Unbosoming
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Poetry is the mist tying our human souls together in intricate, compelling knots of life (and lies). ‘unbosoming’ is the maiden attempt of Samridhi to unravel these knots while struggling to trap the waves of self-loathing, anger, doubt and fear inside the tip of her pen every night. For it’s always better to brandish a pen than a knife. This book is about the webs we spin and trip over, again and again, only to smile for others the next morning and crumble within ourselves again at night. ‘unbosoming’ is the secret child of such spirals, scribbled over for months. It is the journey of the pleasure of self-abuse and acceptance and redemption and the faint knowledge of hope.
Read moreAbout the Book
Poetry is the mist tying our human souls together in intricate, compelling knots of life (and lies). ‘unbosoming’ is the maiden attempt of Samridhi to unravel these knots while struggling to trap the waves of self-loathing, anger, doubt and fear inside the tip of her pen every night. For it’s always better to brandish a pen than a knife. This book is about the webs we spin and trip over, again and again, only to smile for others the next morning and crumble within ourselves again at night. ‘unbosoming’ is the secret child of such spirals, scribbled over for months. It is the journey of the pleasure of self-abuse and acceptance and redemption and the faint knowledge of hope.
Book Details
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ISBN978-93-90882-60-1
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Pages170
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Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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यह संग्रह इस अर्थ में अनूठा है कि इसकी प्रायः सभी कविताएँ किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थिति को विश्लेषित करती, ठोस वस्तुस्थिति की कविताएँ हैं। भावनाओं की अमूर्त्त दुनिया भी है, लेकिन परदे के पीछे। इहलौकिकता के साथ यतीन्द्र मिश्र की कविता की दूसरी विशेषता है इसकी स्मृति-सम्पन्नता। वैसे तो ‘नमक’ जैसी एकाध कविता में अतीत के संघर्ष की स्मृति भी मिलती है, लेकिन आमतौर पर यतीन्द्र के यहाँ मिटती हुई अथवा हाशिये पर जाती हुई मूल्यवान चीज़ों की स्मृति बार-बार आती है। लोक और संगीत प्रायः इसके माध्यम बनते हैं।
‘बारामासा’, ‘लोकगीत’ और ‘क़िस्से-कहानियों की स्मृतियाँ’ ऐसी कविताएँ हैं, जिनमें यथार्थ और स्वप्न के सन्दर्भ में लोकजीवन की स्मृति को सहेजा गया है। ‘आदमी बने रहने की कोशिश’ तथा ‘अष्टपदी’ जैसी कविताओं में यह चिन्ता संगीत के माध्यम से हमारे सामने आती है, जबकि हाशिये पर पहुँच चुके लोग अपनी शक्ति के साथ ‘तकियाकलाम’, ‘मिरासिनें’ तथा ‘कछुआ और खरगोश’ में उपस्थित होते हैं। वैसे तो यतीन्द्र का काव्य-संसार शुरू से आख़िर तक ऐन्द्रिक संवेदनों का संसार है, लेकिन रंगों का जादू उन्हें ख़ासतौर पर सम्मोहित करता है। रंग और संगीत की परस्पर अन्तःक्रिया से निर्मित प्रेम का यह बिम्ब देखें—‘मैं नदी जितना साँवला/तुम सूर्योदय जितनी उज्ज्वल/हमारा प्रेम/कभी बसन्त/ कभी जोगिया में/एक अतिविलम्बित बढ़त’ (हमारा प्रेम)। तेज़ी से भागते समय को रंगों के आकर्षण में रोक रखना कवि को सम्भव जान पड़ता है। लिखना, पढ़ना और रँगना यहाँ परस्पर समानार्थक क्रियाएँ बनकर उभरती हैं। सम्भवतः इसीलिए अपने देशकाल का सबसे सार्थक आख्यान वे ‘सुनो रंगरेज’ जैसी कविता में कर पाते हैं। इस दृष्टि से ‘समय को रँगते हुए पढ़ना’, ‘सहजता के लिए जगह’ और ‘कजरी’ जैसी कविताएँ उल्लेखनीय बन पड़ी हैं।
