Rashtra, Dharma Aur Sanskriti
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Author:
Hanuman Prasad ShuklaPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
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आचार्य वासुदेवशरण अग्रवालजी के समूचे चिंतन-लेखन की धुरी राष्ट्र का गौरव और मातृभूमि की महिमा है। वे राष्ट्रभक्त मनीषी थे। वैष्णव स्वभाव और कर्मनिष्ठा के साथ अंतिम साँस तक वे अपनी अविचल राष्ट्र-भक्ति और अविरल ज्ञान-साधना में निमग्न रहे। वे भारत के मृण्मय स्वरूप पर अत्यंत मुग्ध थे; पर उसके चिन्मय स्वरूप को उद्घाटित करने का यत्न करने में ही उन्होंने अपने भौतिक जीवन को निःशेष कर दिया । चिन्मय भारत का विग्रह धर्मस्वरूप है। वैदिक ऋषियों ने जिस सनातन सृष्टि-तत्त्व को ऋत कहा था, वही धर्म है और धर्म ही संस्कृति है, जो नाना रूपों में अभिव्यक्त होती है और हमारे आचरण या कि चरित्र में परिलक्षित होती है। इस तरह भारत राष्ट्र का निर्माण धर्म और संस्कृति की भित्ति पर हुआ है। इसीलिए इस संचयन का नाम 'राष्ट्र, धर्म और संस्कृति' रखा गया है। इसमें द्वीपांतर से लेकर ईरान और मध्य एशिया तक तथा आसेतुहिमाचल मृण्मय भारत और चिन्मय भारत से संबद्ध वासुदेवजी के निबंध संगृहीत हैं । चिन्मय भारत सहस्र - सहस्र वर्षों से प्रवाहित अजस्त्र धारा का सनातन प्रवाह है; यही इन निबंधों की टेक है; प्रतिपाद्य है ।
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आचार्य वासुदेवशरण अग्रवालजी के समूचे चिंतन-लेखन की धुरी राष्ट्र का गौरव और मातृभूमि की महिमा है। वे राष्ट्रभक्त मनीषी थे।
वैष्णव स्वभाव और कर्मनिष्ठा के साथ अंतिम साँस तक वे अपनी अविचल राष्ट्र-भक्ति और अविरल ज्ञान-साधना में निमग्न रहे। वे भारत के मृण्मय स्वरूप पर अत्यंत मुग्ध थे; पर उसके चिन्मय स्वरूप को उद्घाटित करने का यत्न करने में ही उन्होंने अपने भौतिक जीवन को निःशेष कर दिया ।
चिन्मय भारत का विग्रह धर्मस्वरूप है। वैदिक ऋषियों ने जिस सनातन सृष्टि-तत्त्व को ऋत कहा था, वही धर्म है और धर्म ही संस्कृति है, जो नाना रूपों में अभिव्यक्त होती है और हमारे आचरण या कि चरित्र में परिलक्षित होती है। इस तरह भारत राष्ट्र का निर्माण धर्म और संस्कृति की भित्ति पर हुआ है।
इसीलिए इस संचयन का नाम 'राष्ट्र, धर्म और संस्कृति' रखा गया है। इसमें द्वीपांतर से लेकर ईरान और मध्य एशिया तक तथा आसेतुहिमाचल मृण्मय भारत और चिन्मय भारत से संबद्ध वासुदेवजी के निबंध संगृहीत हैं । चिन्मय भारत सहस्र - सहस्र वर्षों से प्रवाहित अजस्त्र धारा का सनातन प्रवाह है; यही इन निबंधों की टेक है; प्रतिपाद्य है ।
Book Details
-
ISBN9789395386326
-
Pages320
