Lavanyadevi
(0)
Author:
Kusum KhemaniPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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कुसुम खेमानी के उपन्यास ‘लावण्यदेवी’ का कथा-फ़लक इतना विस्तृत है कि इसमें एक कुटुम्ब की पाँच पीढ़ियों की गाथा समाहित है। गाथा इसलिए कि इसमें केवल प्रभावती, ज्योतिर्मयीदेवी, लावण्यदेवी और उनकी सन्तति तथा नाती-पोतों की दास्तान ही नहीं है; बल्कि इनके बहाने जैसे एक पूरे युग और काल के प्रवाह को भाषा में बाँधने की कोशिश की गई है। ऐसी कथा-वस्तु में बिखराव की आशंका बराबर बनी रहती है, लेकिन कुसुम खेमानी ने अपने रचनात्मक कौशल से जैसा कथा-संयोजन किया है, वह देखते ही बनता है। यह हिन्दी का उपन्यास तो है ही, लेकिन इसकी भाषा में बांग्ला और राजस्थानी के शब्दों को इतनी ख़ूबसूरती से पिरोया गया है कि वे कहीं सायास टाँके गए प्रतीत नहीं होते। सामान्यतः हिन्दी के उपन्यासों में एक लोकभाषा या एक प्रान्तीय भाषा के शब्द ही देखने को मिलते हैं। शमशेर ने जो कहीं लिखा है—‘कवि घँघोल देता है व्यक्तियों के चित्र...’ उसी तरह कहा जा सकता है कि कथाकार ने एक भाषा के जल में दो और भाषाओं के रंगों को ‘घँघोल’ दिया है। फिर जो कथा-भाषा तैयार हुई है; उसे एक शब्द में ‘बतरस’ ही कहा जा सकता है। इस दृष्टि से यह हिन्दी का विलक्षण उपन्यास बन पड़ा है।</p> <p>उपन्यास की कथा में अनेक मोड़ आते हैं। भाषा का प्रवाह तीव्र है और इस कथा-यात्रा में अनुभव के नए और लगभग अछूते प्रदेश उद्घाटित होते चलते हैं। इन कारणों से उपन्यास में ग़ज़ब की पठनीयता आ गई है और ऐसा करना एक समर्थ क़िस्सागो के लिए ही सम्भव था। अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में लावण्यदेवी जिस प्रश्न से टकराती हैं, वह मुक्ति का प्रश्न है, किन्तु यह मुक्ति स्वयं तक या अपने प्रियजनों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आगे चलकर मानव मात्र की मुक्ति में बदलती दिखाई देती है। संसार की भौतिकता से घिरी हुई एक आधुनिक कथा नायिका लावण्यदेवी के भीतर भी कहीं गहरे एक देशज अध्यात्म बचा हुआ है, जो उन्हें संन्यास और वैराग्य के लिए विवश करता है, लेकिन यह संन्यास भी कर्म का स्वीकार ही है जिसका प्रमाण लावण्यदेवी का उत्तर जीवन है। दरअसल लावण्यदेवी का व्यक्तित्व कर्म और संघर्ष की धातुओं से ही बना है, किन्तु ये धातुएँ ठोस और जड़ न होकर उच्चतम मूल्यों के ताप में पिघलती भी दिखाई देती हैं। वे अपनी सन्तति को भी निरन्तर संघर्ष और कर्म का ही सन्देश देती हैं। यह कर्म का ‘स्वीकार’ ही है जिसके चलते लावण्यदेवी प्रारब्ध को ख़ारिज करती हैं और जहाँ ख़ारिज नहीं कर पातीं, वहाँ उसके सामने घुटने भी नहीं टेकतीं। लावण्यदेवी का कर्मशील जीवन और उनके सारे फ़ैसले जनहित में किए जाते हैं। इसमें सन्देह नहीं, उच्चवर्ग की पृष्ठभूमि होने के बावजूद यह उपन्यास, इन्हीं मूल्यों के कारण व्यापक पाठक समाज में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने में सफल रहेगा।</p> <p>—एकान्त श्रीवास्तव
