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यह धर्म-कर्म के बल पर अन्तत: स्वर्ग पहुँच गए आदमी की कथा है। वही धर्म-कर्म जिससे हम सब परिचित हैं, यानी अपने स्वार्थों की अमानवीय होने की हद तक हिफ़ाज़त करते हुए पूजा-पाठ का अटूट पालन; आदमी भी वही जिसे हमने अपनी 'सबसे प्राचीन सभ्यता' के काई-शैवाल को छानकर निकाला है, यानी अन्तर्तम से निहायत धर्मविरोधी एक 'धार्मिक' और ईश्वर-आस्था को भौतिक प्राप्तियों के लिए इस्तेमाल करनेवाला एक चालाक प्राणी। और स्वर्ग भी वही जिसकी कामना हिन्दू धर्म के चार पुरुषार्थों में गिनी जाती है।</p> <p>इस उपन्यास के बहाने विष्णु नागर ने स्वर्ग, मनुष्य और धर्म—इन तीनों की व्याख्या की है। साथ में उस समाज की भी जिसे हमने नरक के सतत भय, ईश्वर की सर्वव्यापी मौजूदगी और तैंतीस करोड़ देवताओं की निरन्तर निगहबानी के बावजूद सफलतापूर्वक रचा। एक स्वभक्षी समाज। उपन्यास के नायक गेंदमल जी स्वर्ग में भी उसी समाज को ढूँढ़ने और बनाने की कोशिश करते हैं और भारतवर्ष की महान परम्पराओं की लाज रखते हुए बनाने में सफल भी होते हैं। यही नहीं, वहाँ के अधिपति का पद प्राप्त करते हैं।</p> <p>विष्णु नागर ने कवि के रूप में सामाजिक और मानवीय सरोकारों की जो सहज व्याप्ति सम्भव की है, वही उनकी व्यंग्य कथाओं भी अन्यतम विषेषता है। इस उपन्यास में उन्होंने उसे एक बड़े कैनवस पर साधा है। धर्म और ईश्वर, और इनकी सामाजिक राजनीति हमेशा विष्णु जी का प्रिय विषय रही है। इस उपन्यास में उन्होंने इसका पूरा पाठ पेश किया है।
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यह धर्म-कर्म के बल पर अन्तत: स्वर्ग पहुँच गए आदमी की कथा है। वही धर्म-कर्म जिससे हम सब परिचित हैं, यानी अपने स्वार्थों की अमानवीय होने की हद तक हिफ़ाज़त करते हुए पूजा-पाठ का अटूट पालन; आदमी भी वही जिसे हमने अपनी 'सबसे प्राचीन सभ्यता' के काई-शैवाल को छानकर निकाला है, यानी अन्तर्तम से निहायत धर्मविरोधी एक 'धार्मिक' और ईश्वर-आस्था को भौतिक प्राप्तियों के लिए इस्तेमाल करनेवाला एक चालाक प्राणी। और स्वर्ग भी वही जिसकी कामना हिन्दू धर्म के चार पुरुषार्थों में गिनी जाती है।</p>
<p>इस उपन्यास के बहाने विष्णु नागर ने स्वर्ग, मनुष्य और धर्म—इन तीनों की व्याख्या की है। साथ में उस समाज की भी जिसे हमने नरक के सतत भय, ईश्वर की सर्वव्यापी मौजूदगी और तैंतीस करोड़ देवताओं की निरन्तर निगहबानी के बावजूद सफलतापूर्वक रचा। एक स्वभक्षी समाज। उपन्यास के नायक गेंदमल जी स्वर्ग में भी उसी समाज को ढूँढ़ने और बनाने की कोशिश करते हैं और भारतवर्ष की महान परम्पराओं की लाज रखते हुए बनाने में सफल भी होते हैं। यही नहीं, वहाँ के अधिपति का पद प्राप्त करते हैं।</p>
<p>विष्णु नागर ने कवि के रूप में सामाजिक और मानवीय सरोकारों की जो सहज व्याप्ति सम्भव की है, वही उनकी व्यंग्य कथाओं भी अन्यतम विषेषता है। इस उपन्यास में उन्होंने उसे एक बड़े कैनवस पर साधा है। धर्म और ईश्वर, और इनकी सामाजिक राजनीति हमेशा विष्णु जी का प्रिय विषय रही है। इस उपन्यास में उन्होंने इसका पूरा पाठ पेश किया है।
