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हमारे समय में सामाजिक यथार्थ और सामाजिकता का ऐसा आतंक है कि प्रेम-कविता की जगह घटती गई है—उसे सामाजिकता से भटकाव की विधा तक करार दिया गया है। ऐसे प्रेम-वंचित समय में ओड़िया के प्रसिद्ध कवि देवदास छोटराय की प्रेम कविताओं का हिन्दी के प्रसिद्ध कवि-आलोचक प्रभात त्रिपाठी के अनुवाद में यह संचयन ताज़ी हवा की तरह है। प्रेम मनुष्य का स्थायी भाव है और उसका कविता में अन्वेषण सदियों से कविता के लिए अनिवार्य रहा है। ओड़िया में, सौभाग्य से, जातीय स्मृति सक्रिय-सजीव है और वह इस कविता में अन्त:ध्वनित होती रहती है। हिन्दी में इस अनुवाद का महत्त्व इसलिए होगा कि यह कविता में प्रेम और स्मृति के पुनर्वास की कविता है। रज़ा फ़ाउंडेशन इस पुस्तक को सहर्ष प्रकाशित कर रहा है।</p> <p>—अशोक वाजपेयी
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हमारे समय में सामाजिक यथार्थ और सामाजिकता का ऐसा आतंक है कि प्रेम-कविता की जगह घटती गई है—उसे सामाजिकता से भटकाव की विधा तक करार दिया गया है। ऐसे प्रेम-वंचित समय में ओड़िया के प्रसिद्ध कवि देवदास छोटराय की प्रेम कविताओं का हिन्दी के प्रसिद्ध कवि-आलोचक प्रभात त्रिपाठी के अनुवाद में यह संचयन ताज़ी हवा की तरह है। प्रेम मनुष्य का स्थायी भाव है और उसका कविता में अन्वेषण सदियों से कविता के लिए अनिवार्य रहा है। ओड़िया में, सौभाग्य से, जातीय स्मृति सक्रिय-सजीव है और वह इस कविता में अन्त:ध्वनित होती रहती है। हिन्दी में इस अनुवाद का महत्त्व इसलिए होगा कि यह कविता में प्रेम और स्मृति के पुनर्वास की कविता है। रज़ा फ़ाउंडेशन इस पुस्तक को सहर्ष प्रकाशित कर रहा है।</p>
<p>—अशोक वाजपेयी
Book Details
-
ISBN9789388933384
-
Pages94
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: दिल दुनिया दस्तूर छोटी कविताओं का एक संग्रह है जो एक ऐसे व्यक्ति के दिन-प्रतिदिन के जीवन से प्राप्त होता है, जिसने दिल टूटने, अस्वीकृति और एकाकीपन को देखा है फिर भी उसे प्यार मिला है। यह पुस्तक एक ऐसे व्यक्ति की जीवन यात्रा का प्रदर्शन है जो कई वर्षों से कॉर्पोरेट जीवन से जूझने के संघर्ष के समानांतर वह जीवन जीने की कोशिश कर रहा है जो वह हमेशा चाहता था, अपनी कविताओं के माध्यम से। वह मानव जीवन के मूल तत्वों पर सवाल उठाते हैं – प्यार, दिल टूटना, एकांत तथा एक व्यस्त कामकाजी किंतु यांत्रिक जीवन के रहते भी कहीं खोया एक अकेला व्यक्ति। यह संस्करण एक प्रयास है पाठकों के बीच आत्म-प्रतिबिंब की चिंगारी जलाने में, आधुनिक जीवन की अनियमितताओं से जूझने में और उम्मीद है मददगार होगा समाज के ऐसे मानदंडों से निपटने में जो अक्सर नकली, समझौता न करने वाले, दोहरे मानकों से लिप्त और मजबूर करने वाले होते हैं।
Ek Parityakt Pul Ka Sapna
- Author Name:
Saumya Malviya
- Book Type:

- Description: ये कविताएँ बीते दो-एक दशकों में उपजी बेचैनियों और निराशाओं को स्वर देने का प्रयास करती हैं। वक़्त की चोट को शब्दों में महसूसना चोट पर मरहम का ही काम नहीं करता, बल्कि उसे ज़िन्दा भी रखता है। यह संग्रह अपने ज़ख़्मों के प्रति उत्तरदायी बने रहने की अपील करता हुआ, उनके भरने की उम्मीद की व्यर्थ और अश्लील सकारात्मकता से मुक्त उम्मीद भी करता है। जैसे-जैसे इस दौर की अलामतें हम पर नुमायाँ हुई हैं, कविता, विचार और संवेदना में भ्रम और कुहासा बढ़ा है। दृश्य के धुँधलाने के साथ दृष्टि भी क्षीण होती-सी महसूस हुई है। यहाँ प्रस्तुत कविताएँ इस सन्दर्भ में दृष्टि की खोज भी हैं और उसके थिर और स्पष्ट बने रहने की टॉर्च भी। हालाँकि इन कविताओं में रोशनी की दिशोन्मुखता नहीं, आग की दहनप्रियता अधिक है और इस जलने में केवल सन्ताप नहीं, प्रतिदिन की, सम्बन्धों की, स्थितियों और संघर्षों की ऊष्मा भी है जो जीवन को ठंडेपन से दूर रखते हुए जीवन्त-जाग्रत बनाए रखती है। शिल्प और भाषा के स्तर पर अपने को परस्पर काटते हुए प्रयोग भी उस विकलता को अपने में विन्यस्त करते हैं जो अन्तर्वस्तु की ज़मीन पर जगह-जगह उद्घाटित हुई है। इन कविताओं में एक कवि की यात्रा भी है जो गणित, विज्ञान, दर्शन और समाजशास्त्र की गलियों में भटकती हुई बार-बार कविता के दयार पर लौटती है। ये लौटना ही उसका अरमान भी है और उसका निकष भी। नतीजन इनमें जो धधक रहा है, कई पाँवों का चक्कर, कई हाथों की दुआ है जो हर बार कविता पर आकर ख़त्म होती है। इसलिए तमाम उत्कंठाओं और व्याकुलताओं के बाद भी इन कविताओं में एक बसेरापन भी है और अपनी जगह की ठसक भी।
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