Aakaron Ke Aaspas
(0)
Author:
Kunwar NarainPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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'आकारों के आसपास' की कहानियों को पढ़कर कुछ ऐसा आस्वाद मिलता है जो आम तौर पर आज की कहानियों से सुखद रूप में अलग है। एक तरह से इन कहानियों की दुनिया कोई ख़ास निजी दुनिया नहीं है, इनमें भी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के ही आम परिचित अनुभवों को पेश किया गया है। मगर उन्हें देखनेवाली नज़र, उसके कोण और इन दोनों के कारण उभरनेवाले रूप और भाषाई संगठन का फ़र्क़ इतना बड़ा है कि इन कहानियों की दुनिया एकदम विशिष्ट और विस्मयकारी जान पड़ती है जिसमें किसी-न-किसी परिचित सम्बन्ध, अनुभव या रूख़ का या तो कोई अन्तर्विरोध या नया अर्थ खुल जाता है, या इसकी कोई नई परत उभर आती है—जैसा अक्सर कविता के बिम्बों से हुआ करता है।</p> <p>कोई अजब नहीं कि इन कहानियों में यथार्थ और फैंटेसी के बीच लगातार आवाजाही है। फैंटेसी के साथ-साथ कुँवर नारायण अपनी बात कहने के लिए तीखे व्यंग्य के बजाय हलकी विडम्बना या 'आयरनी' का इस्तेमाल अधिक करते हैं। इसी से उनके यहाँ फूहड़ अतिरंजना या अति-नाटकीयता नहीं है, एक तरह का सुरोचिपूर्ण संवेदनशील निजीपन है ।</p> <p>दरअसल, ये कहानियाँ काफ़ी फैले हुए फ़लक पा अनेक मानवीय नैतिक सम्बन्धों, प्रश्नों और मूल्यों को जाँचने, उधेड़ने और परिभाषित करने की कोशिश करती हैं, किसी क्रान्तिकारी मुद्रा में नहीं, बल्कि असलियत की बेझिझक निजी पहचान के इरादे से।
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'आकारों के आसपास' की कहानियों को पढ़कर कुछ ऐसा आस्वाद मिलता है जो आम तौर पर आज की कहानियों से सुखद रूप में अलग है। एक तरह से इन कहानियों की दुनिया कोई ख़ास निजी दुनिया नहीं है, इनमें भी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के ही आम परिचित अनुभवों को पेश किया गया है। मगर उन्हें देखनेवाली नज़र, उसके कोण और इन दोनों के कारण उभरनेवाले रूप और भाषाई संगठन का फ़र्क़ इतना बड़ा है कि इन कहानियों की दुनिया एकदम विशिष्ट और विस्मयकारी जान पड़ती है जिसमें किसी-न-किसी परिचित सम्बन्ध, अनुभव या रूख़ का या तो कोई अन्तर्विरोध या नया अर्थ खुल जाता है, या इसकी कोई नई परत उभर आती है—जैसा अक्सर कविता के बिम्बों से हुआ करता है।</p>
<p>कोई अजब नहीं कि इन कहानियों में यथार्थ और फैंटेसी के बीच लगातार आवाजाही है। फैंटेसी के साथ-साथ कुँवर नारायण अपनी बात कहने के लिए तीखे व्यंग्य के बजाय हलकी विडम्बना या 'आयरनी' का इस्तेमाल अधिक करते हैं। इसी से उनके यहाँ फूहड़ अतिरंजना या अति-नाटकीयता नहीं है, एक तरह का सुरोचिपूर्ण संवेदनशील निजीपन है ।</p>
<p>दरअसल, ये कहानियाँ काफ़ी फैले हुए फ़लक पा अनेक मानवीय नैतिक सम्बन्धों, प्रश्नों और मूल्यों को जाँचने, उधेड़ने और परिभाषित करने की कोशिश करती हैं, किसी क्रान्तिकारी मुद्रा में नहीं, बल्कि असलियत की बेझिझक निजी पहचान के इरादे से।
Book Details
-
ISBN9789348157119
-
Pages135
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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