Kabeer Soor Tulsi
(0)
Author:
Yogendra Pratap SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखकों तथा आलोचकों ने भक्ति के सन्दर्भ में अनेक टिप्पणियाँ दी हैं। किसी ने इसे ईसाइयत की देन बताई है तो किसी ने इस्लाम की उपज। कोई इसे हिन्दू जाति की हताशा तथा निराशा से जोड़ता है तो अन्य कोई दक्षिण भारत की देन कहता है। इन सबसे हटकर भक्ति प्रवाह भारतीय आध्यात्मिक चेतना का नैसर्गिक विकास है। भक्ति काव्यधारा की मूल प्रकृति में कहीं भी पराजय की कुंठाग्रस्तता नहीं है और न ही उसमें कहीं कोई क्षेत्रवाद ही दिखाई पड़ता है। यह इन सबके ऊपर सामाजिक समानता, प्रेम, हृदय-से हृदय को जोड़कर मानव जाति को आत्यन्तिक मंगलवाद की व्यवस्था से समृद्ध करनेवाली कविता है। इस आलोचनात्मक कृति का मूल मन्तव्य भी इसी से जुड़ा है।</p> <p>कबीर-सूर-तुलसी इन तीनों कवियों में वर्तमान भक्ति की केन्द्रीय चेतना को इंगित करते हुए उनके कृतित्व का एक बार पुनर्विश्लेषण किया गया है ताकि भक्ति की लोकानुभूति से इनकी कविता की आस्वादनभूमि का मर्म समझाया जा सके। ‘हरिस्मरण’ तथा ‘कलाविलास’ के प्रवाह-संगम पर रची गई भक्ति-कविता की अपूर्वता की विवेचना ही इस आलोच्य कृति का मन्तव्य है।
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हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखकों तथा आलोचकों ने भक्ति के सन्दर्भ में अनेक टिप्पणियाँ दी हैं। किसी ने इसे ईसाइयत की देन बताई है तो किसी ने इस्लाम की उपज। कोई इसे हिन्दू जाति की हताशा तथा निराशा से जोड़ता है तो अन्य कोई दक्षिण भारत की देन कहता है। इन सबसे हटकर भक्ति प्रवाह भारतीय आध्यात्मिक चेतना का नैसर्गिक विकास है। भक्ति काव्यधारा की मूल प्रकृति में कहीं भी पराजय की कुंठाग्रस्तता नहीं है और न ही उसमें कहीं कोई क्षेत्रवाद ही दिखाई पड़ता है। यह इन सबके ऊपर सामाजिक समानता, प्रेम, हृदय-से हृदय को जोड़कर मानव जाति को आत्यन्तिक मंगलवाद की व्यवस्था से समृद्ध करनेवाली कविता है। इस आलोचनात्मक कृति का मूल मन्तव्य भी इसी से जुड़ा है।</p>
<p>कबीर-सूर-तुलसी इन तीनों कवियों में वर्तमान भक्ति की केन्द्रीय चेतना को इंगित करते हुए उनके कृतित्व का एक बार पुनर्विश्लेषण किया गया है ताकि भक्ति की लोकानुभूति से इनकी कविता की आस्वादनभूमि का मर्म समझाया जा सके। ‘हरिस्मरण’ तथा ‘कलाविलास’ के प्रवाह-संगम पर रची गई भक्ति-कविता की अपूर्वता की विवेचना ही इस आलोच्य कृति का मन्तव्य है।
Book Details
-
ISBN9788180317248
-
Pages200
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: कृष्णमुरारि मिश्र हिन्दी आलोचना के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। उन्हें हिन्दी की आद्यबिम्बात्मक आलोचना के प्रर्वतन का श्रेय प्राप्त है। साहित्यिक रचनाओं की संरचनात्मक व्याख्या और वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन के लिए वे प्रख्यात हैं। ‘मुक्तिबोध : कविता का आद्यबिम्बत्व’ पुस्तक मुक्तिबोध की कविता की व्याख्या और मूल्यांकन के नए आयाम प्रदान करती है। पुस्तक में बहिस्साक्ष्य और अन्तःसाक्ष्य के आधार पर मुक्तिबोध का विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान से घनिष्ठ परिचय एवं उनके सृजन में विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान की धारणाओं के उपयोग को प्रमाणित किया गया है। नए कवियों में मुक्तिबोध ने ही युंगीय मनोविज्ञान के महत्त्व को सर्वप्रथम और सर्वाधिक अनुभव किया था। साथ ही फ्रायड के सिद्वान्त भी उनके काव्य में प्रगतिवादी विचारधारा के अनुरूप ढलकर प्रयुक्त हुए हैं। मुक्तिबोध की विश्व-दृष्टि प्रगतिवादी थी, उनका प्रगतिवाद विभिन्न दर्शनों और विज्ञानों से पोषित था। इस पुस्तक में मुक्तिबोध की कविता में अचेतन के आद्यबिम्बों और आत्मोपलब्धि प्रक्रिया के आद्यबिम्बों का अध्ययन किया गया है। इसके साथ ही ‘भाषा का आद्यबिम्बत्व’ शीर्षक निबन्ध में मुक्तिबोध के काव्य की भाषिक संरचना, ‘ब्रह्मराक्षस’ शीर्षक निबन्ध में कविता के ब्रह्मराक्षस की पहचान है। हिन्दी आलोचना के इतिहास में पहली बार लेखक ने पुष्ट प्रमाणों के आधार पर सिद्ध किया है कि ब्रह्मराक्षस जयशंकर प्रसाद को बिम्बित करता है। आशा है कि यह हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक साबित होगी।
