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Poems
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Poems
Book Details
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ISBN9789381923788
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Pages136
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Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: वरिष्ठ कवि गंगेश गुंजनक 'अन्हार मे डमरू' घुप्प अन्हरियाक विरुद्ध इजोत तकबाक विलक्षण काव्य-प्रयासक नाम थिक। सम्पूर्ण सम्भावनाक संग कविक दायित्व-बोध आ काव्य-विवेकक मणिकांचन सहकार संग्रहक वैशिष्ट्य। 'धानक शीश जकाँ फुटैत' जाग्रत कविताक 'बगूचा' अछि—'अन्हार मे डमरू'। चमत्कृत करैत कविताक रेंज आ कविक निजी काव्य-भाषाक सौंदर्य कविता केँ नव सृजनशीलता सँ भरि दैछ। मिथिलाक संस्कृति सँ अथाह अनुराग आ रूढ़ अपसंस्कृतिक प्रति घोर चिंताक अंतर्द्वंद्व सँ बनैत कविता विमर्शक लेल पाठक केँ सहजहि हकारैत अछि। 'प्रथम चुम्बनक कृतज्ञता' आ 'दोसर चुम्बनक कृतघ्नता' सँ ल' क' 'कुसियारक पर्याय बनैत स्त्रीक जीवन-कथा', 'धुआँइन ढेकार जकाँ सुन्न दालन पर' 'पुरना मिथिलाक्षरक पाण्डुलिपि जकाँ' पड़ल लोकतंत्रक ठठरी, दिल्ली नगरक त्रासद तामस, जबियाअल मनुक्खक सामने अकादारुन बजार वा 'यात्रीजीक एक कंठ मे सय-पचास लाखक प्रतिध्वनि'; ई सभ टा स्वर समवेत रूपेँ 'अन्हार मे डमरू:क परिसर मे भेटि जैत। बहुस्वरता, विषय-बहुलता आ कथन-भंगीक विविधता संग्रहक नवीनता थिक। प्रतीक, बिंब सँ सुसज्जित एक टा पारदर्शी महीन काव्य-आवरण कविता केँ कुहेसगर नहि बना जीवन-जगतक अलक्षित समय केँ दर्शबैत अछि। गुंजनजीक कविताक संवादधर्मिता हुनक कविता केँ सहज बोधगम्य तँ बनबैत अछि, मुदा ई सहजता सरलता नहि अपितु विषय-वस्तुक समग्रता आ जटिलता केँ सरलता सँ बुझबाक काव्य-युक्ति अछि। —कमलानंद झा
Dilli
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

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Description:
style="font-weight: 400;">‘दिनकर’ की कविताओं में जो गीतात्मक लयात्मकता है वह ‘दिल्ली’ संग्रह की कविताओं में भी मुखर है। इसमें चार कविताएँ संकलित हैं जो दिल्ली के यथार्थ और निहितार्थ को इतने अनूठे ढंग से प्रकट करती हैं कि यह शहर एक प्रतीक बनकर सामने आता है।
संग्रह की पहली कविता ‘नई दिल्ली के प्रति’ 1929 की है। इसकी पृष्ठभूमि में नई दिल्ली का प्रवेशोत्सव है जो 1929 में मनाया गया था। उसी वर्ष भगत सिंह पकड़े गए और लाहौर-कांग्रेस में पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पास हुआ। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के उस उथल-पुथल भरे दौर में उत्सव और दमन के विरोधाभासों को यह कविता बखूबी मूर्त करती है।
संग्रह की दूसरी कविता ‘दिल्ली और मास्को’ है जिसका रचनाकाल 1945 का है। इसमें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और समाजवादी क्रान्ति का जयघोष निहित है जो राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय राजनीतिक घटनाक्रमों की प्रभावी भूमिकाओं को दिल्ली के सन्दर्भों में देखे जाने की माँग करती है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व रचित उपरोक्त दोनों कविताओं के विपरीत शेष दो कविताएँ—‘हक़ की पुकार’ और ‘भारत का यह रेशमी नगर’—स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद क्रमश: 1952 और 1954 की हैं। इन दोनों कविताओं में दिल्ली का तत्कालीन यथार्थ तो प्रकट हुआ ही है, वह विलासी रूप भी उजागर हुआ है जिससे राजनीतिक कर्मठता को प्रेरणा नहीं मिलती, उलटे बाधा पड़ती है। दिनकर कहते हैं कि देश के नवनिर्माण का कार्य जो इतनी धीमी गति से चल रहा है, उसका भी मुख्य कारण यही है कि कार्याधिकारी देश की आकुलता से अपरिचित हैं। जबकि दिल्ली हमारी सारी शिराओं का केन्द्र है। इसी ऊहापोह की राजनीतिक स्थिति से जो क्षोभ उठता है, वही इन कविताओं का मूल भाव है।
राष्ट्रीय राजधानी पर लिखी इन कविताओं को एक साथ पढ़ने पर पाठक कवि के उपरोक्त दृष्टिकोण को कुछ अधिक न्याय के साथ ग्रहण कर सकेंगे।
Hajra Ka Burqa Dheela Hai
- Author Name:
Dr. Tabassum Jahan
- Book Type:

- Description: हाजरा का बुर्का ढीला है', डॉ. तबस्सुम जहान की एक आकर्षक हिंदी साहित्यिक कृति है। इस सोच-समझकर तैयार की गई किताब में एक कलात्मक आवरण है, जो शरद ऋतु के रंगों की एक गर्म, अलौकिक पृष्ठभूमि के खिलाफ एक सुंदर सिल्हूट को दर्शाता है। सुंदर हिंदी टाइपोग्राफी और सौंदर्यपूर्ण डिजाइन तत्व कथा विषयों के साथ सहजता से मिश्रित होते हैं। साहित्य के प्रति उत्साही और कविता प्रेमियों के लिए बिल्कुल सही, यह पुस्तक आपके संग्रह में एक सार्थक वृद्धि का वादा करती है।
Anterlok : Adhyatm Sambandhi Kavitayen
- Author Name:
Nandkishore Acharya
- Book Type:

- Description: कविता बल्कि कला मात्र अपने आपमें एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है—चाहे उसकी विषय–वस्तु कुछ भी हो। स्पष्ट है कि इलियट के लिए धर्म किसी ‘आधि–प्राकृतिक सत्ता में विश्वास’ करना है जबकि आर्नाल्ड के लिए वह मानवमात्र को जोड़ने और जीवन को अर्थ प्रदान करनेवाली चीज़ है; बल्कि कह सकते हैं कि मानवमात्र के जुड़ाव का, संलग्नता का या अद्वैत का यह अनुभव ही जीवन को अर्थ देनेवाली चीज़ है। ‘आलोक के अनन्त का उद्घाटन’—किसी भी धार्मिक–आध्यात्मिक अनुभव की केन्द्रीय अन्तर्वस्तु यही है। उस उद्घाटन का आलम्बन कोई वैयक्तिक ईश्वर है या कोई निर्वैयक्तिक सत्ता अथवा सम्पूर्णत: भौतिक जगत के अन्तर्भूत एकत्व का बोध, इससे अनुभूति की गहराई में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, यदि वह कवि–कलाकार की अनुभूति है। धार्मिक या आध्यात्मिक अनुभव का अर्थ अपने अस्तित्व के अर्थ की तलाश है। इसके लिए ईश्वर जैसी किसी आधि–प्राकृतिक सत्ता पर विश्वास की अनिवार्यता नहीं है। जिस प्रकार विरह–काव्य अथवा वियोग–शृंगार भी प्रेमकाव्य ही हैं, उसी प्रकार जीवन का अर्थ खो देने की पीड़ा और उसे पाने की विकलता भी प्रकारान्तर से धार्मिक–आध्यात्मिक अनुभव ही है। पॉल टिलिच के शब्दों में, ‘‘जो यह अनुभव करता है कि वह अर्थ के चरम स्रोत से विलग हो गया है, वह अपनी इस प्रतीति द्वारा यह प्रगट करता है कि वह केवल विलग ही नहीं है, वह फिर से संयुक्त हो चुका है।’’ लेकिन यह संयुक्ति किसी सरल और रूढ़िबद्ध धार्मिक विश्वास से नहीं होती, वह उस वेदना में से उपजती है जिसे कार्ल जैस्पर्स ‘ईश्वर के लिए ईश्वर से भावोद्वेगपूर्ण संघर्ष’ कहता है । इसलिए आधुनिक कविता या कला जो सवाल पूछती है, उसका कोई निश्चित समाधान उसके पास नहीं होता; बल्कि उसकी वेदना ही उसका समाधान हो जाती है। इस संकलन में हिन्दी में सक्रिय सभी पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व कमोबेश हो सका है जिससे आध्यात्मिक संवेदन के बदलते काव्य–रूपों से हमारा परिचय हो सके।
Samar Gatha
- Author Name:
Narendra Jain
- Book Type:

- Description: लब खुले, बाँहें फैलीं,खामोशी को तोड़ते शब्द और अहर्निश नदी की तरह बहते विचार एवं उनके समुच्चय का नाम है‘समर गाथा’। यह सिर्फ एक विचार पर कदमताल करते स्वरों का कलरव नहीं, बल्कि अलग-अलगसमय में उपजे विचारों का संकलन है। यह ताली-बजाऊ संस्कृति के विरुद्ध सघन और विवेकउद्वेलन का आवश्यक जनमार्ग है। यह सिर्फ विभिन्न दिनों में लिखे गए पत्रकारीय आग्रहभर नहीं है, इसमें सच और अनुभव को व्यक्त करने का जरूरी सामर्थ्य भी है। इसमें गहराईऔर संश्लिष्टता है, बोधगम्यता है। यह वह केंद्रीभूतधारणा है, जिसने ‘समर गाथा’ को पुस्तकाकार लेने में मेरी मदद की। मुरली, घर-आँगन, वन-उपवन,मन-तन की नहीं, जीवन की अहर्निश गूँज का नाम है ‘समर गाथा’। आप भिज्ञ हैं कि प्राणका रूपांतर भाषा है, इसमें प्रवाह है, स्पर्श है। प्रवाह है, इसलिए गति है, स्पर्शहै, इसीलिए संवाद भी है। मैंने जब-जब इन आलेखों को पढ़ा, इसमें तैरता रहा। मुझे लगाकि इसमें सामयिक दृष्टिबोध है, कहन है, कहन में जरूरी घनत्व है, फिर भी बहाव है; जैसेसभी नदियाँ सरस्वती हैं और सभी पहाड़ पुण्य। यह पुस्तक आपको अपनेदृष्टिकोण का विकास करने में मदद करेगी। कृपा करेंगे कि इसके पात्रों को हिंदू-मुसलमानके चश्मे से नहीं, क्रांतिकारी के रूप में देखेंगे तो समय और समाज को समझने में मददमिलेगी। —डॉ. पियूष जैनराष्ट्रीय सचिव, पैफ
Navin
- Author Name:
Gopal Singh 'Nepali'
- Book Type:

