Rigved : Mandal-6 & 7
(0)
Author:
Govind Chandra PandeyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
800
640 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
वेद सनातनविद्या के काव्यात्मक प्रतिपादन हैं। ऋग्वेद संहिता के अनुवाद एवं व्याख्या का प्रयास अनेक भाषाओं में समय-समय पर होता रहा है, किन्तु अभी तक उपलब्ध सभी अनुवादों में काव्यपक्ष की उपेक्षा अथवा पद्यानुवाद की प्रस्तुति के असम्भव प्रयास ही किए गए हैं जो ऋचाओं के साथ पूरा न्याय नहीं करते हैं। वेदों में भावों की सनातनता एक व्यापक ध्वनि के रूप में सूक्तों, संवादों और आख्यानों में विद्यमान है। प्रस्तुत अनुवाद में पादानुसारी किन्तु भावपरक अनुवाद पर विशेष आग्रह सोद्देश्य है ताकि ऋचाओं की काव्यात्मकता का यथासम्भव सम्प्रेषण एवं मूल की अर्थयोजना का क्रम अनुवाद में सुरक्षित रहे।</p> <p>भाषान्तर में व्याख्या का सूक्ष्म प्रकार अनिवार्य होता है और वही अनुवाद का वर्तमान और अतीत के मध्य संवाद बनाकर बहुत कुछ को परम्परा में जीवित तथा प्रगतिशील रखता है। अतः ग्रन्थ में अनुवाद के लिए उपयुक्त भाषा, पुरातन ध्वनि बहुलता और समसामयिक सजीवता के संरक्षण की दृष्टि से तत्सम, तद्भव एवं देशी शब्दों के समन्वित प्रयोग किए गए हैं। साथ ही, गम्भीर और बहुमुखी अर्थों को स्पष्ट करने के लिए क्रियापदों के अनुवाद, दुरूह पदों के अर्थनिर्वचन में धातुपाठ, निरुक्त की पद्धति एवं आधुनिक तथा तुलनात्मक व्याकरण के अनुसरण से सहायता ली गई है।</p> <p>वेद आर्षकाव्य के निर्देशन के साथ-साथ अध्यात्मगवेषियों के मार्गदर्शक भी हैं। अतः ऋचाओं में संश्लिष्ट आधियाज्ञिक, आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक अर्थों को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है। व्याख्याकारों में जहाँ विवाद की स्थिति है, वहाँ प्राचीन एवं नवीन दोनों ही मतों का विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार काव्यात्मक पक्ष की प्रस्तुति, निगूढ़ अर्थ के आयामों का विश्लेषण और विवादित स्थलों का तुलनात्मक विवेचन इस ग्रन्थ के अनुवाद एवं व्याख्या की अभीप्सित विशेषताएँ हैं।</p> <p>इस खंड में ‘ऋग्वेद’ के छठे एवं सातवें मंडल का व्याख्या सहित हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया गया है।
Read moreAbout the Book
वेद सनातनविद्या के काव्यात्मक प्रतिपादन हैं। ऋग्वेद संहिता के अनुवाद एवं व्याख्या का प्रयास अनेक भाषाओं में समय-समय पर होता रहा है, किन्तु अभी तक उपलब्ध सभी अनुवादों में काव्यपक्ष की उपेक्षा अथवा पद्यानुवाद की प्रस्तुति के असम्भव प्रयास ही किए गए हैं जो ऋचाओं के साथ पूरा न्याय नहीं करते हैं। वेदों में भावों की सनातनता एक व्यापक ध्वनि के रूप में सूक्तों, संवादों और आख्यानों में विद्यमान है। प्रस्तुत अनुवाद में पादानुसारी किन्तु भावपरक अनुवाद पर विशेष आग्रह सोद्देश्य है ताकि ऋचाओं की काव्यात्मकता का यथासम्भव सम्प्रेषण एवं मूल की अर्थयोजना का क्रम अनुवाद में सुरक्षित रहे।</p>
<p>भाषान्तर में व्याख्या का सूक्ष्म प्रकार अनिवार्य होता है और वही अनुवाद का वर्तमान और अतीत के मध्य संवाद बनाकर बहुत कुछ को परम्परा में जीवित तथा प्रगतिशील रखता है। अतः ग्रन्थ में अनुवाद के लिए उपयुक्त भाषा, पुरातन ध्वनि बहुलता और समसामयिक सजीवता के संरक्षण की दृष्टि से तत्सम, तद्भव एवं देशी शब्दों के समन्वित प्रयोग किए गए हैं। साथ ही, गम्भीर और बहुमुखी अर्थों को स्पष्ट करने के लिए क्रियापदों के अनुवाद, दुरूह पदों के अर्थनिर्वचन में धातुपाठ, निरुक्त की पद्धति एवं आधुनिक तथा तुलनात्मक व्याकरण के अनुसरण से सहायता ली गई है।</p>
<p>वेद आर्षकाव्य के निर्देशन के साथ-साथ अध्यात्मगवेषियों के मार्गदर्शक भी हैं। अतः ऋचाओं में संश्लिष्ट आधियाज्ञिक, आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक अर्थों को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है। व्याख्याकारों में जहाँ विवाद की स्थिति है, वहाँ प्राचीन एवं नवीन दोनों ही मतों का विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार काव्यात्मक पक्ष की प्रस्तुति, निगूढ़ अर्थ के आयामों का विश्लेषण और विवादित स्थलों का तुलनात्मक विवेचन इस ग्रन्थ के अनुवाद एवं व्याख्या की अभीप्सित विशेषताएँ हैं।</p>
<p>इस खंड में ‘ऋग्वेद’ के छठे एवं सातवें मंडल का व्याख्या सहित हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया गया है।
Book Details
-
ISBN9788190831932
-
Pages884
-
Avg Reading Time29 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Hadapada Appanna-Lingam
- Author Name:
Kashinath Ambalge
- Book Type:

