Ramlila Ki Utpatti Tatha Vikas
(0)
Author:
Mohan Ram YadavPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
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राम के जीवन में भारतीय आदर्शों के चरम विकास के दर्शन होते हैं। भक्ति-सम्प्रदाय में वे भगवान के अवतार माने जाते हैं। अतः उनके चारित्रिक गुण एवं जीवन का ज्ञान बड़े उत्साह से प्राप्त किया जाता है। रामलीला का आयोजन भारत में तो अत्यन्त प्राचीन काल से होता ही रहा है, विदेशों में भी सहस्रों वर्षों से बसे भारतीय इसे अक्षुण्ण बनाए हुए हैं। इस प्रकार रामलीला ने विदेशों में स्थापित भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध को ऐसा दृढ़ बना दिया है कि सहस्रों वर्षों तक निरन्तर प्रयत्न करते रहने पर भी काल उसे नष्ट करने में समर्थ नहीं हो सका है। इसमें सांस्कृतिक जीवन की ऐसी महत्त्वपूर्ण झाँकी मिलती है जो इस युग में भी समस्त क्षेत्रों में मानव का पथ-प्रदर्शन करने में सर्वथा समर्थ है।</p> <p>देश के कोने-कोने में रामलीला के आयोजन की चर्चा अनेक धार्मिक तथा ऐतिहासिक ग्रन्थों में हुई। किन्तु किसी में उसका सम्यक् निरूपण प्राप्त नहीं होता। रामलीला का आयोजन प्रायः भक्ति-साधना के रूप में होता रहा है। अतएव भौतिकता से दूर रहनेवाले साधु-महात्मा इसके विश्लेषणात्मक इतिहास को धर्म-विरुद्ध समझ इससे दूर ही रहे। उन्हें तो रामलीला के दर्शन मात्र से प्रयोजन था। गोस्वामी जी राम का व्यापक प्रचार करना चाहते थे। उनके मत से तात्कालिक व्याधियों का सबसे बड़ा उपचार रामचरित था। जहाँ उन्होंने प्रचार के अनेक साधन अपनाए वहाँ मानस की रामलीला का आयोजन धूम-धाम से किया। रामलीला प्रचार का बड़ा उपयुक्त साधन है। कथा-वार्ता, मन्दिर या अखाड़ों में तो वह व्यक्ति जाता है जिसमें उस प्रकार की प्रवृत्ति रहती है, किन्तु रामलीला के कारण ऐसे जन भी उनकी ओर आकृष्ट होते हैं जिनकी सम्भावना नहीं की जाती। इसमें मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा भी मिलती हैं। प्रत्यक्ष दर्शन का प्रभाव श्रव्यकाव्य या उपदेश की अपेक्षा अधिक तथा स्थायी होता है।</p> <p>गोस्वामी जी के पूर्व से वाल्मीकीय ‘रामायण’ के अनुसार रामलीला होती थी। उसके प्रति जनता में आस्था भी थी। वाल्मीकीय ‘रामायण’ के निर्माण काल की सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक परिस्थिति तत्कालीन समय से भिन्न थी। वाल्मीकीय ‘रामायण’ के आधार पर होनेवाली रामलीला में धार्मिक भावना की प्रधानता थी। वह मुसलमानी शासन तथा इस्लाम धर्म के कारण उस युग में उपादेय सिद्ध नहीं हो सकती थी। गोस्वामी जी उसको नया तथा उपयोगी स्वरूप प्रदान करना चाहते थे। यह रामलीला का आन्दोलन था। रामलीला के आयोजन से जनता में नव-चेतना जग पड़ी। उनके सामने एक उदाहरण प्रत्यक्ष रूप में आ गया। राम की भाँति विपत्तियों में धैर्य रखने तथा पराक्रम द्वारा कार्य करने से राक्षसी प्रवृत्तियों का विनाश हो सकता है। भारतीय संस्कृति का मूर्त रूप पाकर जनता ने अपने हृदय का परिष्कार किया तथा चरित्र सुधारा। गोस्वामी जी की रामलीला की लहर सारे उत्तरी भारत में फैलती हुई दक्षिण में भी जा पहुँची। सारा देश राममय हो गया। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक तथा अटक से लेकर कटक तक रामलीला का आन्दोलन व्याप्त हो गया। इस क्षेत्र में गोस्वामी जी को अपूर्व सफलता मिली।
