Grahakon Ko Khush Rakhna Seekhen
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"ग्राहकों को खुश रखना सीखें ग्राहक की खुशी को सुनिश्चित करना या यूँ कहें कि ग्राहक की संतुष्टि उसके प्रति उत्तरदायित्व का मूल तत्त्व है। जिस व्यवसाय में ग्राहक के प्रति जितना ज्यादा उत्तरदायित्व होगा, वह व्यवसाय उतना ही अधिक सफल होगा। इसलिए ग्राहकों की बात सुनिए, अपने उनकी इज्जत कीजिए, उनकी जरूरतों का आदर कीजिए, उनसे मिले अनुभवों पर ध्यान (आलोचना नहीं) दीजिए, उनकी प्रशंसा कीजिए कि आप उनकी वजह से ही यहाँ हैं, और सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात कि नम्र बनिए, तब आप किसी भी व्यवसाय के लिए ‘श्रेष्ठ व्यक्ति’ हैं। यह पुस्तक सलाह देती है कि अपने ग्राहकों की आवश्यकताओं और दुविधाओं के प्रति मित्रतापूर्ण व्यवहार प्रदर्शित कीजिए। ग्राहक की अधिक खुशी के लिए कम वादे करें और अधिक काम करें। महात्मा गांधी ने भी कहा था कि ‘ग्राहक भगवान् का रूप होता है।’ व्यवसाय की सफलता भी इसी ग्राहक-रूपी भगवान् की मुसकान में छिपी है। सरल-सुबोध भाषा में ग्राहकों/कस्टमर्स को खुश करके व्यावसायिक उन्नति के मूलमंत्र बताती एक रोचक एवं पठनीय पुस्तक। "
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"ग्राहकों को खुश रखना सीखें
ग्राहक की खुशी को सुनिश्चित करना या यूँ कहें कि ग्राहक की संतुष्टि उसके प्रति उत्तरदायित्व का मूल तत्त्व है। जिस व्यवसाय में ग्राहक के प्रति जितना ज्यादा उत्तरदायित्व होगा, वह व्यवसाय उतना ही अधिक सफल होगा। इसलिए ग्राहकों की बात सुनिए, अपने उनकी इज्जत कीजिए, उनकी जरूरतों का आदर कीजिए, उनसे मिले अनुभवों पर ध्यान (आलोचना नहीं) दीजिए, उनकी प्रशंसा कीजिए कि आप उनकी वजह से ही यहाँ हैं, और सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात कि नम्र बनिए, तब आप किसी भी व्यवसाय के लिए ‘श्रेष्ठ व्यक्ति’ हैं।
यह पुस्तक सलाह देती है कि अपने ग्राहकों की आवश्यकताओं और दुविधाओं के प्रति मित्रतापूर्ण व्यवहार प्रदर्शित कीजिए। ग्राहक की अधिक खुशी के लिए कम वादे करें और अधिक काम करें। महात्मा गांधी ने भी कहा था कि ‘ग्राहक भगवान् का रूप होता है।’ व्यवसाय की सफलता भी इसी ग्राहक-रूपी भगवान् की मुसकान में छिपी है। सरल-सुबोध भाषा में ग्राहकों/कस्टमर्स को खुश करके व्यावसायिक उन्नति के मूलमंत्र बताती एक रोचक एवं पठनीय पुस्तक।
"
Book Details
-
ISBN9788173158933
-
Pages112
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘गुज़रा हुआ ज़माना’ कृष्ण बलदेव वैद की रचनाशीलता का एक विशेष आयाम है। 1957 में प्रकाशित उनका पहला उपन्यास ‘उसका बचपन’ आज भी अपने शिल्प और शैली के आधार पर हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिना जाता है। उसमें श्री वैद ने एक अति संवेदनशील बच्चे के दृष्टिकोण से पश्चिमी पंजाब के एक निर्धन परिवार की कलह और पीड़ा का संयत और साफ़ चित्रण करके कथा साहित्य को एक नई गहराई दी थी, एक नया स्वर दिया था।
