Shri Ramnagar Ramleela
(0)
Author:
Bhanushankar MehtaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
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‘रामचरितमानस’ सोलहवीं सदी में पुनः कही गई रामकथा है जिसमें राम का दर्पण रूप प्रतिबिम्बित है और यहाँ राम देवपद पर प्रतिष्ठित हो गए हैं। यहाँ राम द्विज हैं और उनकी कथा भी दो बार कही गई।</p> <p>रामकथा का एक तृतीयांश आदर्श पुरुष राम का, दूसरी तिहाई राजाराम की और अन्तिम अंश वैरागी यात्री राम का है। यहाँ रामनगर में समानान्तर अंक हैं—नगर में जहाँ सुख-सुविधा है, अविकसित ग्राम हैं और वन हैं, वहीं आदिवासी, साधु-सन्त और वैरागी भी रहते हैं। ‘रामनगर रामलीला’ का अद्भुत प्रसंग है—कोट बिदाई। एक राजा द्वारा दूसरे राजा का स्वागत-सत्कार और फिर स्वरूपों को देवरूप मानकर विधिवत् पूजा करता है।</p> <p>‘रामनगर रामलीला’ की यात्राएँ देखें—एक तो राम जी की बारात है जो अयोध्या से जनकपुर जाती है, फिर विदाई यात्रा है जिसमें वर-वधू जनकपुर से अयोध्या आते हैं। वनयात्रा और भरत की चित्रकूट नंदीग्राम की लम्बी यात्रा है। भरत-मिलन लंका से अयोध्या की यात्रा है।</p> <p>‘रामनगर रामलीला’ में लोककला चरम उत्कर्ष पर पहुँच गई है। लोककला की सीमा में सौन्दर्यबोध का अपूर्व विकास हुआ।</p> <p>‘रामलीला’—नाटक, धर्म, राजनीति और समाज की संयुक्त अवतारणा है।</p> <p>‘रामलीला’ में पुराणकथा, दर्शक सहभागिता, राजनीति की माया, पर्यावरण का सभी स्तरों पर प्रदर्शन होता है।</p> <p>अन्यत्र कहीं भी रामनगर का अनुकरण नहीं हो सकता, हाँ, इससे कुछ सीख सकते हैं।
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‘रामचरितमानस’ सोलहवीं सदी में पुनः कही गई रामकथा है जिसमें राम का दर्पण रूप प्रतिबिम्बित है और यहाँ राम देवपद पर प्रतिष्ठित हो गए हैं। यहाँ राम द्विज हैं और उनकी कथा भी दो बार कही गई।</p>
<p>रामकथा का एक तृतीयांश आदर्श पुरुष राम का, दूसरी तिहाई राजाराम की और अन्तिम अंश वैरागी यात्री राम का है। यहाँ रामनगर में समानान्तर अंक हैं—नगर में जहाँ सुख-सुविधा है, अविकसित ग्राम हैं और वन हैं, वहीं आदिवासी, साधु-सन्त और वैरागी भी रहते हैं। ‘रामनगर रामलीला’ का अद्भुत प्रसंग है—कोट बिदाई। एक राजा द्वारा दूसरे राजा का स्वागत-सत्कार और फिर स्वरूपों को देवरूप मानकर विधिवत् पूजा करता है।</p>
<p>‘रामनगर रामलीला’ की यात्राएँ देखें—एक तो राम जी की बारात है जो अयोध्या से जनकपुर जाती है, फिर विदाई यात्रा है जिसमें वर-वधू जनकपुर से अयोध्या आते हैं। वनयात्रा और भरत की चित्रकूट नंदीग्राम की लम्बी यात्रा है। भरत-मिलन लंका से अयोध्या की यात्रा है।</p>
<p>‘रामनगर रामलीला’ में लोककला चरम उत्कर्ष पर पहुँच गई है। लोककला की सीमा में सौन्दर्यबोध का अपूर्व विकास हुआ।</p>
<p>‘रामलीला’—नाटक, धर्म, राजनीति और समाज की संयुक्त अवतारणा है।</p>
<p>‘रामलीला’ में पुराणकथा, दर्शक सहभागिता, राजनीति की माया, पर्यावरण का सभी स्तरों पर प्रदर्शन होता है।</p>
<p>अन्यत्र कहीं भी रामनगर का अनुकरण नहीं हो सकता, हाँ, इससे कुछ सीख सकते हैं।
Book Details
-
ISBN9789352210589
-
Pages223