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और थोथी देशभक्ति के जुमले उछालकर जेएनयू को बदनाम किया जा रहा था, तब वहाँ छात्रों और अध्यापकों द्वारा राष्ट्रवाद को लेकर बहस शुरू की गई। खुले में होनेवाली ये बहस राष्ट्रवाद पर कक्षाओं में तब्दील होती गई, जिनमें जेएनयू के प्राध्यापकों के अलावा अनेक रचनाकारों और जन-आन्दोलनकारियों ने राष्ट्रवाद पर व्याख्यान दिए। इन व्याख्यानों में राष्ट्रवाद के स्वरूप, इतिहास और समकालीन सन्दर्भों के साथ उसके ख़तरे भी बताए-समझाए गए। राष्ट्रवाद कोई निश्चित भौगोलिक अवधारणा नहीं है। कोई काल्पनिक समुदाय भी नहीं। यह आपसदारी की एक भावना है, एक अनुभूति जो हमें राष्ट्र के विभिन्न समुदायों और संस्कृतियों से जोड़ती है। भारत में राष्ट्रवाद स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान विकसित हुआ। इसके मूल में साम्राज्यवाद-विरोधी भावना थी। लेकिन इसके सामने धार्मिक राष्ट्रवाद के ख़तरे भी शुरू से थे। इसीलिए टैगोर समूचे विश्व में राष्ट्रवाद की आलोचना कर रहे थे तो गांधी, अम्बेडकर और नेहरू धार्मिक राष्ट्रवाद को ख़ारिज कर रहे थे। कहने का तात्पर्य यह कि राष्ट्रवाद सतत् विचारणीय मुद्दा है। कोई अन्तिम अवधारणा नहीं। यह किताब राष्ट्रवाद के नाम पर प्रतिष्ठित की जा रही हिंसा और नफ़रत के मुक़ाबिल एक रचनात्मक प्रतिरोध है। इसमें जेएनयू में हुए तेरह व्याख्यानों को शामिल किया गया है। साथ ही योगेन्द्र यादव द्वारा पुणे और अनिल सद्गोपाल द्वारा भोपाल में दिए गए व्याख्यान भी इसमें शामिल हैं।
Chandrashekhar Ke Vichar
- Author Name:
Harivansh
- Book Type:

-
Description:
हमारे पारंपरिक समाज में ‘विचारवान’ एक आस्थासूचक विशेषण है। अगर कोई अच्छी बात कहता है और उससे लोगों का भला होता है, तो समाज की स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है–‘बड़ा विचारवान आदमी है।’ चन्द्रशेखर भारतीय राजनीति के ‘विचारवान शख्स’ थे!
चन्द्रशेखर समाज के लिए समाज की सतह पर खड़े होकर सोचते थे। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के जमाने से ही चन्द्रशेखर समाजोन्मुख चिंतन और सामाजिक गैर-बराबरी को दूर करनेवाले विचार के साथ जनता से मुखातिब होते रहे। इसमें कोई शक नहीं कि चन्द्रशेखर समाजवादी विचारधारा की देन थे और इस विचारधारा के प्रति उनकी निष्ठा असंदिग्ध रही। जब वह छोटी अवधि के लिए प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने अपने अधिकांश भाषणों में अपने कामकाज का बखान करने की जगह भारत की गरीबी और विपन्न बच्चों की शिक्षा को लेकर गहरी चिंता जाहिर की। इस पुस्तक में संकलित भाषणों में भी यह चिंता बखूबी झलकती है।
आर्थिक सवाल पर उनके विचार वैज्ञानिक चेतना से संपन्न देशज स्वाभिमान की तरह हमारे सामने हैं–देशज विकल्प के साथ। यह विकल्प गांधी के रास्ते चन्द्रशेखर तक आया है, इसलिए इसमें प्रति नागरिक आत्मोन्नति को पहली प्राथमिकता प्राप्त है। कहते हैं–अगर उदारीकरण आत्मोन्नति के प्रयासों को धक्का नहीं पहुँचाता है, लालफीताशाही और भ्रष्टाचार की जकड़न से समाज को मुक्त कराता है, तो यह ठीक है–नहीं तो यह महज एक लफ्फाजी है और ऊँचे वर्गों का सोसा है–और यही हमारे समय में चल रहे उदारीकरण की नियति है।
इस पुस्तक में प्रधानमंत्रित्व काल के उनके भाषणों और ‘यंग इंडियन’ व अन्यत्र छपे उनके कुछ महत्त्वपूर्ण लेखों का संकलन किया गया है। इस संकलन की महत्ता यह है कि पाठक देख सकते हैं कि विभिन्न मुद्दों पर चन्द्रशेखर के विचार आज भी कितने प्रासंगिक हैं।
