Akbar Aur Tatkalin Bharat
(0)
Author:
Irfan HabibPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
995
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प्रसिद्ध इतिहासकार इरफ़ान हबीब द्वारा सम्पादित यह पुस्तक ऐसे कई महत्त्वपूर्ण अध्ययनों को हमारे सामने रखती है, जिनमें अकबर, उसके साम्राज्य और तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक व आर्थिक वातावरण पर प्रकाश पड़ता है। मध्यकालीन भारतीय इतिहास के अधिकारी विद्वानों द्वारा लिखित इन गवेषणात्मक आलेखों से पाठक चार सदी पूर्व के भारत की राजनीति और सांस्कृतिक स्थिति की जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं।</p> <p>अकबरकालीन प्रशासनिक व्यवस्था, राजनीतिक इतिहास, धार्मिक रीति तथा विचार, विज्ञान और तकनीकी की स्थिति, समाजार्थिक स्थितियाँ आदि कुछ विषय हैं जिनके बारे में ये निबन्ध हमें प्रामाणिक तथ्य उपलब्ध कराते हैं तथा मौजूदा अवधारणाओं का परिष्कार करते हुए तत्कालीन इतिहास के क्षेत्र में नई चुनौतियों और क्षेत्रों को चिह्नित करते हैं।</p> <p>आज भारतीय जन-गण के लिए यह जानना भी बहुत ज़रूरी हो गया है कि एक राष्ट्र के रूप में हम एक संगठित राजनीतिक और सांस्कृतिक परम्परा के वारिस हैं। इस अर्थ में भी अकबर का राजनीतिक और सांस्कृतिक विज़न फ़ौरी तौर पर हमारे लिए अत्यन्त उपयोगी साबित हो सकता है।
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प्रसिद्ध इतिहासकार इरफ़ान हबीब द्वारा सम्पादित यह पुस्तक ऐसे कई महत्त्वपूर्ण अध्ययनों को हमारे सामने रखती है, जिनमें अकबर, उसके साम्राज्य और तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक व आर्थिक वातावरण पर प्रकाश पड़ता है। मध्यकालीन भारतीय इतिहास के अधिकारी विद्वानों द्वारा लिखित इन गवेषणात्मक आलेखों से पाठक चार सदी पूर्व के भारत की राजनीति और सांस्कृतिक स्थिति की जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं।</p>
<p>अकबरकालीन प्रशासनिक व्यवस्था, राजनीतिक इतिहास, धार्मिक रीति तथा विचार, विज्ञान और तकनीकी की स्थिति, समाजार्थिक स्थितियाँ आदि कुछ विषय हैं जिनके बारे में ये निबन्ध हमें प्रामाणिक तथ्य उपलब्ध कराते हैं तथा मौजूदा अवधारणाओं का परिष्कार करते हुए तत्कालीन इतिहास के क्षेत्र में नई चुनौतियों और क्षेत्रों को चिह्नित करते हैं।</p>
<p>आज भारतीय जन-गण के लिए यह जानना भी बहुत ज़रूरी हो गया है कि एक राष्ट्र के रूप में हम एक संगठित राजनीतिक और सांस्कृतिक परम्परा के वारिस हैं। इस अर्थ में भी अकबर का राजनीतिक और सांस्कृतिक विज़न फ़ौरी तौर पर हमारे लिए अत्यन्त उपयोगी साबित हो सकता है।
Book Details
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ISBN9788126709793
-
Pages327
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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इतिहास, पुरातत्त्व, पुरालिपि और मुद्राशास्त्र के उद्भट विद्वान और विज्ञान को सरल भाषा में सामान्य पाठक के लिए सुगम बनानेवाले जनप्रिय लेखक गुणाकर मुळे की यह पुस्तक हमें उन खँडहरों की यात्रा पर ले जाती है, जिनमें हमारे इतिहास की लोमहर्षक गाथाएँ छिपी हैं।
कौन-सा क़िला कब अस्तित्व में आया, उसका निर्माण किसने कराया, वह किन युद्धों का साक्षी रहा, इन सब तथ्यों की प्रामाणिक जानकारी के साथ यह पुस्तक तत्कालीन राजवंशों के चित्रों, उस समय प्रयोग में आनेवाले अस्त्रों, क़िलों की बनावट, निर्माण कला और हवेलियों आदि का भी सम्यक् ब्यौरा उपलब्ध कराती है। बीच-बीच में नक़्शों के द्वारा भी विषय को स्पष्ट किया गया है।
