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The book delves into unexpressed emotions,unsaid conversations, and the lingering sense of loss.It becomes a powerful outlet for the author’s feelings, offering a testament to the impact of our actions on cherished relationships. Amidst love, regret, and personal growth, this book is a touching tribute to a person who forever changed their life, exploring the beauty and challenges of deep connections while embracingforgivenes and understanding.
Book Details
-
ISBN978-81-19483-04-4
-
Pages70
-
Avg Reading Time2 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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हिन्दी की समकालीन कविता में कुछ समय से आए बदलाव अभी ठीक से परिभाषित नहीं किए गए हैं, लेकिन यह निर्विवाद है कि वह काव्य-पीढ़ियों से आगे की, जीवन के ज़्यादा विस्तारों को देखती-पहचानती हुई कविता है। अपने पूर्वज कवियों का विवेक उसके अनुभव-संसार में उपस्थित है लेकिन उसकी संवेदना बिलकुल नई और अपनी है। इस संवेदना में यह जानने की बेचैनी है कि समाज, मानव-सम्बन्ध और राजनीति में हमने क्या-क्या खोया है, कौन-सी दुनियाएँ हमसे छूट गई हैं और हमारी मूलभूमि का, हमारी स्थानीयता का क्या हाल है। आश्चर्य नहीं कि रमण कुमार सिंह अपने पहले कविता-संग्रह ‘बाघ दुहने का कौशल’ की ज़्यादातर कविताओं में बार-बार उस जीवन को जाँचते-परखते लौटते हैं जो हमारे पीछे रह गया है और जिसकी जर्जरता और उदासी हमारा पीछा करती रहती है। एक सहज, गँवई यथार्थ और उसका जादू जो अब हमारा अतीत है और हमारे सामने फैले शहरी निम्न-मध्यवर्गीय यथार्थ के आपसी तनाव भी इन कविताओं की अन्तर्वस्तु बनाते हैं और उस ‘लुटेरे समय’ की छवियाँ उभारते हैं जो ‘दादी की लोरियों’ और ‘बुजुर्गों की लाठी’ से लेकर ‘आकाश की नीलिमा’ तक को छीन रहा है और जिसके प्रति विरोध दर्ज करना जरूरी है, अन्यथा वह हमारी अभिव्यक्ति को भी नष्ट कर दे सकता है। रमण कुमार सिंह की कविताओं में हमारे लोकजीवन का जर्जरित होता स्वरूप बहुत शिद्दत से व्यक्त हुआ है। वे एक तरफ उस संसार की बची-खुची चीजों, परम्पराओं और सम्बन्धों को कविता की स्थायी स्मृति की तरह बचा लेना चाहते हैं तो दूसरी तरफ उस युवक की बेचैनी के पास भी जाते हैं जो लोक में प्रवेश करते बाजार, टूटती चौपाल और डरावने हो रहे पनघट और राजनीति के सत्ता-समीकरणों का साक्षी है और इस यथार्थ को बदल पाने में असमर्थ है। ‘गुजरे हुए बाबा से संवाद’ इसी तरह की एक मार्मिक कविता है जिसमें आज की पीढ़ी का एक प्रतिनिधि अपने पूर्वज को ग्रामीण संस्कृति का मौजूदा हाल सुनाते हुए उस सपने के बारे में पूछता है जिसे देखते-देखते वे अन्ततः सो गए थे। गौरतलब यह है कि यथार्थ बदल रहा है लेकिन स्वप्न भी जीवित है। दरअसल रमण की कविता उम्मीद और नाउम्मीद के बीच कई तरह के रिश्तों की पहचान की दस्तावेज है और कई बार वे ‘देश-परदेस’ को भी इसी रूप में पहचानते हैं। ‘बाघ दुहने का कौशल’ की रचनाएँ हमें उस सरल और मासूम संसार में ले जाती हैं जो वास्तविकता में टूट रहा है, लेकिन हमारे स्वप्नों में साबुत है। भाषा की ताज़गी और शिल्प की लोक-लय के साथ गँवई-शहरी जीवन के विकल रूप रमण की कविताओं के केन्द्रीय बयान हैं जिनमें संवेदना की स्थानिकता का संगीत भी सुनाई देता है। मंगलेश डबराल
Pratinidhi Kavitayen : Ashok Vajpeyi
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Ashok Vajpeyi
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जन्म और मृत्यु। दो जीवन-सत्य। चूँकि 'मैं' हूँ, इसलिए इनका अस्वीकार भी सम्भव नहीं। फिर एक लय, एक सनातन लय-प्रेम की। सराबोर करती जीवन के, मृत्यु के इस अनुभव-पट को। अनुभव, स्पर्श का अनुभव। ऐन्द्रिकता का निर्द्वन्द्व स्वीकार। यही हैं अशोक वाजपेयी की कविता के मुख्य सरोकार। जड़ और चेतन—सभी ढले हैं उनकी कविताओं में—जो उनकी कविता-गंगा के पाट को दूर, बहुत दूर तक ले गए हैं; जहाँ तक पहुँच पाना या देख पाना, बिना इस गंगा में उतरे सम्भव नहीं। अशोक वाजपेयी जीवन के अनछुए अनुराग, अदेखे अन्धकार और अधखिले फूलों के साथ, उन मुरझाए फूलों को भी प्रेम करनेवाले कवि हैं, जिन्हें हम प्राय: नज़रअन्दाज़ कर जाते हैं। विभिन्न संकलनों से ली गई उनकी चुनिन्दा कविताओं का यह संग्रह निश्चय ही उनकी काव्य-संवेदना के कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को रेखांकित करेगा।