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राम के जीवन में भारतीय आदर्शों के चरम विकास के दर्शन होते हैं। भक्ति-सम्प्रदाय में वे भगवान के अवतार माने जाते हैं। अतः उनके चारित्रिक गुण एवं जीवन का ज्ञान बड़े उत्साह से प्राप्त किया जाता है। रामलीला का आयोजन भारत में तो अत्यन्त प्राचीन काल से होता ही रहा है, विदेशों में भी सहस्रों वर्षों से बसे भारतीय इसे अक्षुण्ण बनाए हुए हैं। इस प्रकार रामलीला ने विदेशों में स्थापित भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध को ऐसा दृढ़ बना दिया है कि सहस्रों वर्षों तक निरन्तर प्रयत्न करते रहने पर भी काल उसे नष्ट करने में समर्थ नहीं हो सका है। इसमें सांस्कृतिक जीवन की ऐसी महत्त्वपूर्ण झाँकी मिलती है जो इस युग में भी समस्त क्षेत्रों में मानव का पथ-प्रदर्शन करने में सर्वथा समर्थ है।</p>
<p>देश के कोने-कोने में रामलीला के आयोजन की चर्चा अनेक धार्मिक तथा ऐतिहासिक ग्रन्थों में हुई। किन्तु किसी में उसका सम्यक् निरूपण प्राप्त नहीं होता। रामलीला का आयोजन प्रायः भक्ति-साधना के रूप में होता रहा है। अतएव भौतिकता से दूर रहनेवाले साधु-महात्मा इसके विश्लेषणात्मक इतिहास को धर्म-विरुद्ध समझ इससे दूर ही रहे। उन्हें तो रामलीला के दर्शन मात्र से प्रयोजन था। गोस्वामी जी राम का व्यापक प्रचार करना चाहते थे। उनके मत से तात्कालिक व्याधियों का सबसे बड़ा उपचार रामचरित था। जहाँ उन्होंने प्रचार के अनेक साधन अपनाए वहाँ मानस की रामलीला का आयोजन धूम-धाम से किया। रामलीला प्रचार का बड़ा उपयुक्त साधन है। कथा-वार्ता, मन्दिर या अखाड़ों में तो वह व्यक्ति जाता है जिसमें उस प्रकार की प्रवृत्ति रहती है, किन्तु रामलीला के कारण ऐसे जन भी उनकी ओर आकृष्ट होते हैं जिनकी सम्भावना नहीं की जाती। इसमें मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा भी मिलती हैं। प्रत्यक्ष दर्शन का प्रभाव श्रव्यकाव्य या उपदेश की अपेक्षा अधिक तथा स्थायी होता है।</p>
<p>गोस्वामी जी के पूर्व से वाल्मीकीय ‘रामायण’ के अनुसार रामलीला होती थी। उसके प्रति जनता में आस्था भी थी। वाल्मीकीय ‘रामायण’ के निर्माण काल की सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक परिस्थिति तत्कालीन समय से भिन्न थी। वाल्मीकीय ‘रामायण’ के आधार पर होनेवाली रामलीला में धार्मिक भावना की प्रधानता थी। वह मुसलमानी शासन तथा इस्लाम धर्म के कारण उस युग में उपादेय सिद्ध नहीं हो सकती थी। गोस्वामी जी उसको नया तथा उपयोगी स्वरूप प्रदान करना चाहते थे। यह रामलीला का आन्दोलन था। रामलीला के आयोजन से जनता में नव-चेतना जग पड़ी। उनके सामने एक उदाहरण प्रत्यक्ष रूप में आ गया। राम की भाँति विपत्तियों में धैर्य रखने तथा पराक्रम द्वारा कार्य करने से राक्षसी प्रवृत्तियों का विनाश हो सकता है। भारतीय संस्कृति का मूर्त रूप पाकर जनता ने अपने हृदय का परिष्कार किया तथा चरित्र सुधारा। गोस्वामी जी की रामलीला की लहर सारे उत्तरी भारत में फैलती हुई दक्षिण में भी जा पहुँची। सारा देश राममय हो गया। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक तथा अटक से लेकर कटक तक रामलीला का आन्दोलन व्याप्त हो गया। इस क्षेत्र में गोस्वामी जी को अपूर्व सफलता मिली।
Book Details
-
ISBN9789352211685
-
Pages192
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: ज्ञान मनुष्य के लिए तभी सहायक होता है, जब वह अपने साथ-साथ समाज को ऊँचा उठाने का सामर्थ्य रखता हो और ब्रह्मज्ञान की सार्थकता तब होती है जब साधक अपने-आपको इतनी ऊँचाई तक ले जाए कि वह त्रिकालज्ञ बनाकर समाज को आत्मकल्याण के मार्ग में ले जाए। ब्रह्मज्ञानी के लोक और परलोक दोनों सुन्दर और सुखद हो जाते हैं, किन्तु ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना अत्यन्त दुष्कर कार्य है। यह अध्यात्म के रास्ते चलकर भक्ति और रोग के धर्म को स्वीकृति प्रदान करके, कठिन साधना द्वारा प्राप्त किया जा सकता। अनाहतनाद की साधना ऐसी ही कठिन तपस्या है जिसे स्मृति शर्मा ने अपने अगम्य कार्य निष्ठा व अटूट मेहनत से पूर्ण किया। अनाहतनाद से आज के संगीत का जन्म हुआ है। भारतीय संगीत केवल मनोविनोद का साधन न होकर आत्मा को परमात्मा से जोड़ने के भक्ति मार्ग का परम कल्याणकारी साधन है। 'आत्मबोध के आयाम’ रचना संगीत एवं अध्यात्म के पाठकों का पथ प्रशस्त करेगी। सुधीजन इससे निश्चित ही लाभान्वित होंगे।