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कुसुम खेमानी के उपन्यास ‘लावण्यदेवी’ का कथा-फ़लक इतना विस्तृत है कि इसमें एक कुटुम्ब की पाँच पीढ़ियों की गाथा समाहित है। गाथा इसलिए कि इसमें केवल प्रभावती, ज्योतिर्मयीदेवी, लावण्यदेवी और उनकी सन्तति तथा नाती-पोतों की दास्तान ही नहीं है; बल्कि इनके बहाने जैसे एक पूरे युग और काल के प्रवाह को भाषा में बाँधने की कोशिश की गई है। ऐसी कथा-वस्तु में बिखराव की आशंका बराबर बनी रहती है, लेकिन कुसुम खेमानी ने अपने रचनात्मक कौशल से जैसा कथा-संयोजन किया है, वह देखते ही बनता है। यह हिन्दी का उपन्यास तो है ही, लेकिन इसकी भाषा में बांग्ला और राजस्थानी के शब्दों को इतनी ख़ूबसूरती से पिरोया गया है कि वे कहीं सायास टाँके गए प्रतीत नहीं होते। सामान्यतः हिन्दी के उपन्यासों में एक लोकभाषा या एक प्रान्तीय भाषा के शब्द ही देखने को मिलते हैं। शमशेर ने जो कहीं लिखा है—‘कवि घँघोल देता है व्यक्तियों के चित्र...’ उसी तरह कहा जा सकता है कि कथाकार ने एक भाषा के जल में दो और भाषाओं के रंगों को ‘घँघोल’ दिया है। फिर जो कथा-भाषा तैयार हुई है; उसे एक शब्द में ‘बतरस’ ही कहा जा सकता है। इस दृष्टि से यह हिन्दी का विलक्षण उपन्यास बन पड़ा है।</p>
<p>उपन्यास की कथा में अनेक मोड़ आते हैं। भाषा का प्रवाह तीव्र है और इस कथा-यात्रा में अनुभव के नए और लगभग अछूते प्रदेश उद्घाटित होते चलते हैं। इन कारणों से उपन्यास में ग़ज़ब की पठनीयता आ गई है और ऐसा करना एक समर्थ क़िस्सागो के लिए ही सम्भव था। अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में लावण्यदेवी जिस प्रश्न से टकराती हैं, वह मुक्ति का प्रश्न है, किन्तु यह मुक्ति स्वयं तक या अपने प्रियजनों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आगे चलकर मानव मात्र की मुक्ति में बदलती दिखाई देती है। संसार की भौतिकता से घिरी हुई एक आधुनिक कथा नायिका लावण्यदेवी के भीतर भी कहीं गहरे एक देशज अध्यात्म बचा हुआ है, जो उन्हें संन्यास और वैराग्य के लिए विवश करता है, लेकिन यह संन्यास भी कर्म का स्वीकार ही है जिसका प्रमाण लावण्यदेवी का उत्तर जीवन है। दरअसल लावण्यदेवी का व्यक्तित्व कर्म और संघर्ष की धातुओं से ही बना है, किन्तु ये धातुएँ ठोस और जड़ न होकर उच्चतम मूल्यों के ताप में पिघलती भी दिखाई देती हैं। वे अपनी सन्तति को भी निरन्तर संघर्ष और कर्म का ही सन्देश देती हैं। यह कर्म का ‘स्वीकार’ ही है जिसके चलते लावण्यदेवी प्रारब्ध को ख़ारिज करती हैं और जहाँ ख़ारिज नहीं कर पातीं, वहाँ उसके सामने घुटने भी नहीं टेकतीं। लावण्यदेवी का कर्मशील जीवन और उनके सारे फ़ैसले जनहित में किए जाते हैं। इसमें सन्देह नहीं, उच्चवर्ग की पृष्ठभूमि होने के बावजूद यह उपन्यास, इन्हीं मूल्यों के कारण व्यापक पाठक समाज में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने में सफल रहेगा।</p>
<p>—एकान्त श्रीवास्तव
Book Details
-
ISBN9788126727506
-
Pages264
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘बिसात : तीन बहनें तीन आख्यान’ एक अनूठी कथा-कृति है। कथा-साहित्य में विख्यात मंजुल भगत, मृदुला गर्ग और अचला बंसल तीनों सगी बहनें हैं। मंजुल भगत अब हमारे बीच नहीं हैं। मृदुला गर्ग व अचला बंसल निरन्तर सक्रिय हैं। तीनों के लेखन की पृथक् पहचान होने के बावजूद कुछ सूत्र ऐसे हैं जिन पर साझा अनुभवों के विविध रंग दिख जाते हैं। मृदुला गर्ग के शब्दों में, ‘तीनों के काफ़ी अनुभव साझा रहे। ज़िन्दगी में कितने ऐसे किरदार थे, जिनसे तीनों का साबका पड़ा। कितने