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Author:
Gunakar MuleyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
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किसी देश के इतिहास और सांस्कृतिक विकास-क्रम को जानने-समझने में अन्य स्रोतों के साथ ऐतिहासिक इमारतों और क़िलों का भी ख़ासा योगदान होता है। वे हमारे लिए अतीत का साक्षात् आईना होते हैं। इतिहास, पुरातत्त्व, पुरालिपि और मुद्राशास्त्र के उद्भट विद्वान और विज्ञान को सरल भाषा में सामान्य पाठक के लिए सुगम बनानेवाले जनप्रिय लेखक गुणाकर मुळे की यह पुस्तक हमें उन खँडहरों की यात्रा पर ले जाती है, जिनमें हमारे इतिहास की लोमहर्षक गाथाएँ छिपी हैं। कौन-सा क़िला कब अस्तित्व में आया, उसका निर्माण किसने कराया, वह किन युद्धों का साक्षी रहा, इन सब तथ्यों की प्रामाणिक जानकारी के साथ यह पुस्तक तत्कालीन राजवंशों के चित्रों, उस समय प्रयोग में आनेवाले अस्त्रों, क़िलों की बनावट, निर्माण कला और हवेलियों आदि का भी सम्यक् ब्यौरा उपलब्ध कराती है। बीच-बीच में नक़्शों के द्वारा भी विषय को स्पष्ट किया गया है। कहना न होगा कि इतिहास के रोमांचक गलियारों का रहस्य खोलती यह पुस्तक न सिर्फ़ इतिहास के विद्यार्थियों के लिए, बल्कि सामान्य पाठकों के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है।
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किसी देश के इतिहास और सांस्कृतिक विकास-क्रम को जानने-समझने में अन्य स्रोतों के साथ ऐतिहासिक इमारतों और क़िलों का भी ख़ासा योगदान होता है। वे हमारे लिए अतीत का साक्षात् आईना होते हैं।
इतिहास, पुरातत्त्व, पुरालिपि और मुद्राशास्त्र के उद्भट विद्वान और विज्ञान को सरल भाषा में सामान्य पाठक के लिए सुगम बनानेवाले जनप्रिय लेखक गुणाकर मुळे की यह पुस्तक हमें उन खँडहरों की यात्रा पर ले जाती है, जिनमें हमारे इतिहास की लोमहर्षक गाथाएँ छिपी हैं।
कौन-सा क़िला कब अस्तित्व में आया, उसका निर्माण किसने कराया, वह किन युद्धों का साक्षी रहा, इन सब तथ्यों की प्रामाणिक जानकारी के साथ यह पुस्तक तत्कालीन राजवंशों के चित्रों, उस समय प्रयोग में आनेवाले अस्त्रों, क़िलों की बनावट, निर्माण कला और हवेलियों आदि का भी सम्यक् ब्यौरा उपलब्ध कराती है। बीच-बीच में नक़्शों के द्वारा भी विषय को स्पष्ट किया गया है।
कहना न होगा कि इतिहास के रोमांचक गलियारों का रहस्य खोलती यह पुस्तक न सिर्फ़ इतिहास के विद्यार्थियों के लिए, बल्कि सामान्य पाठकों के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है।
Book Details
-
ISBN9788126720446
-
Pages208
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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'विश्व संस्कृति को भारत की एक महानतम देन है–दस अंक-संकेतों पर आधारित स्थानमान अंक-पद्धति। आज सारे सभ्य संसार में इसी दशमिक स्थानमान अंक-पद्धति का इस्तेमाल होता है। न केवल यह अंक-पद्धति बल्कि इसके साथ संसार के अनेक देशों में प्रयुक्त होने वाले 1, 2, 3, 9...