1984
(0)
Author:
George OrwellPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
399
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1984 सर्वसत्तावादी शासन के खतरों से आगाह करने वाला विश्वविख्यात उपन्यास है। यह अनिवार्यत: विचार और भाषा के सम्बन्धों पर केन्द्रित एक कृति है। जाहिर है, जब विचार और भाषा एक-दूसरे को प्रभावित करते हों तो यह परिघटना किसी कालखंड में बँधी नहीं रह सकती। जब-जब कोई विचार विशेष सत्ता में होगा, उससे जुड़ी शब्दावली भी वापस प्रचलन में आएगी। यही बात इस उपन्यास को सार्वकालिक नहीं बनाती है और, उसको सर्वोपरि बनाए रखने के लिए अगर व्यवस्था को नागरिकों से भी महत्त्वपूर्ण मान लिया जाएगा तब किसी राज्य और समाज के लोगों को करना एक ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ेगा, जहाँ कोई प्रत्यक्ष जंजीर भले न हो, लेकिन आज़ादी नहीं होगी; जीवन भले हो पर कोई गरिमा न होगी।
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1984 सर्वसत्तावादी शासन के खतरों से आगाह करने वाला विश्वविख्यात उपन्यास है। यह अनिवार्यत: विचार और भाषा के सम्बन्धों पर केन्द्रित एक कृति है। जाहिर है, जब विचार और भाषा एक-दूसरे को प्रभावित करते हों तो यह परिघटना किसी कालखंड में बँधी नहीं रह सकती। जब-जब कोई विचार विशेष सत्ता में होगा, उससे जुड़ी शब्दावली भी वापस प्रचलन में आएगी। यही बात इस उपन्यास को सार्वकालिक नहीं बनाती है और, उसको सर्वोपरि बनाए रखने के लिए अगर व्यवस्था को नागरिकों से भी महत्त्वपूर्ण मान लिया जाएगा तब किसी राज्य और समाज के लोगों को करना एक ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ेगा, जहाँ कोई प्रत्यक्ष जंजीर भले न हो, लेकिन आज़ादी नहीं होगी; जीवन भले हो पर कोई गरिमा न होगी।
Book Details
-
ISBN9789390971084
-
Pages360
-
Avg Reading Time12 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: This is the love story of two girls, Aditi and Zara. One is from Pakistan and other is from India. They meet and fall in love with each other in a foreign land, and they make a promise to fight every demon of society for the sake of their love.But destiny has other plans for their love story. When their love is at its peak, a tragedy befalls Aditi, which forces her to return to her home country and ghost herself. After months of no communication, Zara decides to visit India in search of her love. What happens when Zara lands in aditi’s country to seek her love? Will she be able to find her love in the country of billions of people? Will society ever accept their homosexual relationship? Or will they remain as two parallel lines, moving alongside each other But without a destination and never destined to meet?.
Jeevan Gita
- Author Name:
Devmuni Shukla
- Book Type:

- Description: "श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय वाड्मय का पवित्र एवं अत्यंत लोकप्रिय ग्रंथ है। विश्व की अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है; इसकी अनेक टीका एवं समीक्षाएँ लिखी गई हैं। आदि शंकराचार्य से लेकर विनोबा भावे तक अनेक विद्वानों और संत-महात्माओं ने गीता पर भाष्य लिखे। लोकमान्य तिलक ने गीता को निष्काम कर्मयोग का आधार-ग्रंथ प्रतिपादित किया। गीता का धर्म कर्तव्य का द्योतक है। इसके अनुसार शरीर, इंद्रिय, मन और बुद्धि सभी के कर्तव्य निश्चित हैं। मानव शरीर जीवात्मा का परिधान मात्र है। इसमें निष्काम कर्म और संपूर्ण समर्पण के साथ परमात्मा की शरण में जाने पर जीवन की मुक्ति का मार्ग दिखाया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में आचार की पवित्रता, पाखंड का त्याग, सच्ची निष्ठा, फल की इच्छा न रखते हुए कर्तव्य-पालन तथा अहंकार का त्याग कर उत्कृष्ट नैतिक मूल्यों के अनुपालन का निर्देश दिया गया है। श्री देवमुनि शुक्ल ने सरस और प्रवाहमय भाषा में इसका पद्यानुवाद करके इसे ‘जीवन-गीता’ का रूप दिया है। आशा है, सुधी पाठक गीता को पद्य रूप में हृदयंगम कर इसके आदर्श गुणों को अपनाकर अपने उद्धार का मार्ग प्रशस्त करेंगे।
Ek Bataa Do
- Author Name:
Sujata
- Book Type:

