Tatari Veeran
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सन् 1940 में प्रकाशित ‘तातारी वीरान’ दीनो बुत्साती की एक उत्कृष्ट कृति है। इसमें कुशल लेखक ने मँजी शैली के माध्यम से मानव-जीवन में व्याप्त बेतुकेपन (absurdity) को अपनी वैचित्र्यपूर्ण भाव-संवेदनाओं के ताने-बानों से पिरोया है। उपन्यास में व्यक्त दर्शन एक तरह का अस्तित्ववादी चिन्तन है। कथानक की बुनावट की दृष्टि से यह एक अतियथार्थवादी रचना है जिसमें कथा-संयोजन स्वैरकल्पना (fantasy) के माध्यम से होता है। ‘तातारी वीरान’ के पात्र जीवन-भर अपने द्वारा ही निर्मित भ्रमों के क़ैदी बनकर एक आशा में पूरी ज़िन्दगी गुज़ार देते हैं—जीवन में कुछ बड़ा कर पाने की निर्मूल आशा में! जीवन के हर आयाम में छाया बेतुकापन वस्तुत: एक सम्भावित भय से परिचालित रहता है। मानवीय सम्बन्धों की आधारभूमि एक-दूसरे के बीच की ऐसी ‘जानकारी’ पर निर्मित होती है जो ठोस नहीं अपितु दलदल युक्त है—जिसमें बेतुकेपन की अन्त:सलिला निरन्तर बहती रहती है।
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सन् 1940 में प्रकाशित ‘तातारी वीरान’ दीनो बुत्साती की एक उत्कृष्ट कृति है। इसमें कुशल लेखक ने मँजी शैली के माध्यम से मानव-जीवन में व्याप्त बेतुकेपन (absurdity) को अपनी वैचित्र्यपूर्ण भाव-संवेदनाओं के ताने-बानों से पिरोया है। उपन्यास में व्यक्त दर्शन एक तरह का अस्तित्ववादी चिन्तन है। कथानक की बुनावट की दृष्टि से यह एक अतियथार्थवादी रचना है जिसमें कथा-संयोजन स्वैरकल्पना (fantasy) के माध्यम से होता है। ‘तातारी वीरान’ के पात्र जीवन-भर अपने द्वारा ही निर्मित भ्रमों के क़ैदी बनकर एक आशा में पूरी ज़िन्दगी गुज़ार देते हैं—जीवन में कुछ बड़ा कर पाने की निर्मूल आशा में! जीवन के हर आयाम में छाया बेतुकापन वस्तुत: एक सम्भावित भय से परिचालित रहता है। मानवीय सम्बन्धों की आधारभूमि एक-दूसरे के बीच की ऐसी ‘जानकारी’ पर निर्मित होती है जो ठोस नहीं अपितु दलदल युक्त है—जिसमें बेतुकेपन की अन्त:सलिला निरन्तर बहती रहती है।
Book Details
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ISBN9788171785230
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Pages194
-
Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: v data-content-type="html" data-appearance="default" data-element="main"><p>‘झिपय्या' अरुण साधू की प्रयोगात्मक कथाकृति है। न तो इसे पूरी तरह कहानी कहा जा सकता है और न ही यह उपन्यास-विधा की सारी शर्तें पूरी करता है। इसीलिए श्री साधू ने अपनी इस कृति को सीधे-सीधे कहानी-संग्रह या उपन्यास न कहकर 'कथामालिका' कहा है। इसमें एक ही परिस्थिति में जीवन जीने का ईमानदार संघर्ष करते पात्रों की अनेक कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ श्री साधू ने 1977 से 1987 के बीच लिखीं और वे लगभग उपन्यास बन गईं। यह नया प्रयोग निश्चय ही