Babarnama
(0)
Author:
Yugajit NawalpuriPublisher:
Sahitya AkademiLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹ 250
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Hindi Translation by Yugajit Nawalpuri of the Talbot edition of the Memoirs of Babar(an abridged rendering of Emperor Babar's autobiography originally written in Turkish ).Genre: Memoirs
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Hindi Translation by Yugajit Nawalpuri of the Talbot edition of the Memoirs of Babar(an abridged rendering of Emperor Babar's autobiography originally written in Turkish ).Genre: Memoirs
Book Details
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ISBN9789387567139
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Pages467
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Avg Reading Time16 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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‘नंगातलाई का गाँव’—इस ‘स्मृति-आख्यान’ में डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी अपने दो लेखकीय रूपों में उपस्थित हैं। पहला—अपनी जीवनी के क़िस्सागो अर्थात् नंगातलाई और दूसरा—इस आख्यान के सजग लेखक यानी बिसनाथ। इस विलक्षण जुगलबन्दी के कारनामे में ‘आत्म’ लेखक का है और ‘कथा’ बिस्कोहर के बहाने भारतीय ग्रामीण जीवन सभ्यता की। ‘आत्म-व्यंग्य’ के कठिन शिल्प में दु:ख को मज़े लेकर कहने का करिश्मा जिस निरायास ढंग से सम्भव हुआ है उससे निराला, परसाई और नागार्जुन का स्मरण हो आता है।
दस अध्यायों में बमुश्किल समाहित बिस्कोहर कथा में लेखक ने पं. जगदम्बा पांडे जगेश, लक्खाबुआ, बल्दी बनिया, जनक दुलारी, सुग्गनजान, नदवी साहब, कृष्ण मोहम्मद, नैपाले, माने, अम्मा-दादा से लेकर अनेक अविस्मरणीय पात्रों का जो यथार्थ पुनर्सृजन किया है और उसमें उपस्थित-जागृत आम कुँजड़ा, बेड़नी, बनिया, मौलवी, भंगी, ठाकुर, ब्राह्मण आदि वर्ग के जय-पराजय, दु:ख-सुख, हास-परिहास, प्रेम-घृणा, मान-अभिमान, क्रोध-प्रसन्नता, विनम्रता-अहंकार आदि का सजीव उद्घाटन जिस निर्वैयक्तिता में किया है, वह आत्मकथा के आभिजात्य से मुक्ति का ऐसा बिन्दु है जिसमें नंगातलाई की यह कथा महाकाव्यात्मक गाथा के क़रीब पहुँच जाती है।
इस कालजयी आख्यान में लोक-सौन्दर्य के स्वाभिमान से पगी ऐसी सजल भाषा है जो शोख़, तीखी, मीठी, चोट खाई, लचीली और विदग्ध है। शब्द यहाँ अनेक अदेखी अनूठी भंगिमाओं में अर्थों का नया संसार रचते हैं। शब्दों की विपन्नता के रुदन के बीच यह किताब एक ऐसे आधार ग्रन्थ की तरह है जिसमें पूरबी अवधी का अजाना समृद्ध भाषा-संसार है।
प्रस्तुत कृति चूँकि लेखक के दो रूपों (जीवनीकार, आत्मकथा-लेखक) से बने प्रयोगधर्मी शिल्प में अपना कथा-विन्यास पाती है, अतः उसमें अतीत से लेकर भूमंडलीकरण तक के प्रभावों का यथार्थ इन्दराज है।
डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने स्मृति आख्यान की विधा के गौरव को जिस तरह पुनर्स्थापित किया है, वह हमारे समय की अनूठी और अप्रतिम साहित्यिक उपलब्धि मानी जाए तो कोई आश्चर्य नहीं।
—लीलाधर मंडलोई
Baat Un Dino Ki Hai
- Author Name:
Sriprakash Mani Tripathai
- Book Type:

-
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बात उन दिनों की है पुस्तक संस्मरण भी है और आत्मीय ग्रामबोध का आख्यान भी। पुस्तक में ग्रामीण जीवन की सहज, सरल और मुक्त प्रकृति का चित्र खींचा गया है। इन चित्रों की रचना में लेखक स्वयं भी सम्मिलित है इसलिए इसकी शैली और शिल्प में एक विशेष प्रकार की चुम्बकीयता है।
पुस्तक में यद्यपि व्यक्तिव्यंजक निबंध अंकित हैं, पर है यह गंवई सहजता का शब्दचित्र। ये शब्दचित्र छोटे-छोटे प्रसंगों में बांध कर रचे गए हैं। गाँव के विद्यालय, मेले, नदी-नाले ये सब पुस्तक में रोचक प्रसंग बनकर उभरे हैं। ग्रामीण खानपान का रसीला चित्र भी मिलेगा - नेनुआ की पनीली तरकारी के साथ गरम-गरम भात, होरहा, गट्टा, भुनी मटर हमें लोक जीवन का असली स्वाद चखाते हैं। कुछ व्यक्ति-चित्र और कुछ अतीत की वस्तुएँ जैसे बाइस्कोप, आनंद की सृष्टि करनेवाले हैं।
आनंद का भाव पूरी पुस्तक में व्याप्त है। वास्तव में यही ग्राम जीवन का स्थायी भाव है। गाँव का यह आनंदी स्वभाव इस पुस्तक की आत्मा है। तीस प्रसंगों में प्रस्तुत यह पुस्तक अत्यंत पठनीय है। लेखक के आत्मीय भाव ने प्रसंगों की संवेदना को दोबाला कर दिया है। इस आत्मीयता के कारण पूरी पुस्तक की शैली कहीं भी शिथिल नहीं होती, बल्कि पाठक को अपने साथ बहाये लिए जाती है। यह प्रवाहमयता इस पुस्तक के गद्य की विशिष्टता है।
Maryada Purushottam Bhagwan Ram : Jivan Aur Darshan
- Author Name:
Jairam Mishra
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- Description: श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम तो हैं ही, पूर्ण ब्रह्म के अवतार भी हैं। महामानव और आदर्श मानव के रूप में वह सद्प्रेरणा के अजस्र स्रोत हैं। पर श्रीराम के अवतार स्वरूप को, मोक्ष को जीवन का परम पुरुषार्थ माननेवाला आस्तिक बुद्धिसम्पन्न ईश्वरवादी ही ठीक-ठीक जानता-समझता है। श्रीराम भारतीय धर्म-संस्कृति के अनिवार्य और अपरिहार्य अंग हैं!इसीलिए ईश्वर के विभिन्न नामों में साधना की दृष्टि से रामनाम का महत्त्व सर्वोपरि है। आज के पंकिल कुहासे को नष्ट करने के लिए श्रीराम जैसे चन्दन चर्चित चरित्र में अवगाहन की महती आवश्यकता मानवता को है। वह श्रीराम, जो समस्त भारतीय साधना और ज्ञान-परम्परा के वागद्वार हैं, जिनका दृढ़चरित्र लोक-मर्यादा के कठोर अंकुश से अनुशासित है और जो जन-जन के मन को ‘रस विशेष’ से आप्लावित कर सकता है। इस पुस्तक के लेखक डॉ. जयराम मिश्र राम-साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान ही नहीं, राम-स्वरूप के ज्ञाता और उसमें रमे हुए सन्त हैं। हमें विश्वास है कि यह ग्रन्थ वाल्मीकि और तुलसी की रामकथा-परम्परा की एक कड़ी बनेगा।
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