Shiuli Ki Gandh Aur Anya Kahaniyan
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Author:
Taslima NasrinPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
350
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Available
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संसार को खुली आँखों से देखा हो, जीवन और जन का पर्यवेक्षण बिना किसी पूर्वग्रह के किया हो तो लेखक के रूप में आपके पास अनुभवों की अपार राशि होती है। तसलीमा नसरीन की कहानियों का यह संकलन ‘शिउली की गंध और अन्य कहानियाँ’ उनकी अनुभव-समृद्ध लेखनी की उल्लेखनीय उपलब्धि है। यह उनकी सोच की भी उपलब्धि है, उनकी अपनी स्वतंत्र-चेता दृष्टि की, जो इन कहानियों की पंक्ति-पंक्ति में दिखाई देती है। स्त्री के दुख को उन्होंने कभी अपनी निगाह से ओझल नहीं होने दिया, और यह विडंबना ही है कि स्त्री को उन्होंने दुनिया के हर कोने में एक ही सा दुख सहते पाया, जो एक हक़ीक़त है। ‘शिउली की गंध और अन्य कहानियाँ’ की कहानियों में भी देश-विदेश की अनेक स्त्रियाँ हैं जो अपने-अपने ढंग की पीड़ा सह रही हैं, फिर भी अपने आप की उनकी तलाश जारी है, अपनी आज़ादी और सुकून की चाह की लौ को वे बुझने नहीं देतीं। जिस तरह स्त्री अपने दुख में, उसी तरह पुरुष अपनी ताक़त के अहंकार और परपीड़ा-सुख में, कुछ अपवादों को छोड़कर, पूरी दुनिया में एक ही जैसा है। वह थाइलैंड की चाइलाई का स्वीडिश पति योहान हो, या किशोरी शिउली का सतहत्तर वर्षीय पति इदरीस अली और उसके बाद और ज़्यादा बूढ़े, और ज़्यादा निर्दय कई पति—सबके लिए वह सेवा-दासी भी है, यौन-दासी भी। भाइयों द्वारा ग्यारह बार ग्यारह बूढ़ों को बेची गई शिउली... इस संकलन में तसलीमा नसरीन की चौबीस कहानियाँ संकलित हैं। हर कहानी आपके सामने एक अलग दुनिया का दरवाज़ा खोलती है और अपने साहस और साफ़गोई से आपको चौंका देती है।
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संसार को खुली आँखों से देखा हो, जीवन और जन का पर्यवेक्षण बिना किसी पूर्वग्रह के किया हो तो लेखक के रूप में आपके पास अनुभवों की अपार राशि होती है। तसलीमा नसरीन की कहानियों का यह संकलन ‘शिउली की गंध और अन्य कहानियाँ’ उनकी अनुभव-समृद्ध लेखनी की उल्लेखनीय उपलब्धि है। यह उनकी सोच की भी उपलब्धि है, उनकी अपनी स्वतंत्र-चेता दृष्टि की, जो इन कहानियों की पंक्ति-पंक्ति में दिखाई देती है।
स्त्री के दुख को उन्होंने कभी अपनी निगाह से ओझल नहीं होने दिया, और यह विडंबना ही है कि स्त्री को उन्होंने दुनिया के हर कोने में एक ही सा दुख सहते पाया, जो एक हक़ीक़त है। ‘शिउली की गंध और अन्य कहानियाँ’ की कहानियों में भी देश-विदेश की अनेक स्त्रियाँ हैं जो अपने-अपने ढंग की पीड़ा सह रही हैं, फिर भी अपने आप की उनकी तलाश जारी है, अपनी आज़ादी और सुकून की चाह की लौ को वे बुझने नहीं देतीं। जिस तरह स्त्री अपने दुख में, उसी तरह पुरुष अपनी ताक़त के अहंकार और परपीड़ा-सुख में, कुछ अपवादों को छोड़कर, पूरी दुनिया में एक ही जैसा है। वह थाइलैंड की चाइलाई का स्वीडिश पति योहान हो, या किशोरी शिउली का सतहत्तर वर्षीय पति इदरीस अली और उसके बाद और ज़्यादा बूढ़े, और ज़्यादा निर्दय कई पति—सबके लिए वह सेवा-दासी भी है, यौन-दासी भी। भाइयों द्वारा ग्यारह बार ग्यारह बूढ़ों को बेची गई शिउली...
