Pratinidhi Kahaniyan : Govind Mishra
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Author:
Govind MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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समकालीन कथा-परिवेश और यथार्थवादी कथा-लेखन के सन्दर्भ में टिप्पणी करते हुए एक जगह गोविन्द मिश्र ने लिखा है कि “यथार्थवादी लेखन के इस युग में लेखक को सामाजिक विसंगतियों की यंत्रणा चित्रित करने के आगे उन बातों और चरित्रों में भी जाना होगा, जिनकी वजह से विसंगतियाँ है”, ताकि न तो मानवीय यंत्रणा के अधूरेपन का अहसास हो और न क्रान्तिकारिता के खोखलेपन का। दरअसल हिन्दी-कहानी के विभिन्न दौरों से निरपेक्ष रहते हुए जिन कथाकारों ने अपनी एक स्वतंत्र पहचान बनाई है, गोविन्द मिश्र उनकी पहली क़तार में आते हैं। यह संकलन उनके कई प्रकाशित कहानी-संग्रहों से उनकी महत्त्वपूर्ण और बहुचर्चित कहानियों का चयन है। इन कहानियों के माध्यम से हम वर्तमान भारतीय समाज के विभिन्न चरित्रों और स्तरों से परिचित होते हैं। अपने कथा-चरित्रों के प्रति लेखक का कोई पूर्वग्रह नहीं, बल्कि वह उन्हें जीवन-स्थितियों के बीच पहचानता है। यही कारण है कि ये कहानियाँ हमें जीवन की विविधता तक ले जाती हैं और हमारे भीतर एक इन्द्रधनुषी संसार सजीव हो उठता है।
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समकालीन कथा-परिवेश और यथार्थवादी कथा-लेखन के सन्दर्भ में टिप्पणी करते हुए एक जगह गोविन्द मिश्र ने लिखा है कि “यथार्थवादी लेखन के इस युग में लेखक को सामाजिक विसंगतियों की यंत्रणा चित्रित करने के आगे उन बातों और चरित्रों में भी जाना होगा, जिनकी वजह से विसंगतियाँ है”, ताकि न तो मानवीय यंत्रणा के अधूरेपन का अहसास हो और न क्रान्तिकारिता के खोखलेपन का।
दरअसल हिन्दी-कहानी के विभिन्न दौरों से निरपेक्ष रहते हुए जिन कथाकारों ने अपनी एक स्वतंत्र पहचान बनाई है, गोविन्द मिश्र उनकी पहली क़तार में आते हैं। यह संकलन उनके कई प्रकाशित कहानी-संग्रहों से उनकी महत्त्वपूर्ण और बहुचर्चित कहानियों का चयन है। इन कहानियों के माध्यम से हम वर्तमान भारतीय समाज के विभिन्न चरित्रों और स्तरों से परिचित होते हैं। अपने कथा-चरित्रों के प्रति लेखक का कोई पूर्वग्रह नहीं, बल्कि वह उन्हें जीवन-स्थितियों के बीच पहचानता है। यही कारण है कि ये कहानियाँ हमें जीवन की विविधता तक ले जाती हैं और हमारे भीतर एक इन्द्रधनुषी संसार सजीव हो उठता है।
Book Details
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ISBN9788126706488
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Pages117
-
Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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Description:
विख्यात बांग्ला कथाकार महाश्वेता देवी की आठ लम्बी कहानियाँ अथवा उपन्यासिकाएँ इस पुस्तक में संकलित हैं। उनकी श्रेष्ठतम रचनाओं में इनकी गणना की जा सकती है। इनमें ‘रुदाली’ नामक उपन्यासिका भी शामिल है जिस पर इसी नाम से एक बेहद सार्थक फ़िल्म बनाई जा चुकी है।
इन उपन्यासिकाओं में बिहार के आदिवासी इलाक़ों के जीवन का रोमांचक वर्णन है और आदिवासियों के सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक जीवन के खरे चित्र बेलौस भाषा में दिखाए गए हैं। उनके शोषण-उत्पीड़न, उनकी आशा-आकांक्षा, उनका भोलापन और उनकी जिजीविषा को भीतर तक देखा-दिखाया गया है। मानव-जीवन के इस सबसे प्रताड़ित, पिछड़े और दयनीय, फिर भी स्वाभिमानी और तेजस्वी पक्ष को प्रस्तुत करने में महाश्वेता देवी की लेखनी का कमाल इन रचनाओं को अभूतपूर्व ताज़गी और कचोट से भर देता है।
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