Ababil Ki Udaan
(0)
Author:
Sara RaiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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सारा राय की ये कहानियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि साहित्य और वर्तमान सन्दर्भ में हिन्दी साहित्य ने आगे बढ़ना बन्द नहीं किया है और वह बिना शोर मचाए, प्राय: चुपचाप, प्रगति की दिशा में नए क़दम रखता चला जा रहा है। सम्पन्न कहानी के लिए अब तक घटनाओं की बहुलता आवश्यक होती थी, परन्तु अब बहुत कम, बहुत सामान्य और रोज़मर्रा की ज़िन्दगी पर बहुत सफल कलात्मक कहानी लिखी जा सकती है।</p> <p>निर्मल वर्मा के शब्दों में, ‘‘विवरणात्मक कहानी की लगभग मृतप्राय शैली को (जिसमें बातचीत लगभग नहीं के बराबर है) सारा राय ने यदि इतने सधे, संवेदनशील ढंग से पुनर्जीवित किया है तो उसके पीछे उनकी तीक्ष्ण और जिज्ञासापूर्ण दृष्टि है...। इससे एक अजीब भ्रम उत्पन्न होता है—विवरण कहानी लेखिका देती है लेकिन जो आवाज़ सुनाई देती है, वह उन वस्तुओं और पात्रों के मुँह से जिनके बारे में विवरण दिया जा रहा है।...यदि फार्सटर के कथन 'ओनली कनेक्ट’ में कला का मर्म छिपा है तो सारा राय में उसकी विलक्षण प्रतिभा है।’’</p> <p>निश्चय ही, इस संकलन की बारह कहानियाँ साहित्य में मील के पत्थर के समान हैं।
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सारा राय की ये कहानियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि साहित्य और वर्तमान सन्दर्भ में हिन्दी साहित्य ने आगे बढ़ना बन्द नहीं किया है और वह बिना शोर मचाए, प्राय: चुपचाप, प्रगति की दिशा में नए क़दम रखता चला जा रहा है। सम्पन्न कहानी के लिए अब तक घटनाओं की बहुलता आवश्यक होती थी, परन्तु अब बहुत कम, बहुत सामान्य और रोज़मर्रा की ज़िन्दगी पर बहुत सफल कलात्मक कहानी लिखी जा सकती है।</p>
<p>निर्मल वर्मा के शब्दों में, ‘‘विवरणात्मक कहानी की लगभग मृतप्राय शैली को (जिसमें बातचीत लगभग नहीं के बराबर है) सारा राय ने यदि इतने सधे, संवेदनशील ढंग से पुनर्जीवित किया है तो उसके पीछे उनकी तीक्ष्ण और जिज्ञासापूर्ण दृष्टि है...। इससे एक अजीब भ्रम उत्पन्न होता है—विवरण कहानी लेखिका देती है लेकिन जो आवाज़ सुनाई देती है, वह उन वस्तुओं और पात्रों के मुँह से जिनके बारे में विवरण दिया जा रहा है।...यदि फार्सटर के कथन 'ओनली कनेक्ट’ में कला का मर्म छिपा है तो सारा राय में उसकी विलक्षण प्रतिभा है।’’</p>
<p>निश्चय ही, इस संकलन की बारह कहानियाँ साहित्य में मील के पत्थर के समान हैं।
Book Details
-
ISBN9788171785636
-
Pages143
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अपने भीतरी ‘मैं’ के अनेक-अनेक बाहरी ‘मैं’ के साथ जुड़ते चले जाने की चाहना में मुझे कुछ हद तक इस प्रश्न का उत्तर भी मिला कि मैं क्यों लिखती हूँ? जब से लिखना आरम्भ किया, तब से न जाने कितनी बार इस प्रश्न का सामना हुआ, पर कभी भी कोई सन्तोषजनक उत्तर मैं अपने को नहीं दे पाई तो दूसरों को क्या देती? इस सारी प्रक्रिया ने मुझे उत्तर के जिस सिरे पर ला खड़ा किया, वही एकमात्र या अन्तिम है, ऐसा दावा तो मैं आज भी नहीं कर सकती, लेकिन यह भी एक महत्त्वपूर्ण पहलू तो है ही। किसी भी रचना के छपते ही इस इच्छा का जगना कि अधिक से अधिक लोग इसे पढ़ें, केवल पढ़ें ही नहीं, बल्कि इससे जुड़ें भी—संवेदना के स्तर पर उसके भागीदार भी बनें यानी कि एक की कथा-व्यथा अनेक की बन सके, बने...केवल मेरे ही क्यों, अधिकांश लेखकों के लिखने के मूल में एक और अनेक के बीच सेतु बनने की यह कामना ही निहित नहीं रहती?
मैंने चाहे कहानियाँ लिखी हों या उपन्यास या नाटक—भाषा के मामले में शुरू से ही मेरा नज़रिया एक जैसा रहा है। शुरू से ही मैं पारदर्शिता को कथा-भाषा की अनिवार्यता मानती आई हूँ। भाषा ऐसी हो कि पाठक को सीधे कथा के साथ जोड़ दे...बीच में अवरोध या व्यवधान बनकर न खड़ी हो। कुछ लोगों की धारणा है कि ऐसी सहज-सरल, बकौल उनके सपाट भाषा, गहन संवेदना, गूढ़ अर्थ और भावना के महीन से महीन रेशों को उजागर करने में अक्षम होती है। पर क्या जैनेन्द्र जी की भाषा-शैली इस धारणा को ध्वस्त नहीं कर देती? हाँ, इतना ज़रूर कहूँगी कि सरल भाषा लिखना ही सबसे कठिन काम होता है। इस कठिन काम को मैं पूरी तरह साध पाई, ऐसा दावा करने का दुस्साहस तो मैं कर ही नहीं सकती, पर इतना ज़रूर कहूँगी कि प्रयत्न मेरा हमेशा इसी दिशा में रहा है।
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