Astittva Ki Khoj : Bhartiya Itihas Ki Mahattvapurn Striyan
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Author:
Rekha ModiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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स्त्रियों के योगदान का जश्न मनानेवाले पुरुष-विमर्श में आमतौर पर यह कहने का चलन रहा है कि स्त्रियाँ कोमल लताओं-सी हैं जो अपनी नाज़ुक पत्तियाँ किसी ऐसे विशाल वृक्ष के तने के गिर्द लपेटती ऊपर चढ़ती हैं, जो उनके जीवन का पुरुष हो, चाहे वह पुरुष पिता हो, पति हो या फिर मार्गदर्शक। पर हमने पाया कि इस बिम्ब के ठीक उलट, कुछ स्त्रियाँ स्वतंत्र रूप से ‘वृक्षों’ में विकसित हुईं। इस पुस्तक की सभी स्त्रियाँ यहाँ इसीलिए मौजूद हैं। इन स्त्रियों ने कुछ ऐसा रचा-गढ़ा जो उनके बाद भी ज़िन्दा है, फिर चाहे वह रचना कोई संस्था हो, कला विधा या उसका रचना-संकलन हो, या कोई ढाँचा, कोई दर्शन, कोई तकनीक या कोई सामाजिक आन्दोलन हो। अपने जीवन के एकान्त स्थलों को छोड़ व्यापक दुनिया से जुड़ने की चेष्टा में उन्होंने तमाम विरोधों व निषेधों का सामना किया। गायिकाओं और सक्रिय कर्मियों ने मूक कर देने की धमकियों के बावजूद, नतीजों की परवाह किए बिना बेधड़क अपनी बात कही। राजनीतिज्ञों और अभिनेत्रियों ने घर के बाहर मुँह उघाड़ने पर निन्दा झेली, पर फिर भी जुटी रहीं। उनकी कथाओं का संकलन कर हम एक परम्परा रच रहे हैं, रिवायतें स्थापित कर रहे हैं जिनसे आज की नारियाँ प्रेरणा ले सकती हैं और अपना जीवन सुधार सकती हैं। समृद्ध वैविध्य के ताने-बानों से बुनी उनकी इन कथाओं को एक ही वृहत् पाठ के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। —भूमिका से।
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स्त्रियों के योगदान का जश्न मनानेवाले पुरुष-विमर्श में आमतौर पर यह कहने का चलन रहा है कि स्त्रियाँ कोमल लताओं-सी हैं जो अपनी नाज़ुक पत्तियाँ किसी ऐसे विशाल वृक्ष के तने के गिर्द लपेटती ऊपर चढ़ती हैं, जो उनके जीवन का पुरुष हो, चाहे वह पुरुष पिता हो, पति हो या फिर मार्गदर्शक। पर हमने पाया कि इस बिम्ब के ठीक उलट, कुछ स्त्रियाँ स्वतंत्र रूप से ‘वृक्षों’ में विकसित हुईं।
इस पुस्तक की सभी स्त्रियाँ यहाँ इसीलिए मौजूद हैं। इन स्त्रियों ने कुछ ऐसा रचा-गढ़ा जो उनके बाद भी ज़िन्दा है, फिर चाहे वह रचना कोई संस्था हो, कला विधा या उसका रचना-संकलन हो, या कोई ढाँचा, कोई दर्शन, कोई तकनीक या कोई सामाजिक आन्दोलन हो। अपने जीवन के एकान्त स्थलों को छोड़ व्यापक दुनिया से जुड़ने की चेष्टा में उन्होंने तमाम विरोधों व निषेधों का सामना किया। गायिकाओं और सक्रिय कर्मियों ने मूक कर देने की धमकियों के बावजूद, नतीजों की परवाह किए बिना बेधड़क अपनी बात कही। राजनीतिज्ञों और अभिनेत्रियों ने घर के बाहर मुँह उघाड़ने पर निन्दा झेली, पर फिर भी जुटी रहीं।