कहना न होगा कि इतिहास के रोमांचक गलियारों का रहस्य खोलती यह पुस्तक न सिर्फ़ इतिहास के विद्यार्थियों के लिए, बल्कि सामान्य पाठकों के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है।
Johar Jharkhand
- Author Name:
Amar Kumar Singh
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Description:
प्रोफ़ेसर अमर कुमार सिंह देश के प्रमुख मनोवैज्ञानिकों में से एक रहे। वे देश के उन थोड़े से समाजशास्त्रियों में थे, जिन्होंने अकादमिक दुनिया से बाहर आकर समाचार-पत्रों में मानवीय विकास, धर्मनिरपेक्षता, महिलाओं, आदिवासियों, दलितों और वंचित समूहों की समस्याओं पर गम्भीर लेकिन लोकप्रिय शैली में लेखन किया। उनके इन लेखों ने राजनीतिक–सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप एवं विमर्श पैदा किया है। झारखंड आन्दोलन के समर्पित कार्यकर्ता के रूप में डॉ. सिंह के लेखों में एक ख़ास क़िस्म का अनुभव है। डॉ. सिंह ने झारखंड विषयक समिति के सदस्य के रूप में भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई, इस कारण आलेखों में एक ‘इनसाइडर’ जनदृष्टि की झलक मिलती है। डॉ. सिंह के नेतृत्व में झारखंड की आर्थिक–सामाजिक समस्याओं पर पिछले दशक में अनेक शोधकार्य हुए। इन शोध निष्कर्षों से आदिवासी भूमि, आदिवासी सशक्तिकरण, आदिवासी महिलाओं की स्थिति, झारखंड में सत्ता में विकेन्द्रीकरण के सवालों को व्यापक परिप्रेक्ष्य मिलता है।
डॉ. सिंह के आलेखों का यह प्रतिनिधि संग्रह है, जिसमें झारखंड सम्बन्धी उनकी चिन्ता तो ज़ाहिर होती है, साथ ही झारखंड की सम्भावनाओं, अन्तर्विरोधों और संकटों को समझने में मदद मिलती है। ये आलेख ‘प्रभात ख़बर’ तथा ‘सोशल चेंज’ में प्रकाशित हुए तथा इनसे झारखंड आन्दोलन में बहस को गति एवं दिशा मिली। आन्तरिक उपनिवेशवाद की अवधारणा को डॉ. सिंह ने झारखंड के उद्धरण के साथ राष्ट्रीय बहस का केन्द्र भी बनाया। विकास के साम्प्रतिक दृष्टिकोण में यह बहस कई शंकाओं एवं यथार्थों का रेखांकन करते हुए विकल्पों का क्षितिज खोलती है। डॉ. सिंह ने झारखंडी कार्यकर्ता के अनुभवों के आधार पर राजनीतिक विमर्श के अनेक अनछुए पहलुओं को उठाया है। आदिवासियों के प्रति वंचन एवं अन्याय उनके आलेखों के गहरे सरोकारों में हैं, लेकिन इनमें यह भी दृष्टि मौजूद है कि ग़ैर-आदिवासियों के साथ अन्याय न हो।
कई ज़मीनी विशेषताओं के कारण झारखंड नवनिर्माण से लेकर आज तक इन आलेखों का महत्त्व अपनी भूमिका में प्रमुखता से बना हुआ है।
Nai Dunia Ki Ore
- Author Name:
V.K. Singh
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Description:
बीसवीं सदी के अन्तिम दशक में, नवउदारवाद के पैरोकारों ने इतिहास और विचारधारा के अन्त की घोषणा की थी। समाजवाद के सोवियत प्रयोगों के विफल होने के बाद की गई वह घोषणा पूँजीवाद की ‘अपराजेयता’ का दावा था कि उसका कोई विकल्प नहीं है। लेकिन उसी समय दुनिया के विभिन्न हिस्सों से प्रतिरोध की नई-नई आवाजें सुनाई देने लगीं और नए-नए आन्दोलन उठने लगे। यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि पूरी दुनिया में ऐसे लोग हैं जो ‘इतिहास और विचारधारा के अन्त’ के उदारवादी झाँसे में नहीं आए हैं और पूँजीवादी उत्पादन, उत्पादक शक्तियों के रिश्तों और सामाजिक सम्बन्धों की संस्थानिकताओं के विकल्पों की तलाश और मौजूदा शोषक व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं। वस्तुत: प्रतिरोध की ये शक्तियाँ पूँजीवाद के परे एक नई दुनिया के सपने को साकार करने के लिए प्रयत्नशील हैं और यथार्थ के ठोस धरातल पर विकल्प के सपने देख रही हैं।
