Dukhantika
(0)
Author:
Navnit NiravPublisher:
Antika Prakashan Pvt. Ltd.Language:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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भूमंडलोत्तर कथा पीढ़ी की युवतम खेप के प्रतिनिधि कथाकार नवनीत नीरव की कहानियाँ सहज भाषा और समाज के सबसे कमज़ोर और वंचित व्यक्ति के प्रति अपनी निष्कंप आस्था के कारण सबसे पहले हमारा ध्यान खींचती हैं। कथा-निर्मिति की प्रक्रिया में नवनीत न तो कला की अबूझ दुर्गम कन्दराओं में जाते हैं न ही यथार्थ के स्थूल और अनगढ़ प्रस्तर-खंड को ही कहानी की तरह स्थापित कर देते हैं, बल्कि पात्र और परिवेश के बीच संवाद की रचनात्मक युक्तियों से एक ऐसी दुनिया की पुनर्रचना करते हैं जहाँ कला और यथार्थ एक-दूसरे का मूल्य संवद्र्धन कर सकें। इस रचनात्मक उपक्रम में कला की सूक्ष्मताएँ कब यथार्थ की खुरदुरी हथेली थाम लेती हैं और कब यथार्थ की नुकीली धार कला के बारीक उपकरण का स्वरूप हासिल कर लेती है, पता ही नहीं चलता। 'कला के लिए कला’ और 'प्रयोग के लिए प्रयोग’ के अमूर्त जुमलों को चुनौती देती ये कहानियाँ सहजता के अहाते में विचरण करते हुए भी जितनी प्रयोगात्मक हैं, अपनी प्रयोगधर्मिता के बावजूद उतनी ही नैसर्गिक और स्वाभाविक भी। साधारण और विशेष की खाँचेबंदियों के सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक निहितार्थों को बारीकी से पहचानते हुए नवनीत की कहानियाँ जिस दृढ़ता से अपनी पक्षधरता तय करती हैं, उसके प्रभाव को रघुराम, रामझरोखे और सहनी जैसे चरित्रों की नियति में बहुत आसानी से पहचाना जा सकता है। ये कहानियाँ भाषा और शिल्प के चमत्कार के सहारे सि$र्फ मनोरंजन का परिवेश नहीं रचतीं बल्कि हाशिया और मुख्यधारा के बीच एक पारदर्शी सेतु का निर्माण करते हुए पाठकों के भीतर आश्वस्ति की तरह उतरने का सामथ्र्य रखती हैं। —राकेश बिहारी
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भूमंडलोत्तर कथा पीढ़ी की युवतम खेप के प्रतिनिधि कथाकार नवनीत नीरव की कहानियाँ सहज भाषा और समाज के सबसे कमज़ोर और वंचित व्यक्ति के प्रति अपनी निष्कंप आस्था के कारण सबसे पहले हमारा ध्यान खींचती हैं। कथा-निर्मिति की प्रक्रिया में नवनीत न तो कला की अबूझ दुर्गम कन्दराओं में जाते हैं न ही यथार्थ के स्थूल और अनगढ़ प्रस्तर-खंड को ही कहानी की तरह स्थापित कर देते हैं, बल्कि पात्र और परिवेश के बीच संवाद की रचनात्मक युक्तियों से एक ऐसी दुनिया की पुनर्रचना करते हैं जहाँ कला और यथार्थ एक-दूसरे का मूल्य संवद्र्धन कर सकें। इस रचनात्मक उपक्रम में कला की सूक्ष्मताएँ कब यथार्थ की खुरदुरी हथेली थाम लेती हैं और कब यथार्थ की नुकीली धार कला के बारीक उपकरण का स्वरूप हासिल कर लेती है, पता ही नहीं चलता। 'कला के लिए कला’ और 'प्रयोग के लिए प्रयोग’ के अमूर्त जुमलों को चुनौती देती ये कहानियाँ सहजता के अहाते में विचरण करते हुए भी जितनी प्रयोगात्मक हैं, अपनी प्रयोगधर्मिता के बावजूद उतनी ही नैसर्गिक और स्वाभाविक भी। साधारण और विशेष की खाँचेबंदियों के सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक निहितार्थों को बारीकी से पहचानते हुए नवनीत की कहानियाँ जिस दृढ़ता से अपनी पक्षधरता तय करती हैं, उसके प्रभाव को रघुराम, रामझरोखे और सहनी जैसे चरित्रों की नियति में बहुत आसानी से पहचाना जा सकता है। ये कहानियाँ भाषा और शिल्प के चमत्कार के सहारे सि$र्फ मनोरंजन का परिवेश नहीं रचतीं बल्कि हाशिया और मुख्यधारा के बीच एक पारदर्शी सेतु का निर्माण करते हुए पाठकों के भीतर आश्वस्ति की तरह उतरने का सामथ्र्य रखती हैं। —राकेश बिहारी
Book Details
-
ISBN9789391925611
-
Pages128
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Author Name:
Pankaj Subeer
- Book Type:

- Description: Book
Bhookh Ke Teen Din
- Author Name:
Yashpal
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-
Description:
यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है।
‘भूख के तीन दिन’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘भूख के तीन दिन’, ‘शुरफा’, ‘समय’, ‘दीनता का प्रायश्चित्त’, ‘भली लड़कियाँ’, ‘दाग़ ही दाग़’ ‘मॉडर्न’, ‘सीख’, ‘ख़ूब बचे!’, ‘पागल है!’ और ‘आशीर्वाद’।
Girgit
- Author Name:
Akhilesh Nigam 'Akhil'
- Book Type:

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Description:
‘गिरगिट’ कथा-संग्रह की सभी कहानियाँ जिज्ञासा, रोचकता, भाव-सबलता एवं युगबोध से सम्पन्न हैं। आधुनिक भावबोध से युग के सन्दर्भों के यथार्थ को सूक्ष्म विवेचन और विषय वैविध्य के साथ व्यापक बनाया गया है। सभी कहानियाँ वैचारिक एवं अनुमूल्यात्मक संयोग से युक्त एवं अत्यन्त लोकप्रिय हैं। जीवन के सन्दर्भों का यथार्थ चित्रण विषयगत विविधता परिवेशगत विस्तार, वैचारिक संयोग एवं शिल्पगत वैशिष्ट्य इस संग्रह की कहानियों की विशेषताएँ हैं। इसमें समाज में बदलते हुए सम्बन्धों का सूक्ष्म अध्ययन भी है, जिसकी अभिव्यक्ति चारुता से इन कहानियों में हुई है।
गिरगिट रंग बदलने के लिए प्रसिद्धि पा चुका है, किन्तु मानवाकृति को स्वयं से अधिक रंगों में देखकर स्वयं गिरगिट लज्जित बन पराजित है, यही अखिलेश निगम द्वारा विरचित कहानियों में दर्शनीय है।
इन सभी कहानियों का विषय राष्ट्रीय दृष्टिकोण के परिप्रेक्ष्य में मानव जीवन की समस्याओं से जुड़ा है। कहानीकार का उद्देश्य सर्वत्र सुधारवादी और आशावादी है। इन कहानियों में कहीं-कहीं एक ही पात्र एक समय में मन के विभिन्न स्तरों पर जीता है, जहाँ चारित्रिक विसंगतियाँ ही कहानी की विशेषता बन गई हैं।
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