ऐसे हालात थे, जिनका तीनों ने नज़ारा किया! साझा अनुभवों, किरदारों और अहसास ने हमारे भावबोध को गढ़ा और अन्य अनुभवों की तरह, वे भी कभी-न-कभी, किसी-न-किसी रूप में हमारी रचना के आधार बने। रचना जब-जब हुई, निजी अहसास से गढ़ी, मौलिक थी। हर लेखक का नज़रिया अपना अलग था। फिर भी साझा अहसास और अनुभव की गूँज, उसमें साफ़ ध्वनित होती थी। कह सकते हैं, हमने एक ही विषय पर आधारित रचना की पर रचना के दौरान, रचनात्मकता के दबाव में, रचना ने अपना विषय, कुछ हद तक बदल लिया।’ इन तीनों बहनों के बीच नाना की उपस्थिति एक ऐसा ही बहुअर्थपूर्ण अनुभव था। इस अनुभव से तीन रचनाओं ने आकार लिया। मृदुला गर्ग ने ‘वंशज’ उपन्यास रचा। मंजुल भगत ने ‘बेगाने घर में’ और अचला बंसल ने ‘कैरम की गोटियाँ’ कहानियाँ लिखीं। तीनों रचनाओं में अलग-अलग तरह से महसूस किया गया यथार्थ रचनाकारों की निजता के साथ व्यक्त हुआ। ‘बिसात : तीन बहनें तीन आख्यान’
में वंशज, ‘बेगाने घर में’ और ‘कैरम की गोटियाँ’ एक साथ उपस्थित हैं। तीनों को एक साथ पढ़ना वस्तुतः प्रीतिकर और विचारोत्तेजक हैं। जैसे एक ही जीवन-सत्य के तीन आयाम।
Parishishta
- Author Name:
Giriraj Kishore
- Book Type:

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Description:
‘दिनमान’ (5-11 अगस्त, 1984) के ‘फ़िलहाल’ स्तम्भ में, ‘परिशिष्ट’ के बारे में गिरिराज किशोर का कथन छपा था, “अनुसूचित कोई जाति नहीं, मानसिकता है। जिसे अभिजातवर्ग (जिसका वर्चस्व हो) परे ढकेल देता है, वह अनुसूचित हो जाता है।” ‘परिशिष्ट’ इसी भयानक मानसिकता को उद्घाटित करनेवाला एक महाअभियोग है। अपने बहुचर्चित उपन्यास ‘यथा प्रस्तावित’ में भी गिरिराज ने इसी वर्ग की दारुण पीड़ा को चित्रित किया था। राष्ट्रीय महत्त्व की महान शिक्षा-संस्थाओं में किसी तरह दाख़िला प्राप्त करनेवाले साधनहीन और तथाकथित जातिहीन छात्रों की त्रासदी, उबलते तेल में डाल दिए जानेवाले व्यक्ति के संत्रास की तरह होती है जो पहली बार ‘परिशिष्ट’ के रूप में सामने आई है।
राष्ट्रीय स्तर पर ऊँच-नीच और छुआछूत का विष फैला है। आरक्षणवादी नीतियों के बावजूद इनसान को जिस अमानवीय स्थिति का सामना करना पड़ता है, वह हर एक को अपने गिरहबान में मुँह डालकर झाँकने के लिए मजबूर करती है। उपन्यास से पता चलता है कि लेखक उस सबका अन्तरंग साक्षी है। अपनी मुक्ति की लड़ाई लड़नेवाला हर पात्र एक ऐसे दबाव में जीने के लिए मजबूर है जो या तो उसे मरने के लिए बाध्य करता है या फिर संघर्ष को तेज़ कर देने की ख़ामोश प्रेरणा देता है। यह उपन्यास गिरिराज किशोर की पहचान को ही गहरा नहीं करता बल्कि हिन्दी उपन्यास की परम्परा को समृद्ध भी करता है।
एक लड़ाकू जहाज़ की तरह ऊपर उठते-उठते फट पड़नेवाला, उसी वर्ग का एक पात्र रामउजागर आत्महत्या से पहले नोट लिखकर जेब में रख लेता है कि “मेरा जाना स्वेच्छा से है। गवेषणात्मक है। हालाँकि उसका प्रतिफल दूसरों को बाँट पाना सम्भव नहीं होगा।...किसी घृणा या शिकायत के कारण नहीं, एक आत्मीयता और आत्म-सन्तोष के कारण मेरा केवल यही प्रश्न है कि जब प्रकृति, जिससे हम सब कुछ पाते हैं, घृणामुक्त है, तो मनुष्य मुक्त क्यों नहीं?”... उपन्यास का नायक अनुकूल एक संकल्पशील व्यक्ति है जो सहता है, भोगता है और विचलित नहीं होता। वस्तुतः ‘परिशिष्ट’ संत्रास, संघर्ष और संकल्प की महागाथा है।
