Gaganvat : Sanskrit Muktakon Ka Sweekaran
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'स्वीकरण’ शब्द मेरा नहीं, पुराना है—12वीं सदी के काव्याचार्य राजशेखर का है। मैंने शब्द 'कविता का एक भाषा से दूसरी भाषा में काव्यानुवाद’—इस अर्थ में लिया है। राजशेखर ने 'स्वीकरण’ का प्रयोग इसे 'हरण’ से व्यावृत्त—अलग—करने के लिए किया है। राजशेखर कहते हैं कि नई कविता बनती ही पुरानी चली-आती कविताओं की परम्परा के भीतर है—यों पुरानी कविता को 'ले लेना’ कोई बुरी बात नहीं—बल्कि अनिवार्य है। पर उसे सचमुच 'अपना लेना’ उपाय-कौशल चाहता है। राजशेखर ऐसे उपायों का विस्तार से वर्णन करते हैं। इसके लिए पुरानी कविता का रूपान्तर आवश्यक था जो कई तरह से किया जा सकता था, जिन्हें राजशेखर खोल कर दिखाते हैं। 'स्वीकरण’ शब्द राजशेखर ने गढ़ा था। पर इसके पीछे जो धारणा है, विचार है, वह 'ध्वन्यालोक’ के विख्यात लेखक, भाषा में एक नए अर्थलोक—व्यंजना—के द्रष्टा, महत् दार्शनिक आनन्दवर्धन का है। आनन्दवर्धन अपने ग्रन्थ में ध्वनि (व्यंजना) की शास्त्रीय स्थापना करने के बाद पूछते हैं कि यह जो स्थापना हुई है, यह क्या शास्त्रमात्र-सार नहीं? इससे कवि को क्या लाभ? उत्तर देते हुए आचार्य कहते हैं कि मनुष्य के चित्त में जितने भाव हैं, पुरानी कविता में उनकी सक्षम अभिव्यक्ति हो चुकी है, आज का कवि नया क्या कर सकता है? पर कविता तो नई ही होती है। आनन्दवर्धन की दृष्टि में यह नयापन व्यंजना का ही नयापन होता है। पुरानी कविता की व्यंजना बदल दी जाए तो कविता नई हो जाती है।</p> <p>मेरे अनुवाद इन पुराने रास्तों पर नहीं चलते। 'स्वीकरण’ मेरे लिए अनूदित कविता का रूपान्तरण नहीं, उलटे उस कविता के स्वरूप-स्वभाव को, भाव-मर्म को बजा रखते हुए उसे एक नई भाषा में उतारना है। एक बात और कहना चाहूँगा। संस्कृत कविता मुक्तक-प्रधान है। बड़ी कविताओं में, महाकाव्यों में भी, यह प्रवृत्ति देखी जा सकती है। मैंने अपने 'अनुवचन’ में मुक्तक पर कुछ लम्बी चर्चा की है। पाठक उसे देखेंगे तो इन कविताओं में उसकी पैठ बढ़ सकती है। </p> <p>—प्रस्तावना से</p> <p> </p> <p>संस्कृत काव्य की विपुलता और वैभव का अक्सर ज़िक्र होता है। मुकुन्द लाठ उन बिरले कवि-चिन्तकों में से हैं जिन्होंने इस काव्य के अपार लालित्य को हिन्दी में सुघरता और संवेदनशीलता से लाने की कोशिश की है। राजशेखर के हवाले से वे इन्हें 'स्वीकरण’ कहते हैं। वे इस अर्थ में स्वीकरण हैं भी कि उन्हें पढ़ते लगता है कि आप मूल हिन्दी कविता ही पढ़ रहे हैं। हमें प्रसन्नता है कि हम रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत इस संचयन को एक बार फिर हिन्दी पाठकों के समक्ष रसास्वादन के लिए ला रहे हैं। </p> <p>—अशोक वाजपेयी
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'स्वीकरण’ शब्द मेरा नहीं, पुराना है—12वीं सदी के काव्याचार्य राजशेखर का है। मैंने शब्द 'कविता का एक भाषा से दूसरी भाषा में काव्यानुवाद’—इस अर्थ में लिया है। राजशेखर ने 'स्वीकरण’ का प्रयोग इसे 'हरण’ से व्यावृत्त—अलग—करने के लिए किया है। राजशेखर कहते हैं कि नई कविता बनती ही पुरानी चली-आती कविताओं की परम्परा के भीतर है—यों पुरानी कविता को 'ले लेना’ कोई बुरी बात नहीं—बल्कि अनिवार्य है। पर उसे सचमुच 'अपना लेना’ उपाय-कौशल चाहता है। राजशेखर ऐसे उपायों का विस्तार से वर्णन करते हैं। इसके लिए पुरानी कविता का रूपान्तर आवश्यक था जो कई तरह से किया जा सकता था, जिन्हें राजशेखर खोल कर दिखाते हैं। 