Shunya Tatha Any Rachanayen
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Author:
Usha PriyamvadaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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कुछ कहानियाँ, कुछ यात्रा-संस्मरण और अमरीका से श्रोताओं के नाम लिखे गए चौदह पत्रों का यह संग्रह कथाकार उषा प्रियम्वदा के उस प्रवासी मन के भीतर झाँकने का मौक़ा देता है जो लम्बे विदेश-प्रवास के बावजूद आज भी भारतीय है।</p> <p>चिर-परिचित संवेदनशील शैली में लिखी इन मार्मिक कहानियों के भीतर से झाँकती मानसिकता आज भी अपनी देसी पहचान नहीं खो पाई है। चारों तरफ़ फैला जीवन अपने समूचे आकर्षण-विकर्षण के बावजूद है तो विदेशी ही। देसी और विदेशी के बीच लगातार होता संवाद उषा की इन रचनाओं का प्रमुख आकर्षण है। सुदूर अमरीका के विस्कांसिन शहर में बैठी यह भारतीय कथाकार चाहे कहानियों के ताने-बाने बुने, चाहे अपने समूचे व्यक्तित्व को साथ लिए-दिए यूरोप-भ्रमण करे या फिर उस विराट परदेस अमरीका की अपनी पहचान को पत्रों के माध्यम से उजागर करे, पाठक भूल ही नहीं सकता कि इनके पीछे से झाँकता एक मन है जो ठेठ भारतीय है।</p> <p>“प्रवासी के लिए घर लौटना एक मधुर और कचोट-भरा अवसर होता है। पर साथ ही कहीं छुपा यह बोध भी रहता है कि हम पूरी तरह घर नहीं लौट पाएँगे। हमारा एक अंश, हमारी भावनाओं और अनुभवों का एक भाग जैसे पीछे रह जाता है।”</p> <p>प्रवासी मन के इन्हीं मधुर-तिक्त अनुभवों की दास्तान हैं ये रचनाएँ जो पाठक को बहुत गहराई तक उद्वेलित करती हैं।
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कुछ कहानियाँ, कुछ यात्रा-संस्मरण और अमरीका से श्रोताओं के नाम लिखे गए चौदह पत्रों का यह संग्रह कथाकार उषा प्रियम्वदा के उस प्रवासी मन के भीतर झाँकने का मौक़ा देता है जो लम्बे विदेश-प्रवास के बावजूद आज भी भारतीय है।</p>
<p>चिर-परिचित संवेदनशील शैली में लिखी इन मार्मिक कहानियों के भीतर से झाँकती मानसिकता आज भी अपनी देसी पहचान नहीं खो पाई है। चारों तरफ़ फैला जीवन अपने समूचे आकर्षण-विकर्षण के बावजूद है तो विदेशी ही। देसी और विदेशी के बीच लगातार होता संवाद उषा की इन रचनाओं का प्रमुख आकर्षण है। सुदूर अमरीका के विस्कांसिन शहर में बैठी यह भारतीय कथाकार चाहे कहानियों के ताने-बाने बुने, चाहे अपने समूचे व्यक्तित्व को साथ लिए-दिए यूरोप-भ्रमण करे या फिर उस विराट परदेस अमरीका की अपनी पहचान को पत्रों के माध्यम से उजागर करे, पाठक भूल ही नहीं सकता कि इनके पीछे से झाँकता एक मन है जो ठेठ भारतीय है।</p>
<p>“प्रवासी के लिए घर लौटना एक मधुर और कचोट-भरा अवसर होता है। पर साथ ही कहीं छुपा यह बोध भी रहता है कि हम पूरी तरह घर नहीं लौट पाएँगे। हमारा एक अंश, हमारी भावनाओं और अनुभवों का एक भाग जैसे पीछे रह जाता है।”</p>
<p>प्रवासी मन के इन्हीं मधुर-तिक्त अनुभवों की दास्तान हैं ये रचनाएँ जो पाठक को बहुत गहराई तक उद्वेलित करती हैं।
Book Details
-
ISBN9788171785551
-
Pages163