कथा-विधा के लिए एक चुनौती की तरह है। उपन्यास का नायक 'झिपय्या' बारह-तेरह साल का किशोर है। घर में उसकी बहन लीला और उसकी माँ भी हैं। झिपय्या के अनेक साथी हैं जो बूट पालिश करने का धन्धा करते हैं। लेकिन मुम्बई की बदलती परिस्थितियों के बीच यह धन्धा ख़त्म होनेवाला है। इस अन्धकारमय भविष्य से झिपय्या परेशान नहीं होता। किसी असामाजिक कार्य में घुसने की नहीं सोचता। वह ईमानदारी से श्रम करके जीना चाहता है। यह ताक़त उसे अपनी आशावादी दृष्टि के कारण मिलती है। बूट पालिश करनेवाला झिपय्या के सभी साथी अपनी-अपनी तरह से ग़रीबी के विरुद्ध संघर्ष करते हैं। श्री साधू ने अपनी इस कथा-कृति में मुम्बई में रहनेवाले समाज के सबसे निचले तबके की महागाथा लिखी है। यह रचना निश्चय ही उनकी सृजनयात्रा में भी एक कीर्तिमान है।</p>
Gujarat Ki Lokkathayen
- Author Name:
Raghavji Madhad
- Book Type:

- Description: गुजरात वैविध्य सांस्कृतिक विरासत रखनेवाला विकासशील राज्य है। यहाँ समुद्र, रेगिस्तान, पर्वत और जंगल हैं, जो शायद ही किसी राज्य में एक साथ देखने को मिलते हैं। इन प्राकृतिक, भौगोलिक और सामाजिकता का प्रभाव जनजीवन पर पड़ता रहता है, जिसके आधार पर कला, संस्कृति और साहित्य विकसित होता रहता है। गुजरात के विविध प्रदेशों की सांस्कृतिक और मानव-महिमा को उजागर करनेवाली इन कथाओं में मानवीय गुणों के साथ भाषा व विषयों की विविधता वाली कथाएँ हैं, जिसमें लेखन की विभिन्न शैलियों एवं कथा-कौशल का अनुभव प्राप्त होगा। ये काल के प्रवाह में बह जाने के बदले लोकहृदय को आर्द्र करती रहनेवाली कथाएँ हैं। इतिहास के जर्जरित पन्नों से लगी रजकणिकाएँ हैं। शीलवंत, भटके हुए, भूले हुए, पराक्रमशील, हँसमुख और स्नेहवाले नर-नारियों के जीवन की मधुरता से महकते पात्र इन कथाओं में आलस्य छोड़कर उठ खड़े हुए हैं, जिनमें प्रकृति-प्रेम के साथ प्राणी-प्रेम भी आ जाता है। गुजरात के समृद्ध लोकजीवन की बानगी देती ये लोककथाएँ पाठकों को वहाँ की संस्कृति, परंपराओं और मान्यताओं से परिचित करवाएँगी और उनका ज्ञानवर्धन-मनोरंजन भी करेंगी।
Teri Hi Tasveer
- Author Name:
Harsh Ranjan
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- Description: महाभारत और गीता के कृष्ण भूले-भटके, थके-थके से सूरदास और मीराबाई के भजन सुन रहे थे... वो हाथ के सुदर्शन औरकुरुक्षेत्र के रण से अलग अपनी एक नयी पहचान बुन रहे थे...फिर मैंने उनकी गैया नहीं देखी... मैया भी नहीं देखी... सिर्फपरकटे मोर-मोरनी और कभी की रंग-बिरंगी चिडि़यां देखी। ...फिर सारे मोरपंख मैंने स्याही में डाले और हजार पन्नों का सफर सिर्फकृष्ण-कृष्ण लिखकर निकाल डाले। हरेक सौवां पन्ना मील का एक पत्थर था जिसे कृष्ण का अभय और वर था...और खुद ये उनके लिएआश्वासन था कि उनकी पहचान लिखने का साधन आखिरी हर नये युग के नये कृष्ण का आह्वाहन था।
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