'स्वीकरण’ शब्द राजशेखर ने गढ़ा था। पर इसके पीछे जो धारणा है, विचार है, वह 'ध्वन्यालोक’ के विख्यात लेखक, भाषा में एक नए अर्थलोक—व्यंजना—के द्रष्टा, महत् दार्शनिक आनन्दवर्धन का है। आनन्दवर्धन अपने ग्रन्थ में ध्वनि (व्यंजना) की शास्त्रीय स्थापना करने के बाद पूछते हैं कि यह जो स्थापना हुई है, यह क्या शास्त्रमात्र-सार नहीं? इससे कवि को क्या लाभ? उत्तर देते हुए आचार्य कहते हैं कि मनुष्य के चित्त में जितने भाव हैं, पुरानी कविता में उनकी सक्षम अभिव्यक्ति हो चुकी है, आज का कवि नया क्या कर सकता है? पर कविता तो नई ही होती है। आनन्दवर्धन की दृष्टि में यह नयापन व्यंजना का ही नयापन होता है। पुरानी कविता की व्यंजना बदल दी जाए तो कविता नई हो जाती है।</p>
<p>मेरे अनुवाद इन पुराने रास्तों पर नहीं चलते। 'स्वीकरण’ मेरे लिए अनूदित कविता का रूपान्तरण नहीं, उलटे उस कविता के स्वरूप-स्वभाव को, भाव-मर्म को बजा रखते हुए उसे एक नई भाषा में उतारना है। एक बात और कहना चाहूँगा। संस्कृत कविता मुक्तक-प्रधान है। बड़ी कविताओं में, महाकाव्यों में भी, यह प्रवृत्ति देखी जा सकती है। मैंने अपने 'अनुवचन’ में मुक्तक पर कुछ लम्बी चर्चा की है। पाठक उसे देखेंगे तो इन कविताओं में उसकी पैठ बढ़ सकती है। </p>
<p>—प्रस्तावना से</p>
<p> </p>
<p>संस्कृत काव्य की विपुलता और वैभव का अक्सर ज़िक्र होता है। मुकुन्द लाठ उन बिरले कवि-चिन्तकों में से हैं जिन्होंने इस काव्य के अपार लालित्य को हिन्दी में सुघरता और संवेदनशीलता से लाने की कोशिश की है। राजशेखर के हवाले से वे इन्हें 'स्वीकरण’ कहते हैं। वे इस अर्थ में स्वीकरण हैं भी कि उन्हें पढ़ते लगता है कि आप मूल हिन्दी कविता ही पढ़ रहे हैं। हमें प्रसन्नता है कि हम रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत इस संचयन को एक बार फिर हिन्दी पाठकों के समक्ष रसास्वादन के लिए ला रहे हैं। </p>
<p>—अशोक वाजपेयी
Book Details
-
ISBN9789388753111
-
Pages197
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: रूपम मिश्र की कविता का वैशिष्ट्य यह है कि वह किसी और की तरह नहीं लिखतीं। हम सभी जानते हैं कि साधारण-सी लगने वाली इस बात की क्या असाधारणता है। कहन की यह मौलिकता उन्हें अपनी अन्तर्वस्तु से मिलती हैं जिसका उत्स वह जनक्षेत्र है जिसके वृत्तान्त उनकी कविता का रूप-रंग तय करते हैं। रूपम अवध के पुरुषवाची लैंडस्केप में औरतों के दुखों और दुविधाओं और द्वन्द्व को मरोड़, उत्ताप और विकलता से कहती तो हैं लेकिन इस कहन में विडम्बना अनुपस्थित नहीं होती। इस तरह वह स्त्री के सन्ताप और उसके संकट का भाववाद नहीं निर्मित करतीं और वजह भी यही होगी कि वह न तो राज्य को बख्शती हैं और न प्रतिगामी मूल्यों को बनाए रखने वाले सामाजिक ढाँचे को, जो सामन्ती सोच-समझ का प्रतिफलन, विस्तार और विद्रूप है। वह उन बहुत कम स्त्री कवियों में हैं जिन्होंने नारी स्वातंत्र्य के बुनियादी प्रत्ययों पर कायम रहते हुए उसकी मुक्ति को भारतीय नागरिकता की बृहत्तर मुक्ति के कार्यभार से अलगाकर नहीं देखा। हिन्दी कविता की समकालीनता में वह लगभग अकेली हैं जो अपनी कविता में अपने इलाके