1857 : Bihar Jharkhand Main Mahayuddh
- Author Name:
Prasanna Kumar Choudhari
- Book Type:

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Description:
सन् 1857 के विद्रोह का क्षेत्र विशाल और विविध था। आज़ादी की इस लड़ाई में विभिन्न वर्गों, जातियों, धर्मों और समुदाय के लोगों ने जितने बड़े पैमाने पर अपनी आहुति दी, उसकी मिसाल तो विश्व इतिहास में भी कम ही मिलेगी। इस महाविद्रोह को विश्व के समक्ष, उसके सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का महत् कार्य कार्ल मार्क्स और फ़्रेडरिक एंगेल्स कर रहे थे। ‘1857 : बिहार-झारखंड में महायुद्ध’ पुस्तक बिहार और झारखंड क्षेत्र में इस महायुद्ध का दस्तावेज़ी अंकन करती है।
1857 की सौवीं वर्षगाँठ पर, 1957 में बिहार के कतिपय इतिहासकारों-काली किंकर दत्त, क़यामुद्दीन अहमद और जगदीश नारायण सरकार ने बिहार-झारखंड में चले आज़ादी के इस महासंग्राम की गाथा प्रस्तुत करने का कार्य किया था। लेकिन तब इनके अध्ययनों में कई महत्त्वपूर्ण प्रसंग छूट गए थे। कुछ आधे-अधूरे रह गए थे। वरिष्ठ और चर्चित लेखक-पत्रकारों प्रसन्न कुमार चौधरी और श्रीकांत के श्रम-साध्य अध्ययन-लेखन के ज़रिए इस पुस्तक में पहले की सारी कमियों को दूर करने का सुफल प्रयास किया गया है। बिहार और झारखंड के कई अंचलों में इस संघर्ष ने व्यापक जन-विद्रोह का रूप ले लिया था। बाग़ी सिपाहियों और जागीरदारों के एक हिस्से के साथ-साथ ग़रीब, उत्पीड़ित दलित और जनजातीय समुदायों ने इस महायुद्ध में अपनी जुझारू भागीदारी से नया इतिहास रचा था। यह पुस्तक मूलतः प्राथमिक स्रोतों पर आधारित है। बिहार-झारखंड में सन् सत्तावन से जुड़े तथ्यों और दस्तावेज़ों का महत्त्वपूर्ण संकलन है। आम पाठकों के साथ-साथ शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी पुस्तक।
Kranti Ki Ibarten
- Author Name:
Sudhir Vidyarthi
- Book Type:

- Description: Kranti Ki Ibarten
Afghanistan : Kal, Aaj Aur Kal
- Author Name:
Vedpratap Vaidik
- Book Type:

- Description: अफ़गान-संकट पर दुनिया की अनेक भाषाओं में सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं लेकिन यह ग्रन्थ ज़रा लीक से हटकर है। यह अफ़ग़ानिस्तान के वर्तमान संकट की जड़ों को खोजने के लिए उसके अतीत को खँगालता है और अतीत की व्याख्या उसके वर्तमान के सन्दर्भ में करता है। अफ़ग़ानिस्तान के अतीत और वर्तमान इस ग्रन्थ में सतत संगोष्ठी करते हुए दिखाई पड़ते हैं। यह ग्रन्थ अफ़ग़ानिस्तान का कोरा इतिहास नहीं है। उसके इतिहास, वर्तमान और भविष्य का दर्शन है। यह अफ़ग़ानिस्तान के त्रिकाल की जीवन्त और सरस व्याख्या है। हिन्दी में ही नहीं, दुनिया की किसी भी भाषा में समसामयिक अफ़ग़ानिस्तान पर प्रस्तुत किया जानेवाला यह सर्वप्रथम मौलिक ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ से पाठकों को पता चलेगा कि आर्यों, बौद्धों और हिन्दुओं का यह देश कभी ‘आर्याना’ कहलाता था। पाणिनी, गांधारी और गोरखनाथ का यह देश इस्लामी कैसे बना? यह देश अब भी इस्लाम से