Pratinidhi Kavitayein : Kailash Vajpeyi
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कैलाश वाजपेयी सभ्यता के ध्वंस, मानवीयता के लोप, बंजर होते संवेदन और संताप से झुलसते आँसुओं पर विक्षोभ प्रकट करने वाले, कविता के एक ऐसे नागरिक रहे हैं, जिनकी आवाज़ इतनी वेधक, प्रखर और सत्वग्राही है कि वह अपने अनहद से निष्करुण होती पृथ्वी तक को कँपा दे। कविता का यह तात्त्विक-सात्विक स्वर कैलाश वाजपेयी के पहले संग्रह ‘संक्रान्त’ से लेकर ‘हंस अकेला’ तक में समाया हुआ है। उनका काव्य संसार सामान्य जीवन से लेकर वैश्विक सन्दर्भों और मिथकों की अन्तर्वस्तु से सम्पुष्ट है। वह विश्व वैचारिकी की उनकी विपुल यायावरी से निस्सृत कवि विवेक और जीवन विवेक से संवलित है।</p> <p>भूमंडलीकरण और बाजारवाद के पसरते प्रभुत्व ने सदियों की हमारी सांस्कृतिक विरासत की चूलें हिला दी हैं। हमारी संवेदना को जड़ बनाते पूँजी के प्रेतों ने जिस तरह हमारे इर्द-गिर्द प्रलोभनों का जाल बिछा दिया है, उसके परिणाम निश्चय ही शुभंकर नहीं हैं। कैलाश वाजपेयी का काव्य-संसार कवि के कारुण्य, विक्षोभ और उसकी कबीरी फटकार की साखी बन गया है। भारतीय समाज, वैश्विक यथार्थ और सभ्यता के ज्वलन्त प्रश्नों से लैस कैलाश वाजपेयी की ये कविताएँ उनके काव्य का एक प्रातिनिधिक चयन हैं।</p> <p>—ओम निश्चल
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कैलाश वाजपेयी सभ्यता के ध्वंस, मानवीयता के लोप, बंजर होते संवेदन और संताप से झुलसते आँसुओं पर विक्षोभ प्रकट करने वाले, कविता के एक ऐसे नागरिक रहे हैं, जिनकी आवाज़ इतनी वेधक, प्रखर और सत्वग्राही है कि वह अपने अनहद से निष्करुण होती पृथ्वी तक को कँपा दे। कविता का यह तात्त्विक-सात्विक स्वर कैलाश वाजपेयी के पहले संग्रह ‘संक्रान्त’ से लेकर ‘हंस अकेला’ तक में समाया हुआ है। उनका काव्य संसार सामान्य जीवन से लेकर वैश्विक सन्दर्भों और मिथकों की अन्तर्वस्तु से सम्पुष्ट है। वह विश्व वैचारिकी की उनकी विपुल यायावरी से निस्सृत कवि विवेक और जीवन विवेक से संवलित है।</p>
<p>भूमंडलीकरण और बाजारवाद के पसरते प्रभुत्व ने सदियों की हमारी सांस्कृतिक विरासत की चूलें हिला दी हैं। हमारी संवेदना को जड़ बनाते पूँजी के प्रेतों ने जिस तरह हमारे इर्द-गिर्द प्रलोभनों का जाल बिछा दिया है, उसके परिणाम निश्चय ही शुभंकर नहीं हैं। कैलाश वाजपेयी का काव्य-संसार कवि के कारुण्य, विक्षोभ और उसकी कबीरी फटकार की साखी बन गया है। भारतीय समाज, वैश्विक यथार्थ और सभ्यता के ज्वलन्त प्रश्नों से लैस कैलाश वाजपेयी की ये कविताएँ उनके काव्य का एक प्रातिनिधिक चयन हैं।</p>
<p>—ओम निश्चल
Book Details
-
ISBN9789360864286
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ सिर्फ़ इसलिए हिन्दी का एक गौरव ग्रन्थ नहीं है कि उसने पहली बार साहित्य की समग्र परम्परा का एक वयस्क और उत्तरदायी परिप्रेक्ष्य से निदर्शन कराया, बल्कि इसलिए भी कि उसमें शुक्ल जी की गहरी रसिकता, सावधान और सटीक पहचान और सजग सुरुचि से चुनी हुई कविताओं या कवितांशों का एक विलक्षण संकलन भी है।
इस संकलन से शुक्ल जी का निजी रागबोध और काव्य-दृष्टि प्रगट होती है, साथ ही हिन्दी कविता-संसार की जटिल लम्बी परिवर्तन-कथा भी शुक्ल जी के विश्लेषण और चयन से विन्यस्त होती है। महत्त्वपूर्ण आलोचक डॉ. बच्चन सिंह ने अपने सहकर्मी डॉ. अवधेश प्रधान के साथ शुक्ल जी के चयन के आधार पर हिन्दी की एक ‘गोल्डन ट्रेजरी’ एकत्र की है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि यह हिन्दी काव्य की, छायावाद-पूर्व की सम्पदा से आकलित, एक रत्न-मंजूषा है। इस संकलन की एक और विशेषता की ओर भी ध्यान देना चाहिए—कविताओं में रूप का नैरन्तर्य और परिवर्तन। कुछ लोगों का विचार है कि साहित्य का इतिहास रूपों और उनके परिवर्तन का इतिहास होता है। शुक्ल जी को यह एकांगिता स्वीकार्य नहीं है। शुरू से ही रूपों के नैरन्तर्य, परिष्कार और परिवर्तन के प्रति वे सतर्क हैं। इन परिवर्तनों को वे कभी शब्द-शक्तियों के आधार पर, कभी क्रियारूपों और लय के आधार पर पहचानते हैं। इसमें केवल ‘श्रेष्ठ’ और ‘प्रिय’ का मनचाहा संकलन नहीं है, बल्कि ‘विविध’ और ‘प्रतिनिधि’ का सावधान चयन है जिसमें उत्कृष्ट काव्य-खंडों के साथ कुछ कमज़ोर काव्य-प्रयोग भी है जिनका ऐतिहासिक मूल्य है—काव्य-वस्तु और काव्य-भाषा के विकास की दृष्टि से। इसमें सफल काव्य-सृष्टि की ‘सिद्धावस्था’ के साथ असफल काव्य-प्रयत्नों की ‘साधनावस्था’ भी मौजूद है।
इस इतिहास-यात्रा में जगमगाते शिखरों के साथ कुछ गुमनाम घाटियाँ भी शामिल हैं। आप केवल ‘इतिहास’ में उद्धृत काव्य-रचनाओं को एक क्रम में देख जाएँ तो हिन्दी काव्यधारा का एक व्यापक और प्रतिनिधिमूलक गतिशील प्रवाह-चित्र सामने आ जाता है। यह संचयन ऐसी ही विविधवर्णी चित्रमाला है।
Sirf tum
- Author Name:
Rashmi Gupta
- Book Type:

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आज के दौर में कई रिश्ते बदल गए हैं। मानवीय रिश्ते ही नहीं, रोटी और भूख के रिश्ते भी—तन और वस्त्र के रिश्ते भी—इंसान और समाज के रिश्ते भी। इन रिश्तों में शून्यता का एहसास मानव जीवन के लिए बहुत बड़ी त्रासदी है। इन्हीं शून्यता और सन्नाटे को ही तो कवि शब्द देता है तब काव्य के रूप में वह हमें उन पहलुओं से साक्षात्कार का मौक़ा देता जो हमारी दृष्टि ही नहीं कल्पना से भी ओझल होता है। रश्मि गुप्ता के यहाँ संवेदना का यही रंग हावी है जिसको उन्होंने सामाजिक यथार्थ की कसौटी पर ढाला है।
‘सिर्फ़ तुम’ की कवयित्री का यह पहला काव्य-संग्रह भी इस बात के साक्ष्य के लिए काफ़ी है कि नींद के आलम में अचेतन जिस तरह बिम्बों, इशारों और मवाद का तालमेल से सपने बुनता है रश्मि के यहाँ वही काम रचनात्मक क्रिया के दौरान चेतना अंजाम देती है।
Betarteeb - Weekend Wali Kavita
- Author Name:
Vinod Dubey
- Book Type:

- Description: सुबह का वक़्त कपालभांति में गुज़ारा, तो चाय पर पत्नी के विचार छूट गए। कॉर्नफ़्लेक्स और फ़्रूट प्लेट में रखे, तो आलू के परांठे और नींबू के अचार छूट गए। न ज़िन्दगी की ये छोटी-बड़ी उलझने बदलती हैं, ना हम बदलते है। कविताएँ बस इन्हें देखने का नज़रियाँ बदल देती हैं। लाख योजनाओं के बावज़ूद जैसे हम अस्त-व्यस्त-सी ज़िन्दगी जीते हैं, ठीक उसी तरह इस संग्रह की कविताएँ भी बेतरतीब विषयों पर लिखी गयी हैं। कई बार हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी बिलकुल नीरस हो जाती है, जैसे जेठ की दुपहरी में सड़क पर लावारिस पड़ा टीन का डिब्बा। इसी ज़िन्दगी से निकली इन कविताओं को फुर्सत के पलों में पढ़ियेगा, क्या पता उस जेठ की नीरसता को बसंत की नज़र लग जाए।
Thoda-Thoda Punna Thoda-Thoda Paap
- Author Name:
Kedar
- Book Type:

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Description:
परिपक्व जीवन-अनुभवों और भाषा की गहरी समझ के साथ लिखी गई ये कविताएँ लोकजीवन की आत्मीय छवियों और सामाजिक सरोकारों से उपजी ज़िम्मेदार दृष्टि की परिचायक हैं।
केदार जानते हैं कि ‘एक पूरी ज़िन्दगी लिखना नहीं ठट्ठा-हँसी है / खीर है टेढ़ी’—ये कविताएँ ज़िन्दगी को लिखने के इसी कठिन उद्यम से निर्मित हुई हैं। इन कविताओं का कवि किसी धारा से बाँधा हुआ नहीं है। अनुभूति की प्रामाणिकता और परिवेश की पुनर्रचना केदार के काव्यात्म को एक सघन आयाम देते हैं। बचपन से लेकर जीवन के विभिन्न चरणों के विशिष्ट अनुभव इन कविताओं में उतरे हैं तो बतौर मनुष्य स्वयं से साक्षात्कार से लेकर समाज की स्थूल परिधियों और वहाँ मौजूद विसंगतियों तक उनकी दृष्टि जाती है।
‘सर्कस’, ‘होमवर्क’ और ‘कक्षा’ जैसी पारदर्शी कविताएँ जो बचपन का उत्सव मनाती हुईं हमें अपने सहज छन्द-प्रवाह से निर्भार करती हैं तो ‘नसीहत’ और ‘चिट्ठीरसैन’ जैसी कविताएँ हमें सोच के एक भिन्न और गम्भीर स्तर पर ले जाती हैं।
‘एक-एक शब्द की / चुकानी पड़ती क़ीमत / बहुत जलता लहू / हाथ, उस दिन ख़ाली हो जाता / शब्दों में जिस दिन कुछ / उतरता’—कहने वाले केदार अभिव्यक्ति का दायित्व भी जानते हैं और मूल्य भी।
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