के मनुष्य और मनुष्यता ही नहीं उस भूभाग के सांस्कृतिक पराभव के वर्णन के लिए इलाकाई जबान का बहुत नैसर्गिक और निहितार्थवान उपयोग करती हैं। उनकी कविता को पढ़ना अवध की स्त्रियों की कितनी ही कथाओं और आत्मकथाओं में गूँजते कैद और स्वातंत्र्य, कायरता और प्रतिकार, गलित और नैतिक, परम्परित और अग्रगामी, जड़ीभूत और गतिशील की द्वन्द्वात्मक स्थितियों में पैदा होते सवालों से आप्लावित, विचलित और उत्प्रेरित होना है जहाँ पुरुष वर्चस्व और स्त्री मुखरता का परिपार्श्व अलक्षित नहीं रह पाता। विषम अवस्थितियों में लिखी जाती रूपम मिश्र की कविता और बेहद प्रतिकूल हालात में निर्मित होता और नित निखरता उनका काव्य व्यक्तित्व किसी दन्तकथा से कम नहीं। —देवी प्रसाद मिश्र
Ek Lakh Log
- Author Name:
Sanjay Chaturvedi
- Book Type:

- Description: संजय चतुर्वेदी बगैर लाग-लपेट के अपनी बात कहने वालों में से हैं। जहाँ उन्होंने अपने चाहने वालों को हमेशा मोहब्बत बख्शी है वहीं हर विरोध को विनम्रता से स्वीकार भी किया है। वे कहते हैं कि 'सदियों के मतान्तर का कोलाहल हमारे फूलों की घाटी है'। इन सब के ऊपर संजय चतुर्वेदी ने कहन का एक ऐसा मुहावरा तैयार किया है जो उन्हें अपने समकालीनों में अद्वितीय बनाता है। अथक श्रम से हासिल किए गए अपने भाषा-वैविध्य और छंद-ज्ञान के साथ उन्होंने लगातार असंभव प्रयोग किये हैं। इन प्रयोगों की अविश्वसनीय परिधि को देखने के लिए हमें उनकी और भी बहुत सी कविताओं की ओर जाना होगा। उनकी एक पुरानी कविता 'पतंग' में एक बड़ी यादगार छवि आती है। कटी हुई पतंग लूटने को अपनी लग्गियाँ लेकर 'घास, हवा और ज़मीन से' निकले बच्चे 'सर्र से निकल जाते हैं सूरज के सामने से/ तेज़ भागती गाडिय़ों और टेनिस खेलकर लौटती औरतों के सामने से'। इस एक छवि में पिछले चार दशकों की संजय चतुर्वेदी की कविता के उत्तरोत्तर विकसित होते जाने के बीज देखे जा सकते हैं। उनकी तमामतर रचनाएँ पैने तर्कों और बेहतरीन भाषा की मदद से बनाई गई लग्गियाँ हैं जिनके सहारे वे कविता के आसमान की बोझिल खामोशी में लगातार खलल डालते रहे हैं। अपने परिवेश और उसकी ढहती-बनती आस्थाओं-परम्पराओं को गौर से देख रहा यह कवि विज्ञान और आधुनिकता की चेतना से लैस है। वह सतत प्रत्यक्ष और परोक्ष यात्राओं में रत रहता है और अपनी निगाह को कभी धुंधला नहीं पडऩे देता। —अशोक पाण्डे
Aahaten Aas Paas
- Author Name:
Pankaj Singh
- Book Type:

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Description:
पंकज सिंह हैं। उनके एप्रोच से मतभेद हो सकता है : एक हद तक। लेकिन उनकी एक उत्कट आकांक्षा, कुछ यथार्थ को व्यक्त करने की, और उस यथार्थ से गुथने की—इससे इनकार नहीं किया जा सकता। यह कुछ ऐसी है जैसी कि मुक्तिबोध ने की थी अपने ज़माने में बहुत मेहनत से। उस यथार्थ को व्यक्त करने की। यथार्थ को व्यक्त करना कलाकार का बहुत ही पहला और बहुत ही बुनियादी धर्म है, और उस धर्म में वह कामयाब ही हो, यह ज़रूरी नहीं है। लेकिन ऐसी कोशिश और उस कोशिश में किसी हद तक भी कामयाब होना मेरे लिए बड़ी आदरणीय चीज़ होती है। तो उसमें विभिन्न रूप से विभिन्न दृष्टियों से जो कवि संलग्न है और उसमें अगर काव्य के स्तर पर काव्याभिव्यक्ति के स्तर पर कुछ किया है उन्होंने तो उसका आदर होना चाहिए और मैं उनका आदर करता हूँ...