Dhara Ankurai
- Author Name:
Asghar Wajahat
- Book Type:

- Description: प्रतिष्ठित कथाकार असगर वजाहत की उपन्यास-त्रयी का अन्तिम भाग 'धरा अँकुराई' एक बहुआयामी कथानक को जीवन की सच्चाइयों तक पहुँचाता है। ‘कैसी आगी लगाई’ और ‘बरखा रचाई’ शीर्षक से त्रयी के दो भाग पूर्व में प्रकाशित होकर पर्याप्त प्रशंसा प्राप्त कर चुके हैं। अनेक विवरणों, वृत्तान्तों, परिस्थितियों और अन्त:संघर्षों से गुज़रती यह कथा-यात्रा ‘जीवन के अर्थ’ का आईना बन जाती है। एक दीगर प्रसंग में आया वाक्य है, ‘...यह यात्रा संसार के हर आदमी को जीवन में एक बार तो करनी ही चाहिए।’ यह अन्त:यात्रा है। इससे व्यक्ति जहाँ पहुँचता है, वहाँ एक प्रश्न गूँज रहा है कि आख़िर इस जीवन की सार्थकता व प्रासंगिकता क्या है? उपन्यास-त्रयी के तीन प्रमुख पात्रों में से एक सैयद साजिद अली, जिन्होंने पत्रकारिता की कामयाब ज़िन्दगी जी है, महसूस करते हैं कि उनके भीतर एक ख़ालीपन फैलता जा रहा है। लगता है कि अब तक जिया सब बेमक़सद रहा। सैयद साजिद अली ‘ज़िन्दगी का अर्थ’ समझने के लिए उसी छोटी-सी जगह लौटते हैं, जहाँ से निकलकर वे जाने कहाँ-कहाँ गए थे। उपन्यासकार ने छोटी-छोटी घटनाओं के ज़रिए व्यक्ति और समाज की कशमकश को शब्द दिए हैं। प्रवाहपूर्ण भाषा ने पठनीयता में इज़ाफ़ा किया है। मौक़े-ब-मौक़े उपन्यास में वर्तमान की समीक्षा भी है, ‘‘जनता का पैसा किसी का पैसा नहीं है। यह माले-मुफ़्त है जो हमारे देश में बेदर्दी से बहाया जाता है और इसकी बारिश में अफ़सर, नेता और ठेकेदार नहाते हैं। हमने लोकतंत्र के साथ-साथ ‘विकास’ का भी एक विरला स्वरूप विकसित किया है जो कम ही देशों में देखने को मिलेगा। एक पठनीय व संग्रहणीय उपन्यास।
Dhukani Evam Anya Kahaniyan
- Author Name:
Neeraj Neer
- Book Type:

- Description: "नीरज नीर ने कुछ ही समयावधि में एक संभावनाशील कथाकार के रूप में अपनी पुख्ता पहचान बना ली है। उनका यह पहला कथा-संग्रह इस मायने में महत्त्वपूर्ण है कि उनके पास कहने को भी बहुत कुछ है और कहने की भंगिमा भी। दरअसल लेखक की परख इस बात से भी होती है कि वह किन चीजों को कहाँ से देख रहा है। इस मामले में नीरज नीर की पोजिशनिंग बिल्कुल स्पष्ट है। तकरीबन सभी पात्र निम्नवर्गीय या निम्नमध्यवर्गीय हैं, जिनके हर्ष-विषाद, संबंधों के घात-प्रतिघात, सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने से उनके संघर्ष की कल्पना होती है, जैसे हर चरित्र असीम दुःख के पहाड़ को पूरी ताकत के साथ ठेलने की कोशिश कर रहा है और इस कोशिश में लहूलुहान हो रहा है। इन कहानियों में कथ्य की वैविध्यता अपने ऐश्वर्य के साथ मौजूद है। नीरज नीर की कहानियों की डिटेलिंग कभी-कभी चमत्कृत कर देती है कि लेखक अपने पात्रों के जीवन तल में कितने गहरे उतरा है और पाठक को भी हाथ पकड़कर उन गहराइयों में ले जाने को बाध्य भी करता है। नीरज नीर न तो जटिल शिल्प के आग्रही हैं और न ही अलंकृत भाषा की चकाचौंध के। बिल्कुल उनकी कहानियों के चरित्रों की तरह सादगी ही शिल्प है और जीवन की तरह प्रवाहमयी भाषा-निर्द्वंद्व, झलमल, यथानाम नीर की तरह बहती हुई। —पंकज मित्र सुप्रसिद्ध कथाकार "
Bhagawan Parshuram
- Author Name:
K. M. Munshi
- Book Type:

- Description: आर्य-संस्कृति का उषःकाल ही था, जब भृगुवंशी महर्षि जमदग्नि-पत्नी रेणुका के गर्भ से परशुराम का जन्म हुआ। यह वह समय था जब सरस्वती और हषद्वती नदियों के बीच फैले आर्यावर्त्त में यदु और पुरु, भरत और तृत्सु, तर्वसु और अनु, द्रह्यू और जन्हु तथा भृगु जैसी आर्य जातियाँ निवसित थीं और जहाँ वसिष्ठ, विश्वामित्र, जमदग्नि, अंगिरा, गौतम और कण्व आदि महापुरुषों के आश्रमों से गुंजरित दिव्य ऋचाएँ आर्यधर्म का संस्कार-संस्थापन कर रही थीं। लेकिन दूसरी ओर सम्पूर्ण आर्यावर्त्त, नर्मदा से मथुरा तक शासन कर रहे हैहयराज सहस्रार्जुन के लोमहर्षक अत्याचारों से त्रस्त था। ऐसे में युवावस्था में प्रवेश कर रहे परशुराम ने आर्य-संस्कृति को ध्वस्त करने वाले हैहयराज की प्रचंडता को चुनौती दी और अपनी आर्यनिष्ठा, तेजस्विता, संगठन-क्षमता, साहस और अपरिमित शौर्य के बल पर विजयी हुए। संक्षेप में कहें तो यह उपन्यास एक युगपुरुष की ऐसी शौर्यगाथा है जो किसी भी युग में अन्याय और दमन के सक्रिय प्रतिरोध की प्रेरणा देती रहेगी।
Ration Card Ka Dukh
- Author Name:
Jugnu Shardey
- Book Type:

- Description: "एक युग से आँसुओं, नारों, माँगों और फोटू कमेटी की बरसात हो रही थी। कल गरमी के बावजूद संसद् के एयरकंडीशन से कलेजे में ठंडक लिये वैसे ही मुसकराई देश की संसदीय महिलाएँ, जैसे कभी मुसकराती थीं टूथपेस्ट बेचनेवाली महिलाएँ। आखिर पेश हो गया राज्यसभा में संविधान संशोधन 108वाँ विधेयक। इसमें संसद् और विधानसभा में आबादी के 50 प्रतिशत को 33 प्रतिशत रिजर्वेशन मिल सकेगा। चाणक्य कहते हैं, कहते हैं या नहीं पता नहीं, क्योंकि स्तंभकार ने चाणक्य का अर्थशास्त्र नहीं पढ़ा है, लेकिन छोटी बात को बड़ी बनाने के लिए बड़े लोगों का नाम लेना चाहिए। इसीलिए चाणक्य कहते हैं कि कुछ भी लिखने के पहले सोचसमझ लेना चाहिए। सोचसमझ के लेखन का मतलब होता है कि लिखने के पहले सोचा ही न जाए। जन्म बीत जाए सोचतेसोचते। लेखन तो बस साप्ताहिक मुद्रास्फीति लेखन है कि बस प्रतिशत बढ़ाते या घटाते जाना लिखना भर होता है। फिर भी इस स्तंभकार ने बाकायदा खोजबीन की। ब्रेकिंगन्यूज के बकवासी खतरों और टीवीयाना बहसों की सिरदर्द के बावजूद खबरिया चैनलों को देख गया। रंगीन विज्ञापनों से भरे अगरमगरलेकिनपरंतु वाले प्रिंट मीडिया को पढ़कर चश्मे का नंबर बढ़ गया। इंटरनेटीय सर्च इंजनों को झाँक गया, जहाँ एक विषय पर लाखों भड़ासी जानकारियाँ होती हैं। तब जाकर समझ में आया कि शोधअनुसंधान के लिए विषय का होना जरूरी होता है। अब तक सारी खोजबीन बिना विषय के हो रही थी। विषय भी तय कर लिया गया—देश और गांधीजी के तीन बंदर का व्यावहारिक संबंध।"
Rabindranath Tagore Gora
- Author Name:
Rabindranath Tagore
- Book Type:

- Description: English Translation of Rabindranath Tagore's Bengali novel Gora. Gora consists of two parallel love stories of two pairs of lovers: Gora and Sucharita, Binoy and Lolita. Their emotional development is shown in the background of the social and political problems prevalent in India towards the end of the 19th-century. The novel is the longest novel written by Tagore. It deeply influences the Indian society and emerged as a debate between Brahmo Samaj and Hinduism.
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