Shri Ramcharitmanas : Saptam Sopan Uttar Kand
(0)
Author:
Yogendra Pratap SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
495
396 (20% off)
Unavailable
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
Shri Ramcharitmanas : Saptam Sopan Uttar Kand Literary Criticism Ram Sahitya
Read moreAbout the Book
Shri Ramcharitmanas : Saptam Sopan Uttar Kand
Literary Criticism Ram Sahitya
Book Details
-
ISBNShriRamcharitmanasSaptamSopanUttarKandHardCover
-
Pages209
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Ashtavakra Geeta
- Author Name:
Swami Prakhar Pragyanand
- Book Type:

- Description: "भारतीय पौराणिक साहित्य-भंडार में एक-से-एक अप्रतिम बहुमूल्य रत्न भरे पड़े हैं। अष्टावक्र गीता अध्यात्म का शिरोमणि गं्रथ है। इसकी तुलना किसी अन्य गं्रथ से नहीं की जा सकती। अष्टावक्रजी बुद्धपुरुष थे, जिनका नाम अध्यात्म-जगत् में आदर एवं सम्मान के साथ लिया जाता है। कहा जाता है कि जब वे अपनी माता के गर्भ में थे, उस समय उनके पिताजी वेद-पाठ कर रहे थे, तब उन्होंने गर्भ से ही पिता को टोक दिया था—‘शास्त्रों में ज्ञान कहाँ है? ज्ञान तो स्वयं के भीतर है! सत्य शास्त्रों में नहीं, स्वयं में है।’ यह सुनकर पिता ने गर्भस्थ शिशु को शाप दे दिया, ‘तू आठ अंगों से टेढ़ा-मेढ़ा एवं कुरूप होगा।’ इसीलिए उनका नाम ‘अष्टावक्र’ पड़ा। ‘अष्टावक्र गीता’ में अष्टावक्रजी के एक-से-एक अनूठे वक्तव्य हैं। ये कोई सैद्धांतिक वक्तव्य नहीं हैं, बल्कि प्रयोगसिद्ध वैज्ञानिक सत्य हैं, जिनको उन्होंने विदेह जनक पर प्रयोग करके सत्य सिद्ध कर दिखाया था। राजा जनक ने बारह वर्षीय अष्टावक्रजी को अपने सिंहासन पर बैठाया और स्वयं उनके चरणों में बैठकर शिष्य-भाव से अपनी जिज्ञासाओं का शमन कराया। यही शंका-समाधान अष्टावक्र संवाद रूप में ‘अष्टावक्र गीता’ में समाहित है। ज्ञान-पिपासु एवं अध्यात्म-जिज्ञासु पाठकों के लिए एक श्रेष्ठ, पठनीय एवं संग्रहणीय आध्यात्मिक ग्रंथ। "
Allamprabhu : Pratibha Ka Shikhar
- Author Name:
Kashinath Ambalge
- Book Type:

-
Description:
अज्ञान रूपी पालने में
ज्ञान रूपी शिशु सुलाकर
सकल वेदशास्त्र रूपी रस्सी से बाँधकर झूला,
झुलाती हुई पालने
लोरी गा रही है, भ्रान्ति रूपी माई!
जब तक पालना न टूटे, रस्सी न कटे
लोरी बन्द न हो
तब तक गुहेश्वर लिंग के दर्शन नहीं होंगे॥
अल्लम सृजनशीलता के प्रति विश्वास रखते हैं कि ‘नि:शब्द ज्ञान क्या शब्दों की साधना से सम्भव है?’
बहती नदी को देह भर पाँव
जलती आग को देह भर जिह्वा
बहती हवा को देह भर हाथ
अतः गुहेश्वर, तेरे शरण का सर्वांग लिंगमय है॥
Sayiyin Vakuruthigal
- Author Name:
Sumit Ponda Bhaijee
- Book Type:

- Description: பாய்ஜி சிறுவயதிலிருந்தே சாயிபாபாவிடம் ஈர்க்கப்பட்டார் மற்றும் சாயி மீது ஆர்வம் கொண்ட எவருக்கும் பாபாவைப் பற்றி எண்ணற்று கைதகைள் கூறுவார் அவர் சாயிபாபாவிடமிருந்து உதவேகம் பெற்றார் என்று கூறுவார் பாபாவின் வாழ்ககை கைகைள் விவளிப்பதன் மூலமும் அவருடைய புகழைப் பாடுவதன் மூலமும் பாபாவின் பௌயர் பரப்பினார் அமுதம் போன்று சாயியின அன்பு சாபி அமிர்த் கதர் என்று அழைக்கப்பட்டு உலகெங்கிலும் பரவி வருகிறது பாயஜி தனது தனித்துவமான பாணியில் ஸ்ரீ சாயி சத்சரிதத்தின் போதைன்கைள இக்கால சங்கடங்களுடன தொடாபுபடுத்தி அதன் மூலம் ஏராளமான வாழ்ககை பிரச்சனைகளுக்கு விடை அளிக்கிறார். சாய்யாபா பற்றிய பாயறியிள வலைப்பதிவு: (Bleg) பத்து வட்சத்திற்கும் அதிகமான வாசிப்புகளைப் பெற்றுள்ளது. ஸ்ரீ சாயி அமிரத கதாவின் யூடியூப் சேன்ல் இருபது வடசம் பார்வைகளைக் கடந்துள்ளது. முகநூல் பக்கம் கிட்டத்தட்ட ஐந்து லட்சப் பின்தொடர்பவர்களைக் கொண்டுள்ளது பாய்றியிள தினசரி மேற்கோள் வாசகம் () மற்றும் அதன தெளிவான விரிவாக்கம் எப்போதும் அனைவராலும் எதிர்பார்க்கப்படுகிறது
Jagadguru Adya Shankaracharya
- Author Name:
Shivdas Pandey
- Book Type:

- Description: "शंकराचार्य एक ऐसे शास्त्राचार्य का नाम है, जो संस्कृति-रक्षा को युद्ध मानकर शास्त्रार्थ करता है और जिसका अस्त्र-शस्त्र सबकुछ शास्त्र तथा जिसका युद्ध मात्र शास्त्रार्थ है एवं जिसकी शति हजारो-हजार वर्षों की ऋषि-प्रति-ऋषि एवं तपस्या-प्रति-तपस्या सिद्ध ज्ञान-संपदा है। वह न तो खलीफाओं की तरह युद्ध करता है और न नियोजित बोधिसवों की तरह, न ही जैसा देश, वैसा वेश, वैसा धर्म का सिका चलानेवाले ईसाई पादरियों की तरह। वह शास्त्र के शस्त्र से शास्त्रार्थ का युद्ध लड़ना जानता है—धर्म के क्षेत्र में ज्ञान तथा न्याय के निर्धारित विधानों के सर्वथा अनुरूप। यह युद्ध षड्दर्शनों तथा षड्चक्रों के साधकों के साथ-साथ इन ब्रह्मवादी शैव-दर्शन के तंत्रोन्मुख कश्मीरी शैवों से भी होता है और वह सोलह वर्षों में सभी विवादों का समाधान ढूँढ़कर वैदिक संस्कृति को पुन: स्थापित करता है। शंकराचार्य जैसा आचार्य होना, एक योगसिद्ध-ज्ञानसिद्ध तथा ध्यानसिद्ध आचार्य होना और ऐसे आचार्य का एक सिद्ध जगद्गुरु हो जाने का भी कोई विशेष अर्थ होता है। वह समय आ गया है, जब पुन: एक बार भारत को जगद्गुरु शंकराचार्य का मात्र दर्शन-चिंतन-मंथन वाला युग नहीं, वरन् भारत डॉट कॉम विश्वगुरुवाले नए युग का भी गौरवशाली जगद्गुरु पद प्राप्त होना चाहिए। भारतीय धर्म-दर्शन-संस्कृति परंपराओं के ध्वजवाहक कोटि-कोटि हृदयों के आस्थापुंज जगद्गुरु शंकराचार्य के प्रेरणाप्रद-अनुकरणीय जीवन पर केंद्रित पठनीय उपन्यास। "
Geetgovind
- Author Name:
Jaidev
- Book Type:

- Description: "‘गीतगोविंद’ संस्कृत के प्रसिद्ध कवि जयदेव द्वारा रचित एक अनुपम काव्य-ग्रंथ है, जिसमें राधा-कृष्ण की केलि-कथाओं तथा उनकी अभिसार-लीलाओं के अत्यंत रसमय चित्रण के साथ ही प्रेम के सभी भारतीय रूपों का बड़ी तन्मयता और कुशलता के साथ वर्णन किया गया है। समग्र संस्कृत साहित्य में इस कोटि की मधुर रचना दूसरी कोई नहीं। यह आध्यात्मिक शृंगार का अत्यंत मनोरम काव्य-ग्रंथ है, जिसमें शब्द और अर्थ का मनोमुग्धकारी सामंजस्य है। कृष्ण-भक्ति साहित्य में ‘गीतगोविंद’ को धर्मग्रंथ का स्थान प्राप्त है। श्रीवल्लभ संप्रदाय में भी ‘गीतगोविंद’ को श्रीमद्भागवत पुराण के समान प्रतिष्ठा प्राप्त है। यह ग्रंथ देश-विदेश के अनेक मूर्धन्य एवं लब्धप्रतिष्ठ विद्वान् समीक्षकों द्वारा मुक्त कंठ से प्रशंसित है। प्रस्तुत है, धर्म और दर्शन के क्षेत्र में सुप्रतिष्ठित इस ग्रंथ-रत्न का सुमधुर हिंदी अनुवाद। आध्यात्मिक साधकों के लिए ही नहीं आम पाठकों के लिए समान रूप से उपयोगी पुस्तक। "
Temples Tour: East, West, North, South India
- Author Name:
Rajiv Aggarwal
- Book Type:

- Description: Temples Tour is a book of compilation of major Temples in India and it is compiled with the help of official website of 739 districts of the country (till March 2020), website of Ministry of Tourism of Government of India and all states, website of Archaeological Survey of India, Wikipedia, official website of Temples, other religious websites, Facebook, Twitter, many books and articles. In this compilation, I have covered Temples from Andaman to Ajmer, Bodhgaya to Sarnath, Jagannath Puri to Kedarnath, Kanyakumari to Ksheer Bhavani, Koteshwar to Kamakhya, Lakshadweep to Leh, Sammedshikhar to Shravanbelgola and Somnath to Kashi Vishwanath. There are various types of Temples such as Ashtavinayak Temples, Buddhist Temples, Char Dham, Chota Char Dham, Eight Mahakshetras of Lord Vishnu, Hot/Perennial Sulphur Springs, ISKCON Temples, Jain Temples, Jyotilinga, Nag Devta Temples, Nava Narasimhas, Nava Thirupathi, Panch Badri, Panch Dwarka, Panch Kannan Kshetrams, Panch Kedar, Panch Prayag, Pancha Narasimha Kshetras, Pancharama Kshetras, Pancha Bhoota Sthalam, Panch Sabhai Temples, Sapta Puris, Seven Baithaks of Pushtimarg (Thakurji), Seven Thakurji of Vrindavan, Shakti Peetha, Shani Parihara Temples, Sindhi Temple, Six Abodes of Lord Murugan, Sun Temples, Trilinga Kshetras and other Temples, ponds/lakes, trees, saints and statues of more than 50 foot height.
Rigved : Mandal-10 Uttarardh
- Author Name:
Govind Chandra Pandey
- Book Type:

-
Description:
वेद सनातनविद्या के काव्यात्मक प्रतिपादन हैं। ऋग्वेद संहिता के अनुवाद एवं व्याख्या का प्रयास अनेक भाषाओं में समय-समय पर होता रहा है, किन्तु अभी तक उपलब्ध सभी अनुवादों में काव्यपक्ष की उपेक्षा अथवा पद्यानुवाद की प्रस्तुति के असम्भव प्रयास ही किए गए हैं जो ऋचाओं के साथ पूरा न्याय नहीं करते हैं। वेदों में भावों की सनातनता एक व्यापक ध्वनि के रूप में सूक्तों, संवादों और आख्यानों में विद्यमान है। प्रस्तुत अनुवाद में पादानुसारी किन्तु भावपरक अनुवाद पर विशेष आग्रह सोद्देश्य है ताकि ऋचाओं की काव्यात्मकता का यथासम्भव सम्प्रेषण एवं मूल की अर्थयोजना का क्रम अनुवाद में सुरक्षित रहे।
भाषान्तर में व्याख्या का सूक्ष्म प्रकार अनिवार्य होता है और वही अनुवाद का वर्तमान और अतीत के मध्य संवाद बनाकर बहुत कुछ को परम्परा में जीवित तथा प्रगतिशील रखता है। अतः ग्रन्थ में अनुवाद के लिए उपयुक्त भाषा, पुरातन ध्वनि बहुलता और समसामयिक सजीवता के संरक्षण की दृष्टि से तत्सम, तद्भव एवं देशी शब्दों के समन्वित प्रयोग किए गए हैं। साथ ही, गम्भीर और बहुमुखी अर्थों को स्पष्ट करने के लिए क्रियापदों के अनुवाद, दुरूह पदों के अर्थनिर्वचन में धातुपाठ, निरुक्त की पद्धति एवं आधुनिक तथा तुलनात्मक व्याकरण के अनुसरण से सहायता ली गई है।
वेद आर्षकाव्य के निर्देशन के साथ-साथ अध्यात्मगवेषियों के मार्गदर्शक भी हैं। अतः ऋचाओं में संश्लिष्ट आधियाज्ञिक, आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक अर्थों को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है। व्याख्याकारों में जहाँ विवाद की स्थिति है, वहाँ प्राचीन एवं नवीन दोनों ही मतों का विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार काव्यात्मक पक्ष की प्रस्तुति, निगूढ़ अर्थ के आयामों का विश्लेषण और विवादित स्थलों का तुलनात्मक विवेचन इस ग्रन्थ के अनुवाद एवं व्याख्या की अभीप्सित विशेषताएँ हैं।
इस खंड में ‘ऋग्वेद’ के दसवें मंडल (उत्तरार्द्ध) का व्याख्या सहित हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया गया है।
Vinay Patrika
- Author Name:
Tulsidass
- Book Type:

-
Description:
आत्म निवेदन का सीधा सम्बन्ध अन्तःकरण के आयतन से है। इस तरह की रचनाओं में आत्म-संवाद झलकता है। सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य के इतिहास में तुलसीदास की ‘विनय पत्रिका’ और निराला की ‘अणिमा’ से लेकर ‘सांध्यकाकली’ तक की रचनाओं में यह स्वर विशेष रूप से सुनाई पड़ता है। अन्तर्मुखी होकर किया गया आत्मविश्लेषण, अन्तर्द्वन्द्वों की गहराई, निर्भय होकर की गई आत्म-समीक्षा और सामाजिकता इन रचनाओं को अपने युग का प्रतिनिधित्व प्रदान करती हैं।
तुलसीदास के ‘हौं’ और निराला के ‘मैं’ की प्रकृति, घनत्व और आत्मविस्तार का धरातल उन्हें भिन्न कालखंडों में भी समानधर्मा बनाता है—‘उत्पस्यते तु मम कोऽपि समानधर्मा, कालो ह्यं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी’। ‘विनय पत्रिका’ और निराला की परवर्ती रचनाओं में अभिव्यक्त विनय-भावना कपोल कल्पना या आत्म-प्रवंचना नहीं है। यह दोनों कवियों के जीवन की गाढ़ी कमाई और सर्जनात्मक उपलब्धि है। दार्शनिक स्तर पर जीवन-जगत के प्रति द्वन्द्वात्मक अन्तर्दृष्टि एवं ‘अखिल कारुणिक मंगल’ के प्रसार की कामना ने भक्ति का साधारणीकरण कर दिया है। तुलसीदास का ‘हौं’ एवं निराला का ‘मैं’, अपने समाज से अन्तःक्रिया करते हुए बना है। आत्म-मुक्ति आत्म-प्रसार की भावना से अविच्छिन्न है। दोनों की विनय भावना का अन्त न तो भाग्यवाद में होता है और न ही निराशा में। इस दृष्टि से ‘विनय पत्रिका’ का अन्तिम पद और निराला की अन्तिम रचना सहज तुलनीय है।
Hindu Dharma Ki Dharohar : Bharatiya Sanskriti
- Author Name:
Sanjay Rai Sherpuria
- Book Type:

- Description: ‘हिंदू धर्म की धरोहरः भारतीय संस्कृति’ यह शीर्षक स्वयं में इस पुस्तक का समग्र परिचय करवा रहा है। सनातन हिंदू धर्म क्या है और किस प्रकार से यह भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि के रूप में निरंतर क्रियाशील है, यही तथ्य इस पुस्तक के आधार तत्व हैं। यज्ञ, हवन, शंख, पद्म, गाय, त्रिशूल, मंदिर, देवस्थान जैसे शब्द सनातन हिंदू वैदिक संस्कृति में ही हैं। ये केवल शब्द ही नहीं हैं बल्कि इन शब्दों के उच्चारण में ही ऐसा ध्वनित होता है कि जीवन और जीवन का रहस्य क्या है। हमारे देवी, देवता और धार्मिक प्रतीक क्या हैं? कैसे हैं? कितने महत्त्वपूर्ण हैं? क्यों हैं? स्वाभाविक है कि जिस प्रकार से समाज बदल रहा है और विश्व पटल पर अनेकानेक उपासना पद्धतियाँ जन्म ले रही हैं, ऐसे परिवेश में किसी को भी यदि हिंदू संस्कृति को जानना और समझना है तो संजय राय ‘शेरपुरिया’ की इस पुस्तक को अवश्य पढ़ना चाहिए। जिस विशिष्टता से इस पुस्तक में सनातन प्रतीकों को मोतियों की माला में पिरोया गया है, वह अद्भुत है। भारतीयता, संस्कृति और हिंदू विरासत को समझने के लिए इस पुस्तक में सभी प्रमुख तथ्य, तत्त्व और प्रतीक उपस्थित हैं। यह पुस्तक एक ऐसी कुंजिका है जो भावी पीढ़ी को अपने मूल से जोड़ने और हिंदू संस्कृति को समझने में सक्षम भूमिका का निर्वहन करेगी। सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति का वैशिष्ट्य और निरंतरता बताती पठनीय पुस्तक।
Shree Ramcharitmanas
- Author Name:
Tulsidass
- Book Type:

- Description: रामचरितमानस एक चरित-काव्य है जिसमें राम का सम्पूर्ण जीवन वर्णित हुआ है। इसमें चरित और काव्य दोनों के गुण समान रूप से मिलते हैं। इस काव्य के चरितनायक कवि के आराध्य भी हैं इसलिए यह ‘चरित और ‘काव्य'होने के साथ-साथ कवि की भक्ति का प्रतीक भी है। रचना के इन तीनों रूपों में नीचे उसका संक्षिप्त विवेचन किया जा रहा है। ‘चरित’ की दृष्टि से यह रचना पर्याप्त सफल हुई है। इसमें राम के जीवन की समस्त घटनाएँ आवश्यक विस्तार के साथ एक सुसम्बद्ध रूप में कही गई हैं। रावण के पूर्वभव तथा राम के पूर्वाकार की कथाओं से लेकर राम के राज्य-वर्णन तक कवि ने कोई भी प्रासंगिक कथा रचना में नहीं आने दी है। इस सम्बन्ध में यदि वाल्मीकीय तथा अन्य अधिकतर राम कथा ग्रन्थों से रामचरितमानस की तुलना की जाए तो तुलसीदास की विशेषता प्रमाणित होगी। काव्य की दृष्टि से रामचरितमानस एक अति उत्कृष्ट महाकाव्य है। भारतीय साहित्य-शास्त्र में ‘महाकाव्य’ के जितने लक्षण दिए गए हैं वे इसमें पूर्ण रूप से पाए जाते हैं। तुलसीदास की ‘भक्ति’ की अभिव्यक्ति भी इसमें अत्यन्त विशद रूप में हुई है। अपने आराध्य के सम्बन्ध में उन्होंने रामचरितमानस और विनय-पत्रिका में अनेक बार कहा है कि उनके राम का चरित्र ही ऐसा है कि जो एक बार उसे सुन लेता है वह अनायास उनका भक्त हो जाता है। वास्तव में तुलसीदास ने अपने आराध्य के चरित्र की ऐसी ही कल्पना की है।
ADBHUT SANNYASI
- Author Name:
Rajeev Sharma
- Book Type:

- Description: यह गाथा है एक निस्पृह योगी की, चिरंजीवी तपस्वी की, कठिनतम कर्तव्यरत निर्विकार पुरुषार्थी की, अपराजेय योद्धा की। वे आवेशावतार नहीं थे, न ही अंशावतार। क्रोधावतार कहकर उन्हें सीमित नहीं किया जा सकता। आज तक पृथ्वी पर उनके शौर्य की झलक है, वह उनकी साक्षात् उपस्थिति में कितनी प्रभावी रही होगी। वे उस भृगुकुल के भूषण थे, जिसकी महिमा का विस्तार पवित्र नदियों और समुद्रों, पर्वतों और गहन वनों में विद्यमान असंख्य आश्रमों में ही नहीं संपूर्ण त्रैलोक्य में था, भगवान् विष्णु के वक्षस्थल से लेकर हिमगिरि में भृगु शिखर तक। मदांध सत्ता की कुटिलता के विरुद्ध जनप्रतिरोध का प्रबलतम स्वर हैं परशुराम। आजकल के कथित लोकतंत्रों के जन्म के युगों पूर्व वे तंत्र पर लोक के प्रभावी नियंत्रण के अधिष्ठाता हैं। यदि भारतीय चेतना यूरोपीय प्रभुत्व की बंधक न हुई होती तो स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और न्याय के लिए मानवीय संघर्ष की गाथा परशुराम से प्रारंभ हुई होती; कथित फ्रांसीसी क्रांति से नहीं। वे कोरे योद्धा नहीं थे। उन्होंने साधारण मनुष्यों को शास्त्र और शस्त्र दोनों सौंपकर वह सामर्थ्य दिया कि वे स्वयं अभ्युदय और निःश्रेयस पा सकें। उनकी अद्भुत जीवनगाथा हमारे युग को भी स्वमंगल से सर्वमंगल और अराज से स्वराज हेतु प्रेरित कर सके, यही इस कृति का पावन प्रयोजन है।
Prayagraj: Ardhkumbh, Kumbh, Mahakumbh
- Author Name:
Kumar Nirmalendu
- Book Type:

- Description: भक्ति, तीर्थ, धर्म, ब्रह्म और मोक्ष की अवधारणा को समझे बिना भारत और उसकी चेतना को समझ पाना सम्भव नहीं है। भारत में जहाँ कहीं भी देवनदी के एक से अधिक प्रवाह एक साथ मिलकर बहने लगते हैं, धाराओं का वह मिलन-स्थान ‘प्रयाग’ बन जाता है। हिमालय क्षेत्र में पंचप्रयाग तीर्थ ऐसे ही बने हैं। परन्तु जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती की तीन धाराओं का मिलन होता है, उस स्थान को प्रयागराज कहा गया है। यहाँ प्रतिवर्ष माघ स्नान के लिए, प्रति 6 वर्ष पर अर्धकुम्भ स्नान के लिए, प्रति 12 वर्ष पर कुम्भ स्नान के लिए और प्रति 144 वर्ष पर महाकुम्भ स्नान के लिए असंख्य लोग आते हैं। भाषा, जाति, प्रान्त आदि के भेदों को भुलाकर एक जन-समुद्र उमड़ आता है। भारतीय जीवन पद्धति में अमृतत्त्व का अनुसन्धान मानव जीवन का चरम लक्ष्य रहा है। अर्धकुम्भ, कुम्भ या महाकुम्भ के अवसर पर एकत्र होने वाला अपार जनसमुदाय सम्भवतः अमृत से भरे कुम्भ की अपनी अव्यक्त अभिलाषा को लेकर ही यहाँ पहुँचता है। प्रयागराज भारत का प्रमुख सांस्कृतिक केन्द्र होने के साथ ही भारतीय सात्विकता का सर्वोत्तम प्रतीक भी है। कुम्भ सम्बन्धी पौराणिक मान्यता का सर्वाधिक प्रचार शंकराचार्य ने किया था। लेकिन आदि शंकराचार्य के पूर्व भी प्रयाग में कुम्भ का आयोजन होता रहा है। इसका सबसे पुराना ऐतिहासिक वर्णन ह्वेनत्सांग (7वीं सदी ई.) ने किया था। उस समय प्रयाग के त्रिवेणी संगम पर दुनिया भर से ऋषि-मुनि, राजा-महाराजा, सामन्त, कलाविद् और धर्मप्राण लोग लाखों की संख्या में एकत्र हुए थे। कुम्भ के दौरान संगम तीर्थ पर एक स्नान दिवस पर भक्तिभाव से कई बार इतने लोग जमा हो जाते हैं कि उनकी संख्या दुनिया के कई देशों की कुल जनसंख्या से भी अधिक होती है। श्रद्धालु श्रद्धा और भक्ति की एक अदृश्य डोर में बँधकर खिंचे चले आते हैं। श्रद्धा और आस्था का यह आवेग सदियों से चली आ रही हमारी परम्परा का हिस्सा है। प्रयागराज और कुम्भ की गौरवशाली परम्परा के बारे में जानना एक सुखद अनुभूति है।
Shriramcharitmanas By Tulsidas (English)
- Author Name:
Tulsidas
- Book Type:

- Description: Lord Ram’s life and exploration is so popular that the story has been translated in many languages and versions of Ramcharitmanas. It has a historical enigma, spiritual aura and moral ideals. It’s a treasure of deep inside education, views and unparalleled virtues of righteousness. Many Ram devotees in India could recite the complete verses of the holy book.
Aatmbodh Ke Ayam : Bhartiya Sangeet Ke Anahatnad
- Author Name:
Smriti Sharma
- Book Type:

- Description: ज्ञान मनुष्य के लिए तभी सहायक होता है, जब वह अपने साथ-साथ समाज को ऊँचा उठाने का सामर्थ्य रखता हो और ब्रह्मज्ञान की सार्थकता तब होती है जब साधक अपने-आपको इतनी ऊँचाई तक ले जाए कि वह त्रिकालज्ञ बनाकर समाज को आत्मकल्याण के मार्ग में ले जाए। ब्रह्मज्ञानी के लोक और परलोक दोनों सुन्दर और सुखद हो जाते हैं, किन्तु ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना अत्यन्त दुष्कर कार्य है। यह अध्यात्म के रास्ते चलकर भक्ति और रोग के धर्म को स्वीकृति प्रदान करके, कठिन साधना द्वारा प्राप्त किया जा सकता। अनाहतनाद की साधना ऐसी ही कठिन तपस्या है जिसे स्मृति शर्मा ने अपने अगम्य कार्य निष्ठा व अटूट मेहनत से पूर्ण किया। अनाहतनाद से आज के संगीत का जन्म हुआ है। भारतीय संगीत केवल मनोविनोद का साधन न होकर आत्मा को परमात्मा से जोड़ने के भक्ति मार्ग का परम कल्याणकारी साधन है। 'आत्मबोध के आयाम’ रचना संगीत एवं अध्यात्म के पाठकों का पथ प्रशस्त करेगी। सुधीजन इससे निश्चित ही लाभान्वित होंगे।
Teerthon Mein Teerthraj Prayag
- Author Name:
Shri Prakash
- Book Type:

-
Description:
इलाहाबाद मुग़लों की नज़र में अल्लाह द्वारा आबाद किया हुआ पवित्र नगर है। प्रयाग है, तीर्थ है, तीर्थराज है, प्रयागराज है। इसकी प्राचीनता असन्दिग्ध है। इसकी पौराणिकता, इसका इतिहास गौरवशाली है। मन्दिरों की ऐसी शृंखला है यहाँ कि इसे मन्दिरों का नगर कहें तो अतिशयोक्ति न होगी।
स्वतंत्रता आन्दोलन में 1857 की क्रान्ति से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन तक में इसकी भागीदारी अति महत्त्वपूर्ण है। स्वतंत्रता आन्दोलन में इस नगर और नेहरू परिवार की भागीदारी ने आनन्द भवन को तो राष्ट्रीय तीर्थ ही बना दिया। इन्दिरा गांधी ने अपने इस पैतृक भवन को राष्ट्र को समर्पित भी कर दिया।
नगर में मन्दिर हैं, ऐतिहासिक स्थल हैं, राष्ट्रीयता के प्रतीक-स्थल हैं और सबसे बढ़कर गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का पवित्र त्रिवेणी संगम है। प्रयाग की इस स्थापित महत्ता को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है यह पुस्तक।
Shri Leela Ramayan
- Author Name:
Bhanushankar Mehta
- Book Type:

- Description: प्रस्तुत पुस्तक ‘श्रीलीला रामायण’ में तुलसी की रामकथा है, उनका मानस है और गद्य-पद्य में उन्हीं की पंक्तियाँ हैं। प्रत्येक प्रसंग का मानस के अनुसार स्वरूप दिया गया है। यदि लीला करनेवाले चाहें तो उनका कवित्त-छन्द रीति से शृंगार कर सकते हैं, पर ध्यान रहे अतिरेक न हो, कथा का रस भंग न हो। क्षेपक जोड़ने से कथा का विस्तार होगा और यदि समय अनुमति दे तो वैसा कर सकते हैं। इस लीला-संग्रह में कोई दुराग्रह नहीं है, कोई बाध्यता नहीं है पर जो केवल तुलसी के ‘रामचरितमानस’ को रूपायित करना चाहते हैं, उनके लिए यह उपयोगी होगा। इसका पाठ आपको ‘रामचरितमानस’ के संक्षिप्त पाठ का सुख देगा। रामजी की प्रेरणा से यह लिखा गया और उन्हीं के युगल चरणों में अर्पित है।
A Complete Guide To Astrology
- Author Name:
Dr.Sanjay Rout
- Book Type:

- Description: This book is a complete guide to astrology. It provides readers with an impartial, objective and well-constructed understanding of the science of astrology so that they can make decisions based on their inner knowledge rather than belief-based superstitions.
Sai Ki Seva Mein
- Author Name:
Dr. Suresh Haware
- Book Type:

- Description: साईं की सेवा करने का मुझे अवसर मिला, यह मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा ईश्वरीय आशीर्वाद है, ऐसी मेरे मन की प्रामाणिक भावना है। इस कालावधि में मेरी जिंदगी पूरी तरह से बदल गई। मैं शिरडी कभी आता नहीं था, लेकिन इस पूरे कार्यकाल में मैं शिरडी के सिवाय कहीं जाता ही नहीं था। साईं बाबा का पहले कभी विचार करता नहीं था। लेकिन इस दौरान साईं के सिवाय कोई दूसरा विचार ही नहीं किया। पैर अपने आप शिरडी की ओर खिंचे चले आते थे।
Molige Maarayya : Molige Mahadevi
- Author Name:
Kashinath Ambalge
- Book Type:

-
Description:
महिलाएँ इस दुनिया में सदैव ही उपेक्षित रही हैं। उनको सामाजिक भागीदारी से दूर रखा गया, अतः वे साहित्य एवं सांस्कृतिक लोक में हाशिए पर रही हैं। पर इस वचन साहित्य के सन्दर्भ में महिला अपने व्यक्तित्व विकास की बुलंदी पर पहुँच चुकी थी, ऐसा लगता है।
घास-फूस, झाड़ निकाले बिना खेत स्वच्छ न होता/अशुद्धि और मल को स्वच्छ किए बिना मन शुद्ध न होता/जीव का मूल जाने बिना तन शुद्ध न होता/काय जीव का सम्बन्ध जाने बिना ज्ञानलेपी नहीं होता/इस प्रकार जो भाव भ्रमित हैं उन्हें क्यों ज्ञान प्राप्ति/निष्कळंक मल्लिकार्जुन?॥ भक्त भगवान का सम्बन्ध, जल कमल की रीति के समान/भक्त भगवान सम्बन्ध, क्षीर-नीर की रीति के समान/तुम्हारे और मेरे लिए अलग-अलग ठाँव है क्या/निष्कळंक मल्लिकार्जुन?॥
—मोळिगे मारय्या
Lohe Ki Kamarpetiyan
- Author Name:
Tapi Dharma Rao
- Book Type:

-
Description:
स्वर्गीय तापी धर्माराव के लेखन का फ़ोकस मुख्यत: समाज सुधार रहा है। तेलगू में इनकी पुस्तकें लोकप्रियता के शिखर पर रही हैं। इस पुस्तक में विख्यात लेखक ने कमरपेटियों की परम्परा और इतिहास को अपना विषय बनाया है।
कमरपेटियाँ हमारी परम्परा में जड़ी यौन–वर्जनाओं, पुरुष–वर्चस्व और शुद्धतावादी नैतिक आग्रहों की चरम और सर्वाधिक नृशंस अभिव्यक्ति हैं। इस पुस्तक में कमरपेटियों के इतिहास, उनके समाज–नीतिशास्त्र और वर्तमान में उनके लोक–प्रचलित अवशेषों का सरल, जनसाधारण की भाषा में विवरण दिया गया है। लेखक बताते हैं कि मरुगुबिल्लाओं (लाज–रक्षक पदक) के रूप में आज आन्ध्र में जो आभूषण प्रचलित है, वह कमरपेटियों का ही इमिटेशन है। उसके अलावा पुरातात्त्विक सर्वेक्षणों और खुदाइयों में मिली कमरपेटियों, उनके प्रकारों और उनसे जुड़ी किंवदन्तियों के बारे में प्रामाणिक जानकारी इस पुस्तक में है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book