Debku ek Prem Katha
(0)
Author:
Murari SharmaPublisher:
Antika Prakashan Pvt. Ltd.Language:
HindiCategory:
Historical-fiction₹
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देबकू-जिंदू की यह प्रेम कहानी आज से महज सौ साल पहले की है। जैसा कि उपन्यासकार मुरारी शर्मा ने उपन्यास की पृष्ठभूमि स्पष्ट करते हुए लिखा है कि यह अनूठी प्रेम कहानी प्रथम विश्वयुद्ध के आस-पास की कहानी है। मण्डी रियासत के मुख्यालय से महज बीस-बाईस किलोमीटर की दूरी पर स्थित नगरोटा गाँव से शुरू हुई यह प्रेम गाथा मण्डी नगर में सिमट कर रह गई। इस उपन्यास की विशेषता यह है कि इस प्रेमगाथा में वर्णित स्थानों व भवनों के अवशेषों से लेखक रूबरू हुआ है। बहुत से ऐसे व्यक्तियों से सम्पर्क साधने में सफल रहा है जो देबकू-जिंदू की इस प्रेम कहानी के तथ्यों की प्रामाणिकता को तस्दीक करते हैं। मुरारी शर्मा एक स्थापित वरिष्ठ कथाकार हैं, कहानी बुनने की कला में सिद्धहस्त। इन्होंने उपन्यास की पाठकीय रोचकता में कोई कमी नहीं आने दी है। सहज और सरल पात्रानुकूल भाषा-शैली उपन्यास की जीवंतता को बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ती। निश्चय ही लोक में प्रचलित एक अनूठी प्रेमकथा पर आधारित यह उपन्यास हिंदी साहित्य के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। —विजय विशाल
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देबकू-जिंदू की यह प्रेम कहानी आज से महज सौ साल पहले की है। जैसा कि उपन्यासकार मुरारी शर्मा ने उपन्यास की पृष्ठभूमि स्पष्ट करते हुए लिखा है कि यह अनूठी प्रेम कहानी प्रथम विश्वयुद्ध के आस-पास की कहानी है। मण्डी रियासत के मुख्यालय से महज बीस-बाईस किलोमीटर की दूरी पर स्थित नगरोटा गाँव से शुरू हुई यह प्रेम गाथा मण्डी नगर में सिमट कर रह गई। इस उपन्यास की विशेषता यह है कि इस प्रेमगाथा में वर्णित स्थानों व भवनों के अवशेषों से लेखक रूबरू हुआ है। बहुत से ऐसे व्यक्तियों से सम्पर्क साधने में सफल रहा है जो देबकू-जिंदू की इस प्रेम कहानी के तथ्यों की प्रामाणिकता को तस्दीक करते हैं। मुरारी शर्मा एक स्थापित वरिष्ठ कथाकार हैं, कहानी बुनने की कला में सिद्धहस्त। इन्होंने उपन्यास की पाठकीय रोचकता में कोई कमी नहीं आने दी है। सहज और सरल पात्रानुकूल भाषा-शैली उपन्यास की जीवंतता को बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ती। निश्चय ही लोक में प्रचलित एक अनूठी प्रेमकथा पर आधारित यह उपन्यास हिंदी साहित्य के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। —विजय विशाल
Book Details
-
ISBN9789391925970
-
Pages112
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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नहीं-नहीं, राष्ट्र कभी मरते नहीं । ईश्वर पीड़ितों का रक्षक है । उसने मनुष्य को स्वाधीनता में साँस लेने के लिए उत्पन्न किया है । यदि तुम ठान लो तो समझो, देश स्वतंत्र हो ही गया । इससे अधिक प्रोत्साहक राष्ट्रमंत्र अन्य कौन सा है? एक बार मनुष्य ने ठान लिया कि मैं स्वाधीनता, स्वदेश और मानवता का परम भक्त हूँ फिर उसे स्वाधीनता, स्वदेश और मानवता के लिए लड़ना ही होगा, निरंतर आजीवन लड़ना होगा ।'' '' मेरी इटली की जनसंख्या दो करोड़ है । यदि इन दो करोड़ लोगों ने मन में निश्चय किया तो विदेशियों के वे पचहत्तर हजार सिपाही उन्हें दबा थोड़े सकते हैं! दो करोड़ लोग और उनका सहायक ईश्वर! ऐसी स्थिति में इटली पलक झपकते ही विदेशी सत्ता को चूर-चूर कर देगी । '' - जोसेफ मैझिनी उपर्युक्त कथन 22 जून, 1805 को इटली में जनमे महान् क्रांतिकारी जोसेफ मैझिनी के हैं, जिन्होंने अपनी प्रखर देशभक्ति से इटली के स्वाधीनता आंदोलन को अनुप्राणित किया । प्रस्तुत पुस्तक ऐसे महान् राष्ट्रभक्त का भारत के महान् क्रांतिकारी