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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कुछ ही दिन पहले मेरी दो कहानियों पढ़कर दो पाठकों के क्रोध-भरे पत्र आए। एक ने लिखा था कि 'अपने लेखों और अन्य कार्यक्रमों में मैं स्त्री-मुक्ति और आत्मनिर्भरता की बात करती हूँ, जबकि इस कहानी की नायिका की घुटनभरी-दब्बू जिंदगी हमें कोई ऐसा ‘संदेश’ नहीं देती। दूसरे पाठक ने भी घुमा-फिराकर यही पूछा था कि ‘ठीक है, पात्रों की निजी दुनिया के दबावों और उनके सुख-दुख से कहानी हमारा साक्षात्कार तो कराती है, पर यह अन्त में आकर हमें ‘सिखाती’ क्या है?’ मुझे लगता है कि एक बोझिल हितोपदेशी पाठ्यक्रम की किताबों से ‘साहित्य’ पढ़कर निकले ऐसे पाठक रचनात्मक साहित्य की आत्मा से अपरिचित ही रह आए हैं। मुझे खेद है, मेरी कहानियाँ इनकी थोथी उपदेश-तृष्णा नहीं बुझा सकतीं।
हर कहानी या उपन्यास घटनाओं-पात्रों के जरिए सत्य से एक आशिक और कुतूहलभरा साक्षात्कार होता है। साहित्य हमें जीवन जीना सिखाने के बजाय टुकड़ा-टुकड़ा 'दिखाता' है, वे तमाम नर्क-स्वर्ग, वे राग-विराग, वे सारे उदारता और संकीर्णता-भरे मोड़, जिनका सम्मिलित नाम मानव-जीवन है। जो साहित्य उघाड़ता है, वह अन्तिम सत्य या सार्वभौम आदर्श नहीं, बहुस्तरीय यथार्थ होता है। हाँ, यदि जीवन में आदर्श या सत्य अनुपस्थित या अवहेलित हैं, तो उस विडंबना को भी यह जताता जाता है।
मेरी तहत साहित्य को रचना, परोक्ष रूप से सत्य से आंशिक साक्षात्कारों की ऐसी ही एक शृंखला पाठकों के लिए तैयार करना होता है, जिसके सहारे एक सहृदय व्यक्ति अपनी चेतना, अपनी संवेदना और अभिव्यक्ति-क्षमता का सहज ही कुछ और विस्तार होता पाए। चिंतनपरक लेख और रचनात्मक लेखन के बीच का फासला तर्कसंगत ज्ञान और संवेदनात्मक समझ के बीच का फासला है।
—मृणाल पाण्डे
Nishachar
- Author Name:
Bhisham Sahni
- Book Type:

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भीष्म साहनी ने बतौर कथाकार जो रास्ता चुना, उसके आधार पर अगर उन्हें पथ-प्रवर्तक कहा जाए तो वह ग़लत इसलिए होगा कि उसका अनुकरण हर किसी के लिए सहज नहीं है। बह रास्ता स्वयं सहजता का है, और उस पर चलने की हर सचेत कोशिश अपको न सिर्फ़ असहज, बल्कि अमौलिक भी कर देगी।
वह सहजता जीवन के स्व-भाव से आती है जिसे आप अपने परिवेश के बीचोबीच रहते हुए अर्जित भी नहीं करते, सिर्फ़ स्वीकार करते हैं। यथार्थ के प्रति यह स्वीकृति-भाव ही द्रष्टा को यथार्थ के सम्पूर्ण तक ले जाता है। यह यह आश्चर्यजनक है कि प्रगतिशील विचारधारा में प्रशिक्षित भीष्म जी ने अपने कथाकार को कभी इस स्वीकृति-भाव से वंचित नहीं किया।
अपनी हर कथा-रचना की तरह इस संग्रह की कहानियों में भी भीष्म जी ने दृष्टि की उस विराटता का परिचय दिया है। वर्ष 1983 में प्रकाशित इस संग्रह में उनकी प्रसिद्ध कहानियों में से एक ‘चाचा मंगलसेन’ भी है। साथ ही ‘जहूर बख्श’, ‘सरदारनी’ और 'सलमा आपा’ सहित कुल चौदह कहानियों से सम्पन्न यह पुस्तक सम्बन्धों के बनते-बिगड़ते रूपों और उनके मध्य अकुंठ खड़ी मानवीय जिजीविषा के अनेक आत्मीय और करुण चित्र हमें देती है। ये कहानियाँ गहरे संघर्ष के बाबजूद पलायन नहीं करने की ज़िद को भी रेखांकित करती हैं और वीभत्स के सम्मुख खड़े सौन्दर्य को भी।
Pathar Ke Neeche Dabe Hue Hath
- Author Name:
Rajkamal Chaudhary
- Book Type:

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राजकमल चौधरी की कहानियाँ परमाणु में पर्वत के समावेश की कहानियाँ हैं, जो मानव-जीवन के अनछुए प्रसंगों से उठाकर लाई गई हैं, जिनमें राजकमल की सारी की सारी कहानी-कला मौजूद है और लगता ऐसा है कि इनमें कोई कला नहीं दिखाई गई है। जनजीवन का सत्य ज्यों का त्यों रख दिया गया है। सच्ची घटनाएँ तो अख़बारी रिपोर्टों में बयान होती हैं, कहानी में घटनाएँ सच की तरह आती हैं। घटनाएँ सच हों, इससे ज़्यादा ज़रूरी है कि वे सच लगें भी। राजकमल की कहानियों की यह ख़ास विशेषता है कि वे सारी घटनाएँ सच हों या न हों, सच लगती अवश्य हैं।
धर्म, साहित्य, नौकरी, व्यापार, फ़िल्म, सामाजिक जीवन-यापन...तमाम क्षेत्रों की विकृतियों का इतनी सूक्ष्मता से यहाँ पर्दाफ़ाश किया गया है कि वे अचानक तार-तार हो जाती हैं। छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति, क्षणिक मनोवेगों की पुष्टि के लिए मनुष्य किस सीमा तक गिर सकता है; संन्यासी और सिद्ध योगी और यहाँ तक कि देवता की छवि रखनेवाला भी पल-भर में कैसा जानवर हो जाता है; ख़ूँख़ार जानवर कैसा गऊ हो जाता है; शेर की दहाड़ और आतंक का मालिक पल-भर में कैसे गीदड़, चूहा, केंचुआ, चींटी हो जाता है और रेंगने लगता है—मानव-जीवन की इसी उठा-पटक का एलबम है—राजकमल की कहानियाँ।
Pratinidhi Kahaniyan : Swayam Prakash
- Author Name:
Swayam Prakash
- Book Type:

- Description: स्वयं प्रकाश की कहानियाँ भारतीय, विशेष रूप से हिन्दी मध्यवर्ग के जीवन की एक तस्वीर पेश करती हैं—मनुष्यता से लबरेज़ पर दब्बू और डरपोक मध्यवर्ग, छोटी-छोटी आकांक्षाओं के लिए भी संघर्षरत, अन्ततः उन्हें स्थगित करता मध्यवर्ग, स्वार्थों की अन्धी दौड़ में भागता-गिरता-पड़ता मध्यवर्ग, निम्नवर्गीय जनों से विराग रखता मध्यवर्ग। यूँ तो स्वयं प्रकाश का कथाफ़लक गाँव से शहर तक फैला है, परन्तु उसका केन्द्र मध्यवर्ग ही है। यह मध्यवर्ग स्वतंत्रता आन्दोलन के दौर का मध्यवर्ग नहीं है जिसमें निम्नवर्ग के प्रति एक सदाशयता और सहभाव मौजूद था। इसमें निम्नवर्ग के प्रति वितृष्णा और घृणा निर्णायक हद तक मौजूद है। इस मध्यवर्ग में एक छोटी संख्या, उन लोगों की भी है, जिनमें समाज को बदलने की इच्छा मौजूद है। ऐसे चरित्र स्वयं प्रकाश के यहाँ प्रमुखता से मौजूद हैं। स्वयं प्रकाश की गहरी सहानुभूति इनके साथ है। इसीलिए इनके प्रति एक तरह का आलोचनात्मक भाव भी मौजूद है। परिवर्तनकामी चेतना जब मध्यवर्गीय स्वार्थपरता, पर्सनाल्टी कल्ट, या थोथे आदर्शवाद से घिर जाती है, स्वयं प्रकाश इन चरित्रों के प्रति तीखे हो जाते हैं। उनकी कहानियों में भारतीय स्त्री के जीवन की गहरी आलोचनात्मक पड़ताल भी मौजूद है। वे स्त्री-चरित्रों को प्रायः एक टाइप की तरह नहीं, एक व्यक्ति की तरह अंकित करते हैं। ये स्त्री-चरित्र पुरुष-चरित्रों की तरह ही निजी विशिष्टताओं के मालिक हैं। उन पर सामाजिक संरचना के दबाव हैं, परन्तु वे उनके विरुद्ध जीते हुए अपनी तरह का संसार रचने को आतुर हैं। स्वयं प्रकाश ने कहानीपन की रक्षा करते हुए, उसे रोचक बनाते हुए एक ज्ञानी की तरह नहीं एक क़िस्सागो की तरह अपनी कहानियाँ कही हैं।
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