—शमशेर बहादुर सिंह
(‘पूर्वग्रह’, जनवरी-अप्रैल, 1976)
Mere Baad….
- Author Name:
Rahat Indori
- Book Type:

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Description:
गहरी से गहरी बात को आसानी से कह देने का जटिल हुनर जाननेवाले राहत भाई से मेरा बड़ा लम्बा परिचय है। मुशायरे या कवि-सम्मेलन में वे कमल के पत्ते पर बूँद की तरह रहते हैं। पत्ता हिलता है, झंझावात आते हैं, बूँद पत्ते से नहीं गिरती। कई बार कवि और शायर कार्यक्रम शुरू होने से पहले मंच पर आसन जमा लेते हैं, लेकिन इस नए कॉरपोरेट ज़माने में चूँकि कवि-सम्मेलन या मुशायरा एक शो या इवैंट की तरह हैं, तो शुरुआत से पहले आम तौर से शायर हज़रात मंच के पीछे खड़े रहते हैं। नाम के साथ एक-एक करके उनको पुकारा जाता है, तब मंच पर आते हैं। जिस शायर के लिए ख़ूब देर तक ख़ूब सारी तालियाँ बजती रहती हैं, उनका नाम है राहत इन्दौरी। एक अध्यापक जैसे सादा लिबास में वे आते हैं, जो बिलकुल शायराना नहीं होता। तालियों के प्रत्युत्तर में वे हल्का सा झुककर सामईन को आदाब करते हैं और बैठने के लिए अपनी सुविधा की जगह देखते हैं, वैसे उन्हें पालथी मारकर बैठने में भी कोई गुरेज़ नहीं होता। एक बेपरवाही भी शाइस्तगी के साथ मंच पर बैठती है, जब राहत भाई बैठते हैं। आम तौर से हथेली को गद्दे से टिका देते हैं। मैं कई बार उनके गाढ़े साँवले सीधे हाथ को, जिसको वे टिकाते हैं, देर तक देखता रहता हूँ, उसकी अँगूठियों को निहारता हूँ और उँगली अँगूठे के पोरों को देखता हूँ कि कितनी ख़ुश होती होगी वह क़लम जब इस हाथ से अशआर निकलते होंगे। ऐसे अशआर जिनकी ज़िन्दगी बहुत तवील है, बहुत लम्बी है।
राहत साहब जब माइक पर आते हैं तो लगता है कि ये ज़मीन से जुड़ा हुआ आदमी कुछ इस तरह खड़ा है कि ज़मीन ख़ुश है और वो जब हाथ ऊपर उठाते हैं तो लगता है कि आसमान छू रहे हैं। वे तालियों से बहुत ख़ुश हो जाएँ या अपने अशआर सुनाते वक़्त तालियों की अपेक्षा रखें, ऐसा नहीं होता। उनका अन्दाज़, उनके अल्फाज़, उनकी अदायगी, ज़बान पर उनकी पकड़, उनकी आवाज़ का थ्रो, उनके हाथों का संचालन, माइक से दूर और पास आने की उनकी कला, शब्द की अन्तिम ध्वनि को खींचने का उनका कौशल, एक पंक्ति को कई बार दोहराकर सोचने का समय देने की होशियारी, एक भी शब्द कहीं ज़ाया न हो जाए इसकी सावधानी, न कोई भूमिका और न उपसंहार, अगर होते हैं तो सिर्फ़ और सिर्फ़ अशआर। बहुत नहीं सुनाते हैं, लेकिन जो सुना जाते हैं, वह कम नहीं लगता। क्योंकि वे जो सुना गए, उस पर सोचने के