स्वातव्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा रचित जीवन-चरित्र है । इसमें इटली के स्वातंत्र्यवीर, देशभक्त मैझिनी का आत्मचरित्र और कुछ राजनीतिक लेख संकलित हैं । इन लेखों ने दो करोड़ लोगों में चेतना भर दी । इन लेखों से यूरोपीय सिंहासन उलट-पुलट हो गए । इन लेखों से इटली स्वतंत्र हुआ । इन लेखों में सभी पराधीन देशों को स्वतंत्र करने की शक्ति ठूस-ठूसकर भरी हुई है । मैझिनी के तत्त्व केवल इटली के लिए ही लागू नहीं होते, इटली केवल निमित्त बना है । राजनीति-शास्त्र के ये महत् सत्य उस महात्मा ने अखिल मानव-जाति के लिए प्रकट किए हैं । इस स्वतंत्रता-सुधा का मिष्टान्न सभी संतप्त भूमिकाओं की ओर मुड़ गया है ।
Uttarkatha : Vol. 1-2
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
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कालजयी उपन्यास यह ‘पथ बन्धु था’ के बाद भारतीय जीवन का सर्वांगीण परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करनेवाला यह उपन्यास ‘उत्तरकथा’ आधुनिक कथा-साहित्य की न केवल निष्णात ही, बल्कि सम्पूर्ण सांस्कृतिक औपन्यासिक कृति है। स्वरूप का नहीं, प्रयोजन का नाम है महाकाव्य। आज उपन्यास ही महाकाव्य है, एतदर्थ ‘उत्तरकथा' महाकाव्य भी है। देश और काल के विशाल फलक पर चलते साधारण मनुष्य की बड़ी-छोटी परछाइयाँ ही यह संसार है। जब इसी मानवीय संसार की यथार्थता को प्रयोजन-दृष्टि प्राप्त हो जाती है तब मनुष्य सृष्टि मात्र, प्राणि मात्र का प्रतिनिधित्व करनेवाला 'पुरुष' हो जाता है। बड़ी रचनात्मकता कभी भी केवल यथार्थ को ही अन्तिम नहीं मान सकती, क्योंकि मनुष्य की रचना उदात्तता के लिए ही हुई है। इस प्रथम खंड के सारे साधारण एवं अनाम पात्र कोई बड़ा कार्य नहीं करते परन्तु रोज का तपता हुआ जीवन जीते हैं। यह साधारण उदात्तता प्रकारान्तर से हमें भी पूर्ण बनाती है। दूसरे खंड में जब परिवेश का दबाव और अधिक गहराएगा तब मानवीय विवशता तथा व्यवहार के जल का परिवृत्त और भी सुदूर के तटों तक लहराएगा। यह शती मनुष्य की परीक्षा की शती रही है जिसमें अनाम लोगों की साधारणता, विश्वास खंडित एवं क्षत-विक्षत हुए हैं। इस मानवीय जय-पराजय की गाथा से बड़ी कौन-सी भागवत है?
Pratyancha
- Author Name:
Sanjeev
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‘प्रत्यंचा’ एक युगप्रवर्तक राजा की जीवनगाथा है जिन्हें कोई लोकराजा कहता, कोई राजर्षि तो कोई सनकी। प्रारम्भ में उन्हें भी गुमान रहा कि वे छत्रपति हैं, क्षत्रिय कुलावतंस... लेकिन जिस दिन उन्हीं के अधीनस्थ एक पुरोहित ने उनका गर्व खर्व कर दिया कि तुम शूद्र हो, सिर्फ शूद्र, वे आसमान से सीधे जमीन पर आ गए। तुर्रा यह कि अधिसंख्य विप्र वर्ग भी उसी पतित पुरोहित के पक्ष में खड़ा था। फिर तो राजा ने उठा लिया अपना अमोघ अस्त्र! यह लड़ाई दूसरी लड़ाइयों से ज्यादा विकट और उलझी हुई थी। प्रकट युद्ध में शत्रु सामने होता है, लेकिन यहाँ वह घर-परिवार और सदियों-सहस्राब्दियों से व्यक्ति—व्यक्ति के मन-मस्तिष्क तक में समाया हुआ था। जब एक राजा के साथ वे ऐसा कर सकते हैं तो सामान्य जन की क्या बिसात! शाहूजी का जीवन खुद को और समाज को वर्गविहीन और जातिविहीन करने तथा सबको सामाजिक न्याय दिलाने के सतत संघर्ष का साक्ष्य है। उन्होंने अपनी त्रासदी को एक मुहूर्त और व्यक्तिमात्र में न देखकर पूरी शास्त्रीय और सांस्कृतिक परम्परा में देखा और इस सामूहिक त्रासदी की मर्मान्तक घुटन और पीड़ा को सामूहिक मुक्ति में बदलने की जिद के तहत उलटे नियमों को उलटकर जाति-उच्छेद और सामाजिक परिवर्तन का बीड़ा उठाया। प्रत्यंचा अर्थात दोतरफा तनावों के बीच लक्ष्य का सन्धान! प्रत्यंचा अर्थात पराक्रम और प्रहार की प्रदीप्त दास्तान! प्रत्यंचा अर्थात दुर्दम्य प्रत्याख्यान का अभिनव आख्यान!
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