संचालित होता है या उसके पहले से चली आ रही जातीय परम्पराओं से? अफ़ग़ानिस्तान में ऐसे कौन-से ख़ज़ाने छिपे हुए हैं, जिन्हें पाने के लिए ब्रिटिश और रूसी साम्राज्यों ने काबुल में अपने घुटने तुड़वाए और विश्व-विजेता सिकन्दर, सम्राट अशोक तथा चंगेज़ ख़ान ने हिन्दुकुश के गगनचुम्बी हिम-शिखरों को पार किया? पिछले दो सौ वर्षों में महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा ने अफ़ग़ानिस्तान में क्या-क्या विविध और विलक्षण रूप धारण किए और आगामी समय में उसका हश्र क्या हो सकता है, इसका विवेचन डॉ. वेदप्रताप वैदिक जैसे अधिकारी विद्वान से बेहतर कौन कर सकता है? रूसी और फ़ारसी भाषा के जानकार तथा कई दशकों से अफ़ग़ानिस्तान की शोध-यात्राएँ करनेवाले डॉ. वैदिक ने अफ़ग़ान राजवंशों की अन्दरूनी खींचतान और सत्तारूढ़ गुटों की राजनीति के अनेक अनजाने पहलुओं को भी इस ग्रन्थ में उजागर किया है। अफ़ग़ानिस्तान आतंकवाद का अड्डा कैसे बना और उससे मुक्त कैसे हुआ, इसका चित्रोपम वर्णन तो इस ग्रन्थ में है ही, भारत-पाक-अफ़ग़ान सम्बन्धों के अनेक रहस्यमय और रोचक पहलुओं पर भी प्रकाश डाला गया है। यह ग्रन्थ प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों, शोधकर्त्ताओं और नीति-निर्माताओं के लिए समान रूप से उपयोगी सिद्ध होगा।
Congress-Mukt Bharat
- Author Name:
Amit Bagaria
- Book Type:

- Description: अब 80 महीने से भी अधिक का समय बीत चुका है, जब भारतीय राजनीति की ‘वयोवृद्ध पार्टी’, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 2014 के चुनावों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी/एनडीए के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा था। पाँच साल बाद 2019 में मोदी ने अपने नेतृत्व में बीजेपी/एनडीए को उससे भी बड़ी जीत दिलाई, भले ही कांग्रेस को इस बार कुछ अधिक सीटें मिलीं। अगस्त 2019 में ‘इंडिया टुडे’ के सर्वे में 57.5 प्रतिशत लोगों ने कहा कि कांग्रेस अपने अंत की ओर बढ़ रही है, 71.4 प्रतिशत ने कहा कि भारतीय मतदाताओं ने निर्णायक रूप से वंशवादी राजनीति को खारिज कर दिया है, और मात्र 32.6 प्रतिशत ने कहा कि सिर्फ एक गांधी ही पार्टी को पुनर्जीवित कर सकता है। जनवरी 2020 में कराए गए ऐसे ही सर्वे में 68.2 प्रतिशत लोगों ने कहा कि कांग्रेस अपने सबसे बड़े नेतृत्व संकट से गुजर रही है। अगस्त 2020 में 55.3 प्रतिशत लोगों ने कहा कि कांग्रेस अपने अंत के करीब है। लेकिन अब तक भी 135 साल पुरानी पार्टी के पुनर्जीवित होने के संकेत नहीं दिखते। 7 अगस्त, 2020 को 23 वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी के अध्यक्ष पद समेत विभिन्न संगठनों के चुनाव कराए जाने की माँग के साथ ही नेहरू-गांधी परिवार के खिलाफ विद्रोह कर दिया। इतने महीने बाद भी पार्टी में नेतृत्व के संकट को दूर करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठता नहीं दिखता। ‘बागियों’ और ‘परिवार के तथाकथित वफादारों’ के बीच की दरार कांग्रेस पार्टी को लगातार डरा रही है।
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