेषण को व्यावहारिक धरातल पर उकेरा है। यह पुस्तक वस्तुत: अज्ञेय के उपन्यासों की व्याख्या के क्रम में एक आरम्भिक मूल्यांकन का प्रयास है। अज्ञेय का उपन्यास-संसार मूल रूप में ‘शेखर : एक जीवनी’ (भाग-एक 1940 एवं भाग-दो 1944), ‘नदी के द्वीप’ (1951) और ‘अपने-अपने अजनबी’ (1961) तक विस्तृत है। आलोचक गोपाल राय ने इन्हीं उपन्यासों की रचना-भूमि पर अपनी लेखनी चलाई है। इस पुस्तक में अज्ञेय की जीवनी-रेखा, रचना परिवेश, साहित्य सम्बन्धी विचार का परिचयात्मक मूल्यांकन करते हुए; अज्ञेय के औपन्यासिक-संसार की व्यावहारिक समीक्षा लिखी गई है। ‘हिन्दी उपन्यास साहित्य में अज्ञेय का स्थान’ शीर्षक अध्याय उपन्यासकार अज्ञेय के लिए मूल्यांकन के प्रतिमान बनाने का कार्य भी करता है। इस तरह यह पुस्तक अज्ञेय के उपन्यासों के रूप और वस्तु की संरचना पर मूल्यांकन की प्राथमिक पहल करती जान पड़ती है। आशा है कि गोपाल राय की यह आलोचना कृति रचनकार अज्ञेय और उनके उपन्यासों की पड़ताल में पाठकों के बीच एक सेतु-निर्माण का कार्य करेगी।
Sadharan Ki Pratigya : Andhere Se Sakshatkar
- Author Name:
Surendra Chaudhary
- Book Type:

- Description:
literary criticism and theory by surendra chaudhary
Drishya Aur Dhwaniyan : Khand 2
- Author Name:
Sitanshu Yashashchandra
- Book Type:

- Description:
गुजराती आदि भारतीय भाषाएँ एक विस्तृत सेमिओटिक नेटवर्क अर्थात् संकेतन-अनुबन्ध-व्यवस्था का अन्य-समतुल्य हिस्सा हैं। मूल बात ये है कि विशेष को मिटाए बिना सामान्य अथवा साधारण की रचना करने की, और तुल्य-मूल्य संकेतकों से बुनी हुई एक संकेतन-व्यवस्था रचने की जो भारतीय क्षमता है, उसका जतन होता रहे। राष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय राज्यसत्ता, उपभोक्तावाद को बढ़ावा देनेवाली, सम्मोहक वाग्मिता के छल पर टिकी हुई धनसत्ता एवं आत्ममुग्ध, असहिष्णु विविध विचारसरणियाँ/आइडियोलॉजीज़ की तंत्रात्मक सत्ता, आदि परिबलों से शासित होने से भारतीय क्षमता को बचाते हुए, उस का संवर्धन होता रहे। गुजराती में से मेरे लेखों के हिन्दी अनुवाद करने का काम सरल तो था नहीं। गुजराती साहित्य की अपनी निरीक्षण परम्परा तथा सृजनात्मक लेखन की धारा बड़ी लम्बी है और उसी में से मेरी साहित्य तत्त्व-मीमांसा एवं कृतिनिष्ठ तथा तुलनात्मक आलोचना की परिभाषा निपजी है। उसी में मेरी सोच प्रतिष्ठित (एम्बेडेड) है। भारतीय साहित्य के गुजराती विवर्तों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जाने बिना मेरे लेखन का सही अनुवाद करना सम्भव नहीं है, मैं जानता हूँ। इसीलिए इन लेखों का हिन्दी अनुवाद टिकाऊ स्नेह और बड़े कौशल्य से जिन्होंने किया है, उन अनुवादक सहृदयों का मैं गहरा ऋणी हूँ। ये पुस्तक पढ़नेवाले हिन्दीभाषी सहृदय पाठकों का सविनय धन्यवाद, जिनकी दृष्टि का जल मिलने से ही तो यह पन्ने पल्लवित होंगे। —सितांशु यशश्चन्द्र (प्रस्तावना से) 'हमारी परम्परा में गद्य को कवियों का निकष माना गया है। रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत हम इधर सक्रिय भारतीय कवियों के गद्य के अनुवाद की एक सीरीज़ प्रस्तुत कर रहे हैं। इस सीरीज़ में बाङ्ला के मूर्धन्य कवि शंख घोष के गद्य का संचयन दो खण्डों में प्रकाशित हो चुका है। अब गुजराती कवि सितांशु यशश्चन्द्र के गद्य का हिन्दी अनुवाद दो जि़ल्दों में पेश है। पाठक पाएँगे कि सितांशु के कवि-चिन्तन का वितान गद्य में कितना व्यापक है—उसमें परम्परा, आधुनिकता, साहित्य के कई पक्षों से लेकर कुछ स्थानीयताओं पर कुशाग्रता और ताज़ेपन से सोचा गया है। हमें भरोसा है कि यह गद्य हिन्दी की अपनी आलोचना में कुछ नया जोड़ेगा।" —अशोक वाजपेयी
Upanyas Ki Pahchan : Mahabhoj
- Author Name:
Gopal Ray
- Book Type:

- Description:
No Description
Upanyas Ki Pahchan : Maila Aanchal
- Author Name:
Gopal Ray
- Book Type:

- Description:
गोपाल राय द्वारा ‘उपन्यास की पहचान’ शृंखला में व्यावहारिक आलोचना को आधार बनाकर फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की अप्रतिम रचना ‘मैला आँचल’ को परखने की प्राथमिक कोशिश की गई है। कहते हैं कि ‘मैला आँचल’ के प्रकाशन के बाद हिन्दी में आंचलिक उपन्यासों का आन्दोलन-सा चल पड़ा। ऐसा नहीं है कि भारतीय ग्रामीण जीवन को केन्द्र रखकर उपन्यास न रचे गए हों; किन्तु आंचलिक उपान्यासालोचना का मानदंड रचने में ‘मैला आँचल’ की महत्ती भूमिका रही है। गोपाल राय ने ‘उपन्यास की पहचान’ शृंखला की कड़ी में इन्हीं तथ्यों का उद्घाटन करने के साथ, उपन्यास की व्यावहारिक आलोचना की सैद्धान्तिक पहचान का आधार ‘मैला आँचल’ के कथ्य और शिल्प में तराशने की समग्र कोशिश की है। यह पुस्तक आंचलिक उपन्यास की अवधारणा और हिन्दी उपन्यास की परम्परा को रेखांकित करने के साथ-साथ फणीश्वरनाथ रेणु की उपन्यास-यात्रा पर भी अपनी बात रखती है। ‘मैला आँचल’ के कथ्य, शिल्प, पात्र-योजना, भाषा आदि के रचनात्मक तत्त्वों पर प्राथमिक बयान दर्ज करती है। कह सकते हैं कि उपन्यास के रचनात्मक मानकों की व्यावहारिक परख करते हुए ‘मैला आँचल’ की पढ़त को यह पुस्तक नये आयाम प्रदान करेगी।
Aacharya Shukla Ka Itihas Padhte Huye
- Author Name:
Bachchan Singh
- Book Type:

- Description:
‘आचार्य शुक्ल का इतिहास पढ़ते हुए’ साहित्यालोचना की श्रेणी में एक अलग ढंग की पुस्तक है। हिन्दी साहित्य के मानक इतिहास के रूप में प्रतिष्ठित आचार्य शुक्ल की पुस्तक को ‘साहित्येतिहास-लेखन की अत्यन्त प्रौढ़ और प्रगतिशील विरासत’ मानते हुए डॉ. बच्चन सिंह यह भी कहते हैं कि अभी भी अनेक प्रश्न हैं जो उत्तर की माँग करते हैं, बहुत-से बिन्दु है जिन पर विचार किया जाना चाहिए। वे कहते हैं कि शुक्ल जी पहले व्यक्ति हैं जिनके हाथों हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन के लिए एक सुसंगत आधार और उसका पैटर्न तैयार हुआ। इसके लिए उन्होंने जो केन्द्रीय बिन्दु रखा, वह है ‘लोक प्रवृत्ति’, जिसे उन्होंने जनता की चित्तवृत्ति कहा। लेकिन वे इस तथ्य के प्रति भी सजग थे कि जिस चित्तवृत्ति का प्रतिफलन साहित्य में हुआ, उसका सरोकार शिक्षित जन से है। डॉ. बच्चन सिंह आचार्य शुक्ल के बाद आचार्य द्विवेदी के काम को ही उल्लेखनीय मानते हैं, इसलिए इस पुस्तक में दोनों ही विद्वानों के इतिहास-सम्बन्धी कामों पर अकसर साथ में बात करते हैं, जिससे पाठक के रूप में हम और भी लाभान्वित होते हैं। यह पुस्तक आचार्य शुक्ल लिखित इतिहास को पढ़ने के लिए वृहत्तर भूमि तैयार करती है, और अन्य उपलब्ध साहित्येतिहास-ग्रंथों का भी परिचय देती चलती है।
Gopan Aur Ayan : Khand 1
- Author Name:
Sitanshu Yashashchandra
- Book Type:

- Description:
गुजराती आदि भारतीय भाषाएँ एक विस्तृत सेमिओटिक नेटवर्क अर्थात संकेतन-अनुबन्ध-व्यवस्था का अन्य-समतुल्य हिस्सा हैं। मूल बात ये है कि विशेष को मिटाए बिना सामान्य अथवा साधारण की रचना करने की, और तुल्यमूल्य संकेतकों से बुनी हुई एक संकेतन-व्यवस्था रचने की जो भारतीय क्षमता है, उसका जतन होता रहे। राष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय राज्यसत्ता, उपभोक्तावाद को बढ़ावा देनेवाली, सम्मोहक वाग्मिता के छल पर टिकी हुई धनसत्ता एवं आत्ममुग्ध, असहिष्णु विविध विचारसरणियाँ/आइडियोलॉजीज़ की तंत्रात्मक सत्ता आदि परिबलों से शासित होने से भारतीय क्षमता को बचाते हुए उस का संवर्धन होता रहे। गुजराती से मेरे लेखों के हिन्दी अनुवाद करने का काम सरल तो था नहीं। गुजराती साहित्य की अपनी निरीक्षण परम्परा तथा सृजनात्मक लेखन की धारा बड़ी लम्बी है और उसी में से मेरी साहित्य तत्त्व-मीमांसा एवं कृतिनिष्ठ तथा तुलनात्मक आलोचना की परिभाषा निपजी है। उसी में मेरी सोच प्रतिष्ठित (एम्बेडेड) है। भारतीय साहित्य के गुजराती विवर्तों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जाने बिना मेरे लेखन का सही अनुवाद करना सम्भव नहीं है, मैं जानता हूँ। इसीलिए, इन लेखों का हिन्दी अनुवाद टिकाऊ स्नेह और बड़े कौशल्य से जिन्होंने किया है, उन अनुवादक सहृदयों का मैं गहरा ऋणी हूँ। ये पुस्तक पढ़नेवाले हिन्दीभाषी सहृदय पाठकों का सविनय धन्यवाद, जिनकी दृष्टि का जल मिलने से ही तो यह पन्ने पल्लवित होंगे। —सितांशु यशश्चन्द्र (प्रस्तावना से) ''हमारी परम्परा में गद्य को कवियों का निकष माना गया है। रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत हम इधर सक्रिय भारतीय कवियों के गद्य के अनुवाद की एक सीरीज़ प्रस्तुत कर रहे हैं। इस सीरीज़ में बाङ्ला के मूर्धन्य कवि शंख घोष के गद्य का संचयन दो खंडों में प्रकाशित हो चुका है। अब गुजराती कवि सितांशु यशश्चन्द्र के गद्य का हिन्दी अनुवाद दो जिल्दों में पेश है। पाठक पाएँगे कि सितांशु के कवि-चिन्तन का वितान गद्य में कितना व्यापक है—उसमें परम्परा, आधुनिकता, साहित्य के कई पक्षों से लेकर कुछ स्थानीयताओं पर कुशाग्रता और ताज़ेपन से सोचा गया है। हमें भरोसा है कि यह गद्य हिन्दी की अपनी आलोचना में कुछ नया जोड़ेगा।" —अशोक वाजपेयी
Kahani Se Samwad
- Author Name:
Rashmi Rawat
- Book Type:

- Description:
कहानी से संवाद शास्त्रीय आलोचना नहीं है। जैसाकि नाम से ही ज़ाहिर है, यह कहानी के साथ चलते हुए, उससे बतियाने और उसे समझने की एक रचनात्मक प्रक्रिया है। रश्मि रावत रचना को उसकी समग्रता में देखती हैं, अपने समय और समाज के आलोड़न से उपजी एक जैविक इकाई के रूप में; जो उन मूल्यों को भी वहन करती है, जिन्हें रचनाकार जान रहा होता है, और उन चीजों को भी जो उसके अदेखे स्वयमेव रचना में आ जाती हैं, और कई बार लेखक की सचेत अभिव्यक्तियों से ज्यादा कुछ बता जाती हैं—कहानी के ही बारे में नहीं, लेखक के बारे में भी, और उस सामाजिक-नैतिक पर्यावरण के बारे में भी जिसमें उस रचना ने आकार लिया। यह आलोचना की उस परिपाटी से आगे जाना है जो दी गई कसौटियों पर कहानी या किसी भी रचना को विश्लेषित करके अपने काम को पूरा मान लेती है। इस पुस्तक में शामिल कथा-समीक्षाएँ, हर कहानी को पढ़ते हुए अपनी कुछ कसौटियाँ बनाती हैं; जिनकी जड़ें केवल साहित्य-चिन्तन में नहीं होतीं, बल्कि समाज और उन मूल्यों से जुड़ी चिन्ताओं में होती हैं, जिनकी खोज वे कहानी के घोषित उद्देश्यों के अलावा पात्रों की गठन, लेखकीय भाषा की बुनावट और उसके शब्द-चयन तक में करती हैं। यही वह विशेषता है जिसके चलते ये समीक्षाएँ सिर्फ सम्बद्ध कहानियों की समीक्षाएँ नहीं रह जातीं, बल्कि वृहत्तर पैमाने पर अपने समय, समाज और संस्कृति की समीक्षा हो जाती हैं।
Krantikari Kavi Nirala
- Author Name:
Bachchan Singh
- Book Type:

- Description:
‘क्रान्तिकारी कवि निराला’ हिन्दी के महाप्राण कवि निराला के काव्यगत विकास-क्रम को उनके वैयक्तिक संघर्ष के सन्दर्भ में देखते हुए उनके जीवन, तत्कालीन परिस्थितियों और उनकी कविता की विशिष्टताओं का विवेचन करती है। गौरतलब है कि यह पुस्तक उस समय लिखी गई थी, जब हिन्दी आलोचना में निराला के कृतित्व को लेकर कोई सुसंयोजित काम नहीं हुआ था। गिराला और उनके समय के साथ-साथ यह पुस्तक छायावाद तथा उससे पहले की काव्य-प्रवृत्तियों पर भी टिप्पणी करती चलती है, विशेषतया छायावाद पर। डॉ. बच्चन सिंह कहते हैं कि छायावादी काव्य-सर्जना का सम्बन्ध कवि की निजी प्रेरणा से रहा और यह पारम्परिक कवि-प्रतिभा से भिन्न चीज थी। छायावादी या रोमैंटिक कवि के लिए उसके रचनात्मक क्षणों का महत्त्व सर्वोपरि होता है। इसीलिए निराला की कविता को समझने के लिए भी उनके व्यक्ति को जानना जरूरी है। इसी से हम यह जान पाते हैं कि प्रगतिवादी नहीं होते हुए भी उनकी कविता इतनी प्रगतिपरक कैसे है, और प्रयोगवादी न होते हुए भी कविताओं में इतने रूपात्मक प्रयोग वे कैसे कर सके। निराला के परिचय से लेकर यह पुस्तक उनकी कविता के निर्णायक पड़ावों से होती हुई उनकी रचना-प्रक्रिया के विश्लेषण तक जाती है। संलग्न परिशिष्ट में संकलित ‘राम की शक्तिपूजा’ और निराला की अंतिम कविता की समीक्षा इसे और संग्रहणीय बना देती है। निराला और उनकी कविता को जानने-समझने के लिए इस पुस्तक का विशेष महत्व है।
Kavita Mein Jantantra
- Author Name:
Apoorvanand
- Book Type:

- Description:
कविता स्वभावतः ही लोकतांत्रिक मूल्यों की पैरोकार होती है, वह उनकी तरफ़ हमारा ध्यान भी खींचती है, उनकी कमी को रेखांकित भी करती है, और कई बार नए मूल्यों, नई समझदारी, एक ज़्यादा महीन संवेदना की ओर भी लेकर जाती है। कविता उन परिस्थितियों की गहरी आलोचना भी करती है, जो व्यक्ति की, मनुष्य की स्वतंत्रता के विरुद्ध हैं, और इस तरह लोकतंत्र के भविष्य के लिए ख़तरा पैदा करती है। ‘कविता में जनतंत्र’ पुस्तक में कुछ कविताओं के पाठ के साथ भारतीय जनतंत्र की वर्तमान दशा और दिशा पर चिन्तन किया गया है, यह समझने की कोशिश की गई है कि एक देश और एक समाज के रूप में बहैसियत एक जनतंत्र हमने क्या खोया और क्या पाया है, और इस समय हम कहाँ हैं? ग़ौरतलब है कि इन टिप्पणियों की पृष्ठभूमि में 2024 का लोकसभा चुनाव है, यह वह समय था जब हम जनतंत्र और बहुमत को आमने-सामने खड़ा पा रहे थे; स्वतंत्रता और सर्वसमावेशी उदारता के पक्षधर आशंकित थे, और अल्पसंख्यक भयभीत। जिन कविताओं के बहाने यह गहन जनतंत्र-चर्चा संभव हुई है उनमें नागार्जुन, रघुवीर सहाय, धूमिल, श्रीकान्त वर्मा, विजयदेव नारायण साही, केदारनाथ सिंह, जैसे वरिष्ठों से लेकर अनुज लुगुन, अदनान कफ़ील दरवेश और जसिंता केरकेट्टा तक कई महत्त्वपूर्ण रचनाकारों की कविताएँ शामिल हैं। अत्यन्त समीचीन यह पुस्तक कविता को पढ़ने की एक नई पद्धति तो हमें देती ही है, एक विचार, एक शासन-पद्धति और एक सम्भावना के रूप में जनतंत्र की परिभाषा, उसकी आधारभूत शर्तों, चुनौतियों और प्रतिबद्धताओं पर सोचना भी सिखाती है।
Aatmkatha Ke Elake Mein
- Author Name:
Bharat Singh +1
- Book Type:

- Description:
बनारसीदास जैन ने 'अर्धकथा' (1641) में लिखा कि 'गर्भित कथा कहाँ हिय खोल।' छिपाए जानेवाले या कहें कि गोपन प्रसंगों को भी दिल खोलकर अथवा खुलकर बताना आत्मकथा को प्रसिद्धि दिलाता है, निवैयक्तिक बनाता है। आत्मकथा चर्चित विधा है और आत्मकथा- लेखन की एक समृद्ध परम्परा है, लेकिन यह आलोचना से परे विधा हो, ऐसा भी नहीं है। बाबू बनारसीदास चतुर्वेदी ने आत्मकथा लेखक की पात्रता का सवाल उठाया था। चतुर्वेदी जी ने 'जागरण' में यह सवाल उठाया था कि आत्मकथा किसे लिखनी चाहिए। भाव यह था कि आत्मकथा किसे नहीं लिखनी चाहिए। हालाँकि उनके द्वारा तय की गई शर्तों पर आगे लोगों ने आत्मकथा लिखी, ऐसा भी नहीं है। जब प्रेमचन्द ने 'हंस' का आत्मकथांक (1932) निकाला तो नन्ददुलारे वाजपेयी ने यह कहकर विरोध किया था कि इससे आत्म-विज्ञापन का भाव बढ़ेगा जो कि हिन्दी के हित में नहीं होगा।
लेखिकाओं की आत्मकथा में स्त्री-वेदना के विविध स्वर सुनाई पड़ते हैं। इनकी वेदना समस्त स्त्रियों को शोषण के खिलाफ विरोध की ताकत देती है। इन्होंने अपने आत्मकथा-साहित्य के द्वारा जहाँ स्त्री करुणा, शोक, वेदना, विवशता को व्यक्त किया वहीं उसे हिंसा, शोषण, अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने की शक्ति भी प्रदान की। इन्होंने स्त्री स्वतन्त्रता, समानता, सम्मान, सहभागिता इत्यादि जैसे प्रश्नों पर विचार करते हुए पितृसत्तात्मक व्यवस्था से स्त्री-मुक्ति की भी वकालत की।
आत्मकथाओं में अपने भीतर की यात्रा के जरिये बाहर का जो सफ़र तय होता है उसमें केवल अपनी दुनिया की ही बात नहीं होती है पूरा सामयिक सन्दर्भ आ जाना स्वाभाविक है। दलित आत्मकथाओं को आत्मकथात्मक उपन्यास यूँ ही नहीं कहा जाता है। जीवन का पूरा विस्तार है यथार्थ को देखने की एक नई दृष्टि के साथ ये आत्मकथाएँ हिन्दी साहित्य के मुख्य धारा के साहित्य की चेतना को झकझोरती हैं और उसकी चली आ रही परम्परा में एक तरह की वैचारिक हलचल पैदा करती हैं, दलित आत्मकथाएँ, साहित्य की दुनिया में निर्मित 'औदात्य' की धारणा को बदलकर रख देती हैं और जीवन के नए-नए मुहावरों के बीच अपने पाठकों को ले जाकर खड़ा करती हैं।
Ghar Ka Bhedi
- Author Name:
Salman Akhtar
- Book Type:

- Description:
डॉक्टर सलमान अख़्तर के दादा मुज़्तर ख़ैराबादी, मामू मजाज़ लखनवी, वालिद जाँ निसार अख़्तर और भाई जावेद अख़्तर पर लिखे ये लेख साहित्यिक दुनिया में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। ‘घर का भेदी’ उर्दू शायरी की सोच-समझ और आलोचना की ऐसी पहली किताब है जिसमें लेखक ख़ुद अपने ख़ानदान के मशहूर और लोकप्रिय शोअरा के कलाम का विवेचन करता है और साथ ही उनके साहित्यिक ख़ज़ाने की तुलना तत्कालीन सम्माननीय शोअरा के साहित्य से भी करता है। बात की गहराई और बढ़ जाती है जब हमको ये पता चलता है कि इस किताब का लेखक न सिर्फ़ ख़ुद एक विश्वसनीय शायर और साहित्यकार है बल्कि अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त एक मनोवैज्ञानिक भी है। नतीजे के तौर पर ‘घर का भेदी’ किताब हमें कला के प्रतीकों और बिंबों से भी परिचित कराती है और उसमें निहित व्यक्तिगत पीड़ा और द्वंद्व से भी।
Baton Mein Beete Din
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