इस संकलन में तसलीमा नसरीन की चौबीस कहानियाँ संकलित हैं। हर कहानी आपके सामने एक अलग दुनिया का दरवाज़ा खोलती है और अपने साहस और साफ़गोई से आपको चौंका देती है।
Book Details
-
ISBN9789360866440
-
Pages280
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Mamta Mehrotra
- Book Type:

- Description:
यह समय ‘अस्मिता विमर्श’ का है। विमर्श सचेत करते हैं अधिकारों और दायित्वों के प्रति। विभिन्न स्तरों पर जारी ‘स्त्री विमर्श’ ने स्त्रियों से जुड़े अनेक सवालों को मुखर और प्रखर किया है। स्त्रियाँ स्वतंत्रता, सम्मान, समता और सहभागिता के लिए निरन्तर संघर्ष कर रही हैं। इस सन्दर्भ में यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि भारत के संविधान ने महिलाओं को कौन-कौन से अधिकार दिए हैं। 'महिला सशक्तिकरण' को सच करते हुए क़ानून ने महिलाओं को क्या-क्या शक्तियाँ प्रदान की हैं। ज़ाहिर है कि इस लोकतंत्र में महिलाएँ यदि अपने अधिकारों को भली प्रकार जान जाएँ तो उनके 'अस्तित्व' का संघर्ष सरल और सकारात्मक हो जाएगा। ‘महिला अधिकार’ पुस्तक में ममता मेहरोत्रा ने मानवाधिकार को विश्व पटल पर रखकर स्त्री-प्रश्नों का विवेचन किया है। बीजिंग घोषणा-पत्र, वियना सम्मेलन—1993, भारतीय विधि आयोग की इक्कीसवीं रिपोर्ट के ज़रिए महिला अधिकारों के प्रति सामाजिक-वैधानिक सतर्कता का जायजा लिया गया है। सती प्रथा, डायन, विज्ञापन, मातृत्व, द्विविवाह, दहेज आदि पक्षों पर तर्कपूर्ण विचार करते हुए लेखिका ने इनके अनेक पक्षों का वर्णन किया है, विशेषत: क़ानूनी पक्ष का। पुस्तक की भाषा प्रवाहपूर्ण है, इसलिए पठनीयता भरपूर है। सचेत और सशक्त करती एक ज़रूरी किताब।
Mahila Lekhan Ke Sau Varsh
- Author Name:
Mamta Kaliya
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- Description:
लेखन में बीसवीं सदी से आज तक का समय यदि एक प्रस्थान-बिन्दु के रूप में लिया जाए तो यह स्पष्ट है कि इन सौ वर्षों में स्त्रियों की लेखनी में सबसे अधिक परिवर्तन की प्रक्रिया दिखी। पुरुष-लेखन में मात्र एक पात्र होने की भूमिका से निकलकर स्त्री-लेखक ने स्वयं अपनी क़लम से अस्तित्व, व्यक्तित्व और विचार को अभिव्यक्ति देना अभीष्ट समझा। प्रस्तुत संकलन में स्त्री-रचनाकारों के कोमल संवेगों के साथ-साथ आत्मसजग सृजन और विकास-प्रक्रिया का परिचय मिलता है। राजेन्द्र बाला घोष (बंग महिला) से लेकर अलका सरावगी तक एक लम्बी परम्परा तैयार हुई है जहाँ क़लम की साँकलें कहीं अनायास तो कहीं सायास खुली हैं। हर्ष और गर्व का विषय है कि महिला-लेखन अब हिन्दी साहित्य में एक सशक्त सचेत और संवेदनायुक्त धारा है। आनेवाला समय यह याद रखे कि अपने इर्द-गिर्द खड़े किए समस्त चौखटे और कोष्ठक तोड़कर इक्कीसवीं सदी की स्त्री