- Description: हिन्दी कविता को जनमानस तक पहुँचाने में गोपाल सिंह नेपाली का अद्वितीय योगदान है। -हरिवंशराय बच्चन ‘हम राजनीति में नौजवान और साहित्य में बूढ़े एक साथ नहीं बने रह सकते’—इस कविता-संग्रह ‘नवीन’ की भूमिका में गोपाल सिंह नेपाली यह उल्लेखनीय वक्तव्य देते हैं और एक तरह से साहित्य और साहित्यिकों के लिए भी एक कार्यभार तय कर देते हैं। इस संग्रह का समय 1940 का दशक है जब देश आजादी पाने से कुछ ही दूर था और राजनीति के साथ-साथ स्वतंत्रता आंदोलन भी एक नई करवट ले रहा था। अब जरूरत थी साहित्य के एक नया रूप लेने की। ‘नवीन’ की कविताओं में उन्होंने यही करने का प्रयास किया है। न सिर्फ कथ्य, बल्कि शिल्प, छन्द और भाषा के स्तर पर भी। संग्रह की पहली ही कविता ‘नवीन’ में वे पुराने तथा रूढ़िबद्ध को छिन्न-भिन्न करते हुए नवीन कल्पना का आह्वान करते हैं : तुम प्रार्थना किये चले, नहीं दिशा हिली/तुम साधना किये चले, नहीं निशा हिली/इस आर्त दीन देश की न दुर्दशा हिली। अब अश्रु-दान छोड़ आज शीश-दान से/तुम अर्चना करो, अमोघ अर्चना करो।... नवीन कल्पना करो। प्रकृति की महिमा के साथ-साथ इस संग्रह में राष्ट्र और जन-चेतना से सम्पन्न कविताएँ भी विशेष रूप से ध्यान खींचती हैं। ‘फुटपाथ पर खड़े दर्शकों से’ और ‘नौजवान की मृत्यु पर’ जैसी कविताएँ अपनी चुस्त गठन और स्पष्ट भावाभिव्यक्ति में जैसे आज भी पूरे समाज को झकझोर देने की क्षमता रखती हैं।
Har Koshish Hai Ek Baghawat
- Author Name:
Rajendra Kumar
- Book Type:

- Description: collection of poems
Meerabai Ki Sampurna Padawali
- Author Name:
Ramkishor Sharma
- Book Type:

- Description: भक्तिकाल में मीराँ की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई थी। मीराँ के विषय में अनेक किंवदन्तियाँ भी गढ़ ली गईं। किंवदन्तियाँ भले ही ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित न हों, किन्तु उनसे इतना अवश्य ज़ाहिर होता है कि मीराँ अपनी विद्रोही चेतना के कारण लोकप्रिय अवश्य हो गई थीं। जो रचनाकार जितना अधिक लोकप्रिय होता है, उतना अधिक उसके कृतित्व का देशकाल के अनुसार रूपान्तरण होता है। मीराँ के पद गेय थे, अत: एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में साधु, सन्तों तथा गायकों के द्वारा मौखिक ढंग से प्रचारित-प्रसारित होते रहे। मीराँ सर्जनात्मक चेतना को भी उद्वेलित करती हैं। मीराँ के पदों में पाठ-भेद होने के लिए प्रादेशिक भेद तथा मौखिक गेय परम्परा को ज़िम्मेदार ठहराया गया है। उनके औचित्य पर प्रश्नचिह्न लगाए बिना एक सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि मीराँ ने कुछ पदों को दुबारा कुछ विस्तार से तथा कुछ परिवर्तन के साथ गाया होगा। आत्मोल्लास या उन्माद के क्षणों में गाए जानेवाले गीतों में गायक को इसकी सुध-बुध कहाँ रहती है कि वह अपने पूर्व कथन को दुहरा रहा है। उन्होंने अपने जीवन में घटित हुए कटु एवं तीक्ष्ण अनुभवों को वाणी दी है, राणा के द्वारा जो व्यवहार किया गया था, मीराँ भावावेश के क्षणों में उनका कई पदों में स्मरण करती हैं और भगवद् कृपा की महिमा का अनुभव करती हैं। शोधार्थियों और अध्येताओं के लिए एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण और संग्रहणीय पुस्तक।
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