और शून्य संकेत भी, जिन्हें आज हम ‘भारतीय अन्तरराष्ट्रीय अंक’ कहते हैं, भारतीय उत्पत्ति के हैं। देवनागरी अंकों की तरह इनकी व्युत्पत्ति भी पुराने ब्राह्मी अंकों से हुई है। भारतीय अंक-पद्धति की कहानी में भारतीय प्रतिभा की इस महान उपलब्धि के उद्गम और देश-विदेश में इसके प्रचार-प्रसार का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है। साथ ही, अपने तथा दूसरे देशों में प्रचलित पुरानी अंक-पद्धतियों का भी संक्षिप्त परिचय दिया गया है। अन्त में, आजकल के इलेक्ट्रॉनिक गणक-यंत्रों में प्रयुक्त होनेवाली द्वि-आधारी अंक-पद्धति को भी समझाया गया है। इस प्रकार, इस पुस्तक में आदिम समाज से लेकर आधुनिक काल तक की सभी प्रमुख गणना-पद्धतियों की जानकारी मिल जाती है। विभिन्न अंक-पद्धतियों के स्वरूप को भली-भाँति समझने के लिए पुस्तक में लगभग चालीस चित्र हैं। न केवल विज्ञान के, विशेषतः गणित के विद्यार्थी, बल्कि भारतीय संस्कृति के अध्येता भी इस पुस्तक को उपयोगी पाएँगे। हमारे शासन ने ‘भारतीय अन्तरराष्ट्रीय अंकों’ को ‘राष्ट्रीय अंकों’ के रूप में स्वीकार किया है। फिर भी, कइयों के दिमाग़ में इन ‘अन्तरराष्ट्रीय अंकों’ के बारे में आज भी काफ़ी भ्रम है–विशेषतः हिन्दी-जगत में। इस भ्रम को सही ढंग से दूर करने के लिए हमारे शासन की ओर से अभी तक कोई पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई है। ‘भारतीय अन्तरराष्ट्रीय अंकों’ की उत्पत्ति एवं विकास को वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत करनेवाली यह हिन्दी में, सम्भवतः भारतीय भाषाओं में, पहली पुस्तक है। भारतीय अंक-पद्धति की कहानी एक प्रकार से लेखक की इस माला में प्रकाशित भारतीय लिपियों की कहानी की परिपूरक कृति है। अतः इसे भारतीय इतिहास और पुरालिपि-शास्त्र के पाठक भी उपयोगी पाएँगे।
Sansar Ke Mahan Ganitagya
- Author Name:
Gunakar Muley
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वैज्ञानिकों ने भौतिक जगत् के अन्वेषण के लिए गणित का उपयोग परमावश्यक माना है। लेकिन इतने महत्त्व का विषय होते हुए भी अंग्रेज़ी तक में गणित के इतिहास और गणितज्ञों के बारे में जानकारी देनेवाले ज़्यादा ग्रन्थ नहीं हैं। जो हैं, उनमें भारत या पूर्व के अन्य देशों की गणितीय उपलब्धियों के बारे में बहुत कम सूचनाएँ मिलती हैं। इस दृष्टि से प्रस्तुत पुस्तक की उपादेयता स्वयंसिद्ध है। यह इसलिए और भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि हिन्दी में यह अपने विषय की सम्भवतः पहली कृति है। इस ग्रन्थ में विद्वान लेखक ने यूनानी गणितज्ञ यूक्लिड (300 ई.पू.) से लेकर जर्मन गणितज्ञ डेविड हिल्बर्ट (1862-1943) तक संसार के उनचालीस गणितज्ञों के जीवन और कृतित्व का परिचय दिया है। इनमें पाँच भारतीय गणितज्ञ भी हैं—आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, महावीराचार्य, भास्कराचार्य और रामानुजन, जो संसार के श्रेष्ठ गणितज्ञों के समुदाय में स्थान पाने के निश्चय ही अधिकारी हैं। हम न्यूटन, गॉस, आयलर, रीमान, कान्तोर आदि महान गणितज्ञों के गणितीय सिद्धान्तों के बारे में पढ़ते हैं, उनका उपयोग करते हैं। मगर इन गणितज्ञों के