Humanist Social Vision of a Jungle Poet
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Kuvempu +1
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This book carries 51 poems of Kuvempu in translation with a long introduction to give the pan India audience an understanding of Kuvempu's major concerns. Prof Raghunath has made his choice carefully to represent Kuvempu's social concern, and that seems to be at the heart of his introductory piece.
The Darkness is Vanishing
- Author Name:
Ramesh Pokhriyal 'Nishank'
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The poems of Ramesh Pokhriyal "Nishank" represent innate, passionate ramifications and poetic mystification for readers. While they may include hymns and religious instructions, what stands out is the sentimental piety in the poems offered within this collection. As a poet, Nishank surveys possibilities, comparing them to actualities, facts, theories, alternatives, and ideals, weighing them together. Thus, his work is both insightful and foresightful, providing a sense of life’s worth. Remarkably, these poems are not complex; they are simple and pliable. The doctrines and practices they endorse are not new or recent but align with established norms. The poems that emerge from darkness invigorate the spirit, making our hearts dance and enveloping us in a mystical softness, enchanting enough to soothe distressed feelings while instilling a sense of truth, clarity, and refinement. Nishank conjures images of everyday, affable life, depicting socially intellectual and passionate men who dance, croon, and fall yet rise again—shortly devastated but soon resilient. His poems are both popular and distinctly contemplative. Hidden behind his voice lies every man; if you wish to understand his character, let the doors of the heart open and allow them to speak. *** The ardor for humankind may pulse in every throb of my heart; let there be a beautiful person within me. My only desire in this life is to die for my country, with my life as an emblem for humanity. *** Like worms clothing the wheat, jealousy, like termites, hollow out the preposterous. *** To erase darkness, those who burn like torches do so even in adverse torrents; they never extinguish. *** Happiness resides in the present, not in the future; it rests in the depths of the mind. —From this collection.
Footprints
- Author Name:
Neelam Dadhwal
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Her thoughtful verses which often revolt to gain the roots, upwardly or downwardly enrich the poetry readers with wonderful insights. When she is not recreating the world with her poetry, she indulges in gardening.
Middlemist Red
- Author Name:
Priyanka Das
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The key is in your hand and now it's upto you how do you unlock yourself
Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
- Author Name:
Piyush Mishra
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सिनेमा और थिएटर के अन्तरिक्ष में विधाओं के आर-पार उड़नेवाले धूमकेतु कलाकार पीयूष मिश्रा यहाँ, इस जिल्द के भीतर सिर्फ़ एक बेचैन शब्दकार के रूप में मौजूद हैं। ये कविताएँ उनके जज़्बे की पैदावार हैं जिन्हें उन्होंने अपनी कामयाबियों से भी कमाया है, नाकामियों से भी। हर अच्छी कविता की तरह ये कविताएँ भी अपनी बात ख़ुद कहने की क़ायल हैं, फिर भी जो ख़ास तौर पर सुनने लायक़ है वह है इनकी बेचैनी जो इनके कंटेंट से लेकर फ़ार्म तक एक ही रचाव के साथ बिंधी है। दूसरी ध्यान रखने लायक़ बात ये कि इनमें से कोई कविता अब तक न मंच पर उतरी है, न परदे पर। यानी यह सिर्फ़ और सिर्फ़ कवि-शायर पीयूष मिश्रा की किताब है।
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