-
Description:
पद्मिनी नायिकाओं-सी अगाधमना लड़कियाँ जब महानगर के गली-कूचों में जन्मे और अपने मायकों की खटर-पटर से निजात पाने के लिए उस पहले रोमियो को ही ‘हाँ’ कर दें जिसने उन्हें देखकर पहली ‘आह’ भरी तो जीवन मिनी-त्रासदियों का मेगा-सिलसिला बन ही जाता है और उससे निबटने के दो ही तरीक़े बच जाते हैं—पहला, ख़ुद को दो हिस्सों में फाड़ना। जैसे सलवार-कुरते का कपड़ा अलग किया जाता है, वैसे शरीर से मन अलग करना। मन को बौद्ध भिक्षुणियों या भक्त कवयित्रियों की राह भेजकर शरीरेण घर-बाहर के सब दायित्व निभाए चले जाना! दूसरे उपाय में भी बाक़ी दोनों घटक यही रहते हैं पर भक्ति का स्थानापन्न प्रेम हो जाता है—प्रकृति से, जीव-मात्र से, संसार के सब परितप्त जनों से और एक हमदर्द पुरुष से भी जो उन्हें ‘आत्मा का सहचर’ होने का आभास देता है।
स्वयं से बाहर निकलकर ख़ुद को द्रष्टा-भाव में देखना और फिर अपने से या अपनों से मीठी चुटकियाँ लिए चलना भी स्त्री-लेखन की वह बड़ी विशेषता है जिसकी कई बानगियाँ गुच्छा-गुच्छा फूली हुई आपको हर क़दम पर इस उपन्यास में दिखाई देंगी! हर कवि के गद्य में एक विशेष चित्रात्मकता, एक विशेष यति-गति होती है, पर यह उपन्यास प्रमाण है इस बात का कि स्त्री-कवि के गद्य में रुक-रुककर मुहल्ले की हर टहनी के फूल लोढ़ते चली जानेवाली क़स्बाई औरतों की चाल का एक विशेष छंद होता है। अब हिन्दी में स्त्री उपन्यासकारों की एक लम्बी और पुष्ट परम्परा बन गई है। सुजाता का यह उपन्यास उसे एक सुखद समृद्धि देता है और ज़रूरी विस्तार भी।
—अनामिका
Chidiya Bahnon Ka Bhai
- Author Name:
Anand Harshul
- Book Type:

-
Description:
चिड़िया बहनों का भाई’ के जिस कथा-संसार में आप दाख़िल होने जा रहे हैं, वह आनन्द हर्षुल का रचा हुआ एक ‘अनिर्वचनीय’ ऐन्द्रिय लोक है। यह कथानायक भुलवा का घर-संसार है। इस दुनिया की प्रकृति में पशु, वनस्पति और मनुष्य का अनिवार्य मेल है। एक से दूसरे के अस्तित्व में आवाजाही इस दुनिया में ज़िन्दगी का सहज सामान्य दैनंदिन तरीक़ा है। नवजात बेटियाँ पैदा होते ही अपने कन्धों पर पंख उगाकर खिड़की से उड़ जाती हैं—आँखों में अथाह करुणा-भरे, अपनी माँ और घर को अपने जन्म के अतिशय दु:ख से बचाने के लिए। उनके इकलौते भाई भुलवा की पकड़ी हुई मछलियाँ स्वयं उड़कर उसके घर जा पहुँचती हैं, उनकी ठठरी नदी में फिंककर फिर ज़िन्दा मछलियों में तब्दील हो जाती हैं...और भी वे सारी घटनाएँ और चरित्र जिनकी चर्चा यहाँ अनावश्यक है, क्योंकि आगामी पृष्ठों में आप उनको स्वयं इस यथार्थ को रचते और उस यथार्थ से प्रसूत होते देखेंगे।
यह भाषा के मिथकीय स्वभाव में जन्म लेने और व्यक्त होनेवाली दुनिया है। संवेदनाओं का समग्र संश्लिष्ट बोध इस दुनिया की जीवन-प्रणाली है, जैसी कि वह आदिम मनुष्य की रही होगी। आनन्द हर्षुल ने वैसी ही संश्लिष्ट सघन भाषा रचकर उस दुर्लभ अनिर्वचनीय समग्रता को वचनीय बनाया है और निस्सन्देह, यह स्वयं किसी चमत्कार से कम नहीं।
आनन्द हर्षुल के हाथों में मिथकीय भाषा केवल दर्ज करने का उपकरण नहीं रह जाती। वह वस्तुत: आँख है, अनुभव को देखती और यथातथ्य भाव से उसकी उद्दामता को पकड़ती। यह तो अनुभव की उद्दामता है जो उसको यथातथ्य नहीं रहने देती। इस भाषा के हाथों में मिथक वह रूप ले लेता है जिसे कभी कोलरिज ने प्राथमिक कल्पना की तरह पहचाना था और उसे समस्त मानवीय बोध की जीवनी शक्ति और पुरोधा माना था जो सीमित आबद्ध चेतना में अनादि अनन्त 'अस्मि' की सृजनाकांक्षा की पुनरावृत्ति कही जा सकती है।
यह संस्कृति की सुसंस्कारित प्रकृति की विकासगाथा है जो विकृति के प्रतिपक्ष की तरह स्थापित हो जाती है। प्रकृति को लौटा लाने का निर्विकल्प आह्वान अब एकमात्र बच रहा विकल्प है। 'चिडिय़ा बहनों का भाई' में आनन्द हर्षुल इसी आह्वान को साकार उपस्थित करते दिखाई देते हैं।
—अर्चना वर्मा
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