कवि की यही प्रवृत्तियाँ तानसेन, तुकाराम, उस्ताद अलाउद्दीन ख़ाँ और ग़ालिब तक उसे ले जाती हैं और उनके होने का मतलब, उनका सारतत्त्व तलाशती हैं। इसी तलाश में यतीन्द्र अक्सर उन जगहों पर भी पहुँचते हैं, जहाँ जीवन की साधारण परिस्थितियाँ अपनी विशिष्टता में मौजूद हैं। यहाँ उनके साथ कवि का सौहार्दपूर्ण रिश्ता हमें ज़्यादा बड़े आशयों की ओर ले जाता है और इस प्रक्रिया में ‘रफ़ू’, ‘लंगड़ा आम’, ‘सुबह’ व ‘ढोल’ जैसी महत्त्वपूर्ण कविताओं से हमारा सामना होता है। इन कविताओं को पढ़कर कोई भी पाठक मामूली चीज़ों से कविता बना देने की कवि की प्रतिभा को महसूस किए बिना नहीं रहेगा।
यह संग्रह हिन्दी की युवा कविता की सम्भावना, शक्ति और दिशा को प्रकट करनेवाला एक प्रतिनिधि संग्रह है।
—कृष्णमोहन
Pratinidhi Kavitayen : Praveen Shakir
- Author Name:
Parveen Shakir
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Description:
पाकिस्तान की उर्दू शायरी में परवीन शाकिर की गणना प्रेम की नाजुक मूर्ति के रूप में होती है। परवीन का प्रेम अपने अद्वितीय अन्दाज़ में ‘नर्म सुख़न’ बनकर फूटा है और अपनी ‘ख़ुशबू’ से उसने उर्दू शायरी की दुनिया को सराबोर कर दिया है।
पाकिस्तान की ही प्रसिद्ध कवयित्री फ़हमीदा रियाज़ के अनुसार, ‘परवीन के शे’रों में लोकगीतों की सी सादगी और लय भी है और क्लासिकी मौसीकी (शास्त्रीय संगीत) की नफ़ासत और नज़ाकत भी। उसकी नज़्में और ग़ज़लें भोलेपन और सॉफ़िस्टिकेशन का दिलआवेज़ संगम हैं।’
परवीर शाकिर की शायरी का केन्द्रीय विषय ‘स्त्री’ है। प्रेम में टूटी हुई, बिखरी हुई खुद्दार स्त्री। लेकिन उसकी शायरी की यह कोई सीमा नहीं है। वस्तुतः परवीन की शायरी प्रेम की एक ऐसी लोरी है जो अपने मद्धिम-मद्धिम सुरों से सोते हुओं को जगाने का काम करती है।
परवीन की शायरी में रूमानियत भी है और गहरी ऐंद्रिकता भी, पर कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि सामने की दुनिया सिर्फ़ एक सपना है। अपनी सूक्ष्म यथार्थपरकता के कारण ही मुख्य रूप से ‘स्त्री’ और ‘प्रेम’ को आधार बनाकर लिखी गई ये कविताएँ अनुभूति के व्यापक द्वार खोलती हैं।
Mornaach
- Author Name:
Nida Fazli
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- Description: मोरनाच देवनागरी में आनेवाला निदा फ़ाज़ली का ऐसा संकलन है जिसमें उनकी अब तक की अधिकांश कविताएँ निरखी और परखी जा सकती हैं। इसमें पिछले पच्चीस बरसों की उनकी सोच-समझ और सरोकार का फैलाव है और अब तक आए तीनों मजमूओं में से ख़ुद लेखकीय चुनाव—इसीलिए एक अर्थ में यह निदा की प्रतिनिधि कविताओं का संग्रह भी कहा जा सकता है। इसमें ग़ज़लें भी हैं, नज़्में भी और कुछ गीत भी। शुरू का दौर भी है, बीच का भी और इधर का भी, लेकिन जो बात अव्वल से अब तक मुसलसिल बनी हुई है, वह है कवि का हर एक के लिए एक बेलौस लगाव—कुछ लोगों को यह सिनिसिज़्म की हदों को छूने वाला भी लग सकता है लेकिन शायद यह हर आधुनिक रचनाकार की मजबूरी है कि वह माँ, बाप, भाई, बहन, परिवार, स्त्री, प्रेम, समाज और देश—किसी को भी जस का तस स्वीकार नहीं करता। वह उन्हें सन्देह के कठघरे में धकेलकर सवाल करता है—ऐसे कि पहले वह सवाल पलटकर एक-एक कर ख़ुद उसका गिरेबान पकड़ ले और फिर अन्तत: समाज का होकर रह जाए। यही वह सच है जिसे अपने समय का हर सही रचनाकार अपने अनुभव की रोशनी में ही देखना और परखना चाहता है जैसाकि ख़ुद निदा फ़ाज़ली का ही एक दोहा है: वो सूफ़ी का कौल हो, या पंडित का ज्ञान जितनी बीते आप पर, उतना ही सच मान। —शानी
Fati Hatheliyan
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Neha Naruka
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Description:
नेहा नरूका की कविताओं में भारतीय राजनीति के नवीन संस्करणजन्य भय और आशंकाएँ विन्यस्त हैं। वे रेखांकित करती हैं कि इस सदी में, ख़ासतौर पर पिछले दशक में राजनीति ने किस-किस तरह समाज को, जनचेतना को संक्रमित और प्रदूषित करने के उपक्रम किए हैं। उसके अक्स आम जीवन की दिनचर्या, विचार-प्रक्रिया, प्रेमिलता और सहजीविता पर नाख़ूनों की गहरी खरोंचों की तरह आए हैं। इनकी त्रासदियाँ सहज मानवीय जीवन की आकांक्षा को नाना प्रकार चोटिल कर सकती हैं, उसके विचलित करनेवाले, मार्मिक ब्योरे यहाँ दर्ज हैं। वे इन कविताओं में संचित आवेग, प्रतिवाद और पीड़ाजन्य क्रोध में समेकित हैं। हम देख सकते हैं कि काली राजनीति से गाढ़े होते इस सामाजिक अन्धकार में नेहा संवेदित स्पर्श और दृष्टि-सम्पन्नता से अपनी कविता अग्रसर करती हैं।
तमाम तरह के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दुराचारों से लथपथ इस समय में घर के बाहर और भीतर जितने अत्याचार और ख़तरे हैं, वे नेहा की कविताओं के प्रस्थान-बिन्दु हैं। ये कविताएँ एक रचनाकार की तकलीफ़ और तलछट के साक्षात जीवनानुभवों से निसृत हैं। इनसे गुज़रते हुए निम्न-मध्यवर्गीय, निम्नवर्गीय और वंचित जीवन के बारीक फ़र्क़ को बेहतर समझा जा सकता है, हिन्दी कविता में इधर जिसका संज्ञान दुर्लभ हो गया है। स्त्रियों पर आरोपित अन्धविश्वासों, धार्मिक पाखंड से सनी कुरीतियों पर सीधे प्रश्नों की तीक्ष्णता इन्हें अधिक प्रभावी बनाती है। प्रेम पर लिखते हुए वे समाज में व्याप्त विषमताओं और अन्तर्विरोधों पर लगातार निगाह रखती हैं।
यहाँ स्त्रीवाद की जिरहें, पितृसत्तात्मकता, स्त्री-निर्मिति आदि के पहलू रोज़मर्रा की मुश्किलों और समझ से प्रेरित हैं। जहाँ वे इंगित कर सकती हैं कि व्यापक सुख व्यापक संवेदनहीनता में बदल रहे हैं। स्त्री की व्यथा स्त्री-कथा में बदल गई है। प्रकारान्तर से स्त्री-दशा की बृहत् तस्वीर बनती चली जाती है। इस हेतु वे तथाकथित वांछित काव्यात्मकता या लयकारी के बरअक्स उस ज्ञानात्मक संवेदित गद्य में कविता मुमकिन करती हैं जो समकालीन कविता का हासिल है। ये कविताएँ आँसुओं की नहीं सवालों की झड़ी लगाती हैं, एक सजग स्त्री, नागरिक की तरफ़ से आरोप-पत्र दाख़िल करती हैं। बाध्यकारी नैतिकताओं और पवित्रताओं को प्रश्नांकन के दायरे में लेती हैं। पहले ही कविता-संग्रह में यह सब देखना सुखद है, स्वागतेय है।
—कुमार अम्बुज
Chand-Shati
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Jagdish Gupt
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- Description: Awating description for this book
Lamhe Zindagi Ke
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- Description: 'लम्हे जिंदगी के' कविता पुस्तक, सामाजिक विषयों पर स्वयं लेखक की कविताओं का संकलन है। 'पिता क्या होता है' इसका अहसास पिता बनने के बाद ही होता है, यह इस कविता के माध्यम से बेहतरीन तरीके से बतलाया है। इस कविता के अलावा पिता पर बहुत-सी भावनात्मक कविताओं का समावेश है जैसे 'पिता', 'पिता का प्यार', 'पिता की डांट' एवं 'सूरज से पिता' इत्यादि। माँ पर भी दिल को छू लेने वाली बहुत-सी कविताएँ हैं। 'माँ को कभी सोते देखा नहीं' कविता में एक बच्चे का माँ के प्रति अथाह प्रेम को मर्मस्पर्शी तरीके से दर्शाया है। कोरोना ने समाज के हर तबके को बहुत गम दिये हैं। बहुत लोगों ने अपनों को खोया है। कविताओं के माध्यम से कोरोना के प्रति अपनी भावनात्मक अभिव्यक्ति प्रस्तुत की है। एक छोटे बच्चें की भावना को जो करोना के कारण लंबे समय से स्कूल नहीं जा पा रहा है, बहुत सुंदर तरीके से पेश किया है। दोस्तों पर लिखी कविताएँ भी बेमिसाल है। उपरोक्त पुस्तक में प्रत्येक कविता दिल को छू जाने वाली तथा आम आदमी के जीवन का प्रतिबिम्ब है। यह हर उम्र के व्यक्तियों के पढ़ने योग्य है।
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Book
01/04/2023
Nikunj Parekh
"Unbosoming" is a collection of emotional and heartfelt poems that explore themes of love, loss, and healing. The author's honest and raw portrayal of her personal experiences makes the poems deeply moving and relatable. The book is a great read for anyone who loves poetry and is looking for inspiration and solace.