-
Description:
ध्यान करना चाहूँ तो क्या ध्यान करूँ।
मन तेजोहीन धुँधला पड़ गया था, तन शून्य हो गया था।
कायक गुण गल चुका। देह से अहं मिट गया था।
अपने आपसे प्रकाश में झूमते मैं सुखी बनी
अप्पण्णाप्रिय चन्नबसवण्णा॥
मन याद कर रहा है।
बुरी विषय वासना की ओर मन बहक रहा है।
डाली की चोटी की ओर जा रहा है मन
मन किसी भी नियम में बँधता नहीं,
छोड़ देने पर मन जाता भी नहीं।
अपनी इच्छा पर मनमानी करते मन को नियम में बाँधकर
लक्ष्य में स्थिर करके शून्य में विहरनेवाले
शरणों के चरणों में मैं समा रही
अप्पण्णाप्रिय चन्नबसवण्णा॥
—लिंगम्मा
घास-फूस-कचरा निकालकर स्वच्छ किए
हुए खेत में कूड़ा-करकट बोनेवाले पागलों की तरह
विषय-सुखों के झूठे भ्रम में लोलुप होकर
तकलीफ़ में पड़नेवाले मनुष्य कैसे जान सकते
महाघन गुरु के स्वरूप को?
मरण बाधा में पड़नेवाले आपको कैसे जान सकते हैं
बसवप्रिय कूडल चन्नबसवण्णा? ॥
भूख मिटाने अन्न स्वीकार करते हैं,
विषय के मोह में झूठ बोलते हैं,
नए-नए व्यसन में पड़कर
भस्म धारण करके सारा विश्व घूमते हैं।
इस मिथ्या को छोड़कर, माया के धुँधलेपन को दूर किए बिना
नहीं समा सकता हमारा बसवप्रिय कूडल चन्नबसवण्णा॥
—अप्पण्णा
Allamprabhu : Pratibha Ka Shikhar
- Author Name:
Kashinath Ambalge
- Book Type:

-
Description:
अज्ञान रूपी पालने में
ज्ञान रूपी शिशु सुलाकर
सकल वेदशास्त्र रूपी रस्सी से बाँधकर झूला,
झुलाती हुई पालने
लोरी गा रही है, भ्रान्ति रूपी माई!
जब तक पालना न टूटे, रस्सी न कटे
लोरी बन्द न हो
तब तक गुहेश्वर लिंग के दर्शन नहीं होंगे॥
अल्लम सृजनशीलता के प्रति विश्वास रखते हैं कि ‘नि:शब्द ज्ञान क्या शब्दों की साधना से सम्भव है?’
बहती नदी को देह भर पाँव
जलती आग को देह भर जिह्वा
बहती हवा को देह भर हाथ
अतः गुहेश्वर, तेरे शरण का सर्वांग लिंगमय है॥
Dashaguru Parampara Ke Navam Guru Shri Tegabahaduraji
- Author Name:
Dr. Kuldip Chand Agnihotri
- Book Type:

- Description: सप्तसिंधु क्षेत्र की कुछ घटनाएँ ऐसी हैं, जिन्होंने भारतवर्ष के इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनमें सबसे पहली घटना तो सिंधु-सरस्वती सभ्यता का विकास है। दरअसल वर्तमान भारतीय विश्वासों, आस्थाओं एवं पूजा-पद्धति का आधार सिंधु-सरस्वती घाटी में ही मिलता है। इसके उपरांत वेद रचना का युग आता है। यह सिंधु-सरस्वती सभ्यता का अगला चरण है—गंभीर चिंतन का युग। इस युग के चिंतन ने भारतवर्ष को ही नहीं, बल्कि पूरे जंबूद्वीप को आच्छादित किया। कुरुक्षेत्र में हुआ महाभारत का युद्ध इस क्षेत्र की ऐसी घटना है, जिसने पूरे हिंदुस्तान को सप्तसिंधु के मैदान में लाकर खड़ा कर दिया था। बाद के काल में विदेशी आक्रांता येन-केन-प्रकारेण विजित प्रदेश के निवासियों को अपने मजहब में मतांतरित करने लगे थे। हमले क्योंकि सप्तसिंधु क्षेत्र से ही होते थे, इसलिए इसका सर्वाधिक दंश भी इसी क्षेत्र को सहना पड़ा। लेकिन इस नई आफत का सामना कैसे किया जाए, यह सबसे बड़ी चुनौती थी। इस मरहले पर दशगुरु परंपरा की शुरुआत एक दैवी योजना ही मानी जा सकती है। गुरु नानक देवजी इसके संस्थापक थे। दुर्भाग्य से दशगुरु परंपरा का मूल्यांकन आध्यात्मिक क्षेत्र में तो हुआ है, लेकिन ऐतिहासिक व सामाजिक क्षेत्र में समग्र रूप से नहीं हुआ। यह ऐसा क्षेत्र है, जिसमें कुदाल चलाने की जरूरत है और यह पुस्तक दशगुरु परंपरा को प्रकाश में लाने का स्तुत्य प्रयास है।
Bahudha aur 9/11 ke baad ki dunia
- Author Name:
Balmeeki Prasad Singh
- Book Type:

-
Description:
इधर आतंकवाद और पुनरुत्थानवाद के उदय के कारण वैश्विक राजनीति में कुछ अहम परिवर्तन आए हैं। ये अभूतपूर्व चुनौतियाँ विश्व के नेताओं से एक नई, साहसी और कल्पनाशील राजनीति की माँग कर रही हैं। शान्ति की सदियों पुरानी तकनीकों से ऊपर उठने और विमर्श की हमारी भाषा की पुनर्रचना करने की ज़रूरत को रेखांकित करते हुए यह पुस्तक ‘बहुधा’ की अवधारणा को प्रस्तुत करती है; ‘बहुधा’—यानी एक शाश्वत सचाई, एक सातत्य; शान्तिपूर्ण जीवन और सौहार्द का संवाद। यह अवधारणा बहुजातीय समाजों और बहुवाद के अन्तर को बताती है, वैचारिक आदान-प्रदान की गुंजाइश देती है और सामूहिक कल्याण की समझ को प्रोत्साहित करती है।
पुस्तक को पाँच भागों में विभाजित किया गया है। पहले भाग में 1989 से 2001 की अवधि में घटी घटनाओं और विभिन्न देशों, संस्कृतियों और अन्तरराष्ट्रीय शान्ति पर पड़े उनके प्रभावों पर विचार किया गया है। मसलन—बर्लिन की दीवार का गिरना, हांगकांग का चीन में जाना और सितम्बर 11 को अमेरिका में हुआ हमला। दूसरे भाग में वेदों और पुराणों के उदाहरणों और अशोक, कबीर, गुरु नानक, अकबर व महात्मा गांधी की नीतियों के विश्लेषण के द्वारा बहुवादी चुनौतियों से निबटने के भारतीय अनुभवों को परखा गया है।
आगे के भागों में लेखक ने ‘बहुधा’ को सामूहिक सौहार्द की एक नीति के रूप में रेखांकित करते हुए विश्वस्तर पर इस दृष्टिकोण के अनुकरण पर विचार किया है। एक सद्भावनापूर्ण समाज की रचना के लिए लेखक शिक्षा और धर्म की भूमिका को केन्द्रीय मानते हैं और वैश्विक विवादों को हल करने के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ को शक्तिशाली बनाने की वकालत करते हैं।
लेखक की मान्यता है कि आतंकवाद का जवाब मानवाधिकारों के सम्मान और विभिन्न संस्कृतियों और मूल्य-व्यवस्थाओं के सम्मान में छिपा है। शान्तिपूर्ण विश्व के निर्माण के लिए, आवश्यक संवाद-प्रक्रिया को आरम्भ करने के लिए यह ज़रूरी है।
कई-कई विषय-क्षेत्रों में एक साथ विचरण करनेवाली यह कृति विद्यार्थियों, विद्वानों और इतिहास, दर्शन, राजनीति तथा अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों के शोधार्थियों के लिए समान रूप से रुचिकर साबित होगी।
Islam Ka Saidhantik Parivesh
- Author Name:
Zafar Raza
- Book Type:

-
Description:
प्रोफ़ेसर सैयद जाफ़र रज़ा उन विद्वान अध्यापकों में हैं, जो किसी भी विश्वविद्यालय के लिए गौरवपात्रिक होते हैं। मेरा उनका साथ कश्मीर विश्वविद्यालय, श्रीनगर से है। मैंने उनकी प्रबुद्धता के जौहर अनेक संगोष्ठियों में देखे हैं। इस्लामी धर्म, इतिहास, दर्शन, साहित्य और संस्कृति पर उन जैसी पैनी दृष्टि किसी दूसरे उर्दू साहित्यकार में मुझे देखने को नहीं मिली।
प्रस्तुत पुस्तक में इस्लामी धर्म और समाज के बारे में सभी ज़रूरी जानकारी इस तरह पेश की गई है, कि कतरा में दजला की सैर करा दी है। उस पर सोहागा है, विद्वान लेखक की अपनी स्वस्थ, सन्तुलित एवं उदार दृष्टि, जिससे वे पहचाने जाते हैं। कोई बात बिना किसी ठोस आधार के नहीं लिखते हैं। यदि किसी विवादास्पद विषय पर उन्हें लिखना ही पड़ा, तो इस पर नज़र रखते हैं कि उनके क़लम से किसी के दिल को चोट न लगे। इस पुस्तक में भी इसका ख़याल रखा गया है।
यह अत्यन्त उपयोगी पुस्तक है, जिससे इस्लामी धर्म और समाज का सही परिचय मिलता है। यक़ीन है कि पुस्तक का हिन्दी-जगत में स्वागत होगा।
Islam Mein Dharmik Chintan Ki Punarrachna
- Author Name:
Mohd. Ikbal
- Book Type:

-
Description:
‘इस्लाम में धार्मिक चिन्तन की पुनर्रचना’ डॉ. मुहम्मद इक़बाल के उन महत्त्वपूर्ण अंग्रेज़ी व्याख्यानों का अनुवाद है जिन्हें उन्होंने मद्रास मुस्लिम एसोसिएशन के निवेदन पर तैयार किया था। ये व्याख्यान दिसम्बर, 1928 के अन्त में मद्रास और जनवरी, 1929 में हैदराबाद और अलीगढ़ में दिए गए थे।
यूरोपीय भाषाओं—जर्मन, फ़्रेंच, इतालवी तथा एशियाई भाषाओं—उर्दू, अरबी, फ़ारसी और तुर्की में इन व्याख्यानों के अनुवाद बहुत पहले हो चुके हैं। ज़रूरत थी कि दक्षिण-पूर्व एशिया की प्रमुख भाषा हिन्दी में भी इनका अनुवाद हो ताकि हिन्दीभाषी पाठक अपने दिक और काल में इस्लाम में धार्मिक चिन्तन के स्वरूप को समझने तथा इसकी पुनर्रचना के इस सबसे आधुनिक एवं समर्थ प्रयास से न केवल परिचित हो सकें, बल्कि इस्लाम में धार्मिक चिन्तन को लेकर फैलाए जा रहे प्रभावों से मुक्त होकर एक समुचित दृष्टिकोण अपना सकें।
इस पुस्तक से एक बार पुनः भारतीय दर्शन की अनेक गंगा-जमुनी समस्याओं का समाधान हो सके, इसी विश्वास के साथ एक विस्तृत परिदृश्य को रेखांकित किया गया है ताकि पाठकों एवं चिन्तकों को न केवल इक़बाल की मनोभूमि का पता चल सके, बल्कि इस्लामी चिन्तन की गहरी अर्थवत्ता और व्यापक मानवीयता का भी बोध हो सके।
Shrimadbhagwadgita : Tatvik Bhav
- Author Name:
U.P. Singh
- Book Type:

-
Description:
श्रीमद्भगवद्गीता में अभिहित कर्म एवं इसके फल के रहस्य को यथार्थ रूप से समझकर तथा तदनुसार जीवन दर्शन को अंगीकार करके अपने वर्णधर्म के अनुसार करने योग्य कर्मों को ईश्वर को अर्पण करके निष्काम भाव से चित्त की शुद्धि हेतु यज्ञरूप से करते हुए गीतोक्त कर्म, ज्ञान व भक्ति योगमार्ग में से अपने-अपने स्वभाव के अनुसार आधाररूप से किसी एक योगमार्ग के अभ्यास में लगे रहकर ईश्वर का स्मरण व ध्यान करके किसी भी देश, काल, धर्म, सम्प्रदाय अथवा लिंग का मनुष्य परम तत्त्व से योग (ऐक्य) स्थापित करके इस जीवन को आनन्दमय बनाते हुए परम पुरुषार्थ रूपी मोक्ष की प्राप्ति करके जन्म-मरण रूपी बन्धन से मुक्त हो सकता है।
अभ्यास के उपर्युक्त क्रम में कर्म तथा कर्मफल में अनासक्ति का भाव, जगत के सुख-दुःखादि द्वंदों में समभाव, सभी जीवों में परमात्मा रूप से स्थित 'आत्मा' के एकत्व का भाव, सतत् आनन्ददायक परम सत्ता में प्रेम का भाव तथा उच्चतम आध्यात्मिक उत्कर्ष हेतु आवश्यक अन्यान्य मानवीय कल्याणकारी मूलभूत भावों व गुणों का अन्तःकरण में प्रादुर्भाव ईश्वर की अहैतुकी कृपा से सहज ही हो जाता है। इस प्रकार से प्राप्त लौकिक तथा पारलौकिक दिव्यता के प्रत्यक्ष अनुभव की अभिव्यक्ति सम्पूर्णता से वाणी द्वारा व्यक्त करना कठिन है।
Sufiwad Ke Adhyatmik Ayam
- Author Name:
Zafar Raza
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी में तसव्वु़फ या सूफ़ीमत पर दो प्रामाणिक पुस्तकें छपी हैं। एक चन्द्रबली पाण्डेय की, दूसरी डॉ. राममूर्ति त्रिपाठी की। इस्लाम धर्म के अनुयायी विद्वान् की हिन्दी में यह पहली पुस्तक है—सू़फ़ीवाद के आध्यामिक आयाम।
इस पुस्तक में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ सू़फ़ी सिद्धान्तों का बहुत ही स्पष्ट और प्रामाणिक विवेचन है। प्रोफ़ेसर जाफ़र रज़ा ने अपने प्रतिपादन की पुष्टि क़ुर्आन के उद्धरणों से की है। इसके साथ-साथ विभिन्न सू़फ़ी सम्प्रदायों का ऐतिहासिक, दार्शनिक और साधनापरक विवेचन भी इसमें है।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पूर्ववर्ती मूल अरबी-फ़ारसी विवेचकों का संक्षिप्त परिचय भी दिया गया है। विशेष रूप से भारत में प्रसिद्ध सू़फ़ी-फ़कीर सम्प्रदायों और उनके प्रमुख हस्ताक्षरों के बारे में बहुत ही प्रामाणिक विवेचन है। प्रोफ़ेसर जाफ़र ऱजा ने अत्यन्त निष्पक्ष होकर सूफ़ीवाद का एक प्रामाणिक दस्तावेज़ प्रस्तुत किया है।
सूफ़ी-दर्शन इस्लाम को मथ करके निकला मक्खन है। यह इस्लाम को प्रतिष्ठा दिलाने में तो सफल हुआ ही है, इसकी पृष्ठभूमि का दिग्दर्शन प्रोफ़ेसर जाफ़र ऱजा ने अच्छी तरह प्रस्तुत किया है।
Urilinga Peddi-Kaalavve
- Author Name:
Kashinath Ambalge
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Temples Tour: East India
- Author Name:
Rajiv Aggarwal
- Book Type:

- Description: Temples Tour is a book of compilation of major Temples in India and it is compiled with the help of official website of 739 districts of the country (till March 2020), website of Ministry of Tourism of Government of India and all states, website of Archaeological Survey of India, Wikipedia, official website of Temples, other religious websites, Facebook, Twitter, many books and articles. In this compilation, I have covered Temples from Andaman to Ajmer, Bodhgaya to Sarnath, Jagannath Puri to Kedarnath, Kanyakumari to Ksheer Bhavani, Koteshwar to Kamakhya, Lakshadweep to Leh, Sammedshikhar to Shravanbelgola and Somnath to Kashi Vishwanath. There are various types of Temples such as Ashtavinayak Temples, Buddhist Temples, Char Dham, Chota Char Dham, Eight Mahakshetras of Lord Vishnu, Hot/Perennial Sulphur Springs, ISKCON Temples, Jain Temples, Jyotilinga, Nag Devta Temples, Nava Narasimhas, Nava Thirupathi, Panch Badri, Panch Dwarka, Panch Kannan Kshetrams, Panch Kedar, Panch Prayag, Pancha Narasimha Kshetras, Pancharama Kshetras, Pancha Bhoota Sthalam, Panch Sabhai Temples, Sapta Puris, Seven Baithaks of Pushtimarg (Thakurji), Seven Thakurji of Vrindavan, Shakti Peetha, Shani Parihara Temples, Sindhi Temple, Six Abodes of Lord Murugan, Sun Temples, Trilinga Kshetras and other Temples, ponds/lakes, trees, saints and statues of more than 50 foot height.
Shri Ramcharitmanas : dwitya sopan Ayodhyakand
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
May Be We'll All Go Mad
- Author Name:
Ulla Berkewicz
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Sachchi Ramayan
- Author Name:
Periyar E.V. Ramasamy
- Book Type:

-
Description:
‘सच्ची रामायण’ ई.वी. रामासामी नायकर 'पेरियार' की बहुचर्चित और सबसे विवादास्पद कृति रही है। पेरियार रामायण को एक राजनीतिक ग्रन्थ मानते थे। उनका कहना था कि इसे दक्षिणवासी अनार्यों पर उत्तर के आर्यों की विजय और प्रभुत्व को जायज़ ठहराने के लिए लिखा गया और यह ग़ैर-ब्राह्मणों पर ब्राह्मणों और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व का उपकरण है।
‘रामायण’ की मूल अन्तर्वस्तु को उजागर करने के लिए पेरियार ने 'वाल्मीकि रामायण' के अनुवादों सहित; अन्य राम कथाओं, जैसे—'कंब रामायण', 'तुलसीदास की रामायण' (रामचरितमानस), ‘बौद्ध रामायण’, ‘जैन रामायण’ आदि के अनुवादों तथा उनसे सम्बन्धित ग्रन्थों का चालीस वर्षों तक अध्ययन किया और 'रामायण पादीरंगल' (रामायण के पात्र) में उसका निचोड़ प्रस्तुत किया। यह पुस्तक 1944 में तमिल भाषा में प्रकाशित हुई। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद ‘द रामायण : अ ट्रू रीडिंग' नाम से 1959 में प्रकाशित हुआ।
यह किताब हिन्दी में 1968 में ‘सच्ची रामायण' नाम से प्रकाशित हुई थी, जिसके प्रकाशक लोकप्रिय बहुजन कार्यकर्ता ललई सिंह थे। 9 दिसम्बर, 1969 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया और पुस्तक की सभी प्रतियों को ज़ब्त कर लिया। ललई सिंह यादव ने इस प्रतिबन्ध और ज़ब्ती को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। वे हाईकोर्ट में मुक़दमा जीत गए। सरकार ने हाईकोर्ट के निर्णय के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। 16 सितम्बर, 1976 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सर्वसम्मति से फ़ैसला देते हुए राज्य सरकार की अपील को ख़ारिज कर दिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में निर्णय सुनाया।
प्रस्तुत किताब में ‘द रामायण : अ ट्रू रीडिंग' का नया, सटीक, सुपाठ्य और अविकल हिन्दी अनुवाद दिया गया है। साथ ही इसमें 'सच्ची रामायण' पर केन्द्रित लेख व पेरियार का जीवनचरित भी दिया गया है, जिससे इसकी महत्ता बहुत बढ़ गई है। यह भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन के इतिहास को समझने के इच्छुक हर व्यक्ति के लिए एक आवश्यक पुस्तक है।
Lohe Ki Kamarpetiyan
- Author Name:
Tapi Dharma Rao
- Book Type:

-
Description:
स्वर्गीय तापी धर्माराव के लेखन का फ़ोकस मुख्यत: समाज सुधार रहा है। तेलगू में इनकी पुस्तकें लोकप्रियता के शिखर पर रही हैं। इस पुस्तक में विख्यात लेखक ने कमरपेटियों की परम्परा और इतिहास को अपना विषय बनाया है।
कमरपेटियाँ हमारी परम्परा में जड़ी यौन–वर्जनाओं, पुरुष–वर्चस्व और शुद्धतावादी नैतिक आग्रहों की चरम और सर्वाधिक नृशंस अभिव्यक्ति हैं। इस पुस्तक में कमरपेटियों के इतिहास, उनके समाज–नीतिशास्त्र और वर्तमान में उनके लोक–प्रचलित अवशेषों का सरल, जनसाधारण की भाषा में विवरण दिया गया है। लेखक बताते हैं कि मरुगुबिल्लाओं (लाज–रक्षक पदक) के रूप में आज आन्ध्र में जो आभूषण प्रचलित है, वह कमरपेटियों का ही इमिटेशन है। उसके अलावा पुरातात्त्विक सर्वेक्षणों और खुदाइयों में मिली कमरपेटियों, उनके प्रकारों और उनसे जुड़ी किंवदन्तियों के बारे में प्रामाणिक जानकारी इस पुस्तक में है।
Bhagavadgeethe Kannada Kavya
- Author Name:
Prof V Narahari
- Book Type:

- Description: DESCRIPTION AWAITED
Rigved : Mandal-8
- Author Name:
Govind Chandra Pandey
- Book Type:

-
Description:
वेद सनातनविद्या के काव्यात्मक प्रतिपादन हैं। ऋग्वेद संहिता के अनुवाद एवं व्याख्या का प्रयास अनेक भाषाओं में समय-समय पर होता रहा है, किन्तु अभी तक उपलब्ध सभी अनुवादों में काव्यपक्ष की उपेक्षा अथवा पद्यानुवाद की प्रस्तुति के असम्भव प्रयास ही किए गए हैं जो ऋचाओं के साथ पूरा न्याय नहीं करते हैं। वेदों में भावों की सनातनता एक व्यापक ध्वनि के रूप में सूक्तों, संवादों और आख्यानों में विद्यमान है। प्रस्तुत अनुवाद में पादानुसारी किन्तु भावपरक अनुवाद पर विशेष आग्रह सोद्देश्य है ताकि ऋचाओं की काव्यात्मकता का यथासम्भव सम्प्रेषण एवं मूल की अर्थयोजना का क्रम अनुवाद में सुरक्षित रहे।
भाषान्तर में व्याख्या का सूक्ष्म प्रकार अनिवार्य होता है और वही अनुवाद का वर्तमान और अतीत के मध्य संवाद बनाकर बहुत कुछ को परम्परा में जीवित तथा प्रगतिशील रखता है। अतः ग्रन्थ में अनुवाद के लिए उपयुक्त भाषा, पुरातन ध्वनि बहुलता और समसामयिक सजीवता के संरक्षण की दृष्टि से तत्सम, तद्भव एवं देशी शब्दों के समन्वित प्रयोग किए गए हैं। साथ ही, गम्भीर और बहुमुखी अर्थों को स्पष्ट करने के लिए क्रियापदों के अनुवाद, दुरूह पदों के अर्थनिर्वचन में धातुपाठ, निरुक्त की पद्धति एवं आधुनिक तथा तुलनात्मक व्याकरण के अनुसरण से सहायता ली गई है।
वेद आर्षकाव्य के निर्देशन के साथ-साथ अध्यात्मगवेषियों के मार्गदर्शक भी हैं। अतः ऋचाओं में संश्लिष्ट आधियाज्ञिक, आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक अर्थों को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है। व्याख्याकारों में जहाँ विवाद की स्थिति है, वहाँ प्राचीन एवं नवीन दोनों ही मतों का विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार काव्यात्मक पक्ष की प्रस्तुति, निगूढ़ अर्थ के आयामों का विश्लेषण और विवादित स्थलों का तुलनात्मक विवेचन इस ग्रन्थ के अनुवाद एवं व्याख्या की अभीप्सित विशेषताएँ हैं।
इस खंड में ‘ऋग्वेद’ के आठवें मंडल का व्याख्या सहित हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया गया है।
Dr. Kalam : Prerna Ki Udaan
- Author Name:
Dr. Unnat Pandit
- Book Type:

- Description: ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिक, विचारक, दाशर्निक और शिक्षक के रूप में डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने प्रत्येक भारतीय को सदैव प्रेरित किया है। उनके जीवन, कॅरियर और लेखन ने कोटि-कोटि भारतीयों का मार्गदर्शन किया है, उन्हें प्रोत्साहित किया है। वे हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन हर भारतीय के हृदय में हमेशा उनका स्थान रहेगा। वे समाज और देश के प्रति अपने कर्तव्यों को लेकर हमारे मन में सदैव ज्ञान की ज्योति जलाते रहेंगे। प्रस्तुत पुस्तक ‘डॉ. कलाम : प्रेरणा की उड़ान’ उनके सहज-सरल, अनुकरणीय जीवन का एक विशद् विवेचन करती है। इस पुस्तक का उद्देश्य भारत के सर्वांगीण विकास के डॉ. कलाम के स्वप्न को साकार करने की प्रबल इच्छाशक्ति जाग्रत् कराना है, ताकि भारत के छात्र-युवा-आमजन प्रेरणा ले सकें। यह पुस्तक पढ़कर छात्रों को भारतीय रक्षा और अनुसंधान विकास में एरोनॉटिकल इंजीनियर, मिसाइल इंजीनियरिंग, उपग्रह प्रक्षेपण यान तकनीक के क्षेत्र में डॉ. कलाम के अनगिनत योगदानों के विषय में और ज्यादा जानने का अवसर मिलेगा। स्वप्न देखकर उन्हें साकार करने की क्षमता प्राप्त करने की उड़ान भरने में यह पुस्तक मील का पत्थर साबित होगी।
Shri Ramcharitmanas (Pramanik Path Tatha Teeka)
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh
- Book Type:

- Description: ‘श्रीरामचरितमानस’ भारतीय संस्कारों का श्रेष्ठतम महाकाव्य है। भारतीय संस्कार का अर्थ है, समग्र मानव जाति के निखिल मंगल, कल्याण एवं हितैषिता के प्रति समर्पित होकर प्रेम, स्नेह, उदारता, ममता, सहिष्णुता, दया, अस्तित्व, अहिंसा, सत्य, परोपकार आदि मूल्यों की प्रतिष्ठा करना। इस प्रकार, मानस मानव अस्तित्व को सर्वोपरि मानकर उसके लिए सबसे सुलभ, सर्वाधिक सुगम तथा श्रेयस्कर मार्ग की तलाश की छटपटाहट से संयुक्त है। समाज के सर्वोच्च शुभ की प्रतिष्ठा ही मानसकार तुलसी का महत्तम शुभ है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानवीय अस्तित्व की सार्थकता के लिए जिस भव्यतम शुभ का दर्शन किया है, मानस की कविता के विविध पात्रों द्वारा उसे जिस प्रकार व्यंजित किया है तथा नैतिक मंगल के सर्वोच्च मूल्य श्रीराम और उनके ठीक विपरीत गर्हित अशुभ एवं अधर्म के प्रतीक रावण को आमने-सामने रखकर जिस मानवीय शुभ की स्थापना की है—उसकी चरम परिणति असत्य पर सत्य की विजय, अशुभ पर शुभ की स्थापना, क्रूरता पर प्रेम तथा दया का प्रसार, प्रपंच तथा छल पर मानवीय सहजता की छाया की स्थापना में होती है। इस सृष्टि पर जब तक मानव जाति रहेगी, अपनी सांस्कृतिक धरोहर सत्य, प्रेम, दया, उदारता आदि श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों से सम्पृक्त ‘श्रीरामचरितमानस’ जैसे काव्य की रक्षा करती रहेगी। इस प्रकार ‘श्रीरामचरितमानस’ निखिल मानव जाति की सनातन धरोहर है और इस टीका का मन्तव्य है—उसकी इस अमूल्य तथा परम शुभमयी धरोहर से उसे बराबर परिचित कराते रहना।
Shri Guru Granth-Darshan
- Author Name:
Jairam Mishra
- Book Type:

-
Description:
‘गुरुग्रन्थ’ की अधिकांश रचनाएँ उन सिक्ख गुरुओं की हैं जो सीधे गुरु नानक देव की शिष्य-परम्परा में आते हैं तथा जिन्हें क्रमश: उन्हीं की ‘ज्योति का प्रतिरूप’ रहते आने के कारण, 'नानक' संज्ञा द्वारा अभिहित करने की परिपाटी भी चली आई है।
इसमें संगृहीत वाणियों के रचयिताओं की चेष्टा अधिकतर यही जान पड़ती है कि जो कुछ वास्तविक सत्य के रूप में अनुभूत हो उसे स्वयं अपने जीवन में भी उतारा जाए तथा वैसा ही करने का परामर्श किसी दूसरे को भी दिया जाए। वैसे सत्य का स्वरूप सदा एकरस एवं विश्वजनीन ही हो सकता है।
‘गुरुग्रन्थ' की एक ऐसी अन्य विशेषता, उसमें संगृहीत विविध रचनाओं के क्रमदान में भी पाई जा सकती है। उसमें आए हुए पदों को कोई ऐसा शीर्षक भी दिया हुआ नहीं मिलता जो विषयानुसार निश्चित किया गया हो तथा जिसके सहारे हमें उस मत-विशेष का परिचय मिल सके जिसे उनके रचयिताओं ने प्रकट किया होगा। उनका क्रम केवल रागानुसार ही स्थिर किया गया जान पाता है जिससे इस विषय में, हमें कोई भी सहायता नहीं मिल पाती। हमें यहाँ प्रत्यक्षत: केवल इतना ही पता चल पाता है कि सिक्ख गुरुओं ने, तथा कतिपय सन्तों, भक्तों ने एवं सूफियों तक ने भी एक ही प्रकार के गीत गाए होंगे।
Nij Brahma Vichar
- Author Name:
Purushottam Agarwal
- Book Type:

-
Description:
धर्म के सामान्य अनुयायी, साधारण आस्थावान् लोग हों या धर्म को हिंसक राजनीति में बदलनेवाले चतुर सुजान, धर्म के अध्येता हों या कठोर आलोचक और घोर विरोधी—अपने सारे मतभेदों के बावजूद इनमें से अधिकांश एक बात पर सहमत हैं। वह यह कि धर्म और अध्यात्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। या तो अध्यात्म फ़िज़ूल की बात है, या फिर धर्म ही अध्यात्म का एकमात्र आधार और माध्यम है। या तो अध्यात्म का आशय है—समाजनिरपेक्ष आत्मलीनता या अध्यात्म का अर्थ है प्रतिक्रियावादी रहस्यवाद। दोनों में से किसी भी तर्क-पद्धति को अपनाइए, निष्कर्ष पहले से तय है : यदि अध्यात्म के प्रश्नों में आपकी दिलचस्पी है तो आप धर्म को अपनाइए; यदि आप धर्म से असुविधा महसूस करते हैं तो अध्यात्म को भी साथ-साथ ख़ारिज कर दीजिए।
परस्पर विरोधी तर्क-पद्धतियों का निष्कर्ष के धरातल पर यह सामंजस्य अद्भुत है। धर्मेतर अध्यात्म की सम्भावनाओं पर विचार का प्रस्ताव, जो यह पुस्तक आपको देती है, विरुद्धों के इस सामंजस्य से टकराने का, और हो सके तो इसके परे जाने का प्रस्ताव है।
पिछले एक साल से भी ज़्यादा समय से दैनिक ‘जनसत्ता’ में चिन्तक-आलोचक
डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल का चर्चित कॉलम ‘मुखामुखम’ एक समग्रबोध की साधना करने की भरसक कोशिश करता रहा है। सैद्धान्तिक प्रश्नों से जूझने से लेकर अटलांटा, वर्धा और गोपेश्वर के अनुभव-संवेदनों को पाठकों के सामने प्रस्तुत करने तक के रूप में ये लेख लगातार उत्सुकता के साथ पढ़े गए। जाने-माने बुद्धिजीवियों से लेकर पाठकों तक सभी ने इनमें विशेष दिलचस्पी ज़ाहिर की। बहसें भी हुईं। शुरुआती एक वर्ष (मई 2003-मई 2004) में प्रकाशित चर्चित लेख यहाँ पुस्तक रूप में प्रस्तुत हैं। लेखक ने इनमें वे आवश्यक पाद-टिप्पणियाँ और सन्दर्भोल्लेख भी जोड़ दिए हैं, जो अख़बार में नहीं आ सकते थे, लेकिन ज़रूरी थे।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book