उनकी कथाओं का संकलन कर हम एक परम्परा रच रहे हैं, रिवायतें स्थापित कर रहे हैं जिनसे आज की नारियाँ प्रेरणा ले सकती हैं और अपना जीवन सुधार सकती हैं। समृद्ध वैविध्य के ताने-बानों से बुनी उनकी इन कथाओं को एक ही वृहत् पाठ के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।
—भूमिका से।
Book Details
-
ISBN9789388183277
-
Pages320
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: मन के भीतर न जाने कितनी परतें होती हैं, जिन्हें स्त्री कभी छीलकर अलग कर देती है तो कभी फिर से कई और परतों में ढककर छिपा देती है। लेकिन इस दौरान वह पीड़ा के सागर में लगातार गोते लगाती रहती है। इसके बावजूद वह हर बार किनारे पर आ खड़ी होती है। स्त्री का संघर्ष ही तो है जो उसे टूटने से बचाता है। परिस्थितियाँ कई बार अवरोध बनकर उसके सामने आ खड़ी होती हैं, तब बेशक पहाड़ों-सी दृढ़ता उसमें न आ पाए, गगनचुंबी चोटियों की तरह वह सतर्क रहती है, हर बाधा को पार करने के लिए। वह हारती नहीं है, वह बस निरंतर एक नदी की तरह प्रवाहमान होती रहती है। यह स्त्री पुरुष विरोधी नहीं है, पर अपने हक़ के लिए लड़ना जानती है। स्त्री से हर रिश्ते में एक अहम भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती है क्योंकि पुरुष जानता है कि वही ऐसा कर सकती है और सच में, वह ऐसा करने में सफल होती भी रही है। स्त्री जीवन के विविध पहलुओं पर केंद्रित इन कहानियों में अगर कोई उलझन है तो उसका समाधान भी है। कुछ अछूते विषयों को उजागर और स्त्री की सोच को निरूपित करती हैं इस संग्रह की कहानियाँ।
Chithhi Jo Padhee Nahin Gai
- Author Name:
Krishna Ambashth
- Book Type:

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Description:
कहानीकार, कवि, व्यंग्यकार और निबन्धों पर भी सफलतापूर्वक हाथ आज़माने वाले कृष्ण अम्बष्ठ का यह कहानी-संग्रह पारिवारिक रिश्तों से लेकर प्रशासनिक दुनिया में फैले लोभ-लालच के बीहड़ तक को खँगालता है।
संग्रह में शामिल इक्कीस कहानियाँ अपने विषय-वैविध्य के अलावा पठनीयता के लिए भी उल्लेखनीय हैं। मध्यवर्गीय और निम्न-मध्यवर्गीय जीवन से लिए गए पात्रों के मन और परिवेश की लेखक को गहरी समझ है जो इन कहानियों की बुनावट में जाहिर होती है। आर्थिक अभाव के चलते अपने मानवीय आग्रहों से बरबस च्युत होते हुए लोग, ऊँचे पदों पर बैठे हुए लोगों की स्वाभाविक हो चली क्रूरता और दूसरी तरफ़ पूजा-पाठ आदि का आडम्बर—यह सब एक पूरी दुनिया की तरह यहाँ प्रकट होता है।
अपने आसपास की वस्तुओं और लोगों का ‘ऑब्जर्वेशन’ कृष्ण अम्बष्ठ की इन कहानियों की पठनीयता को रोचक और सहज बना देता है। ‘माइल स्टोन’ शीर्षक कहानी की ये पंक्तियाँ देखें : “कई घरों में एक से अधिक घडि़यों के रहने पर भी उनकी मिनटवाली सुइयों में आपसी तालमेल का अभाव-सा रहता है।” निजी जीवन में लेखक के बहुरंगी अनुभवों की छटा इन कहानियों के कलेवर को विस्तृत करती है, और विश्वसनीय भी बनाती है।
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