Karam Sanyasi Krishna
(0)
Author:
Jhunni Lal VermaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
995
796 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
व्यासदेव प्रणीत ‘महाभारत’ ग्रन्थ में भारत के राष्ट्रीय युग-परिवर्तन का इतिहास है। वह उस दीप-स्तम्भ के समान है, जिसके प्रकाश में अतीत की चित्रावली के साथ-साथ युग-क्रान्ति के पश्चात् स्थापित होनेवाली नवीन राजसत्ता, समाज और व्यक्ति के नवीन रूप, नवीन उत्साह और नवीन आकांक्षाओं की भी झलक प्राप्त होती है। यद्यपि उस ग्रन्थ में कौरव-पांडवों के भीषण युद्ध का वर्णन है, परन्तु रचना के मूल नायक कृष्ण हैं।</p> <p>कृष्ण के जिन स्वरूपों का उक्त ग्रन्थ में उद्घाटन हुआ है, उनमें युग-पुरुष, विभूति, तत्त्वज्ञ तथा पूर्णावतार मुख्य हैं<strong>।</strong> यदि कृष्ण के अवतार रूप को वादग्रस्त भी मान लिया जाए तब भी उनके शेष तीन रूप ही उन्हें मानवेतर या महामानव के पद पर आसीन करने को पर्याप्त हैं<strong>।</strong> उनका चरित्र इतना विशाल और गूढ़ है कि उसका पूर्ण दर्शन सम्भव नहीं<strong>।</strong> मानवीय जीवन का कोई भी पक्ष ऐसा नहीं जो उनके क्रियात्मक रूप से अछूता बचा हो<strong>।</strong> प्रथम रूप में वे अपने युग के नरोत्तम, दूसरे में महामानव और तीसरे में जगद्गुरु हैं<strong>।</strong> इन सब कारणों से वे पूर्ण पुरुष कहे व माने जाते हैं<strong>।</strong> योगेश्वर कृष्ण ने जिस अध्यात्म की चर्चा की तथा जिस स्थिति को प्राप्त करना प्रगतिशील मानवी जीवन की सबसे उत्कृष्ट उपलब्धि बतलाई है, वह इस जीवन से विलग किसी अन्य क्षेत्र की गतिविधि नहीं<strong>।</strong> यथार्थ में गीता-प्रतिपादित अध्यात्म मानवी-जीवन का ही विषय है और उसी का अंग है<strong>।</strong> वह संसार के व्यवहार से सम्बन्धित है<strong>।</strong> वह व्यक्तिगत व सामाजिक व्यवहार शुद्धि पर अवलम्बित है<strong>।</strong> आसुरी वृत्ति का त्याग और सात्त्विकता का अर्जन उस मार्ग के दिशा-सूचक संकेत-चिन्ह हैं<strong>।</strong></p> <p>यह पुस्तक पश्चिम के प्रभावस्वरूप भारत में कृष्ण को लेकर प्रचलित उन धारणाओं का खंडन करती है</p> <p>जो कृष्ण की ऐतिहासिकता और गुण-सम्पन्नता को क्षतिग्रस्त करने का प्रयास करती है<strong>।</strong> कृष्ण के सन्दर्भ में प्रक्षेपित संशयों का निराकरण करते हुए विद्वान लेखक इस पुस्तक में कृष्ण की नितान्त आधुनिक और समीचीन व्याख्या प्रस्तुत करते हैं और अकाट्य तथा प्रखर तर्कों के आधार पर एक सम्पूर्ण कृष्ण-छवि की रचना करते हैं<strong>।</strong>
Read moreAbout the Book
व्यासदेव प्रणीत ‘महाभारत’ ग्रन्थ में भारत के राष्ट्रीय युग-परिवर्तन का इतिहास है। वह उस दीप-स्तम्भ के समान है, जिसके प्रकाश में अतीत की चित्रावली के साथ-साथ युग-क्रान्ति के पश्चात् स्थापित होनेवाली नवीन राजसत्ता, समाज और व्यक्ति के नवीन रूप, नवीन उत्साह और नवीन आकांक्षाओं की भी झलक प्राप्त होती है। यद्यपि उस ग्रन्थ में कौरव-पांडवों के भीषण युद्ध का वर्णन है, परन्तु रचना के मूल नायक कृष्ण हैं।</p>
<p>कृष्ण के जिन स्वरूपों का उक्त ग्रन्थ में उद्घाटन हुआ है, उनमें युग-पुरुष, विभूति, तत्त्वज्ञ तथा पूर्णावतार मुख्य हैं<strong>।</strong> यदि कृष्ण के अवतार रूप को वादग्रस्त भी मान लिया जाए तब भी उनके शेष तीन रूप ही उन्हें मानवेतर या महामानव के पद पर आसीन करने को पर्याप्त हैं<strong>।</strong> उनका चरित्र इतना विशाल और गूढ़ है कि उसका पूर्ण दर्शन सम्भव नहीं<strong>।</strong> मानवीय जीवन का कोई भी पक्ष ऐसा नहीं जो उनके क्रियात्मक रूप से अछूता बचा हो<strong>।</strong> प्रथम रूप में वे अपने युग के नरोत्तम, दूसरे में महामानव और तीसरे में जगद्गुरु हैं<strong>।</strong> इन सब कारणों से वे पूर्ण पुरुष कहे व माने जाते हैं<strong>।</strong> योगेश्वर कृष्ण ने जिस अध्यात्म की चर्चा की तथा जिस स्थिति को प्राप्त करना प्रगतिशील मानवी जीवन की सबसे उत्कृष्ट उपलब्धि बतलाई है, वह इस जीवन से विलग किसी अन्य क्षेत्र की गतिविधि नहीं<strong>।</strong> यथार्थ में गीता-प्रतिपादित अध्यात्म मानवी-जीवन का ही विषय है और उसी का अंग है<strong>।</strong> वह संसार के व्यवहार से सम्बन्धित है<strong>।</strong> वह व्यक्तिगत व सामाजिक व्यवहार शुद्धि पर अवलम्बित है<strong>।</strong> आसुरी वृत्ति का त्याग और सात्त्विकता का अर्जन उस मार्ग के दिशा-सूचक संकेत-चिन्ह हैं<strong>।</strong></p>
<p>यह पुस्तक पश्चिम के प्रभावस्वरूप भारत में कृष्ण को लेकर प्रचलित उन धारणाओं का खंडन करती है</p>
<p>जो कृष्ण की ऐतिहासिकता और गुण-सम्पन्नता को क्षतिग्रस्त करने का प्रयास करती है<strong>।</strong> कृष्ण के सन्दर्भ में प्रक्षेपित संशयों का निराकरण करते हुए विद्वान लेखक इस पुस्तक में कृष्ण की नितान्त आधुनिक और समीचीन व्याख्या प्रस्तुत करते हैं और अकाट्य तथा प्रखर तर्कों के आधार पर एक सम्पूर्ण कृष्ण-छवि की रचना करते हैं<strong>।</strong>
Book Details
-
ISBN9788180319570
-
Pages304
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Nath Sampraday
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
- Book Type:

- Description: र्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ऐसे वांड़्मय-पुरुष हैं जिनका संस्कृत मुख है, प्राकृत बाहु है, अपभ्रंश जघन है और हिन्दी पाद है। नाथ सिद्धों और अपभ्रंश साहित्य पर उनके शोधपरक निबन्ध पढ़ते समय मन की आँखों के सामने उनका यह रूप साकार हो उठता है। ‘नाथ सम्प्रदाय’ में गुरु गोरखनाथ के लोक-संपृक्त स्वरूप का उद्घाटन किया गया है। स्वयं द्विवेदी जी के शब्दों में 'गोरखनाथ ने निर्मम हथौड़े की चोट से साधु और गृहस्थ दोनों की कुरीतियों को चूर्ण-विचूर्ण कर दिया। लोकजीवन में जो धार्मिक चेतना पूर्ववर्ती सिद्धों से आकर उसके पारमार्थिक उद्देश्य से विमुख हो रही थी, उसे गोरखनाथ ने नई प्राणशक्ति से अनुप्राणित किय
Vishnu Purana
- Author Name:
Bibek Debroy
- Rating:
- Book Type:

- Description: The Vishnu Purana is part of a series of eighteen sacred Hindu texts known collectively as the Puranas. It occupies a prominent position among the ancient Vaishnava Puranas which recount tales of creation and the many incarnations of Lord Vishnu. It describes the four classes of society, the four stages of life, and key astronomical concepts related to Hinduism. Brimming with insight and told with clarity, this translation of the Vishnu Purana by Bibek Debroy presents readers with an opportunity to truly understand the classical Indian mythic texts. Debroy has previously translated the Bhagavata Purana, the Markandeya Purana, and the Brahma Purana.
MadhyaKalin Dharm-Sadhna
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
- Book Type:

- Description: ्यकालीन धर्म-साधना' यद्यपि भिन्न-भिन्न अवसर पर लिखे गये निबन्धों का संग्रह ही है, तथापि आचार्य द्विवेदी जी ने प्रयत्न किया है कि ये लेख परस्पर विच्छिन और असम्बद्ध न रहें और पाठकों को मध्यकालीन धर्म-साधनाओं का संक्षिप्त और धारावाहिक परिचय प्राप्त हो जाए। दो प्रकार के साहित्य से इन धर्म-सानाओं का परिचय संग्रह किया गया है— (1) विभिन्न सम्प्रदायों के साधना-विषयक और सिद्धान्त-विषयक ग्रन्थ; और (2) साधारण काव्य-साहित्य। इस प्रकार पुस्तक में आलोचित अधिकांश धर्म-साधनाएँ शास्त्रीय रूप में ही आई हैं। जिन सम्प्रदायों के कोई धर्म-ग्रन्थ प्राप्त नहीं हैं या जो धर्म-साधनाएँ साधारण काव्य-साहित्य में नहीं आ सकी हैं, वे छूट गई हैं। हमारे देश की धर्म-साधना का इतिहास बहुत विपुल है। विभिन्न युग की सामाजिक स्थितियों से भी इसका सम्बन्ध है। फलस्वरूप इस पुस्तक में प्रयत्न किया गया है कि उत्तर भारत की प्रधान धर्म-साधनाएँ यथासम्भव विवेचित हो जाएँ और उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि का भी सामान्य परिचय पाठक को मिल जा
Tulsi Dohawali
- Author Name:
Raghav 'Raghu'
- Book Type:

- Description: "हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास को उत्तर भारत के घर-घर में अकूत सम्मान प्राप्त है। राम की अनन्य भक्ति ने उनका पूरा जीवन राममय कर दिया था। हालाँकि उनका आरंभिक जीवन बड़ा कष्टपूर्ण बीता, अल्पायु में माता के निधन ने उन्हें अनाथ कर दिया। उन्हें भिक्षाटन करके जीवन-यापन करना पड़ा। धीरे-धीरे वह भगवान् श्रीराम की भक्ति की ओर आकृष्ट हुए। हनुमानजी की कृपा से उन्हें राम-लक्ष्मण के साक्षात् दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने ‘रामचरितमानस’ की रचना आरंभ की। ‘रामलला नहछू’, ‘जानकीमंगल’, ‘पार्वती मंगल’, ‘कवितावली’, ‘गीतावली’, ‘विनयपत्रिका’, ‘कृष्ण गीतावली’, ‘सतसई दोहावली’, ‘हनुमान बाहुक’ आदि उनके प्रसिद्ध ग्रंथ हैं। यह पुस्तक उन्हीं तुलसी को समर्पित है, जो अपनी रचनाओं द्वारा हमारा मार्गदर्शन करते हैं, हमें सामाजिक व आध्यात्मिक रूप से श्रेष्ठ बनने की शिक्षा देते हैं। तुलसी की वाणी, उनकी रचनाएँ मन को छू लेनेवाली हैं; हमें मार्ग दिखानेवाली हैं। इनका संदेश हमारा पाथेय है।"
Ramayan Ki Kahani, Vigyan Ki Zubani
- Author Name:
Saroj Bala
- Book Type:

- Description: This Book Doesn't have a Description.
Hadapada Appanna-Lingam
- Author Name:
Kashinath Ambalge
- Book Type:

-
Description:
ध्यान करना चाहूँ तो क्या ध्यान करूँ।
मन तेजोहीन धुँधला पड़ गया था, तन शून्य हो गया था।
कायक गुण गल चुका। देह से अहं मिट गया था।
अपने आपसे प्रकाश में झूमते मैं सुखी बनी
अप्पण्णाप्रिय चन्नबसवण्णा॥
मन याद कर रहा है।
बुरी विषय वासना की ओर मन बहक रहा है।
डाली की चोटी की ओर जा रहा है मन
मन किसी भी नियम में बँधता नहीं,
छोड़ देने पर मन जाता भी नहीं।
अपनी इच्छा पर मनमानी करते मन को नियम में बाँधकर
लक्ष्य में स्थिर करके शून्य में विहरनेवाले
शरणों के चरणों में मैं समा रही
अप्पण्णाप्रिय चन्नबसवण्णा॥
—लिंगम्मा
घास-फूस-कचरा निकालकर स्वच्छ किए
हुए खेत में कूड़ा-करकट बोनेवाले पागलों की तरह
विषय-सुखों के झूठे भ्रम में लोलुप होकर
तकलीफ़ में पड़नेवाले मनुष्य कैसे जान सकते
महाघन गुरु के स्वरूप को?
मरण बाधा में पड़नेवाले आपको कैसे जान सकते हैं
बसवप्रिय कूडल चन्नबसवण्णा? ॥
भूख मिटाने अन्न स्वीकार करते हैं,
विषय के मोह में झूठ बोलते हैं,
नए-नए व्यसन में पड़कर
भस्म धारण करके सारा विश्व घूमते हैं।
इस मिथ्या को छोड़कर, माया के धुँधलेपन को दूर किए बिना
नहीं समा सकता हमारा बसवप्रिय कूडल चन्नबसवण्णा॥
—अप्पण्णा
Rigved : Mandal-10 Purvardh
- Author Name:
Govind Chandra Pandey
- Book Type:

-
Description:
वेद सनातनविद्या के काव्यात्मक प्रतिपादन हैं। ऋग्वेद संहिता के अनुवाद एवं व्याख्या का प्रयास अनेक भाषाओं में समय-समय पर होता रहा है, किन्तु अभी तक उपलब्ध सभी अनुवादों में काव्यपक्ष की उपेक्षा अथवा पद्यानुवाद की प्रस्तुति के असम्भव प्रयास ही किए गए हैं जो ऋचाओं के साथ पूरा न्याय नहीं करते हैं। वेदों में भावों की सनातनता एक व्यापक ध्वनि के रूप में सूक्तों, संवादों और आख्यानों में विद्यमान है। प्रस्तुत अनुवाद में पादानुसारी किन्तु भावपरक अनुवाद पर विशेष आग्रह सोद्देश्य है ताकि ऋचाओं की काव्यात्मकता का यथासम्भव सम्प्रेषण एवं मूल की अर्थयोजना का क्रम अनुवाद में सुरक्षित रहे।
भाषान्तर में व्याख्या का सूक्ष्म प्रकार अनिवार्य होता है और वही अनुवाद का वर्तमान और अतीत के मध्य संवाद बनाकर बहुत कुछ को परम्परा में जीवित तथा प्रगतिशील रखता है। अतः ग्रन्थ में अनुवाद के लिए उपयुक्त भाषा, पुरातन ध्वनि बहुलता और समसामयिक सजीवता के संरक्षण की दृष्टि से तत्सम, तद्भव एवं देशी शब्दों के समन्वित प्रयोग किए गए हैं। साथ ही, गम्भीर और बहुमुखी अर्थों को स्पष्ट करने के लिए क्रियापदों के अनुवाद, दुरूह पदों के अर्थनिर्वचन में धातुपाठ, निरुक्त की पद्धति एवं आधुनिक तथा तुलनात्मक व्याकरण के अनुसरण से सहायता ली गई है।
वेद आर्षकाव्य के निर्देशन के साथ-साथ अध्यात्मगवेषियों के मार्गदर्शक भी हैं। अतः ऋचाओं में संश्लिष्ट आधियाज्ञिक, आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक अर्थों को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है। व्याख्याकारों में जहाँ विवाद की स्थिति है, वहाँ प्राचीन एवं नवीन दोनों ही मतों का विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार काव्यात्मक पक्ष की प्रस्तुति, निगूढ़ अर्थ के आयामों का विश्लेषण और विवादित स्थलों का तुलनात्मक विवेचन इस ग्रन्थ के अनुवाद एवं व्याख्या की अभीप्सित विशेषताएँ हैं।
इस खंड में ‘ऋग्वेद’ के दसवें मंडल (पूर्वार्द्ध) का व्याख्या सहित हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया गया है।
Hindutwa Aur Uttar-Aadhunikta
- Author Name:
Sudhish Pachauri
- Book Type:

-
Description:
किसी दैनिक कमेंट्री की तरह लिखी गई ये टिप्पणियाँ उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श का रेखांकन करने और उसके समस्या-बिन्दुओं को खोलने की प्रक्रिया में लिखी जाती रही हैं। उत्तर-आधुनिक विमर्श और उत्तर-संरचनावादी पाठ-प्रविधि के बिना उत्तर-औपनिवेशिकता की इस गुत्थी को नहीं खोला जा सकता। यहाँ हिन्दुत्व के द्वारा चयनित और सक्रिय किए गए नाना प्रकार के धार्मिक और सांस्कृतिक चिन्हों को पढ़ा गया है। वे इस लेखक के लिए ‘षड्यंत्र’ नहीं हैं, उत्तर-औपनिवेशिक एजेंडे और सत्तामूलक विमर्श के परिणाम हैं जिनकी कुल माँग आधुनिकता का एक सकलतावादी एजेंडा है। सती-दहन से लेकर अणुबम फोड़ने तक, मस्जिद के विध्वंस से लेकर मन्दिर निर्माण तक हर बात पर स्वदेशी एजेंडे की वकालत, पिछले दशकों के वे राजनीतिक-सांस्कृतिक समुच्चय हैं जो प्रचलित सेकुलर समीक्षा की मुठभेड़ों से परे और महफ़ूज़ ही रहे आए हैं। इसका कारण हिन्दुत्व शक्तियों द्वारा पैदा किए गए ‘प्रस्थापना परिवर्तन’ हैं, सेकुलर विमर्श जिन्हें समझने में कई बार नाकाम रहता है। उसे अगर कोई प्रस्थापनाएँ समस्याग्रस्त करती हैं तो लेट-कैपिटलिज़्म के द्वारा पैदा की गई उत्तर-आधुनिक प्रस्थापनाएँ हैं। उत्तर-आधुनिकता के समय में हिन्दुत्व एक ‘अ-सम्भावना’ ही है।
भारत जैसे समाजों के सन्दर्भ में उत्तर-आधुनिकता की भूमिका नए पूँजीवाद की भूमिका की तरह द्वन्द्वात्मकता से युक्त है क्योंकि उसमें लेट-कैपिटलिज़्म का द्वन्द्ववाद सक्रिय है। यही इस लेखक की उत्तर-आधुनिकता की अपने ढंग की उत्तर-मार्क्सवादी पाठ-प्रविधि है जो उत्तर-औपनिवेशिक एजेंडे के आगे उत्तर-आधुनिकता से फिर-फिर टकराती है और हिन्दुत्व के सकलतावाद के एकार्थवादी तत्त्व के बरक्स उत्तर-आधुनिकता के बहुलवाद के तत्त्व को अल्पवाद के हाशियावाद के विमर्श में उपयोगी पाती है और साथ ही एक समकालीन ‘कल्चर टर्न’ को पढ़ते हुए उपभोक्तावाद और पॉपुलर कल्चर में इस उत्तर-औपनिवेशिक तत्त्ववाद के सकंट को गहराता देखती है।
यह किताब हिन्दुत्व के अन्तरंग संकटों के इशारे देती है। यह हिन्दुत्व की समकालीन मार्केटिंग में निहित है। यह उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श का उत्तर-आधुनिक ग्लोबल मंडली में बैठना भर है। इस मार्केटिंग के खेल को पुराने सेकुलर विमर्श की प्रस्थापनाओं से नहीं समझा जा सकता। बिन लादेनी ब्रांड का इस्लाम पहले इसी बाज़ार के लिए बना था, अब उसे उसी बाज़ार ने तोड़ा है। हिन्दुत्व की अन्तिम हद अगर कुछ है तो तालिबानीकरण है और वही उसकी समाधि भी है।
May Be We'll All Go Mad
- Author Name:
Ulla Berkewicz
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Sai Ki Seva Mein
- Author Name:
Dr. Suresh Haware
- Book Type:

- Description: साईं की सेवा करने का मुझे अवसर मिला, यह मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा ईश्वरीय आशीर्वाद है, ऐसी मेरे मन की प्रामाणिक भावना है। इस कालावधि में मेरी जिंदगी पूरी तरह से बदल गई। मैं शिरडी कभी आता नहीं था, लेकिन इस पूरे कार्यकाल में मैं शिरडी के सिवाय कहीं जाता ही नहीं था। साईं बाबा का पहले कभी विचार करता नहीं था। लेकिन इस दौरान साईं के सिवाय कोई दूसरा विचार ही नहीं किया। पैर अपने आप शिरडी की ओर खिंचे चले आते थे।
Tere Dar Pe : Bhakti Ke Naye Drishtikon
- Author Name:
Rajesh P Meshwari
- Book Type:

- Description: हर प्राणी का अपना धर्म होता है। उसका मूल स्वभाव होता है। जैसे किसी विषैले जीव का धर्म है काटना या विष वमन करना। मनुष्य का धर्म है—करुणा और क्षमा। संस्कृति हमें यही सिखाती है कि हम जगत् के समस्त प्राणियों से करुणा करें, उन्हें क्षमा करें। यदि किसी विषैले जीव को भी हम मारते हैं, तो यह हमारे धर्म के प्रतिकूल है। वह हमारा धर्म नहीं है। हमारी असल परीक्षा ऐसे ही अवसरों पर होती है। हम अपने शत्रुओं के प्रति भी शुभकामनाओं से भरे हों और यथासम्भव करुणा और क्षमा के मार्ग का ही अनुसरण करें। इन श्रेष्ठतम मानवीय गुणों का पक्ष इतिहास में हर प्रबुद्ध और जाग्रत मनीषी ने लिया है।
Hindu Hone Ka Dharma
- Author Name:
Prabhash Joshi
- Book Type:

-
Description:
अपने सुदीर्घ पत्रकार जीवन में प्रभाष जोशी का लेखन लोक के विवेक को रेखांकित करने और जहाँ वह मंद पड़ा हो वहाँ उसे पुनर्जाग्रत करने का लेखन रहा है। ज़्यादातर हिन्दी समाज से संवाद करती उनकी पत्रकारिता एक ओर सत्ता-राजनीति से सीधी बहस में उतरती है और दूसरी ओर समाज, संस्कृति, पर्यावरण, संगीत और खेल की मार्फ़त समग्र जीवन-मूल्यों की खोज करती है। प्रभाष जोशी के सम्पादन में 1983 में प्रकाशित दैनिक ‘जनसत्ता’ एक बड़ी घटना थी जिसने ‘सबकी ख़बर लेने’ के साहस और ‘सबको ख़बर देने’ की प्रतिबद्धता के साथ पत्रकारिता के इकहरे विन्यास को, उसके सत्ता-केन्द्रित स्वरूप को तोड़ते हुए उसे लोकधर्मी बनाने की पहल की। क़रीब दस वर्ष बाद 1992 में जब हिन्दू समाज से उभरे कुछ विकृत और उन्मादी तत्त्वों ने अपनी साम्प्रदायिक-नकारात्मक प्रवृत्तियों के चरम के रूप में अयोध्या की बाबरी मस्जिद का ध्वंस किया तो प्रभाष जोशी उन चुनिंदा लेखकों-पत्रकारों में अग्रणी थे जिन्होंने हमारे सर्वग्राही धर्म और उदार-सहिष्णु-सामासिक संस्कृति के साथ हुए इस दुष्कृत्य का विरोध किया। ऐसे समय में जब ज़्यादातर हिन्दी मीडिया साम्प्रदायिकता के आक्रमण के आगे घुटने टेक रहा था या हक्का-बक्का था तो प्रभाष जोशी ने गांधी विचार के आलोक में जिस वैचारिक संघर्ष की शुरुआत की, वह भी ‘जनसत्ता’ के प्रकाशन जैसी ही एक घटना थी।
‘हिन्दू होने का धर्म’ बाबरी ध्वंस के बाद और गुजरात नरसंहार तक ‘जनसत्ता’ में लिखे गए प्रभाष जोशी के सैकड़ों लेखों-स्तम्भों में से एक चयन है जिसके फ़ोकस में संघ परिवार के साम्प्रदायिक हिन्दुत्व के विपरीत हिन्दू होने का वह मर्म है जो हमारी वास्तविक परम्परा और समाज के मूल्यों को निर्मित करता आया है और महात्मा गांधी जिसके सबसे बड़े प्रतीक-व्यक्तित्व थे। साम्प्रदायिक तत्त्वों और छद्म राष्ट्रवाद के विभिन्न मुखोशों और दशाननों को उधेड़ती ये टिप्पणियाँ हमारे आसपास बनाए जा रहे एक बुरे या निकृष्ट हिन्दू से जिरह करती हुई उसकी जगह एक अच्छे, सच्चे और नैतिक हिन्दू को प्रतिष्ठित करती हैं और यह सिद्ध करती हैं कि हिन्दुत्व की संघ परिवारी परिभाषाएँ व्यापक हिन्दू समाज में पूरी तरह अमान्य हैं। आज़ादी की लड़ाई के समय से ही हमारे देश में ‘गांधी जीतेंगे या गोडसे’ की बहस चलती रही है और उसे भी इन लेखों में बहस का विषय बनाया गया है। ख़ास बात यह है कि प्रभाष जोशी अपना वैचारिक विमर्श और अलख हिन्दुत्व के ही मोर्चे पर चलाए और जगाए रहते हैं जिससे उनके तर्क और निष्कर्ष ज़्यादा विश्वसनीय और कारगर हो उठते हैं और इस काम में हमारा पारम्परिक लोक-विवेक और धर्म उनकी मदद करता चलता है।
Cosmic Vedic Technology
- Author Name:
Dr.Sanjay Rout
- Book Type:

- Description: Cosmic Vedic Technology is a book that will help you to understand the relationship between your mind and body, as well as the role of cosmic energy in your life. It will show you how to use these principles to improve your health, wealth, and relationships.
Nanak Vani
- Author Name:
Jairam Mishra
- Book Type:

-
Description:
नानक वाणी में धार्मिक, लौकिक और लौकिक-धार्मिक काव्य का सहज समन्वय है। इसमें कर्ममार्ग, योगमार्ग, भक्तिमार्ग और ज्ञानमार्ग का विशद निरूपण है। नानक वाणी में शान्त, शृंगार, करुण, वीर, हास्य आदि रसों का अद्भुत परिपाक है। उनका प्रकृति चित्रण अत्यन्त मोहक और आकर्षक है। उनकी भाषा पूर्वी पंजाबी है, परन्तु उसमें ब्रजभाषा और खड़ी बोली का भी पुट है। मुहावरों और कहावतों का प्रचुर प्रयोग है। नानक के अनुसार परमात्मा एक है वह कर्तार है, वह भय से रहित है, बैर से रहित है, मूर्तिमान है, काल से रहित है, योनि के अन्तर्गत नहीं आता। नानक वाणी में जहाँ एक ओर गुरु गाम्भीर्य और ज्ञान-वैराग्य भक्ति का अमृत मन्थन है वहाँ उनकी भाषा में अद्भुत ओज और भक्ति है। उनकी रचना-शैली में काव्य का लालित्य, माधुर्य, विचार सम्पन्नता सब कुछ है। नानक वाणी हृदय और मस्तिष्क को स्पर्श ही नहीं करती प्रत्युत उन्हें अनुप्राणित भी करती है।
नानक वाणी में उन्नीस राग प्रयुक्त हुए हैं : राग श्री, माझ, गौरी, आसा, गुजरी, वडहंस, सोरठि, धनासिरी, तिलंग, सूही, बिलावल, रामकली, मारू, दुखारी, भैरउ, बसंत, सागर, मलार तथा प्रभाती। नानक वाणी संगीतमय है, विचारोत्तेजक है। नानक वाणी का यह संस्करण अपनी विशद् सारगर्भित भूमिका के कारण अधिक सुबोध और उपयोगी हो गया है। श्रीगुरु नानक देव की सम्पूर्ण वाणी का यह मूल्यवान संग्रह उनके सभी भक्तों और प्रेमियों के पास अवश्य होना चाहिए।
Sriramcharit Manas : Pancham Sopan Sundarkand
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh
- Book Type:

-
Description:
तुलसी कृत सुन्दरकांड के कथा नायक हनुमान हैं, परन्तु वह लगते नहीं। कवि सुन्दरकांड के माध्यम से श्रीराम के माहात्म्य, उनके प्रति भक्ति तथा प्रपत्ति एवं शरणागति भाव को व्यंजित करना चाहता है। इस दृष्टि से, सुन्दरकांड में आए हनुमान, सीता, रावण एवं विभीषण के चरित्रों का तुलनात्मक अध्ययन करें तो विभीषण का स्थान सर्वोपरि है। सुन्दरकांड के इस विभीषण का चरित्र ऐतिहासिक नहीं, स्वयं तुलसीदास का अपना निजी भोगा हुआ उपेक्षित व्यक्तित्व है। विभीषण एवं तुलसी दोनों श्रीराम की शरणागति में ही जीवन की सार्थकता प्राप्त करते हैं। यदि और स्पष्ट ढंग से कहना चाहें तो यह भी कह सकते हैं कि इस विभीषण का पर्याय तुलसीयुगीन सम्पूर्ण निराश्रित जनसमूह है।
तुलसी सुन्दरकांड में विभीषण का विद्रावक तथा संवेदनशील व्यक्तित्व निर्मित करके इस कथा का मुख ग़रीब एवं असहाय जनता की ओर मोड़ देते हैं। इसीलिए, इस सुन्दरकांड में कवि अपनी सम्पूर्ण रचनात्मक ऊर्जा न हनुमान की शक्ति एवं बल से सम्बद्ध करता है, न रावण के प्रति अन्याय और आक्रोश में लगाता है, साथ ही, उसे न वह श्रीराम की प्राणप्रिया सीता की विरह पीड़ा से ही जोड़ता है; वह पूरी तरह से सजग तथा संवेदनशील होकर आश्रयविहीन विभीषण को अपना भावात्मक समर्पण देकर उसे सार्थक बनाने की चेष्टा करता है। इस सुन्दरकांड के कवि तथा उसकी कविता की यही भव्यता है।
Temple Management
- Author Name:
Dr. Suresh Haware
- Book Type:

- Description: India has a rich and diverse culture, with its different rituals, practices and customs. The temples all across the country are testimony to such diverse rituals. India has around 30 lakh temples. It has a potential to bring socio-economic transformation in India. The book is a documentation to this effect on a very novel subject of temple management. The scientific approach, the service mind and the management skills have the potential to change the scenario of the temples in India. Dr. Suresh Haware being a senior nuclear scientist and a successful businessman besides serving as chairman of Sri Sai Baba temple located at Shirdi, has penned down his experiences and his prospective plans on managing the temples. The temples possess a huge potential for employment generation that has not yet been harnessed. Institutions could carve out professional courses in the subject to make suitable manpower available for managing the temples effectively. This book is of interest to and will attract the attention of professionals towards this necessity. It will provide a spark to many minds from the business, industry, religion and institutions so as to attract many souls to the innovative subject of temple management. Temple management will then make a difference.
Chitt Basain Mahaveer : Jivan Aur Darshan
- Author Name:
Prem Suman Jain
- Book Type:

- Description: विश्व के साधक चिन्तकों में जैन दार्शनिक एवं तीर्थंकर कई दृष्टियों से स्मरण किए जाते हैं। उनका चिन्तन धर्म, जाति, देशकाल को गहरे प्रभावित करता है। उन्होंने प्राणीमात्र के कल्याण एवं विकास के सूत्र अपने उद्बोधनों में प्रदान किए हैं। भगवान महावीर का सन्देश है कि सुख, शान्ति, तनावरहित जीवन अपरिग्रह, सन्तोष, संयम से ही आ सकता है। तीर्थंकर महावीर ने अपने जीवन में व्यक्तिगत स्वामित्व के विसर्जन का प्रयोग करके बताया है। उन्होंने राज्यपद को त्यागा और पदार्थों के ढेर से अलग जा खड़े हुए, तब वे समता और शान्ति के स्वामी बने भगवान महावीर ने व्यक्ति के पूर्ण विकास के लिए एक ओर जहाँ आत्म-विकास का पथ प्रशस्त किया है, वहीं दूसरी ओर लोक-कल्याण के लिए सामाजिक मूल्यों का भी सृजन किया है। अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकान्त—ये तीनों मूल्य महावीर के सामाजिक अनुसन्धान के परिणाम हैं। तीर्थंकर महावीर के चिन्तन ने व्यक्ति को पुरुषार्थी और स्वावलम्बी बनने की शिक्षा दी है। उन्होंने मानव को सहिष्णु, निराग्रही होने का भी सन्देश दिया है। विचारों की उदारता से ही हम सत्य की तह तक पहुँच सकते हैं। तीर्थंकर महावीर का सारा जीवन आत्म-साधना के पश्चात् सामाजिक और नैतिक मूल्यों के निर्माण में ही व्यतीत हुआ। इसी कारण तीर्थंकर महावीर मानव जाति के गौरव के रूप में प्रतिष्ठित हुए। ‘चित्त बसें महावीर’ पुस्तक में प्रो. प्रेम सुमन जैन ने तीर्थंकर महावीर के प्रेरणादायक जीवन और दर्शन को एक रोचक शैली में प्रस्तुत किया है। एक महत्त्वपूर्ण और संग्रहणीय कृति।
Awadh Ke Pramukh Vrat-Parva-Tyohar Evam Riti-Rivaj
- Author Name:
Dr. Vidya Vindu Singh
- Book Type:

-
Description:
हमारा भारतवर्ष मुख्य रूप से कथा धर्मी देश है। तप-साधना से तो नव-नव ज्ञान की सूझें मिलती ही हैं पर चित्त की रस तृप्ति द्वारा प्रेरित संरचनात्मक धर्मिता से भी हमारे देश ने कुछ कम उपलब्धियाँ नहीं पाईं। इस बात को मैं बार-बार कहते हुए भी नही अघाता हूँ कि मुख्य रूप से भारत ही एक ऐसा देश है जिसने पुराण कथाओं के संग्रह और भारत जैसे आसमुद्र हिमालय वाले महादेश में वैष्णवधर्मी एक राष्ट्रीयता का निर्माण करने के लिए नैमिषारण्य में कथा यूनिवर्सिटी बनाई थी।
लोक साहित्य-संगीत और कला में गहन रुचि रखने के साथ ही डॉ. विद्या विन्दु सिंह स्वयं भी कथाएँ लिखती हैं। कामना करता हूँ कि विदुषी लेखिका का कर्म और यश उत्तरोत्तर वर्द्धमान हो।
—अमृतलाल नागर
Shri Ramcharitmanas (Pramanik Path Tatha Teeka)
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh
- Book Type:

- Description: ‘श्रीरामचरितमानस’ भारतीय संस्कारों का श्रेष्ठतम महाकाव्य है। भारतीय संस्कार का अर्थ है, समग्र मानव जाति के निखिल मंगल, कल्याण एवं हितैषिता के प्रति समर्पित होकर प्रेम, स्नेह, उदारता, ममता, सहिष्णुता, दया, अस्तित्व, अहिंसा, सत्य, परोपकार आदि मूल्यों की प्रतिष्ठा करना। इस प्रकार, मानस मानव अस्तित्व को सर्वोपरि मानकर उसके लिए सबसे सुलभ, सर्वाधिक सुगम तथा श्रेयस्कर मार्ग की तलाश की छटपटाहट से संयुक्त है। समाज के सर्वोच्च शुभ की प्रतिष्ठा ही मानसकार तुलसी का महत्तम शुभ है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानवीय अस्तित्व की सार्थकता के लिए जिस भव्यतम शुभ का दर्शन किया है, मानस की कविता के विविध पात्रों द्वारा उसे जिस प्रकार व्यंजित किया है तथा नैतिक मंगल के सर्वोच्च मूल्य श्रीराम और उनके ठीक विपरीत गर्हित अशुभ एवं अधर्म के प्रतीक रावण को आमने-सामने रखकर जिस मानवीय शुभ की स्थापना की है—उसकी चरम परिणति असत्य पर सत्य की विजय, अशुभ पर शुभ की स्थापना, क्रूरता पर प्रेम तथा दया का प्रसार, प्रपंच तथा छल पर मानवीय सहजता की छाया की स्थापना में होती है। इस सृष्टि पर जब तक मानव जाति रहेगी, अपनी सांस्कृतिक धरोहर सत्य, प्रेम, दया, उदारता आदि श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों से सम्पृक्त ‘श्रीरामचरितमानस’ जैसे काव्य की रक्षा करती रहेगी। इस प्रकार ‘श्रीरामचरितमानस’ निखिल मानव जाति की सनातन धरोहर है और इस टीका का मन्तव्य है—उसकी इस अमूल्य तथा परम शुभमयी धरोहर से उसे बराबर परिचित कराते रहना।
Devtulya Nastik
- Author Name:
Arun Bhole
- Book Type:

-
Description:
धर्म, दर्शन और विज्ञान अपने-अपने तरीक़े से सत्य और ज्ञान की खोज करते रहते हैं। स्थूल रूप से इनकी चेष्टाएँ विरोधी प्रतीत हो सकती हैं, लेकिन गहरे मन्तव्यों में लक्ष्य एक ही है। आस्तिक और नास्तिक केवल व्यावहारिक विभाजन हैं—प्रक्रिया की भिन्नता के कारण।
‘देवतुल्य नास्तिक’ पुस्तक में अरुण भोले कुछ विशिष्ट व्यक्तित्वों के माध्यम से जीवन के रहस्यों को जानने का प्रयास करते हैं। ‘ज्ञानपिपासु गौतम’, ‘अन्तर्मुखी विज्ञान’, ‘तटस्थ प्रकृति’, ‘वैज्ञानिक ज्ञान-मीमांसा’, ‘सन्देह और श्रद्धा के संगम’, ‘संवाद और सहयोग', 'जले दीप से दीप' तथा 'विज्ञान और नियति' शीर्षकों के अन्तर्गत लेखक ने सत्य और ज्ञान की खोज करनेवाले विश्वविख्यात व्यक्तित्वों का विश्लेषण किया है।
लेखक का उद्देश्य स्पष्ट है। वह चाहता है कि शक्तियों में समन्वय हो।
लेखक के शब्दों में : ‘अपने अन्वेषण और प्रयोगों से विज्ञान ने जो तथ्य बटोरे हैं, उन सबके आत्यन्तिक अर्थ क्या हैं तथा लोकमंगल की दृष्टि से उनका परम उपयोग क्या होगा, इसी का बोध ज्ञान माना जाएगा। वैसे ज्ञान के अभाव में अमर्यादित वैज्ञानिक जानकारियाँ हमें सर्वनाश की ओर ले जा सकती हैं। यही वह स्थल है जहाँ हमें धर्म और दर्शन की सहायता लेनी पड़ेगी; क्योंकि वैज्ञानिक भी मानते हैं कि जीवन को सँवारने और मानवीय भावनाओं को प्रभावित करने का अधिक अभ्यास और अनुभव दर्शन और धर्म को ही है।’
विश्व संस्कृति की अन्तर्धाराओं का प्रवाहपूर्ण, प्रामाणिक और सतर्क विश्लेषण।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book