Hadapada Appanna-Lingam
(0)
Author:
Kashinath AmbalgePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
300
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Available
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ध्यान करना चाहूँ तो क्या ध्यान करूँ।</p> <p>मन तेजोहीन धुँधला पड़ गया था, तन शून्य हो गया था।</p> <p>कायक गुण गल चुका। देह से अहं मिट गया था।</p> <p>अपने आपसे प्रकाश में झूमते मैं सुखी बनी</p> <p>अप्पण्णाप्रिय चन्नबसवण्णा॥</p> <p> </p> <p>मन याद कर रहा है।</p> <p>बुरी विषय वासना की ओर मन बहक रहा है।</p> <p>डाली की चोटी की ओर जा रहा है मन</p> <p>मन किसी भी नियम में बँधता नहीं,</p> <p>छोड़ देने पर मन जाता भी नहीं।</p> <p>अपनी इच्छा पर मनमानी करते मन को नियम में बाँधकर</p> <p>लक्ष्य में स्थिर करके शून्य में विहरनेवाले</p> <p>शरणों के चरणों में मैं समा रही</p> <p>अप्पण्णाप्रिय चन्नबसवण्णा॥</p> <p>—लिंगम्मा</p> <p> </p> <p>घास-फूस-कचरा निकालकर स्वच्छ किए</p> <p>हुए खेत में कूड़ा-करकट बोनेवाले पागलों की तरह</p> <p>विषय-सुखों के झूठे भ्रम में लोलुप होकर</p> <p>तकलीफ़ में पड़नेवाले मनुष्य कैसे जान सकते</p> <p>महाघन गुरु के स्वरूप को?</p> <p>मरण बाधा में पड़नेवाले आपको कैसे जान सकते हैं</p> <p>बसवप्रिय कूडल चन्नबसवण्णा? ॥</p> <p> </p> <p>भूख मिटाने अन्न स्वीकार करते हैं,</p> <p>विषय के मोह में झूठ बोलते हैं,</p> <p>नए-नए व्यसन में पड़कर</p> <p>भस्म धारण करके सारा विश्व घूमते हैं।</p> <p>इस मिथ्या को छोड़कर, माया के धुँधलेपन को दूर किए बिना</p> <p>नहीं समा सकता हमारा बसवप्रिय कूडल चन्नबसवण्णा॥ </p> <p>—अप्पण्णा
Read moreAbout the Book
ध्यान करना चाहूँ तो क्या ध्यान करूँ।</p>
<p>मन तेजोहीन धुँधला पड़ गया था, तन शून्य हो गया था।</p>
<p>कायक गुण गल चुका। देह से अहं मिट गया था।</p>
<p>अपने आपसे प्रकाश में झूमते मैं सुखी बनी</p>
<p>अप्पण्णाप्रिय चन्नबसवण्णा॥</p>
<p> </p>
<p>मन याद कर रहा है।</p>
<p>बुरी विषय वासना की ओर मन बहक रहा है।</p>
<p>डाली की चोटी की ओर जा रहा है मन</p>
<p>मन किसी भी नियम में बँधता नहीं,</p>
<p>छोड़ देने पर मन जाता भी नहीं।</p>
<p>अपनी इच्छा पर मनमानी करते मन को नियम में बाँधकर</p>
<p>लक्ष्य में स्थिर करके शून्य में विहरनेवाले</p>
<p>शरणों के चरणों में मैं समा रही</p>
<p>अप्पण्णाप्रिय चन्नबसवण्णा॥</p>
<p>—लिंगम्मा</p>
<p> </p>
<p>घास-फूस-कचरा निकालकर स्वच्छ किए</p>
<p>हुए खेत में कूड़ा-करकट बोनेवाले पागलों की तरह</p>
<p>विषय-सुखों के झूठे भ्रम में लोलुप होकर</p>
<p>तकलीफ़ में पड़नेवाले मनुष्य कैसे जान सकते</p>
<p>महाघन गुरु के स्वरूप को?</p>
<p>मरण बाधा में पड़नेवाले आपको कैसे जान सकते हैं</p>
<p>बसवप्रिय कूडल चन्नबसवण्णा? ॥</p>
<p> </p>
<p>भूख मिटाने अन्न स्वीकार करते हैं,</p>
<p>विषय के मोह में झूठ बोलते हैं,</p>
<p>नए-नए व्यसन में पड़कर</p>
<p>भस्म धारण करके सारा विश्व घूमते हैं।</p>
<p>इस मिथ्या को छोड़कर, माया के धुँधलेपन को दूर किए बिना</p>
<p>नहीं समा सकता हमारा बसवप्रिय कूडल चन्नबसवण्णा॥ </p>
<p>—अप्पण्णा
Book Details
-
ISBN9789389742015
-
Pages96