संघर्षमय जीवन के बारे में हमारी जानकारी नहीं के बराबर होती है। प्रस्तुत ग्रन्थ में गणितज्ञों को कालक्रमानुसार रखा गया है, इसलिए इस ग्रन्थ से प्राचीन काल से लेकर वर्तमान सदी के आरम्भ काल तक के गणित के बहुमुखी विकास की भी सिलसिलेवार जानकारी मिल जाती है। ग्रन्थ के अन्त में पारिभाषिक शब्दावली, सहायक ग्रन्थ-सूची, नामानुक्रमणिका, विषयानु- क्रमणिका आदि के छह परिशिष्ट हैं। संसार के महान गणितज्ञों के जीवन और कृतित्व से सम्बन्धित यह प्रेरणाप्रद जानकारी इस ग्रन्थ में मिलेगी, हिन्दी में पहली बार
Urja Sankat Aur Hamara Bhavishya
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Gunakar Muley
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वर्तमान ऊर्जा-संकट का प्रभाव समाज के सभी वर्गों पर पड़ रहा है। कोयले और तेल की कमी से किसानों, कारख़ानों और घरेलू उपयोग के लिए बिजली का नियमित मिलना कठिन हो गया है। आज साधारण जन यह जानने के लिए उत्सुक है कि इस संकट का निवारण कब और कैसे होगा? खनिज तेल की कमी और उसके मूल्यों में अत्यधिक वृद्धि के कारण हमें सौर-ऊर्जा, परमाणु-ऊर्जा, तप्तकुंड-ऊर्जा, ज्वार-भाटा तथा पवन-ऊर्जा की ओर ध्यान देना होगा, क्योंकि ऊर्जा के ये स्रोत सस्ते तथा न ख़त्म होनेवाली ऊर्जा हैं। बिजली हमारी मूलभूत आवश्यकता है, मगर जिस रफ़्तार से इसकी खपत हो रही है, उस हिसाब से भविष्य में हम इससे वंचित हो सकते हैं। प्रसिद्ध विज्ञान-लेखक गुणाकर मुळे की यह पुस्तक ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों की आधारभूत जानकारी देती है, और बताती है कि इस समय ऊर्जा उत्पादन और संरक्षण को लेकर भारत की क्या स्थिति है? ऊर्जा के नए स्रोत क्या हो सकते हैं? सूर्य, जल, वायु और परमाणु आदि स्रोतों से ऊर्जा प्राप्त करने की दिशा में क्या कोशिशें की जा रही हैं, यह पुस्तक ऐसे तमाम प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करती है।
Ganit Se Jhalakti Sanskriti
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Gunakar Muley
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गणित और संस्कृति का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध रहा है। अतीत की कौन सी संस्कृति कितनी उन्नत रही है, यह उसकी गणितीय उपलब्धियों से पहचाना जा सकता है। किसी आदिम जनजाति की भौतिक अवस्था इस बात से भी जानी जा सकती है कि वह कहाँ तक गिनती कर सकती है। यूनानियों ने मिस्र से ज्यामितीय जानकारी हासिल करके उसका आगे विकास किया और उसे निगमनात्मक तर्कशास्त्र का इतना सुदृढ़ जामा पहनाया कि यूक्लिड (300 ई.पू.) की ज्यामिति आज भी सारी दुनिया के स्कूलों में पढ़ाई जाती है। ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में संसार को भारत की सबसे बड़ी देन है—शून्य सहित सिर्फ़ दस संकेतों से सारी संख्याएँ लिखने की अंक-पद्धति, जिसका आज सारी दुनिया में व्यवहार होता है। गणित अब एक व्यापक विषय बन गया है। आज गणित के बिना किसी भी विषय का गहन अध्ययन सम्भव नहीं है। भौतिकी, रसायन, आनुवंशिकी आदि अनेक वैज्ञानिक विषयों के लिए गणित का बुनियादी महत्त्व है। इस पुस्तक के लेखक गुणाकर मुळे आजीवन हिन्दी भाषा-भाषी समाज को वैज्ञानिक चेतना से सम्पन्न बनाने का सपना देखते रहे। इसी उद्देश्य को ध्यान में रख उन्होंने अनेकानेक ग्रन्थों की रचना की। गणित और संस्कृति के अन्तर्सम्बन्धों को रेखांकित करनेवाली यह पुस्तक भी उनकी इसी साधना का फल है जिसे पाठक निश्चय ही अत्यन्त उपयोगी पाएँगे।