Book Details
-
ISBN9788126726400
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘खिलेगा तो देखेंगे’ विनोद कुमार शुक्ल का बहुत चर्चित उपन्यास है। आदिवासी जीवन और परिवेश के दृश्यों में रचे-बसे इस उपन्यास में भी विनोद कुमार शुक्ल की वह कथा-शैली देखने को मिलती है जो उनका अपना आविष्कार है। बिना किसी ठोस कथा-सूत्र के ‘खिलेगा तो देखेंगे’ एक सामूहिक जीवन की कथा कहता है, जिसमें असाधारण शिल्प में बुनी दृश्यावली और कल्पनाशील बिम्बों के द्वारा साधनहीनों और अकसर मूक रहनेवाले लोगों के सुख और दु:ख ख़ुद-ब-ख़ुद सामने आकर अपने आपको दिखाते हैं। यह उपन्यास जो आप को बताता है, आप उससे ज़्यादा महसूस कर पाते हैं जिसका श्रेय विनोद कुमार शुक्ल के जादू जैसे गद्य, उनकी दृष्टि और भाषा को जाता है। प्रकृति इस कथा में जीवन की भी सहचरी है, पीड़ा और प्रसन्नताओं की भी, और उस उम्मीद की भी जिसे विनोद कुमार शुक्ल हर हाल में बचाए रखते हैं।
Banbhatt Ki Aatmakatha
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
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आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की विपुल रचना-सामर्थ्य का रहस्य उनके विशद शास्त्रीय ज्ञान में नहीं, बल्कि उस पारदर्शी जीवन-दृष्टि में निहित है, जो युग का नहीं युग-युग का सत्य देखती है। उनकी प्रतिभा ने इतिहास का उपयोग ‘तीसरी आँख’ के रूप में किया है और अतीत-कालीन चेतना-प्रवाह को वर्तमान जीवनधारा से जोड़ पाने में वह आश्चर्यजनक रूप से सफल हुई है। बाणभट्ट की आत्मकथा अपनी समस्त औपन्यासिक संरचना और भंगिमा में कथा-कृति होते हुए भी महाकाव्यत्व की गरिमा से पूर्ण है। इसमें द्विवेदी जी ने प्राचीन कवि बाण के बिखरे जीवन-सूत्रों को बड़ी कलात्मकता से गूँथकर एक ऐसी कथाभूमि निर्मित की है जो जीवन-सत्यों से रसमय साक्षात्कार कराती है। इसमें वह वाणी मुखरित है जो सामगान के समान पवित्रा और अर्थपूर्ण है-‘सत्य के लिए किसी से न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्रा से भी नहीं; लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।’ बाणभट्ट की आत्मकथा का कथानायक कोरा भावुक कवि नहीं वरन कर्मनिरत और संघर्षशील जीवन-योद्धा है। उसके लिए ‘शरीर केवल भार नहीं, मिट्टी का ढेला नहीं’, बल्कि ‘उससे बड़ा’ है और उसके मन में आर्यावर्त्त के उद्धार का निमित्त बनने की तीव्र बेचैनी है। ‘अपने को निःशेष भाव से दे देने’ में जीवन की सार्थकता देखने वाली निउनिया और ‘सबकुछ भूल जाने की साधना’ में लीन महादेवी भट्टिनी के प्रति उसका प्रेम जब उच्चता का वरण कर लेता है तो यही गूँज अंत में रह जाती हैद-‘‘वैराग्य क्या इतनी बड़ी चीज है कि प्रेम देवता को उसकी नयनाग्नि में भस्म कराके ही कवि गौरव का अनुभव करे?’’