Hindi Sahitya : Ek Saral Parichay
- Author Name:
Suraiyya Sheikh
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- Description: इतिहास ग्रन्थों के अतिरिक्त हिन्दी साहित्य के विभिन्न कालखंडों, काल-रूपों और धाराओं पर अनेक शोध-प्रबन्ध एवं समीक्षात्मक ग्रन्थ प्रकाश में आए हैं। इनमें साहित्य के अनेक अज्ञात तथ्यों और अनिर्णीत प्रश्नों को नवीन दृष्टिकोण से नवालोक में प्रस्तुत किया गया है, किन्तु हिन्दी अनुसन्धान-जगत के इन नवीन निष्कर्षों और परिणामों का अतीव सतर्कतापूर्वक समन्वय एवं समाहितीकरण इतिहास-लेखन की दिशा में अभी शेष है। अतः नवीन शोध-परिणामों और विकसित साहित्य-चेतना के आलोक में हिन्दी साहित्य के इतिहास का पुनर्गठन और लेखन आवश्यक है। निस्सन्देह आज हिन्दी साहित्य के इतिहास में सम्बन्धित शताब्दिक पुस्तकें उपलब्ध हैं, किन्तु अभी तक इस दिशा में उचित व सन्तोषजनक प्रगति नहीं हुई है। हमने उस अभाव को दृष्टि में रखकर इस ग्रन्थ का प्रणयन किया है।
Hindi Sahitya : Udbhav Aur Vikas
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
- Book Type:

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Description:
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने साहित्यिक इतिहास-लेखन को पहली बार ‘पूर्ववर्ती व्यक्तिवादी इतिहास-प्रणाली के स्थान पर सामाजिक अथवा जाती ऐतिहासिक प्रणाली’ का दृढ़ वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। उनका प्रस्तुत ग्रन्थ इसी दृष्टि से हिन्दी का अत्यधिक महत्त्वपूर्ण साहित्येतिहास है। यह कृति मूलतः विद्यार्थियों को दृष्टि में रखकर लिखी गई है। प्रयत्न किया गया है कि यथासम्भव सुबोध भाषा में साहित्य की विभिन्न प्रवृत्तियों और उसके महत्त्वपूर्ण बाह्य रूपों के मूल और वास्तविक स्वरूप का स्पष्ट परिचय दे दिया जाए। परन्तु पुस्तक के संक्षिप्त कलेवर के समय ध्यान रखा गया है कि मुख्य प्रवृत्तियों का विवेचन छूटने न पाए और विद्यार्थी अद्यावधिक शोध-कार्यों के परिणाम से अपरिचित न रह जाएँ। उन अनावश्यक अटकलबाजियों और अप्रासंगिक विवेचनाओं को समझाने का प्रयत्न तो किया गया है, पर बहुत अधिक नाम गिनाने की मनोवृत्ति से बचने का भी प्रयास है। इससे बहुत से लेखकों के नाम छूट गए हैं, पर साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ नहीं छूटी हैं।
साहित्य के विद्यार्थियों और जिज्ञासुओं के लिए एक अत्यन्त उपयोगी पुस्तक।
Antim Dashak Ki Hindi Kavita
- Author Name:
Ravindranath Mishra
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Description:
बीसवीं सदी का अन्तिम दशक कई तरह से सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों का साक्षी रहा। विश्व में समाजवाद के पतन के उपरान्त भारत में उदारीकरण के चलते कई नई चुनौतियाँ हमारी चेतना के समक्ष उपस्थित हुईं। बाज़ारवाद, मीडिया विस्फोट और सूचना तकनीकी के आगमन के कारण भाषिक-संवेदना के तार बिखरने लगे।
इन परिस्थितियों में हिन्दी कवि को इन चुनौतियों का सामना करते हुए वैकल्पिक और सम्पूर्ण भावबोध प्रस्तुत करना था। और, इस दशक की कविता ने यह किया भी। इस पुस्तक में इस दशक में सक्रिय महत्त्वपूर्ण कवियों पर अलग-अलग विचार करते हुए उस संक्रमण काल की कविताओं की मुख्य चिन्ताएँ और सरोकार रेखांकित किए गए हैं।
अरुण कमल, कुमार अम्बुज, अष्टभुजा शुक्ल, बोधिसत्व, एकान्त श्रीवास्तव, हरीशचन्द्र पांडे, स्वप्निल श्रीवास्तव निलय उपाध्याय, काव्यायनी, अनामिका, गगन गिल और नीलेश रघुवंशी के काव्य पर अलग-अलग अध्यायों में विस्तार से विचार करते हुए लेखक ने उस समय की सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि को भी समझने का प्रयास किया है।
कवियों के शिल्प और भाषा की संरचनात्मक विशेषताओं को रेखांकित करते हुए उन्होंने उनकी सीमाओं और सम्भावनाओं की तरफ़ भी संकेत किया है, और एक पूरे दशक की कविता के सम्पूर्ण को सरल रूप में प्रस्तुत किया है।
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