- Description:
‘बातों में बीते दिन’ पुस्तक नामवर सिंह के साक्षात्कारों का संकलन है। इस किताब में शामिल साक्षात्कारों का विषय क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। पेरेस्त्रोइका-ग्लासनोस्त और आधुनिकतावाद से लेकर कविता, कहानी, उपन्यास और निजी जीवन तक। साहित्य और देश-दुनिया की नामवर जी की समझ का एक स्पष्ट प्रतिबिम्ब यहाँ मिलता है। उनकी विश्व-दृष्टि का रूपायन इन साक्षात्कारों में हुआ है। पुस्तक तीन खंडों में बँटी हुई है। मध्यम आकार के और विषय केन्द्रित साक्षात्कार पहले खंड में हैं। दूसरे खंड में रचनाकारों और रचनाओं पर केन्द्रित बातचीत है। प्रेमचन्द, सुमित्रानन्दन पंत, त्रिलोचन और अमृतराय तथा सुमित्रानन्दन पंत की कृति ‘गुंजन’ और कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘मित्रो मरजानी’—इन साक्षात्कारों के केन्द्र में है। तीसरे खंड में महावीर अग्रवाल द्वारा लिये गए नौ साक्षात्कार हैं जो उनके निजी जीवन से लेकर आलोचना और विविध विषयों से सम्बन्धित हैं। आलोचना लिखित हो या वाचिक—उसके पीछे बुनियादी प्रक्रिया है—पढ़ना, विवेचना, विचारना। तर्क और संवाद। नामवर जी के इन साक्षात्कारों में इसका व्यापक समावेश है। इनसे गुजरते हुए हम महसूस करते हैं कि वह किसी रचना को हमेशा नई और अपनी तरह से पढ़ने की कोशिश करते हैं और इस तरह ‘पढ़ते’ हुए वे लगातार नई तरह से ‘सोचते’ और ‘विचारते’ हुए सामने आते हैं। उनकी वाचिक आलोचना मूल्यांकन की ऊपरी सीढ़ी तक पहुँचती है। निकष बनाती है। प्रतिमानों पर बहस करती है। उसमें ‘लिखित’ की तरह की ‘कौंध’ मौजूद होती है। नहीं होता तो बस पूरापन।
Aurat Ki Duniya
- Author Name:
Nasera Sharma
- Book Type:

- Description:
औरतों, अल्पसंख्यकों और देश-दुनिया के दमित-उत्पीड़ितों के पक्ष में हमेशा अपनी आवाज़ बुलन्द रखनेवाली कथाकार नासिरा शर्मा ने अपने सरोकारों और चिन्ताओं को अपनी कहानियों, उपन्यासों, निबन्धों और साक्षात्कारों में लगातार स्वर दिया है। यह उनके स्तम्भों का संकलन है जो उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर लिखे। स्त्री और उसकी सामाजिक-पारिवारिक स्थिति तो उनके चिन्तन में प्राथमिक रही ही है, पर्यावरण, साम्प्रदायिक सौहार्द, नए पुरुष और स्त्री के आपसी सम्बन्ध, पारिवारिक रिश्ते और हमारे आसपास का तेज़ी से बदलता हुआ परिवेश भी उनकी संवेदना के दायरे में रहा है। इस पुस्तक में संकलित स्तम्भ-लेखन में उन्होंने सम-सामयिक घटनाओं के हवाले से अनेक उन समस्याओं पर अपनी क़लम चलाई है जो समाज और इनसान के वर्तमान और भविष्य से, उसकी नियति से गहरे जुड़े हैं। उल्लेखनीय यह कि वे जो देखती हैं, जो लिखती हैं, उसमें अपनी स्त्री-दृष्टि को पहले रखती हैं। स्त्री, जिसका न सिर्फ़ दुनिया को देखने का तरीक़ा अलग है, बल्कि उसे बरतने और समझने का सलीका भी पुरुष के मुक़ाबले ज़्यादा मानवीय और करुणार्द्र है। इन आलेखों में उनकी यह विस्तृत और संवेदनशील दृष्टि साफ़ दिखाई देती है।
Nath Sampraday
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
- Book Type:

- Description:
र्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ऐसे वांड़्मय-पुरुष हैं जिनका संस्कृत मुख है, प्राकृत बाहु है, अपभ्रंश जघन है और हिन्दी पाद है। नाथ सिद्धों और अपभ्रंश साहित्य पर उनके शोधपरक निबन्ध पढ़ते समय मन की आँखों के सामने उनका यह रूप साकार हो उठता है। ‘नाथ सम्प्रदाय’ में गुरु गोरखनाथ के लोक-संपृक्त स्वरूप का उद्घाटन किया गया है। स्वयं द्विवेदी जी के शब्दों में 'गोरखनाथ ने निर्मम हथौड़े की चोट से साधु और गृहस्थ दोनों की कुरीतियों को चूर्ण-विचूर्ण कर दिया। लोकजीवन में जो धार्मिक चेतना पूर्ववर्ती सिद्धों से आकर उसके पारमार्थिक उद्देश्य से विमुख हो रही थी, उसे गोरखनाथ ने नई प्राणशक्ति से अनुप्राणित किय
Chandrakanta (Santati) Ka Tilism
- Author Name:
Wagish Shukla
- Book Type:

- Description:
कई बार क्लैसिक कृतियाँ भी आलोचनात्मक ध्यान में गहनता से नहीं आतीं, भले उनकी लोकप्रियता व्यापक और असंदिग्ध हो। 'चन्द्रकान्ता’ और 'चन्द्रकान्ता सन्तति’ ऐसे ही क्लैसिक हैं जिन पर आलोचना और अनुसन्धान का ध्यान ख़ासी देर से, लगभग बीसवीं शताब्दी के अन्त पर, गया। गहरे विद्वान् और अनूठे आलोचक वागीश शुक्ल ने इस छोटी-सी पुस्तक में अध्यवसाय और सूक्ष्मता से इन दो कृतियों का विश्लेषण और आकलन किया है। रज़ा फ़ाउंडेशन उनकी 'मनमानी बातों’ को पुस्तकाकार प्रस्तुत करते हुए आश्वस्त है कि अब योग्य विचार और विश्लेषण की शुरुआत हो रही है। —अशोक वाजपेयी
Meghdoot : Ek Antaryatra
- Author Name:
Prabhakar Shrotriya
- Book Type:

- Description:
‘मेघदूत’ एक कालजयी कृति ही नहीं प्रेम, प्रकृति और निसर्ग के प्रति कालिदास की अनन्य प्रपत्ति भी है। अपने विशिष्ट स्वर, स्वरूप और न्यास में यह काव्य एक अप्रतिम एवं इन्द्रधनुषी भाव-वितान है, जिसमें कृतिकार की अपूर्व परिकल्पना, मौलिक उद्भावना तथा बिम्बों और वर्णों की जीवन्त छवियाँ सहज ही देखी जा सकती हैं। कालिदास ने अपनी यशस्वी कृति ‘मेघदूत’ के द्वारा जिस रूपक-राज्य का निर्माण किया था—पिछली दो सहस्राब्दियों से उसका निरन्तर विकास और विस्तार होता रहा है। विरही यक्ष के मनोजगत में विद्यमान एक आर्तप्रेमी के प्रणयोत्सुक प्रार्थी भाव को अनुषंग बनाकर—अपनी प्राण-प्रियतमा को भेजे जानेवाले विरहातुर सन्देश को कई रचनाकारों, भाष्यकारों और रूपान्तरकारों और चित्रकारों ने अपने-अपने ढंग से, अलग-अलग शैलियों में निरूपित किया है। प्रसंगानुरूप और प्रसंगान्तर परिदृश्य को अपने विरहकातर निवेदन से मुखर करनेवाली इस कालातीत रचना का अनुगायन और अनुकीर्तन न केवल सदियों से होता रहा है, बल्कि आधुनिक और समकालीन पीढ़ियाँ भी इसमें अपनी रचनात्मक भावांजलि लिए खड़ी रही हैं। अपनी सर्जनात्मक समग्रता के नाते और ‘क्लासिकी’ के गुणों से समृद्ध एवं समादृत ‘मेघदूत’ ने काव्य और काव्येतर माध्मयों के द्वारा सहृदय पाठकों, प्रेक्षकों, गायकों और समीक्षकों की क्षमता और आकांक्षाओं के अनुरूप सुदीर्घ रचना-प्रकिया एवं परम्परा को जीवित रखा है। इसी अनुक्रम में हिन्दी के सुपरिचित विद्वान, आलोचक, कवि एवं रचनाकार प्रभाकर श्रोत्रिय ने ‘मेघदूत’ के मार्मिक प्रसंगों, अछूते अनुषंगों—और सबसे बढ़कर—रचनाकार की विराट मनोभूमि का स्पर्श एवं अनुभावन अपनी विदग्ध रचना मनीषा के द्वारा किया है। ‘मेघदूत : एक अन्तर्यात्रा’ पुस्तक प्रेमी और प्रकृति के शाश्वत एवं चिरन्तन आधान को सुललित और सर्जनात्मक आयाम प्रदान करेगी—इसमें सन्देह नहीं।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book