Mahabhoj
- Author Name:
Mannu Bhandari
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मन्नू भंडारी का ‘महाभोज’ उपन्यास इस धारणा को तोड़ता है कि महिलाएँ या तो घर-परिवार के बारे में लिखती हैं, या अपनी भावनाओं की दुनिया में ही जीती-मरती हैं। ‘महाभोज’ विद्रोह का राजनैतिक उपन्यास है। जनतंत्र में साधारण जन की जगह कहाँ है? राजनीति और नौकरशाही के सूत्रधारों ने सारे ताने-बाने को इस तरह उलझा दिया है कि वह जनता को फाँसने और घोटने का जाल बनकर रह गया है। इस जाल की हर कड़ी ‘महाभोज’ के दा साहब की उँगलियों के इशारों पर सिमटती और खुलती है। हर सूत्र के वे कुशल संचालक हैं। उनकी सरपरस्ती में राजनीति के खोटे सिक्के समाज चला रहे हैं—खरे सिक्के एक तरफ़ फेंक दिए गए हैं। ‘महाभोज’ उपन्यास भ्रष्ट भारतीय राजनीति के नग्न यथार्थ को प्रस्तुत करता है। अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में इस महत्त्वपूर्ण उपन्यास के अनुवाद हुए हैं और ‘महाभोज’ नाटक तो दर्जनों भाषाओं में सैकड़ों बार मंचित होता रहा है। ‘नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा’ (दिल्ली) द्वारा मंचित ‘महाभोज’ नाटक राष्ट्रीय नाट्य-मंडल की गौरवशाली प्रस्तुतियों में अविस्मरणीय है। हिन्दी के सजग पाठक के लिए अनिवार्य उपन्यास है ‘महाभोज’।
Nadi Ke Dweep
- Author Name:
Sachchidananda Hirananda Vatsyayan 'Ajneya'
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व्यक्ति अज्ञेय की चिंतन-धरा का महत्तपूर्ण अंग रहा है, और ‘नदी के द्वीप’ उपन्यास में उन्होंने व्यक्ति के विकसित आत्म को निरुपित करने की सफल कोशिश की है-वह व्यक्ति, जो विराट समाज का अंग होते हुए भी उसी समाज की तीव्रगामी धाराओं, भंवरों और तरंगो के बीच अपने भीतर एक द्वीप की तरह लगातार बनता, बिगड़ता और फिर बनता रहता है । वेदना जिसे मांजती है, पीड़ा जिसे व्यस्क बनाती है, और धीरे-धीरे द्रष्टा । अज्ञेय के प्रसिद्द उपन्यास ‘शेखर : एक जीवनी’ से संरचना में बिलकुल अलग इस उपन्यास की व्यवस्था विकसनशील व्यक्तियों की नहीं, आंतरिक रूप से विकसित व्यक्तियों के इर्द-गिर्द बुनी गई है । उपन्यास में सिर्फ उनके आत्म का उदघाटन होता है । समाज के जिस अल्पसंख्यक हिस्से से इस उपन्यास के पत्रों का सम्बन्ध है, वह अपनी संवेदना की गहराई के चलते आज भी समाज की मुख्यधारा में नहीं है । लेकिन वह है, और ‘नदी के द्वीप’ के चरों पत्र मानव-अनुभूति के सर्वकालिक-सार्वभौमिक आधारभूत तत्त्वों के प्रतिनिधि उस संवेदना-प्रवण वर्ग की इमानदार अभिव्यक्ति करते हैं । ‘नदी के द्वीप’ में एक सामाजिक आदर्श भी है, जिसे अज्ञेय ने अपने किसी वक्तव्य में रेखांकित भी किया था, और वह है-दर्द से मंजकर व्यक्तित्व का स्वतंत्र विकास, ऐसी स्वतंत्रता की उद्भावना जो दूसरे को भी स्वतंत्र करती हो । व्यक्ति और समूह के बीच फैली तमाम विकृतियों से पीड़ित हमारे समाज में ऐसी कृतियाँ सदैव प्रासंगिक रहेंगी ।
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