लिए कई गुना वक़्त ज़रूरी होता है। वे सामईन को स्तब्ध कर देते हैं। वे अपने जादू की तैयारी नहीं करते, लेकिन जब डायस पर आ जाते हैं तो उनका जादू सिर चढ़कर बोलता है। राहत इन्दौरी का होना एक होना होता है। वे अपनी निज की अनोखी शैली हैं, दुनिया-भर के सैकड़ों शायर उनका अनुकरण करते हैं, लेकिन सिर्फ़ कहन की शैली से क्या होता है, शैली के पीछे सोच और समझ का व्यापक भंडार भी तो होना चाहिए।
‘जुगनुओं ने फिर अँधेरों से लड़ाई जीत ली, चाँद, सूरज घर के रौशनदान में रखे रहे' ये शे’र ये बताता है कि उनके अन्दर इतना हौसला है कि कायनात से चाँद-सूरज को उठाकर वे अपने रौशनदान में रख सकते हैं। रौशनदान दोनों तरफ़ उजाला करता है। घर के अन्दर भी और घर के बाहर भी। अगर वे सूरज, चाँद हैं तो। मुझे लगता है कि राहत इन्दौरी एक रौशनदान हैं, जो आभ्यन्तर लोक को भी देदीप्यमान करते हैं तो बहिर्लोक को भी चुँधिया देते हैं। बहुत लम्बी चर्चा की जा सकती है राहत भाई के बारे में वो कवि-सम्मेलनों और मुशायरों के लिए एक राहत हैं, एक धरोहर हैं क्योंकि वे सामईन की चाहत हैं। मैं दुआ करता हूँ कि राहत भाई कवि-सम्मेलन और मुशायरों को स्तरीय बनाए रखने में अपना योगदान दीर्घकाल तक देते रहें...!
—अशोक चक्रधर
Seepiyaan
- Author Name:
Javed Akhtar
- Rating:
- Book Type:

- Description: कबीर, तुलसी, वृंद, रहीम और बिहारी आदि कवियों ने सदियों पहले अपनी गहरी अन्तर्दृष्टि और मानव-स्वभाव की समझ की बुनियाद पर कुछ बातें कहीं, और इसके लिए उन्होंने कविता का जो रूप चुना, वह था—दोहा। दो पंक्तियों में गुँथी-गठी एक सम्पूर्ण कविता जो तीर की तरह जाकर हमारी चेतना में गड़ जाती है। सैकड़ों सालों से ये दोहे हमारे साथ रहते आए हैं, कभी ये हमें हमारी ख़ामियाँ दिखाते हैं, कभी हमारे रहबर बन जाते हैं, और कभी कोई ऐसा सच बता जाते हैं जिसे हमारी दुनियावी निगाह देखकर भी नहीं देखती। ‘सीपियाँ’ में जावेद अख़्तर ने ऐसे ही कुछ दोहों को चुनकर उनके भीतर छिपे सत्य को आमफ़हम ज़बान में हर किसी के लिए सुलभ कर दिया है। जो बातें इनसे निकलकर आई हैं वे आज भी उतनी ही सच हैं, आज भी उतनी ही उपयोगी हैं, जितनी उस समय थीं, और आगे भी उतनी ही सार्थक रहेंगी। जावेद अख़्तर हमारी आज की रोज़मर्रा ज़िन्दगी से उन्हें जोड़ते हैं और बताते हैं कि कैसे उन पर अमल करके, उनसे मिलनेवाली सीख को अपनाकर हम ख़ुद को बेहतर इनसान और अपनी दुनिया को एक बेहतर समाज बना सकते हैं।
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