Thartharahat
(0)
₹
350
280 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
‘कविता वह समय है जिसे इतिहास देख भले ले पर दुहरा नहीं सकता’—</p> <p>ये कुछ शब्द नए कवि आस्तीक वाजपेयी की कविता के हैं जो तुमुल कोलाहल-कलह के बीच कवि की आवाज़ में बचे रह गए उस समय की याद दिलाते हैं जिसमें पुराण और पुरखों की स्मृति बसी हुई है। इस कविता को पढ़ते हुए उस अग्रज समय का अहसास होता है जो जल्दी नहीं बीतता, स्मृति बनकर साथ-साथ चलता है और थर-थर काँपते वर्तमान में उस कवि-धीरज की तरह स्थिर बना रहता है जिसके सहारे कवि आस्तीक अपने काव्यारम्भ की देहरी पर यह पहचान लेते हैं कि मैं उसी से बना हूँ जो ढह जाता है। आस्तीक की कविता हमें फिर याद दिला रही है कि—‘जीत नहीं हार बचा लेती है अस्तित्व के छोर पर’। यह प्रश्नाकुल कविता है जो हमसे फिर पूछ रही है कि—‘इस दुनिया के राज़ कौन जानता है और यह दुनिया है किसकी?’ यह कविता इस प्रश्न से फिर सामना कर रही है कि—‘हमें क्यों इच्छाएँ इतनी अधिक मिलीं और कौशल इतना कम।’</p> <p>इस नई कवि-व्यथा में डूबा साधते हुए संसार का सामना इस तरह होता है कि जैसे—बारिश के आँसू सूख चुके हैं, वे धरती को गीला नहीं करते। जैसे—गुस्सा, अहंकार और हठ ताल पर चन्द्रमा की प्रतिमा की तरह जगमगा रहे हैं। जैसे—यत्न, हिम्मत और सादगी की हवा आसमान में खो गई है—कवि आस्तीक अपनी कविता के समय के आईने में नए बाज़ार से घिरते जाते संसार का चेहरा दिखाते हुए हमसे कह रहे हैं कि जैसे—दूसरों की कल्पना के बाग़ीचे में उनकी इच्छाओं की दूब उखाड़कर अपनी इच्छाओं के पेड़ लगाए जा रहे हों। कवि आस्तीक दूसरों से कुछ कहना चाहते हैं पर इस समझ के साथ कि ये दूसरे कौन हैं। यह नया कवि हमें एक बार फिर सचेत कर रहा है कि ख़ुद की पैरवी करते हुए हम थक गए हैं और सब अकेले घूम रहे हैं भाषा की भीड़ में, अर्थ भाग गए हैं, शब्द ही हैं जो नए बन सकते हैं।</p> <p>आस्तीक की कविता में बिना पाए खोने का दु:ख बार-बार करवट लेता है। इन कविताओं को पढ़ते हुए यह अनुभव होता है कि यह नया कवि दु:ख के भार से शब्दों पर पड़ गई सलवटों को अपनी अनुभूतियों के ताप से इस तरह सँवार लेता है कि शब्द नए लगने लगते हैं। आस्तीक अपनी एक कविता में कहते हैं कि मृत्यु ही पिछली शताब्दी की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि है। ये कविताएँ पढ़ते हुए पाठकगण अनुभव करेंगे कि शब्दों को नया करके ही मृत्यु को टाला जा सकता है।</p> <p>—ध्रुव शुक्ल
Read moreAbout the Book
‘कविता वह समय है जिसे इतिहास देख भले ले पर दुहरा नहीं सकता’—</p>
<p>ये कुछ शब्द नए कवि आस्तीक वाजपेयी की कविता के हैं जो तुमुल कोलाहल-कलह के बीच कवि की आवाज़ में बचे रह गए उस समय की याद दिलाते हैं जिसमें पुराण और पुरखों की स्मृति बसी हुई है। इस कविता को पढ़ते हुए उस अग्रज समय का अहसास होता है जो जल्दी नहीं बीतता, स्मृति बनकर साथ-साथ चलता है और थर-थर काँपते वर्तमान में उस कवि-धीरज की तरह स्थिर बना रहता है जिसके सहारे कवि आस्तीक अपने काव्यारम्भ की देहरी पर यह पहचान लेते हैं कि मैं उसी से बना हूँ जो ढह जाता है। आस्तीक की कविता हमें फिर याद दिला रही है कि—‘जीत नहीं हार बचा लेती है अस्तित्व के छोर पर’। यह प्रश्नाकुल कविता है जो हमसे फिर पूछ रही है कि—‘इस दुनिया के राज़ कौन जानता है और यह दुनिया है किसकी?’ यह कविता इस प्रश्न से फिर सामना कर रही है कि—‘हमें क्यों इच्छाएँ इतनी अधिक मिलीं और कौशल इतना कम।’</p>
<p>इस नई कवि-व्यथा में डूबा साधते हुए संसार का सामना इस तरह होता है कि जैसे—बारिश के आँसू सूख चुके हैं, वे धरती को गीला नहीं करते। जैसे—गुस्सा, अहंकार और हठ ताल पर चन्द्रमा की प्रतिमा की तरह जगमगा रहे हैं। जैसे—यत्न, हिम्मत और सादगी की हवा आसमान में खो गई है—कवि आस्तीक अपनी कविता के समय के आईने में नए बाज़ार से घिरते जाते संसार का चेहरा दिखाते हुए हमसे कह रहे हैं कि जैसे—दूसरों की कल्पना के बाग़ीचे में उनकी इच्छाओं की दूब उखाड़कर अपनी इच्छाओं के पेड़ लगाए जा रहे हों। कवि आस्तीक दूसरों से कुछ कहना चाहते हैं पर इस समझ के साथ कि ये दूसरे कौन हैं। यह नया कवि हमें एक बार फिर सचेत कर रहा है कि ख़ुद की पैरवी करते हुए हम थक गए हैं और सब अकेले घूम रहे हैं भाषा की भीड़ में, अर्थ भाग गए हैं, शब्द ही हैं जो नए बन सकते हैं।</p>
<p>आस्तीक की कविता में बिना पाए खोने का दु:ख बार-बार करवट लेता है। इन कविताओं को पढ़ते हुए यह अनुभव होता है कि यह नया कवि दु:ख के भार से शब्दों पर पड़ गई सलवटों को अपनी अनुभूतियों के ताप से इस तरह सँवार लेता है कि शब्द नए लगने लगते हैं। आस्तीक अपनी एक कविता में कहते हैं कि मृत्यु ही पिछली शताब्दी की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि है। ये कविताएँ पढ़ते हुए पाठकगण अनुभव करेंगे कि शब्दों को नया करके ही मृत्यु को टाला जा सकता है।</p>
<p>—ध्रुव शुक्ल
Book Details
-
ISBN9788126730162
-
Pages148
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Main Samay Hoon
- Author Name:
Pawan Jain
- Book Type:

-
Description:
कुछ लोग कविता को एक ऐसा साज बनाना चाहते हैं जिसकी मधुर आवाज़ से थके-हारे इनसानों को नींद आ सके। लेकिन, पवन जैन उनमें से हैं जो कविता को ऐसा हथियार बनाना चाहते हैं जिसे लेकर समाज के शोषण और दुनिया के अँधियारे से युद्ध किया जा सके। पवन जैन की कविताएँ एक जागते हुए कवि की रचनाएँ हैं जो अपने चारों ओर पल-पल बदलती और बिगड़ती दुनिया को देख रहा है और हमें दिखाना चाहता है और साथ ही बिन पूछे हमसे पूछना चाहता है कि करना क्या है?
—जावेद अख्तर
कविता किसे कहते हैं? वह शब्द है या शब्दार्थ? भाव है या भाव का भाषिक विस्फोट या फिर अति संवेदनशील लोक-मानस की असाधारण भाव प्रतिक्रिया—इस सब पर बरसों से विचार होता चला आ रहा है और समाज और कला-संस्कृति की परम्परा में इस सबको अलग-अलग समयों में स्वीकार-प्रतिस्वीकार किया जाता है।
यह भी कि कविता को कोई एक सुनिश्चित आकार-प्रकार, सुनिर्धारित ढाँचा या फिर अभिव्यंजना पद्धति आज तक अपनी सीमा रेखा में नहीं बाँध सकी। करोड़ों-करोड़ जाने-माने चेहरों की अपूर्वता और मौलिकता की तरह कविता भी हमेशा अपूर्व और मौलिक को अपनी आधारभूत पहचान मानती आई है—ठीक निसर्ग-सृजन की तरह। तथापि वह एक अभिव्यंजना-कला भी है। कवि द्वारा प्रयुक्त जाने-पहचाने से शब्द जब सर्वथा एक नई मुद्रा में आकर हमसे रोचक या उत्तेजक संवाद करने लगते हैं, हम मान लिया करते हैं, यह तो कविता है। तब भाषा के इस प्रकार की बनावटों को कविता कहना कोई अनहोना कथन कैसे कहा जाए?
पवन जैन की इन कविताओं का अन्तरंग गहरा राजनीतिक है। रचनात्मक तौर पर राजनीतिक किन्तु भारी सामूहिक व्यथा और क्षोभ से उपजा हुआ है। आदर्श नहीं बचे, मूल्य अवमूल्यों के द्वारा खदेड़ दिए गए, विचार की जगह कुविचार और घर को नष्ट-भ्रष्ट कर बाज़ार हमारे बीच किसी महानायक का प्रेत बन आ खड़ा है। ऐतिहासिक और क्रूर यथार्थ से ये कविताएँ हमारा साबक़ा करवाती हैं।
इन कविताओं में भाषा एक चीख़ बनकर फूटी है। इससे हम कविता की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारियों और भाषा के आवेग-विह्वल विचलनों का अनुमान लगा पाएँगे और यह भी कि समय की बहुरूपी जटिलता और मानव-संवेदना की छटपटाहटों के बीच छिड़ा संग्राम किस तरह कविता का चेहरा-मोहरा बदल दिया करता है।
—डॉ. विजयबहादुर सिंह
Hansti Hui Laraki
- Author Name:
Nirmala Thakur
- Book Type:

-
Description:
निर्मला ठाकुर की कविताएँ यह कहना चाहती हैं कि अनुभव रचना का एक ज़रूरी तत्त्व है। जीवनानुभव की रोशनी में बाहरी दुनिया को देखते हुए उन्होंने कविताओं को आकार दिया है। 'हँसती हुई लड़की' का केन्द्रीय सरोकार स्त्री है। स्त्री की बहुतेरी छवियाँ हैं। यहाँ जीवन का मार्मिक विस्तार है। ‘रूप—कई रूप’ कविता में ’नन्ही/मुन्नी दँतुली में हँसी—दूध की' से लेकर सन्ध्या की देहरी तक आ पहुँची स्त्री-जिजीविषा का वर्णन है। निर्मला ठाकुर ने बहुत संजीदगी के साथ आधी आबादी के संघर्षों व स्वप्नों को चित्रित किया है। ‘औरत की दुनिया’ इस सन्दर्भ में ख़ासतौर पर पढ़ी जानी चाहिए।
इन कविताओं का सशक्त पक्ष है ‘अबूझ की समझ’। यही कारण है कि इनमें सुसंवेद्य पारदर्शिता है। ‘बर्तन माँजती हुई स्त्री की फलश्रुति है—इधर देखो/मुखातिब हो ज़रा हमसे/मुख पर कौन सी छाया घनेरी/लिए बैठी हो/उठो न/चेहरा इधर कर/ऊपर उठाओ/समय का दर्पण तुम्हारे सामने है।’ कवयित्री ने स्त्री-जीवन के कोलाहल और अकेलेपन की शिनाख़्त की है।
रिश्ते, प्रकृति, रूपबोध व जनजीवन आदि कविताओं में शामिल हैं। 'स्वर्ग सुख' कविता पढ़कर निराला की वह ‘तोड़ती पत्थर’ याद आ सकती है। ‘जो करना’ आत्मकथात्मक है और बेहद मार्मिक।
भाषा-शिल्प की सहजता में विन्यस्त ये कविताएँ एक संवेदनशील मन का आईना हैं।
Andhere Se Bahar Nikalate Huye
- Author Name:
Amar Kushwaha
- Book Type:

- Description: ‘अँधेरे से बाहर निकलते हुए’ अमर कुशवाहा की बहुत सहज और सीधी लेकिन अर्थवान कविताओं का पहला संग्रह है। अपनी जमीन, अपनी जिन्दगी, अपने संघर्षों की कथा कहती ये कविताएँ मानवीय संवेदनाओं को एक नई दृष्टि देती हैं, साथ ही कविता के माध्यम से समाज को एक नए रूप में संस्कारित करने का प्रयास भी करती हैं। समाज की यांत्रिकता, बाजारूपन एवं व्यक्ति के संवेदनहीन होते जाने की समस्या को उकेरती ये कविताएँ विकासशील भारत के एकपक्षीय विकास को रेखांकित करते हुए जीवन से साहित्य एवं संस्कृति के लुप्त हो जाने पर चिन्ता भी प्रकट करती हैं। समकालीन जीवन को अपनी कविता का विषय बनाता कवि इन कविताओं में समय के दर्द को भी चित्रित करता है और आधुनिक जीवन की आकुलताओं-व्याकुलताओं को एक नया स्वर देता है। ये स्वर यथार्थ की तह तक जाने के स्वर हैं, जीवन के खट्टे-मीठे स्वाद के स्वर हैं, दैनिक जीवन के गणित के स्वर हैं, व्यवस्था के स्वर हैं और समाज के मार्मिक प्रसंगों के स्वर हैं। इन कविताओं का खासतौर पर देखने लायक पक्ष ये है कि आधुनिक जीवन-शैली के अनुसार कवि की कविताओं के छंद भी आधुनिक हैं। छंदों में उतार है, चढ़ाव है, लहर है, प्रवाह है, किन्तु इस सबके बावजूद कविताएँ बारम्बार गाँव के सुख-दुःख की ओर लौट आती हैं। गाँव के नदी-नालों, खेत-खलिहानों की ओर लौट आती हैं। समाज और राजनीति में व्याप्त झूठ-फरेब, लूट-खसोट, अत्याचार-अनाचार से क्षुब्ध कवि अपनी स्पष्ट एवं बेबाक पंक्तियों से राजनेताओं को आगाह करते हुए किसी भी समाज की मुक्तिकामी चेतना को ऊर्जस्वित करने का प्रयास भी करता है.
Avalamban
- Author Name:
Manish Shrivastav
- Book Type:

-
Description:
किसी नए कवि की रचना से गुज़रते हुए अक्सर उम्मीद की जाती है कि उसमें कुछ नया होगा लेकिन मनीष श्रीवास्तव की कविताओं के साथ केवल नए होने का भाव नहीं है, यहाँ विविधता है। अपने होने में पूरी विनम्रता के साथ लेकिन रचनात्मक रूप से लगभग अतार्किक। ये कविताएँ कोई नई ज़मीन तोड़ने का दावा नहीं करतीं, कोई नारेबाज़ी नहीं करतीं, चौंकाती भी नहीं—बस, अपने कविता होने को आश्वस्त करती हैं और यह भी कि इन रचनाओं में पुरखे शामिल हैं।
सांस्कृतिक तत्सम शब्दावली और मीर, ग़ालिब, पंत की भाषा परम्परा के रास्ते से ये रचनाएँ ग्लोबल कविता की अवधारणा में प्रवेश पाती हैं। यहाँ हर रचना के साथ कोई एक छाया चलती है—भाषा, काल और कहन के एक ऐसे पृष्ठ-तनाव को फिर-फिर उजागर करती हुई, अपने पूरे संस्कार और संवेदना के साथ, जो किसी एक रचनाकार के लिए इन दिनों असम्भव है।
मनीष पूरे विस्तार के साथ शब्दों को बरतते हैं, एक चौकन्नेपन के साथ, कहीं-कहीं अतिरिक्त सावधानी के साथ भी, लेकिन बाज़ार की माँग के अनुसार तो कुछ भी नहीं। रचना का होना बचा रहे, इसका निर्वाह तो हरेक रचनाकार स्वाभाविक रूप से करता है, लेकिन यह
होना यहाँ किसी अनुशासन की तरह नहीं है।
इन रचनाओं में शब्दों का पड़ोस है जीवन और अन्ततः प्रेम जहाँ ये कविताएँ सहज रूप से खुलती चली जाती हैं।
Siyasat Bhi Allahabad Mein Sangam Nahati Hai
- Author Name:
Jaikrishna Rai 'Tushar'
- Book Type:

- Description: हिन्दी ग़ज़ल में कहन की, कंटेंट की विविधता की आज़ादी है यद्यपि अब उर्दू शायरी भी सिर्फ़ इश्क़ मोहब्बत नहीं रही। यह बदलाव ही साहित्य को समाज से जोड़ता है। एक अच्छा शेर हमेशा याद रहता है- शोख इठलाती हुई परियों का है ख़्वाब ग़जल झील के पानी में उतरे तो है महताब गज़ल उसकी आँखों का नशा, जुल्फ़ की खुशबू, टीका रंग और मेंहदी रचे हाथों का आदाब ग़ज़ल मैंने ग़ज़ल को परिभाषित करने की कोशिश की है। आज ग़ज़ल की लोकप्रियता का ये आलम है कि हिन्दी के साथ अन्य भारतीय भाषाओं यहाँ तक कि बोलियों में भी लिखी और कही जा रही है। मैंने भी विविध विषयों पर ग़ज़ल कही है। कभी मीराँ, कभी तुलसी, कभी रसखान लिखता हूँ ग़ज़ल में गीत में पुरखों का हिन्दुस्तान लिखता हूँ ग़ज़ल ऐसी हो जिसको खेत का मज़दूर भी समझे दिलों की बात जब हो और भी आसान लिखता हूँ स्त्री सौन्दर्य का उपमान आज बदल गया है, स्त्री आज जमीन से अन्तरिक्ष तक अपने पराक्रम को दिखा रही है। अब वह घरों के दालान और आँगन की शोभा नहीं है न चूड़ी है, न बिन्दी है, न काजल, माँग टीका है ये औरत कामकाजी है ये चेहरा इस सदी का है आशा है यह संकलन आप सभी को पसन्द आएगा। जयकृष्ण राय 'तुषार'
Momin
- Author Name:
Momin
- Book Type:

- Description: तुम मिरे पास होते हो गोया जब कोई दूसरा नहीं होता थी वस्ल में भी फ़िक्र-ए-जुदाई तमाम शब वो आए तो भी नींद न आई तमाम शब रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह अटका कहीं जो आप का दिल भी मिरी तरह शब जो मस्जिद में जा फँसे 'मोमिन' रात काटी ख़ुदा ख़ुदा कर के किस पे मरते हो आप पूछते हैं मुझ को फ़िक्र-ए-जवाब ने मारा
Chaurahe Par Khade Ham
- Author Name:
Milan Sinha
- Book Type:

- Description: poetry
Gujrat Ke Baad
- Author Name:
Jagannath Prasad Das
- Book Type:

-
Description:
कविता संवेदना और विचार के सहमेल से यथार्थ को उसकी समग्र सम्भावना के साथ व्यक्त करती है। जगन्नाथ प्रसाद दास की कविताओं को पढ़ते हुए निरन्तर अनुभव होता है कि कविता समकालीन यथार्थ के साथ परम्परा के संघर्ष को भी प्रकट करती है। ‘गुजरात के बाद’ की कविताएँ गहन आत्मानुभूति से उपजी हैं। परिवेश का प्रभाव तो है ही, कवि ने स्मृतियों को टटोलते हुए अर्थ की पूँजी सहेजी है।
इन कविताओं में उम्मीद का उजाला है। यह उजाला विषाद के क्षणों में भरोसा दिलाता है। कवि ने हमारे समय के संकटों को कई जगह संकेतित किया है। ‘अरण्य’ की पंक्तियाँ हैं : “वनस्पति की सघनता को भेदकर/लकड़हारे की पदचाप सुनाई पड़ती है/सहज कलरव का अविरल छन्द/हठात् थम जाता है/इतिहास की अन्तिम कथा-सा।”
जगन्नाथ प्रसाद दास की इन मूलत: ओड़िया कविताओं का अनुवाद करते समय राजेन्द्र प्रसाद मिश्र ने कविता की बहुअर्थी प्रकृति का ध्यान रखा है।
Pratinidhi kavitayein : Badri Narayan
- Author Name:
Badri Narayan
- Book Type:

-
Description:
छोटे शहरों के रचनाकारों के बड़े केन्द्रों में उत्प्रवास और उनके मनोजगत में केन्द्र के सर्वग्रासी प्रसार और आधिपत्य के इस भयावह दौर में बद्री नारायण की कविता गुलाब के बरक्स कुकुरमुत्ते के बिम्ब को रचने वाली काव्य-परम्परा का विस्तार है। यह एक ऐसा समय है जब केन्द्र अपने अभिमत का उत्पादन ही नहीं कर रहा है, उसका प्रसार भी कर रहा है। वह कुछ हद तक अपनी मान्यताओं से अलग दिखती धारणाओं और काव्य-भंगिमाओं को भी लील जाने को आतुर है। इसलिए कोई भी अन्य काव्य-भंगिमा उसके लिए असहनीय हो गई है। वह तर्क से या कुतर्क से उसे ख़ारिज कर देने पर आमादा है। यह समय कविता-परिदृश्य के आन्तरिक जनतंत्र को बचाने के कठिन संघर्ष का समय है। बद्री की कविता वस्तुतः जनतांत्रिक समय में एक संवादी नागरिक होने की इच्छा की कविता है।
उनकी कविता भारतीय समाज के निम्नवर्ग के ऐसे मिथकों, आख्यानों और इतिहास के अलक्षित सन्दर्भों के पास जाती है जिनमें उनकी पीड़ाएँ, अवसाद और संघर्ष की अदीठ रह गई गाथाएँ छिपी हैं। बद्री की कविता में वर्चस्वशाली शक्तियों द्वारा स्वीकृति प्राप्त कर चुके प्रचलित मिथक लगभग नहीं हैं। अप्रचलित मिथकीय आख्यानों का पुनर्पाठ करने की कोशिश भी यहाँ नहीं है। इन कविताओं में तो ऐसी जातियों और मानव समूहों के अपने आख्यानों और जन-इतिहासों के चरित्र और गाथाएँ हैं जो उत्पादन की गतिविधियों से जुड़े होने के बावजूद समाज की परिधि पर नारकीय जीवन जीने को अभिशप्त हैं। बद्री की कविता उन बहुसंख्य मानव समूहों के सपनों, आकांक्षाओं, उनकी कमज़ोरियों और उनकी शक्ति का भाष्य तैयार करती है। वस्तुतः कवि का काव्य-व्यवहार ही इस कविता की राजनीति का साक्ष्य है ।
—राजेश जोशी
Neeli Bayaaz
- Author Name:
Adnan Kafeel 'Darwesh'
- Book Type:

-
Description:
अदनान कफ़ील दरवेश ऐसे कवि हैं जो नए हिन्दुस्तान में जन्मे और पले-बढ़े, जिन्होंने ख़ुद को मक् तब के बजाय लड़ाई के मैदान में खड़ा पाया। अपने इर्द-गिर्द उत्तरोत्तर विषाक्त होते जाते राजनीतिक और सांस्कृतिक माहौल में कविता ही उनका शस्त्र और कवच है। वह हिन्दी में अपने समय के एक साहसी, उदास और स्वप्नशील कवि हैं।
जैसे-जैसे इस नए हिन्दुस्तान की मुहब्बतें और नफ़रतें, विषमताएँ और बेचैनियाँ अपना अतिक्रमण बढ़ाती जाती हैं—जिनको संज्ञान में लेना हर सच्चे रचनाकार की नियति है—वैसे-वैसे उनकी आवाज़ में पुराने हिन्दुस्तान की गूँज भी तेज़तर होती जाती है। यह नई सांस्कृतिक बर्बरता, नैतिक ख़ालीपन और साम्प्रदायिक फ़ाशीवाद के बरक्स हमारे उपमहाद्वीप के ऐतिहासिक सेकुलर-मानववादी ज़मीर की आवाज़ है।
बारी-बारी से उनकी आवाज़ में एक देशज-स्थानीय आवाज़ आती है तो एक शरणार्थी आवाज़ भी। वह अपने वतन में भी हैं और निर्वासन में भी, जो कि हर अच्छे कवि की पहचान है।
अदनान अपनी काव्यभाषा में आज़ादी और ख़ुदमुख़्तारी पर बज़िद हैं। ज़बान और लहजे के ऐतबार से वह हिन्दीवादी भाषिक और सांस्कृतिक वर्जनाओं और लिखित-अलिखित संहिताओं का उल्लंघन करते हैं। उनकी रचनाशीलता के मूल स्रोत आधुनिक हिन्दी की अलगाववादी और मनमाने ढंग से परिभाषित काव्यधारा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उत्तर भारत की इलाक़ाई परम्परा और सैकड़ों सालों से चली आ रही समृद्ध और परिपक्व हिन्द-फ़ारसी परम्परा की अन्तर्क्रिया में हैं।
उनकी कविता में एक ख़ास तरह का हमदर्दाना लहजा, लयकारी, संगीतमयता और चुनौती भरा स्वर है। एक ख़ानाबदोश गायक की तरह वह अपना संगीत अपने साथ लेकर चलते हैं।
—असद ज़ैदी
Qafas
- Author Name:
Brahmdeep Alune
- Book Type:

- Description: Book
Ek Cheez Kam
- Author Name:
Neelesh Raghuwanshi
- Book Type:

-
Description:
‘कहना है मुझे उस तरह/जिस तरह कहा नहीं गया अब तक’ इस साधारण से वाक्य से नहीं लगता था कि कविता का हिस्सा बनकर यह कथन बहुआयामी हो जाएगा। नीलेश की कविताओं में साधारण को असाधारण में ढालने की क्षमता है। क्या कभी सोचा जा सकता है कि समाज में बूढ़े हो चुके पिता परिवार से इस तरह अलग-थलग होते जाते हैं, जैसे अंगुली से नाखून अलग किए जाते हैं—‘नाखून की तरह/पिता भी तो झर रहे हैं/अब जीवन से’, इस वाक्योक्ति में पैवस्त यातना दहला देने वाली है।
नीलेश के यहाँ वाक्यांश मुहावरों में ढलते नज़र आते हैं। ‘जिन आँखों में काजल लगाया मैंने (कैसे) देख सकूँ उसमें दुख को’ कहते हुए कवि को लगता है—‘चट्टानों के बीच से/कोंपल की तरह फूटता है/दुख’। यहाँ मुहावरा उलट गया है। चट्टानों में कोंपल का फूटना अदम्य जिजीविषा का द्योतक है पर यहाँ हमारे सामाजिक यथार्थ की क्रूर चट्टानों से तो केवल दुख ही उपजता है। बदलते वक्त के साथ सामाजिक यथार्थ कितना उलट गया है, कवि इस स्थिति को ‘नागरिकता की मृत्यु’ की तरह देखने को विवश है।
ट्रैफिक के लिए सड़क किनारे के बोर्ड की चेतावनी को इस तरह पढ़ा जाना कि ‘सावधान! आगे अंधा मोड़ है/कहती हैं सड़कें/हमारे जीवन की कहानी’। सिर्फ कविता में ही सम्भव हो सकता है जीवन के इस कटु यथार्थ को एक साधारण-सी बात में इस तरह गुम्फित करना और नीलेश इसे बहुत सलीके से करती हैं। इसमें राजनीतिक हालात का दर्शन भी किया जा सकता है। ‘भला मानुष’ पद कभी निष्कपट, सच्चे और किसी कदर भोले-भाले व्यक्ति के लिए प्रयोग में आने लगा था लेकिन नीलेश उसी के अभिधार्थ में कहती हैं—‘जब मानुष भला मानुष हो जाएगा/तो बन्दर भी भले बन्दर हो जाएँगे’। पाठक के लिए यहाँ भी राजनीतिक अर्थ खोजने की गुंजाइश बनती है।
अपने आसपास उपस्थित परिवेश के आमफहम बिम्बों में जीवन के शाश्वत प्रश्नों की तरफ संकेत करना नीलेश की कविता की भी विशेषता रही है और गद्य की भी। उनका यह नया कविता-संग्रह निश्चय ही उनके कवि-मानस के अन्य विस्तारों से हमारा परिचय कराएगा।
Kavita Ka Shuklapaksh
- Author Name:
Bachchan Singh
- Book Type:

-
Description:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ सिर्फ़ इसलिए हिन्दी का एक गौरव ग्रन्थ नहीं है कि उसने पहली बार साहित्य की समग्र परम्परा का एक वयस्क और उत्तरदायी परिप्रेक्ष्य से निदर्शन कराया, बल्कि इसलिए भी कि उसमें शुक्ल जी की गहरी रसिकता, सावधान और सटीक पहचान और सजग सुरुचि से चुनी हुई कविताओं या कवितांशों का एक विलक्षण संकलन भी है।
इस संकलन से शुक्ल जी का निजी रागबोध और काव्य-दृष्टि प्रगट होती है, साथ ही हिन्दी कविता-संसार की जटिल लम्बी परिवर्तन-कथा भी शुक्ल जी के विश्लेषण और चयन से विन्यस्त होती है। महत्त्वपूर्ण आलोचक डॉ. बच्चन सिंह ने अपने सहकर्मी डॉ. अवधेश प्रधान के साथ शुक्ल जी के चयन के आधार पर हिन्दी की एक ‘गोल्डन ट्रेजरी’ एकत्र की है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि यह हिन्दी काव्य की, छायावाद-पूर्व की सम्पदा से आकलित, एक रत्न-मंजूषा है। इस संकलन की एक और विशेषता की ओर भी ध्यान देना चाहिए—कविताओं में रूप का नैरन्तर्य और परिवर्तन। कुछ लोगों का विचार है कि साहित्य का इतिहास रूपों और उनके परिवर्तन का इतिहास होता है। शुक्ल जी को यह एकांगिता स्वीकार्य नहीं है। शुरू से ही रूपों के नैरन्तर्य, परिष्कार और परिवर्तन के प्रति वे सतर्क हैं। इन परिवर्तनों को वे कभी शब्द-शक्तियों के आधार पर, कभी क्रियारूपों और लय के आधार पर पहचानते हैं। इसमें केवल ‘श्रेष्ठ’ और ‘प्रिय’ का मनचाहा संकलन नहीं है, बल्कि ‘विविध’ और ‘प्रतिनिधि’ का सावधान चयन है जिसमें उत्कृष्ट काव्य-खंडों के साथ कुछ कमज़ोर काव्य-प्रयोग भी है जिनका ऐतिहासिक मूल्य है—काव्य-वस्तु और काव्य-भाषा के विकास की दृष्टि से। इसमें सफल काव्य-सृष्टि की ‘सिद्धावस्था’ के साथ असफल काव्य-प्रयत्नों की ‘साधनावस्था’ भी मौजूद है।
इस इतिहास-यात्रा में जगमगाते शिखरों के साथ कुछ गुमनाम घाटियाँ भी शामिल हैं। आप केवल ‘इतिहास’ में उद्धृत काव्य-रचनाओं को एक क्रम में देख जाएँ तो हिन्दी काव्यधारा का एक व्यापक और प्रतिनिधिमूलक गतिशील प्रवाह-चित्र सामने आ जाता है। यह संचयन ऐसी ही विविधवर्णी चित्रमाला है।
Karze Tahjeeb Ek Duniya Hai
- Author Name:
Vinay Kumar
- Book Type:

-
Description:
हमारे बीच इधर जिन कवियों के रचना-कर्म को गहरी उत्सुकता और उम्मीद के साथ देखा गया है, उनमें डॉ. विनय कुमार भी हैं। उन्होंने बाक़ी सबसे भिन्न रास्ता चुना है। हिन्दी-उर्दू के दोआब को अपनी भूमि मानकर उन्होंने कुछ अनूठी कविताएँ रची हैं। इनमें उनका अपना अनुभव सार रूप में प्रगट होता है। दिल्ली के अनुभव से लेकर गाँव-जवार और देश-दुनिया के प्रसंग यहाँ समाहित हैं। साथ-साथ समसामयिक विषयों एवं जीवन-तथ्यों, राजनीतिक-सामाजिक सन्दर्भों पर उनकी बेलाग, तिलमिला देनेवाली टिप्पणियाँ भी दर्ज होती चलती हैं। विवरणों-ब्योरों का ढेर लगाने के बजाय डॉ. विनय कुछ चुनिन्दा बिम्ब निर्मित करने की कोशिश करते हैं जो वास्तव में अनुभवों का सारांश होते हैं। डॉ. विनय भाषा को अपने ढंग से बरतते हैं—उर्दू-बहुल शब्दों-मुहावरों से जड़ी उनकी भाषा एक ही साथ अनलंकृत, सादी भी है और मीनाकारी से जगमग भी।
कवि विनय कुमार पेशे से मनोरोग-चिकित्सक हैं। हमारी भाषा में ऐसे कवि विरल हैं जो मनोरोग-चिकित्सा में भी यशस्वी हों। इस क्षेत्र में उनके अनुभव अभी कविता में विस्तार से आने को शेष हैं, लेकिन जहाँ-तहाँ उन अनुभवों की पदचाप, उनकी नेपथ्य-झंकार अवश्य सुनी जा सकती है। जटिल मनोगुत्थियों से उलझनेवाले डॉ. विनय कुमार का मुख्य ध्येय इन कविताओं में अपनी बात का सम्प्रेषण है जिसमें वह हमेशा ही अप्रत्याशित रूप से सफल होते हैं। उनकी कविता अपना सम्पूर्ण अर्थ-कोष एक ही पाठ में खोल देती है। ऐसी सम्प्रेषणीयता कविता को साधारण पाठकों के लिए सुगम तो बनाती ही है, साथ ही कविता को वैचारिक हथियार की क्षमता भी प्रदान करती है। डॉ. विनय कुमार की कविता की गुफ़्तगू अवाम से है।
—अरुण कमल
Sandhyageet
- Author Name:
Mahadevi Verma
- Book Type:

-
Description:
‘सांध्यगीत’ में कुछ स्फुट गीत संगृहीत हैं। ‘सांध्यगीत’ मेरी उस मानसिक स्थिति को व्यक्त कर सकेगा जिसमें अनायास ही मेरा हृदय सुख-दु:ख में सामंजस्य का अनुभव करने लगा। मेरे गीत मेरा आत्म-निवेदन मात्र है—इनके विषय में कुछ कह सकना मेरे लिए सम्भव नहीं है! इन्हें मैं अपने उपहार के योग्य अकिंचन भेंट के अतिरिक्त और कुछ नहीं मानती।
—महादेवी वर्मा
Taaron Kee Dhool
- Author Name:
Krishna Mohan Jha
- Book Type:

- Description: तारों की धूल कृष्णमोहन झा का नया कविता-संग्रह है जो उनके पहले संग्रह के लगभग दो दशकों के बाद पाठकों के सामने आ रहा है। उनकी कविता इस दुनिया को स्मृति की दृष्टि से देखती है। इस तथ्य को, कि स्मृति एक भरा-पूरा संसार है, वह इतने गाढ़े रंगों में अंकित करती है कि उसे छुआ जा सके, उसमें रहा जा सके जैसे हम प्रकृति के साथ, उसके बीच उसके तमाम सजीव स्पर्शों के साथ रहते आए हैं। प्रकृति और मनुष्य का यह साहचर्य उत्तरोत्तर क्षीण हुआ है, यह वह दुख है जो उनकी कविताओं में सतत मौजूद रहता है। उनकी कविता हमें बीते हुए को अपने भीतर सँजोए हुए इस पृथ्वी पर रहना सिखाती है, यह पृथ्वी जहाँ पानी है, हवा है, वनस्पति है, चिड़ियाँ हैं, जुगनू हैं, आकाश और उसमें गुच्छों-के-गुच्छे लटकते तारे हैं, और कविताएँ हैं। उनकी कविता हमें महसूस कराती है कि इन सबके साथ, उनकी सजीवता को स्वीकार करते हुए मनुष्य ने कैसे रहना शुरू किया होगा, और कैसे हम रह सकते हैं ताकि आगे भी रह सकें। वे एक आठवें दिन की कल्पना करते हैं, एक ऐसा दिन जिस पर न ख़ून का एक छींटा हो, न आँसू का कोई निशान। जिस चीज़ को ये कविताएँ क़तई महिमामंडित नहीं करतीं, वह है आगे-ही-आगे चलते चले जाना, और वह भी उसी महापथ से जहाँ विस्मरण हमारी तमाम अकृतज्ञताओं और अमनुष्यताओं को कवच की तरह ढके रहता है। ये हमें याद दिलाती हैं, और आज के समय में यह एक बड़ा कार्यभार है, जिसे ये कविताएँ अपनी आन्तरिक ज़िद और बाह्य शिल्प, दोनों से जैसे शपथपूर्वक करती हैं।
Is Shahar Mein Tumhen Yaad Kar
- Author Name:
Virbhadra Karkidholi
- Book Type:

-
Description:
'इस शहर में तुम्हें याद कर' संग्रह की कविताएँ इसी दुनिया में एक ऐसी धरती की कविताएँ हैं, जहाँ आसमान में जब काले बादल मँडराते हैं, धरती बिवाइयों की तरह फटती है और अपनी पीड़ा किसी से नहीं कह पाती; जहाँ कुछ लोग बाज और चील की तरह अपनी उड़ान में शामिल हैं और कुछ उन तोते-मैना की तरह हैं जिनके पंख काट दिए गए हैं; जहाँ दया और प्रेम की हत्याएँ होती हैं तो अपराधियों के अपराध की सज़ा एक निरपराध को भुगतना पड़ता है; जहाँ एक भागा हुआ आदमी भागकर भी कहीं नहीं भाग पाता, वापस वहीं आ जाता है अपनी ग़लती पुन: दुहराने; जहाँ बूट रौंदते हैं सड़कों को तो आह में बस पिघलने को अभिशप्त पर्वत देखते रह जाते हैं कि रात में श्रमिकों की ख़ुशियों को जलानेवाले ही दिन में संरक्षक हैं...। ऐस में कवि की यह अदम्य जिजीविषा ही है कि वह अपनी आग से सृजन की ही कामना करता है और कहता है—'...तुम्हारे कारावास से परे/जो जीवन है/नितान्त नवीन जीवन/वहीं से गुज़रने दो/कि मैं तुम्हारी ईश्वरीय दुनिया में/पुन: एक युग ईश्वरहीन होकर जी सकूँ!
इस संग्रह की कविताएँ अपनी पीठ पर अपना बोझ लेकर अपने पैरों से यात्रा करनेवाले कवि की कविताएँ हैं, जो अपने वितान-उद्देश्य में जितनी मनुष्यों की उतनी ही प्रकृति की हैं—सुख, दु:ख, संघर्ष और सौन्दर्य के साथ; अपनी बोली-बानी, संस्कृति और सभ्यता के साथ; बदलते समय में सत्ता और समाज के बीच निरन्तर प्रदूषित होते कारकों के साथ—इसीलिए ये कविताएँ अपने पाठक से मुखर होकर संवाद भी करती हैं।
प्रेम है, बिछुड़न है और उसकी यादें भी हैं जो कवि की अपनी ज़मीन की ऋतुओं और पर्वतों की तरह जीने की कला में शामिल हैं, और इस तरह जैसे थाह के आगे अथाह की अभिव्यक्ति हों; वह कैनवस हों जहाँ कहने-भूलने के सम्बन्धों की हार-जीत का कोई भी चित्र बनाना बेमानी है। ईश्वर है तो आध्यात्मिक चेतना के उस रूप में जिससे कुछ कहा जा सके, जिसका कुछ सुना जा सके। आँसुओं में मन की बातें देखने-समझने की ये कविताएँ जो अनूदित होने के बावजूद अपरिचित नहीं लगतीं—साथ जगते हुए जीने की कविताएँ हैं।
Faiz
- Author Name:
Faiz Ahmed 'Faiz'
- Book Type:

-
Description:
“फ़ैज़ की शाइरी ऐसे ज़िन्दा इशारों का पर्याय है जो दर्द की चीख़ और कराह को कसकर अन्दर ही अन्दर दबाये और छुपाये हुए हैं, मगर जो दरअस्ल दबाये दबते हैं न छुपाये छुपते।”
“फ़ैज़ की शाइरी एक ऐसा संगीत है जो मालूम तो होता है रोमानी, मगर असलन् इजतिहारी है–अपने रोमानी तेवर में भी ख़ालिसन् इन्क़िलाबी। यानी संघर्षों में उसका जन्म हुआ है।”
‘फ़ैज़’ के कलाम में वह नर्मी और मिठास है जो मन को मोह
लेती है। जिस गहरी समझ, भावनागत निश्छलता और कलात्मकता से प्रेमानुभूतियों को उन्होंने सामाजिक समस्याओं के साथ मिलाकर पेश किया है, वह अपने-आपमें अभूतपूर्व है। उनकी नज़्में उर्दू
की बेहतरीन नज़्में हैं और नज़्म की सारी विशेषताएँ और भी निखर-सँवरकर उनकी ग़ज़लों में ढल गई हैं।
‘फ़ैज़’ मानवीय मूल्यों की गरिमा के महान नायक हैं। उनकी शाइरी में मानवीय सम्बन्धों की प्रेममय सहजता उजागर हुई है, जिसका लक्ष्य हर तरह के ज़ोर-ज़ुल्म और शोषण-व्यवस्था का उन्मूलन है। उनके दावों और अमल में, कथनी और करनी में कहीं टकराव नहीं, उनके व्यक्तित्व की यह विशिष्टता उनके काव्य की भी शक्ति और विशिष्टता है। भारत और पाकिस्तान के साथ-साथ विश्व-भर में उनकी असाधारण लोकप्रियता इसका एक ज्वलन्त प्रमाण है।
Naye Yug Mein Shatru
- Author Name:
Mangalesh Dabral
- Book Type:

-
Description:
एक बेगाने और असन्तुलित दौर में मंगलेश डबराल अपनी नई कविताओं के साथ प्रस्तुत हैं—अपने शत्रु को साथ लिए। बारह साल के अन्तराल से आए इस संग्रह का शीर्षक चार ही लफ़्ज़ों में सब कुछ बता देता है : उनकी कला-दृष्टि, उनका राजनीतिक पता-ठिकाना, उनके अन्तःकरण का आयतन।
यह इस समय हिन्दी की सर्वाधिक समकालीन और विश्वसनीय कविता है। भारतीय समाज में पिछले दो-ढाई दशक के फासिस्ट उभार, साम्प्रदायिक राजनीति और पूँजी के नृशंस आक्रमण से जर्जर हो चुके लोकतंत्र के अहवाल यहाँ मौजूद हैं और इसके बरक्स एक सौन्दर्य-चेतस कलाकार की उधेड़बुन का पारदर्शी आकलन भी। ये इक्कीसवीं सदी से आँख मिलाती हुई वे कविताएँ हैं जिन्होंने बीसवीं सदी को देखा है। ये नए में मुखरित नए को भी परखती हैं और उसमें बदस्तूर जारी पुरातन को भी जानती हैं। हिन्दी कविता में वर्तमान सदी की शुरुआत ही ‘गुजरात के मृतक का बयान’ से होती है।
ऊपर से शान्त, संयमित और कोमल दिखनेवाली, लगभग आधी सदी से पकती हुई मंगलेश की कविता हमेशा सख्तजान रही है—किसी भी चीज़ के लिए तैयार। इतिहास ने जो ज़ख़्म दिए हैं उन्हें दर्ज करने, मानवीय यातना को सोखने और प्रतिरोध में ही उम्मीद का कारनामा लिखने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध। यह हाहाकार की ज़बान में नहीं लिखी गई है; वाष्पिभूत और जल्दी ही बदरंग हो जानेवाली भावुकता से बचती है। इसकी मार्मिकता स्फटिक जैसी कठोरता लिए हुए है। इस मामले में मंगलेश ‘क्लासिसिस्ट’ मिज़ाज के कवि हैं—सबसे ज़्यादा तैयार, मँजी हुई और तहदार ज़बान लिखनेवाले।
मंगलेश असाधारण सन्तुलन के कवि हैं—उनकी कविता ने न यथार्थ-बोध को खोया है, न अपने निजी संगीत को। वे अपने समय में कविता की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारियों को अच्छे से सँभाले हुए हैं और इस कार्यभार से दबे नहीं हैं। मंगलेश के लहज़े की नर्म-रवी और आहिस्तगी शुरू से उनके अकीदे की पुख़्तगी और आत्मविश्वास की निशानी रही है। हमेशा की तरह जानी-पहचानी मंगलेशियत इसमें नुमायाँ है।
और इससे ज़्यादा आश्वस्ति क्या हो सकती है कि इन कविताओं में वह साजे-हस्ती बे-सदा नहीं हुआ है जो ‘पहाड़ पर लालटेन’ से लेकर उनके पिछले संग्रह ‘आवाज़ भी एक जगह है’ में सुनाई देता रहा था। ‘नए युग में शत्रु’ में उसकी सदा पूरी आबो-ताब से मौजूद है।
—असद ज़ैदी।
Boli Baat
- Author Name:
Shriprakash Shukla
- Book Type:

-
Description:
‘बोली बात’ युवा कवि श्रीप्रकाश शुक्ल का दूसरा काव्य-संकलन है जिसमें कवि ने न सिर्फ़ अपनी विकास यात्रा को रेखांकित किया है, बल्कि समाज और उसके जन-जीवन के प्रति अपनी सरोकारों को और भी गहरे ढंग से जताया है। संग्रह में शामिल ‘ग़ाज़ीपुर’ कविता की ये पंक्तियाँ स्पष्ट रूप से बताती हैं कि कवि अपने आसपास को कितनी संवेदनशीलता के साथ ग्रहण कर रहा है: “यह एक ऐसा शहर है/जहाँ लोग धीरे-धीरे रहते हैं/और धीरे-धीरे रहने लगते हैं/यहाँ आनेवाला हर व्यक्ति कुछ सहमा-सहमा रहता है/कुछ-कुछ अलग-अलग रहता है/जैसे उमस-भरी गर्मी में दूसरे का स्पर्श/लेकिन धीरे-धीरे ससुराल गई महिला की तरह/जीना सीख लेता है।”
कवि का पहला संकलन कुछ वर्ष पहले आया था, जिसका नाम था—‘जहाँ सब शहर नहीं होता’। ‘बोली बात’ पिछले संग्रह के नाम से ध्वनित होनेवाली भाव-भूमि और दृष्टि-भंगिमा का ही अगला सोपान है, यह कहा जा सकता है। एक नए कवि का दूसरा संग्रह एक तरह से उसके विकास की कसौटी भी होता है और इस संग्रह की कविताओं को देखते हुए यह आश्वस्तिपूर्वक कहा जा सकता है कि इस संग्रह में काफ़ी कुछ ऐसा है जो कवि के रचनात्मक विकास की ओर ध्यान आकृष्ट करता है और कहें तो प्रमाणित भी। इस पूरे संग्रह को एक साथ पढ़ा जाए तो इसकी एक-एक कविता के भीतर से एक ऐसी दुनिया उभरती हुई दिखाई पड़ेगी, जिसे समकालीन विमर्श की भाषा में ‘सबाल्टर्न’ कहा जाता है। संग्रह की पहली कविता ‘हड़परौली’—इसका सबसे स्पष्ट और मूर्त्त उदाहरण है। इस प्रवृत्ति को सूचित करनेवाली एक साथ इतनी कविताएँ यहाँ मिल सकती हैं, जो कई बार एक पाठक को रोकती-टोकती-सी लगें। पर एक अच्छी बात यह है कि इसी के चलते अनेक नए देशज शब्द भी यहाँ मिलेंगे, जिन्हें पहली बार कविता की दुनिया की नागरिकता दी गई है।
कुल मिलाकर यह एक ऐसा संग्रह है जो अपने खाँटी देसीपन के कारण अलग से पहचाना जाएगा। कविता के एक पाठक के रूप में मैं यह निस्संकोच कह सकता हूँ कि इस विशिष्टता के अलावा भी यहाँ बहुत कुछ मिलेगा जो कविता-प्रेमियों को आकृष्ट करेगा और बेशक आश्वस्त भी।
—केदारनाथ सिंह
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book