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आशावाद बनाम यथार्थ, यह वाल्टेयर के इस प्रसिद्ध फ़्रेंच उपन्यास की मुख्य थीम है। आशावादी नज़रिए की अपूर्णता और अपर्याप्तता को व्यंग्यात्मक शैली में रेखांकित करनेवाले इस उपन्यास की रचना लेखक ने 1759 में की थी।</p> <p>मध्य अठारहवीं सदी की दुखमयी घटनाओं, विशेषकर 1755 के लिस्बन भूकम्प, जर्मन राज्यों में सात वर्ष लम्बे युद्ध आदि से गहरे में प्रभावित इस उपन्यास में प्रबोधन काल के चरम आशावाद की सीमाओं को व्यंग्य शैली में इंगित किया गया है।</p> <p>यह पुस्तक विशेष रूप से किशोरों को ध्यान में रखकर किया गया ‘कांदीद’ का संक्षिप्त रूपान्तरण है। रूपान्तर किया है हिन्दी के प्रगतिशील उपन्यासकार भैरवप्रसाद गुप्त ने।</p> <p>विश्व क्लासिक कथा-रचनाओं की किशोरों के लिए सरल, संक्षिप्त रूप में पुनर्प्रस्तुति की इस शृंखला में गोर्की, दोस्तोयेव्स्की, मार्क ट्वेन और वाल्टर स्कॉट आदि लेखकों की विश्व-प्रसिद्ध कृतियाँ भी उपलब्ध हैं।
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आशावाद बनाम यथार्थ, यह वाल्टेयर के इस प्रसिद्ध फ़्रेंच उपन्यास की मुख्य थीम है। आशावादी नज़रिए की अपूर्णता और अपर्याप्तता को व्यंग्यात्मक शैली में रेखांकित करनेवाले इस उपन्यास की रचना लेखक ने 1759 में की थी।</p>
<p>मध्य अठारहवीं सदी की दुखमयी घटनाओं, विशेषकर 1755 के लिस्बन भूकम्प, जर्मन राज्यों में सात वर्ष लम्बे युद्ध आदि से गहरे में प्रभावित इस उपन्यास में प्रबोधन काल के चरम आशावाद की सीमाओं को व्यंग्य शैली में इंगित किया गया है।</p>
<p>यह पुस्तक विशेष रूप से किशोरों को ध्यान में रखकर किया गया ‘कांदीद’ का संक्षिप्त रूपान्तरण है। रूपान्तर किया है हिन्दी के प्रगतिशील उपन्यासकार भैरवप्रसाद गुप्त ने।</p>
<p>विश्व क्लासिक कथा-रचनाओं की किशोरों के लिए सरल, संक्षिप्त रूप में पुनर्प्रस्तुति की इस शृंखला में गोर्की, दोस्तोयेव्स्की, मार्क ट्वेन और वाल्टर स्कॉट आदि लेखकों की विश्व-प्रसिद्ध कृतियाँ भी उपलब्ध हैं।
Book Details
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ISBN9788183613620
-
Pages127
-
Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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‘महाभारत’ में युधिष्ठिर ‘धर्मराज’ के रूप में विख्यात इतिहासपुरुष हैं। अधर्म, अशान्ति और रक्तपात से उन्हें घोर विरक्ति है। उनकी राजनीति धर्म-साधना का माध्यम-भर है—धर्म को उसका साधन नहीं बनाया जा सकता। यह जानते हुए भी कि कौरव उनका और उनके भाइयों का सर्वस्व हड़प जाना चाहते हैं, युद्ध उन्हें स्वीकार्य नहीं। यही कारण है कि दुर्योधन और शकुनि के षड्यंत्र को जानते हुए भी वे द्यूतसभा का बुलावा स्वीकार कर लेते हैं और भाइयों आदि के निषेध के बावजूद लगातार हारते चले जाते हैं। उपन्यास में इस समूचे घटनाक्रम के दौरान युधिष्ठिर के अन्तर्द्वन्द्व और बेचैनी का मार्मिक अंकन हुआ है। वनवास और अज्ञातवास के बावजूद अन्ततः उन्हें ‘कुरुक्षेत्र’ जाना पड़ा।
और ‘कुरुक्षेत्र’ अधूरा है—यहाँ और जीवन, दोनों जगह। पता नहीं, कब से यह कुरुक्षेत्र हमारे बाहर-भीतर अपूर्ण है और कब तक रहेगा? पर शायद मानव-विकास का बीज भी इसी अपूर्णता में निहित है।
Mahabrahman
- Author Name:
Trilok Nath Pandey
- Book Type:

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भारत के जाति-संजाल की अनूठी विवेचना करता है ‘महाब्राह्मण’। समाज के अब तक अनछुए रहे कई पहलुओं को बड़ी बेबाकी से उभारकर उनकी विडम्बनाओं और त्रासदियों पर प्रकाश डालती है इसकी कहानी।
भारतीय समाज सदियों से जातियों-उपजातियों की चक्की में लोगों को पीसता रहा है। जाति हमारे यहाँ ऊपरी आभासी समरसता के अन्तस्तल में अनिवार्य तत्त्व के रूप में सदैव सक्रिय रहती है और लोगों के निर्णयों और प्राथमिकताओं के निर्धारण में एक बड़ी भूमिका निभाती है। यही कारण है कि लोग मजबूरी में भी अपनी जाति-पहचान से चिपके रहते हैं।
इस उपन्यास का नायक मानवीयता की उदात्त डोर पकड़कर आगे बढ़ने की कोशिश करता है, किन्तु कदम-कदम पर उसे अपमान और प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। व्यक्ति के शुभत्व में गहरी आस्था के सहारे नायक अपने संघर्ष की निरन्तरता बनाए रखता है, किन्तु प्राय: हर तरफ से बार-बार मिलती निराशा इसे आत्मघात की ओर धकेल देती है। उपन्यास के अन्य चरित्र मानव-जीवन की विभिन्न विचित्रताओं को चित्रित करते हैं जिससे इसका कथानक बहुआयामी और रोचक बन गया है।
उपन्यास के लेखक ने वर्षों तक निरन्तर शोध और फील्ड वर्क किया है। महाब्राह्मण समाज की गहराई में जाकर लेखक ने अनगिनत इंटरव्यू लिए और अनेक ऐसी विसंगतियों को देखा-समझा जिनके बारे में आमतौर पर हम बिलकुल नहीं जानते। यह पहली कृति है, जो जाति-संरचना के इस पक्ष को इतने अच्छे ढंग से न सिर्फ, चित्रित करती है बल्कि विश्लेषित भी करती है।
Patrangpur Puran
- Author Name:
Mrinal Pande
- Book Type:

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रचनात्मक गद्य की गहराई और पत्रकारिता की सहज सम्प्रेषणीयता से समृद्ध मृणाल पाण्डे की कथाकृतियाँ हिन्दी जगत में अपने अलग तेवर के लिए जानी जाती हैं। उनकी रचनाओं में कथा का प्रवाह और शैली उनका कथ्य स्वयं बुनता है।
‘पटरंगपुर पुराण’ के केन्द्र में पटरंगपुर नाम का एक गाँव है जो बाद में एक क़स्बे में तब्दील हो जाता है। इसी गाँव के विकास-क्रम के साथ चलते हुए यह उपन्यास कुमाऊँ-गढ़वाल के पहाड़ी क्षेत्र के जीवन में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आए बदलाव का अंकन करता है। कथा-रस का सफलतापूर्वक निर्वाह करते हुए इसमें काली कुमाऊँ के राजा से लेकर भारत की स्वतंत्रता-प्राप्ति तक के समय को लिया गया है।
परिनिष्ठित हिन्दी के साथ-साथ पहाड़ी शब्दों और कथन-शैलियों का उपयोग इस उपन्यास को विशेष रूप से आकर्षित बनाता है, इसे पढ़ते हुए हम न केवल सम्बन्धित क्षेत्र के लोक-प्रचलित इतिहास से अवगत होते हैं, बल्कि भाषा के माध्यम से वहाँ का जीवन भी अपनी तमाम सांस्कृतिक और सामाजिक भंगिमाओं के साथ हमारे सामने साकार हो उठता है। कहानियों-क़िस्सों की चलती-फिरती खान, विष्णुकुटी की आमा की बोली में उतरी यह कथा सचमुच एक पुराण जैसी ही है।
1984
- Author Name:
George Orwell
- Book Type:

- Description: 1984 सर्वसत्तावादी शासन के खतरों से आगाह करने वाला विश्वविख्यात उपन्यास है। यह अनिवार्यत: विचार और भाषा के सम्बन्धों पर केन्द्रित एक कृति है। जाहिर है, जब विचार और भाषा एक-दूसरे को प्रभावित करते हों तो यह परिघटना किसी कालखंड में बँधी नहीं रह सकती। जब-जब कोई विचार विशेष सत्ता में होगा, उससे जुड़ी शब्दावली भी वापस प्रचलन में आएगी। यही बात इस उपन्यास को सार्वकालिक नहीं बनाती है और, उसको सर्वोपरि बनाए रखने के लिए अगर व्यवस्था को नागरिकों से भी महत्त्वपूर्ण मान लिया जाएगा तब किसी राज्य और समाज के लोगों को करना एक ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ेगा, जहाँ कोई प्रत्यक्ष जंजीर भले न हो, लेकिन आज़ादी नहीं होगी; जीवन भले हो पर कोई गरिमा न होगी।
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