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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कृष्ण के जिन स्वरूपों का उक्त ग्रन्थ में उद्घाटन हुआ है, उनमें युग-पुरुष, विभूति, तत्त्वज्ञ तथा पूर्णावतार मुख्य हैं। यदि कृष्ण के अवतार रूप को वादग्रस्त भी मान लिया जाए तब भी उनके शेष तीन रूप ही उन्हें मानवेतर या महामानव के पद पर आसीन करने को पर्याप्त हैं। उनका चरित्र इतना विशाल और गूढ़ है कि उसका पूर्ण दर्शन सम्भव नहीं। मानवीय जीवन का कोई भी पक्ष ऐसा नहीं जो उनके क्रियात्मक रूप से अछूता बचा हो। प्रथम रूप में वे अपने युग के नरोत्तम, दूसरे में महामानव और तीसरे में जगद्गुरु हैं। इन सब कारणों से वे पूर्ण पुरुष कहे व माने जाते हैं। योगेश्वर कृष्ण ने जिस अध्यात्म की चर्चा की तथा जिस स्थिति को प्राप्त करना प्रगतिशील मानवी जीवन की सबसे उत्कृष्ट उपलब्धि बतलाई है, वह इस जीवन से विलग किसी अन्य क्षेत्र की गतिविधि नहीं। यथार्थ में गीता-प्रतिपादित अध्यात्म मानवी-जीवन का ही विषय है और उसी का अंग है। वह संसार के व्यवहार से सम्बन्धित है। वह व्यक्तिगत व सामाजिक व्यवहार शुद्धि पर अवलम्बित है। आसुरी वृत्ति का त्याग और सात्त्विकता का अर्जन उस मार्ग के दिशा-सूचक संकेत-चिन्ह हैं।
यह पुस्तक पश्चिम के प्रभावस्वरूप भारत में कृष्ण को लेकर प्रचलित उन धारणाओं का खंडन करती है
जो कृष्ण की ऐतिहासिकता और गुण-सम्पन्नता को क्षतिग्रस्त करने का प्रयास करती है। कृष्ण के सन्दर्भ में प्रक्षेपित संशयों का निराकरण करते हुए विद्वान लेखक इस पुस्तक में कृष्ण की नितान्त आधुनिक और समीचीन व्याख्या प्रस्तुत करते हैं और अकाट्य तथा प्रखर तर्कों के आधार पर एक सम्पूर्ण कृष्ण-छवि की रचना करते हैं।
Sriramcharit Manas : Pancham Sopan Sundarkand
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh
- Book Type:

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Description:
तुलसी कृत सुन्दरकांड के कथा नायक हनुमान हैं, परन्तु वह लगते नहीं। कवि सुन्दरकांड के माध्यम से श्रीराम के माहात्म्य, उनके प्रति भक्ति तथा प्रपत्ति एवं शरणागति भाव को व्यंजित करना चाहता है। इस दृष्टि से, सुन्दरकांड में आए हनुमान, सीता, रावण एवं विभीषण के चरित्रों का तुलनात्मक अध्ययन करें तो विभीषण का स्थान सर्वोपरि है। सुन्दरकांड के इस विभीषण का चरित्र ऐतिहासिक नहीं, स्वयं तुलसीदास का अपना निजी भोगा हुआ उपेक्षित व्यक्तित्व है। विभीषण एवं तुलसी दोनों श्रीराम की शरणागति में ही जीवन की सार्थकता प्राप्त करते हैं। यदि और स्पष्ट ढंग से कहना चाहें तो यह भी कह सकते हैं कि इस विभीषण का पर्याय तुलसीयुगीन सम्पूर्ण निराश्रित जनसमूह है।
तुलसी सुन्दरकांड में विभीषण का विद्रावक तथा संवेदनशील व्यक्तित्व निर्मित करके इस कथा का मुख ग़रीब एवं असहाय जनता की ओर मोड़ देते हैं। इसीलिए, इस सुन्दरकांड में कवि अपनी सम्पूर्ण रचनात्मक ऊर्जा न हनुमान की शक्ति एवं बल से सम्बद्ध करता है, न रावण के प्रति अन्याय और आक्रोश में लगाता है, साथ ही, उसे न वह श्रीराम की प्राणप्रिया सीता की विरह पीड़ा से ही जोड़ता है; वह पूरी तरह से सजग तथा संवेदनशील होकर आश्रयविहीन विभीषण को अपना भावात्मक समर्पण देकर उसे सार्थक बनाने की चेष्टा करता है। इस सुन्दरकांड के कवि तथा उसकी कविता की यही भव्यता है।
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