Kashmir 370 Ke Sath Aur Baad (Hindi Translation of Valley of Red Snow)
- Author Name:
Jitendra Dixit
- Book Type:

- Description: 5 अगस्त, 2019 को जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा देनेवाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया गया था। जम्मू-कश्मीर अब एक केंद्र शासित प्रदेश है। कश्मीर की इस ऐतिहासिक घटना से पहले आजादी के बाद के सात दशकों में सिलसिलेवार अनेक राजनीतिक और सामाजिक घटनाएँ हुई थीं। किन ताकतों की वजह से अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की यह प्रक्रिया हुई? जम्मू-कश्मीर के लोगों पर इसके क्या परिणाम हुए? इस पर उनकी क्या प्रतिक्रिया थी? और सबसे महत्त्वपूर्ण बात, उनका भविष्य क्या है? वरिष्ठ पत्रकार जीतेंद्र दीक्षित लिखित ‘कश्मीर : 370 के साथ और बाद’ में इन सवालों के जवाब देने की कोशिश की गई है। साथ ही एक निष्पक्ष, सही-गलत का फैसला सुनाए बिना तमाम पहलुओं को शामिल करनेवाली कहानी पेश करने का प्रयास भी किया गया है। यह पुस्तक अनुच्छेद 370 हटने की ऐतिहासिक घटना से पहले के वर्षों की घटनाओं, अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के समय कश्मीर की तात्कालिक स्थिति का वर्णन करती है और अनेक साक्षात्कारों के जरिए घाटी में विभिन्न हितधारकों की आवाज आप तक पहुँचाती है। यह पिछले दशक के दौरान घाटी में होनेवाली महत्त्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन करती है, जिन्हें लेखक ने कश्मीर की धरती पर जाकर देखा। यही नहीं, यह ‘न्यू कश्मीर’ पर गहरी जानकारी भी देती है। जम्मू-कश्मीर के भविष्य में रुचि रखनेवाले इसे अवश्य पढ़ें।
Hindu Dharma Ki Dharohar : Bharatiya Sanskriti
- Author Name:
Sanjay Rai Sherpuria
- Book Type:

- Description: ‘हिंदू धर्म की धरोहरः भारतीय संस्कृति’ यह शीर्षक स्वयं में इस पुस्तक का समग्र परिचय करवा रहा है। सनातन हिंदू धर्म क्या है और किस प्रकार से यह भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि के रूप में निरंतर क्रियाशील है, यही तथ्य इस पुस्तक के आधार तत्व हैं। यज्ञ, हवन, शंख, पद्म, गाय, त्रिशूल, मंदिर, देवस्थान जैसे शब्द सनातन हिंदू वैदिक संस्कृति में ही हैं। ये केवल शब्द ही नहीं हैं बल्कि इन शब्दों के उच्चारण में ही ऐसा ध्वनित होता है कि जीवन और जीवन का रहस्य क्या है। हमारे देवी, देवता और धार्मिक प्रतीक क्या हैं? कैसे हैं? कितने महत्त्वपूर्ण हैं? क्यों हैं? स्वाभाविक है कि जिस प्रकार से समाज बदल रहा है और विश्व पटल पर अनेकानेक उपासना पद्धतियाँ जन्म ले रही हैं, ऐसे परिवेश में किसी को भी यदि हिंदू संस्कृति को जानना और समझना है तो संजय राय ‘शेरपुरिया’ की इस पुस्तक को अवश्य पढ़ना चाहिए। जिस विशिष्टता से इस पुस्तक में सनातन प्रतीकों को मोतियों की माला में पिरोया गया है, वह अद्भुत है। भारतीयता, संस्कृति और हिंदू विरासत को समझने के लिए इस पुस्तक में सभी प्रमुख तथ्य, तत्त्व और प्रतीक उपस्थित हैं। यह पुस्तक एक ऐसी कुंजिका है जो भावी पीढ़ी को अपने मूल से जोड़ने और हिंदू संस्कृति को समझने में सक्षम भूमिका का निर्वहन करेगी। सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति का वैशिष्ट्य और निरंतरता बताती पठनीय पुस्तक।
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