अपने पूरे तेवर के साथ हर क्षेत्र में उठ खड़ी हुई है। प्रस्तुत संकलन में हमें कहानी और निबन्ध, जीवनी और संस्मरण, आलोचना और विमर्श, गोया हर विधा और विषय पर स्त्री की तेजस्विता का परिचय मिलेगा। महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी से लेकर गीतांजलि श्री, मधु कांकरिया, सारा राय और अलका सरावगी तक अपने पूरे तेवर के साथ यहाँ मौजूद हैं। पृष्ठ सीमा के चलते कई विधाओं का मात्र उल्लेख ही कर पाये हैं। यहीं से अगले खंड की सम्भावना नज़र आती है।
Pariyon Ke Beech
- Author Name:
Ruth Vanita
- Book Type:

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परियों के बीच उपन्यास एक ऐसे कोमल अहसास और रिश्ते का संसार हमारे सामने उजागर करता है जिसका वजूद हमेशा से रहा है, लेकन ज़्यादातर वक़्तों में यह अनकहा और पोशीदा रहा; कई बार उसे अपनी स्वाभाविक मानवीयता की अनदेखी करनेवाले सवालों का सामना भी करना पड़ा है। दो औरतों, मशहूर तवायफ़ चपला बाई और शायरा नफ़ीस बाई के आपसी प्यार की इस कहानी में उनके कुछ मर्द दोस्त भी हैं जो उनकी मदद करते हैं। इन दोस्तों में कुछ नामचीन शायर हैं तो ख़ुद एक मर्द से प्यार करने वाला शरद भी। उपन्यास में रंगीन, इंशा और जुरअत जैसे उर्दू के कुछ असल शायर क़िरदार के रूप में आए हैं। उनकी शायरी के साथ-साथ उस दौर की कुछेक ग़ज़लों-नज़्मों और गानों का इस्तेमाल उपन्यास की ख़ूबसूरती और असर को बढ़ा देता है। वस्तुत: यह उपन्यास पूर्व-औपनिवेशिक काल के उस दौर को जीवन्त करता है जब समलैंगिक प्यार को अपेक्षाकृत सहजता से स्वीकार किया जाता था। लेकिन 1857 के बाद के दौर में उसको सवालिया बना दिया गया।
Stree Chintan Ki Chunautiya
- Author Name:
Rekha Kastwar
- Book Type:

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रेखा कास्तवार ने इस पुस्तक में स्त्री को केन्द्र में रखकर लिखी गई महिला और पुरुष रचनाकारों के उपन्यासों का तुलनात्मक अध्ययन किया है और इस क्रम में वे स्त्री चिन्तन से सम्बन्धित कुछ ऐसी चुनौतियों से रू-ब-रू हुई हैं, जिन्हें अध्ययन की इस पद्धति से ही समझा जा सकता है। लेखिका ने स्त्री से जुड़े कुछ मूलभूत सवालों को उठाया है और उसके आलोक में पुरुष तथा महिला लेखकों के नज़रिए के फ़र्क़ को रेखांकित किया है। गहरे विवेचन और विश्लेषण के बाद ही वह इस निष्कर्ष तक पहुँचती हैं—स्त्री-विमर्श का प्रमुख सरोकार स्त्री का अपने पक्ष में ख़ुद लड़ना और ख़ुद खड़े होना रहा है, जब तक यह लड़ाई अपनी ओर से नहीं लड़ी जाएगी, स्त्री के पक्ष में नहीं जाएगी। ‘स्त्री-चिन्तन की चुनौतियाँ’ निश्चित रूप से हिन्दी के स्त्री-विमर्श में कतिपय अवधारणात्मक परिवर्तन लाने में सफल होगी।
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