1981 में प्रकाशित ’गुज़रा हुआ ज़माना’ उसी उपन्यास की अगली कड़ी है। इसमें ‘उसका बचपन’ का केन्द्रीय पात्र बीरू अपने परिवार की सीमाओं से बाहर की दुनिया को भी देखता है, उससे उलझता है। इसमें अनेक घटनाओं, पात्रों और पीड़ाओं से एक प्यारे और पेचीदा कस्बे का सामूहिक चित्र तैयार किया गया है। इस चित्र को देखकर दहशत भी होती है और श्री वैद की निराली नज़र के दर्शन भी। इसमें देश-विभाजन सम्बन्धी साम्प्रदायिक पागलपन को उभारा भी गया है और लताड़ा भी। ‘गुज़रा हुआ ज़माना’ देश-विभाजन को लेकर लिखे गए उपन्यासों में एक अलग और विशिष्ट स्थान पिछले दो दशकों से बनाए हुए है। इसका यह संस्करण, आशा है, उस स्थान को और स्थिरता प्रदान करेगा।
Nadi
- Author Name:
Usha Priyamvada
- Book Type:

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‘बस—बहने दो जीवन सरिता को कहीं-न-कहीं—जल्दी या देरी से—कोई-न-कोई हल तो निकलेगा।' यही सूत्र है 'नदी' उपन्यास का। हिन्दी कथा-साहित्य में अविस्मरणीय ख्याति प्राप्त कर चुकीं उषा प्रियम्वदा का यह नया उपन्यास पठनीयता का पुनर्नवन है। नियति, अबूझ जीवन, प्रारब्ध—क्या नाम दें उस घटनाक्रम को जो 'नदी' की नायिका आकाशगंगा को जाने किस-किस रूप में कहाँ-कहाँ से विस्थापित करता है।
विदेश में निवास करती आकाशगंगा पुत्र भविष्य की मृत्यु के लिए इस सीमा तक अपने पति द्वारा उत्तरदायी मानी जाती है कि परिवार से विच्छिन्न कर दी जाती है। पति गगनेन्द्र दो बेटियों सहित भारत आ जाते हैं। यहीं से एकाकी छूट गई आकाशगंगा का संघर्ष प्रारम्भ होता है। वह अर्जुन सिंह और एरिक के प्रगाढ़ सम्पर्क में आती है। भारत लौटकर सास-ससुर, बेटियों की आत्मीयता में घिरने लगती है कि एक प्राय: अप्रत्याशित स्थिति उसे दूरदेश ले आती है।
प्रवीण दम्पति के साथ रहकर गंगा जीवन का नया अध्याय शुरू करती है। और एरिक के साहचर्य से उत्पन्न उसका बेटा स्तव्य स्टीवेन! आकाशगंगा अपने जीवन-प्रवाह में जिन ऊँचाइयों, गहराइयों, मैदानों, घाटियों, संकीर्ण-पथों प्रशस्त पाटों से गुज़रती है, उन्हें उषा प्रियम्वदा ने जीवन्त कर दिया है।
उषा प्रियम्वदा ने आकाशगंगा के बहाने स्त्री-जीवन के कटु-कठोर यथार्थ का मार्मिक चित्रण किया है। भाषा और शैली के लिए तो वे अलग से पहचानी ही जाती हैं।
‘नदी' जीवन-प्रवाह का ऐसा दृश्य...जिसमें अदृश्य के अँधेरे देर तक चमकते रहते हैं।
Manushya Ke Roop
- Author Name:
Yashpal
- Book Type:

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“लेखक को कला की महानता इसमें है कि उसने उपन्यास में यथार्थ से ही सन्तोष किया है। अर्थ और काम की प्रेरणाओं की विगर्हणा उसने स्पष्ट कर दी है। अर्थ की समस्या जिस प्रकार वर्ग और श्रेणी के स्वरूप को लेकर खड़ी हुई है, उसमें उपन्यासकार ने अपने पक्ष का कोई कल्पित उपलब्ध स्वरूप एक स्वर्ग, प्रस्तुत नहीं किया...अर्थ सिद्धान्त की किसी अयथार्थ स्थिति की कल्पना उसमें नहीं। समस्त उपन्यास का वातावरण बौद्धिक है। अत: आदि से अन्त तक यह यथार्थवादी है।...मनुष्यों की यथार्थ मनोवृत्ति का चित्रांकन करने की लेखक ने सजग चेष्टा की है।...यह उपन्यास लेखक के इस विश्वास को सिद्ध करता है कि परिस्थितियों से विवश होकर मनुष्य के रूप बदल जाते हैं।
‘मनुष्य के रूप' में मनुष्य की हीनता और महानता के यथार्थ चित्रण का एक विशद प्रयत्न किया गया है।”
—डॉ० सत्येन्द्र
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