‘नई दुनिया की ओर’ उन्हीं शक्तियों के स्वप्न और संघर्ष का बयान और विश्लेषण करती है। यह पुस्तक किसी अकादमिक अथवा बौद्धिक पांडित्य का दावा किए बगैर समाज के एक सामान्य श्रमशील सदस्य की नजर और नजरिये से पूँजी और श्रम के जटिल रिश्तों को दिखाने समझाने का प्रयास करती है। लेखक आजकल जोरशोर से प्रचारित ‘प्रतिबद्धतामुक्त’, ‘गैर-राजनीतिक’ अथवा ‘निरपेक्ष-तटस्थ’ रहने की कथित समझदारी के निहितार्थों को रेखांकित करते हुए बतलाता है कि ऐसा करना वास्तव में यथास्थिति का समर्थन करना है जबकि नव-प्रतिरोध के नए संकल्प, नई परियोजनाएँ और नई प्रयोगधर्मिताएँ संघर्ष और प्रतिरोध की नई भाषा रच रहे हैं। यह वह भाषा है, जो नए वैकल्पिक संकल्पों, नई पहलकदमियों, नई परियोजनाओं और एक बेहतर समतामूलक-न्यायपूर्ण समाज की दृष्टि के साथ नए प्रयोगों को जन्म देगी।
एक बेहतर समाज और संसार का सपना देखने वाले हरेक व्यक्ति के लिए अवश्य पठनीय और विचारोत्तेजक पुस्तक।
Pashchatya Itihas Darshan Evam Itihas Lekhan
- Author Name:
Heramb Chaturvedi
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"अराजक का अव्यवस्थित असंख्य तथ्यों के मध्य एक क्रम स्थापित करके मानव के विकास-क्रम को अनुरेखित करना ही इतिहास का विवरण प्रस्तुत करना होता है। वैसे इस अर्थ को दोनों रूपों में देखा-समझा जा सकता है-प्रथम तो संरचना के स्तर पर और दूसरे, उसके लेखन अथवा चित्रण के उद्देश्य के माध्यम से!""
"द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् शीत-युद्ध से लेकर भू- मंडलीकरण एवं उदारवाद से होते हुए सोवियत संघ के विघटन और 'वैश्विक ग्राम' की परिकल्पना के बाद के क्रम में जिस प्रकार, उत्तर-संरचनावाद, उत्तर- धुनिकतावाद, उपाक्रमी इतिहास लेखन से लेकर उत्तर-सत्य ('पोस्ट-टुथ') का दौर चल रहा है उसमें भाषाई बाजीगरी (सिमेटिक जग्लरी) में एक अजब दुविधापूर्ण स्थिति उत्पन्न कर दी है। यह दो विरोधाभासी विशेषताओं से युक्त काल प्रतीत हो रहा है, जिसमें एक ओर, मानव विश्व एकीकृत लगता है किन्तु दूसरी तरफ एक निश्चित ही भीषण अराजकता का काल है।"
"...एक ओर वह तकनीकी परिवर्तनों की स्वीकृति सेजूझता है और दूसरी तरफ तकनीकी एकता से संगठितहोने का लाभार्थी भी है। वैसे तो विश्व संक्रमणशीलहोने के नाते सदैव ही अनिर्णायक एवं अराजक-साप्रतीत होता है... पहली बार इस अराजकता को'तकनीकी उत्प्रेरक' ने उसे एक निश्चित ही अलग दशाऔर दिशा प्रदान की है। इसी अराजकता के कारण हम 'टुथ' या ऐतिहासिक तथ्यों की खोज में 'पोस्ट टुथ' तक पहुंच गए हैं।"
Uttar Pradesh Ka Swatantrata Sangram : Siddharthnagar
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Dr. Arun Kumar Tripathi
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यह पुस्तक आजादी के आंदोलन में सिद्धार्थनगर जनपद के योगदान को रेखांकित करती है। विद्वान लेखक ने सम्यक् अध्ययन एवं शोध के उपरांत इस पुस्तक को लेखनीबद्ध किया है। मुगल आक्रांताओं से लोहा लेने के लिए सतासी राज्य के इतिहास से लेकर 1857 में हुई देशव्यापी ब्रिटिश विरोधी क्रांति तक इस जनपद के जन-गण ने अपनी भूमि और अपने देश के लिए जान हथेली पर रखकर संघर्ष किया।
19वीं सदी के आंदोलनों में यहाँ के लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। चौरी-चौरा जनक्रांति के पश्चात् इस जनपद के लोगों के आंदोलित होने पर तत्कालीन अधिकारियों ने शोहरतगढ़ के कांग्रेस कार्यालय को जला दिया था।
पं. परमेश्वर दत्त को कोड़ों से पीटा गया। शहीद बुधई की जान भी ऐसे ही अत्याचार के कारण गई। शहीद हबीबुल्लाह ने जेल में अनशन करके अपने प्राण त्याग दिए। ऐसी तमाम घटनाएँ इस जनपद के इतिहास में आज अपनी अलग ही चेतना से जगमगा रही हैं जिन्हें इस पुस्तक के माध्यम से देशभक्त जन के सामने लाया जा रहा है।
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