Pascal
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Gunakar Muley
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सामान्यत: हम मान लेते हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है। लेकिन पास्कल जीवन-भर अजीर्ण और अनिद्रा से पीड़ित रहे। फिर भी 39 वर्ष की अल्पायु में गणित के क्षेत्र में इतना मौलिक कार्य कर गए कि आज उन्हें न केवल फ़्रांस का, अपितु संसार का एक महान गणितज्ञ माना जाता है। बालक पास्कल की शिक्षा घर पर ही हुई, पिता की देखरेख में। वह इतने प्रतिभाशाली थे कि 12 वर्ष की आयु में, किसी की सहायता के बिना, स्वयं ही यूक्लिड की ज्यामिति के कई प्रमेयों को सिद्ध कर डाला। इसमें वह प्रमेय भी शामिल था, जिसके अनुसार त्रिभुज के तीन भीतरी कोणों का योग दो समकोणों के बराबर होता है। गणित को पास्कल की एक और महान देन है—सम्भाविता-सिद्धान्त। ताश के पत्तों के खेल से उपजे सवालों को हल करने के प्रयासों में इस सिद्धान्त का जन्म हुआ था। आज सम्भाविता-सिद्धान्त एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विषय बन गया है; यह सिद्धान्त प्रकृति की लीलाओं के मूल में पैठा हुआ है। हिन्दी के विशिष्ट विज्ञान-लेखक गुणाकर मुळे ने गहन शोध के बाद ख़ास तौर पर किशोर पाठकों के लिए यह पुस्तक तैयार की थी जिसमें पास्कल के जीवन के साथ-साथ उनकी वैज्ञानिक उपलब्धियों की भी सरल भाषा में जानकारी दी गई है। यह पुस्तक किशोरों के मानस को एक वैज्ञानिक दिशा प्रदान करती है।
Suraj Chand Sitare
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Gunakar Muley
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‘सूरज चाँद सितारे’ गुणाकर मुळे की पहली पुस्तक है जो उन्होंने 1962 में अपने विद्यार्थी जीवन के दौरान लिखी थी। पुस्तक का केन्द्रीय विषय खगोलीय संसार है और इसमें सूर्य, पृथ्वी, चन्द्रमा आदि ग्रहों के अलावा ब्रह्मांड की संरचना, ग्रहों की उत्पत्ति, धूमकेतु और उल्काओं आदि की जानकारी देते हुए हमारे लिए हमेशा रहस्यमय रहे आकाश को जानने-समझने की आधार-पीठिका तैयार की गई है। आकाश में चमकनेवाले असंख्य तारे, सूर्य, चन्द्रमा और आकाशगंगाएँ हमेशा से मनुष्य के मन में कौतूहल और आश्चर्य की सर्जना करते रहे हैं। यह पुस्तक सहज-ग्राह्य भाषा में विज्ञान की जटिल अवधारणाओं की जानकारी देते हुए इस विषय में पाठकों की अनेकानेक जिज्ञासाओं का समाधान प्रस्तुत करती है। वैज्ञानिक चेतना के व्यापक सामाजिक प्रसार-प्रचार की दिशा में गुणाकर जी का यह आरम्भिक प्रयास आज भी जिज्ञासु किशोरों के साथ इस विषय में जानने को उत्सुक पाठकों के लिए अमूल्य उपहार है।
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