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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नानक वाणी में धार्मिक, लौकिक और लौकिक-धार्मिक काव्य का सहज समन्वय है। इसमें कर्ममार्ग, योगमार्ग, भक्तिमार्ग और ज्ञानमार्ग का विशद निरूपण है। नानक वाणी में शान्त, शृंगार, करुण, वीर, हास्य आदि रसों का अद्भुत परिपाक है। उनका प्रकृति चित्रण अत्यन्त मोहक और आकर्षक है। उनकी भाषा पूर्वी पंजाबी है, परन्तु उसमें ब्रजभाषा और खड़ी बोली का भी पुट है। मुहावरों और कहावतों का प्रचुर प्रयोग है। नानक के अनुसार परमात्मा एक है वह कर्तार है, वह भय से रहित है, बैर से रहित है, मूर्तिमान है, काल से रहित है, योनि के अन्तर्गत नहीं आता। नानक वाणी में जहाँ एक ओर गुरु गाम्भीर्य और ज्ञान-वैराग्य भक्ति का अमृत मन्थन है वहाँ उनकी भाषा में अद्भुत ओज और भक्ति है। उनकी रचना-शैली में काव्य का लालित्य, माधुर्य, विचार सम्पन्नता सब कुछ है। नानक वाणी हृदय और मस्तिष्क को स्पर्श ही नहीं करती प्रत्युत उन्हें अनुप्राणित भी करती है।
नानक वाणी में उन्नीस राग प्रयुक्त हुए हैं : राग श्री, माझ, गौरी, आसा, गुजरी, वडहंस, सोरठि, धनासिरी, तिलंग, सूही, बिलावल, रामकली, मारू, दुखारी, भैरउ, बसंत, सागर, मलार तथा प्रभाती। नानक वाणी संगीतमय है, विचारोत्तेजक है। नानक वाणी का यह संस्करण अपनी विशद् सारगर्भित भूमिका के कारण अधिक सुबोध और उपयोगी हो गया है। श्रीगुरु नानक देव की सम्पूर्ण वाणी का यह मूल्यवान संग्रह उनके सभी भक्तों और प्रेमियों के पास अवश्य होना चाहिए।
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वेद सनातनविद्या के काव्यात्मक प्रतिपादन हैं। ऋग्वेद संहिता के अनुवाद एवं व्याख्या का प्रयास अनेक भाषाओं में समय-समय पर होता रहा है, किन्तु अभी तक उपलब्ध सभी अनुवादों में काव्यपक्ष की उपेक्षा अथवा पद्यानुवाद की प्रस्तुति के असम्भव प्रयास ही किए गए हैं जो ऋचाओं के साथ पूरा न्याय नहीं करते हैं। वेदों में भावों की सनातनता एक व्यापक ध्वनि के रूप में सूक्तों, संवादों और आख्यानों में विद्यमान है। प्रस्तुत अनुवाद में पादानुसारी किन्तु भावपरक अनुवाद पर विशेष आग्रह सोद्देश्य है ताकि ऋचाओं की काव्यात्मकता का यथासम्भव सम्प्रेषण एवं मूल की अर्थयोजना का क्रम अनुवाद में सुरक्षित रहे।
भाषान्तर में व्याख्या का सूक्ष्म प्रकार अनिवार्य होता है और वही अनुवाद का वर्तमान और अतीत के मध्य संवाद बनाकर बहुत कुछ को परम्परा में जीवित तथा प्रगतिशील रखता है। अतः ग्रन्थ में अनुवाद के लिए उपयुक्त भाषा, पुरातन ध्वनि बहुलता और समसामयिक सजीवता के संरक्षण की दृष्टि से तत्सम, तद्भव एवं देशी शब्दों के समन्वित प्रयोग किए गए हैं। साथ ही, गम्भीर और बहुमुखी अर्थों को स्पष्ट करने के लिए क्रियापदों के अनुवाद, दुरूह पदों के अर्थनिर्वचन में धातुपाठ, निरुक्त की पद्धति एवं आधुनिक तथा तुलनात्मक व्याकरण के अनुसरण से सहायता ली गई है।
वेद आर्षकाव्य के निर्देशन के साथ-साथ अध्यात्मगवेषियों के मार्गदर्शक भी हैं। अतः ऋचाओं में संश्लिष्ट आधियाज्ञिक, आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक अर्थों को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है। व्याख्याकारों में जहाँ विवाद की स्थिति है, वहाँ प्राचीन एवं नवीन दोनों ही मतों का विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार काव्यात्मक पक्ष की प्रस्तुति, निगूढ़ अर्थ के आयामों का विश्लेषण और विवादित स्थलों का तुलनात्मक विवेचन इस ग्रन्थ के अनुवाद एवं व्याख्या की अभीप्सित विशेषताएँ हैं।
इस खंड में ‘ऋग्वेद’ के पहले मंडल (पूर्वार्द्ध) का व्याख्या सहित हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया गया है।
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