Hindi Kavya
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हिंदी काव्य उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप प्रदेश के समस्त विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों हेतु पुनर्गठित एकीकृत हिंदी पाठ्यक्रम की स्नातक प्रथम सेमेस्टर हेतु पाठ्यक्रम समिति के संयोजक एवं सदस्यों द्वारा तैयार की गई एकमात्र निर्धारित पाठ्यपुस्तक है, जिसके पाठ्यक्रम को तैयार करते समय इस तथ्य को दृष्टिगत रखने का प्रयास किया गया कि स्नातक प्रथम सेमेस्टर के विद्यार्थी हिंदी काव्य के समस्त कालों के लगभग 1300 वर्षों तक विस्तीर्ण इतिहास, महत्त्वपूर्ण कवियों तथा उनकी प्रतिनिधि रचनाओं से उच्च कक्षा के प्रथम सोपान में ही परिचित हो सकें एवं आगामी कक्षाओं में आने हेतु हिंदी साहित्य की मूलभूत काव्य परंपरा को जान सकें।
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हिंदी काव्य उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप प्रदेश के समस्त विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों हेतु पुनर्गठित एकीकृत हिंदी पाठ्यक्रम की स्नातक प्रथम सेमेस्टर हेतु पाठ्यक्रम समिति के संयोजक एवं सदस्यों द्वारा तैयार की गई एकमात्र निर्धारित पाठ्यपुस्तक है, जिसके पाठ्यक्रम को तैयार करते समय इस तथ्य को दृष्टिगत रखने का प्रयास किया गया कि स्नातक प्रथम सेमेस्टर के विद्यार्थी हिंदी काव्य के समस्त कालों के लगभग 1300 वर्षों तक विस्तीर्ण इतिहास, महत्त्वपूर्ण कवियों तथा उनकी प्रतिनिधि रचनाओं से उच्च कक्षा के प्रथम सोपान में ही परिचित हो सकें एवं आगामी कक्षाओं में आने हेतु हिंदी साहित्य की मूलभूत काव्य परंपरा को जान सकें।
Book Details
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ISBN9789355210838
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Pages176
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Avg Reading Time11 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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Description:
अपने हर कविता-संग्रह में जगूड़ी अपनी कविता के लिए अलग–अलग क़िस्म के नए गद्य का निर्माण करते रहे हैं। उनके लिए कहा जाता है कि वे गद्य में कविता नहीं करते, बल्कि कविता के लिए नया गद्य गढ़ते हैं। यही वजह है कि उनकी कविता में कतिपय कवियों की तरह केवल कहानी नहीं होती, न वे कविता की जगह एक निबन्ध लिखते हैं। उन्होंने एक जगह कहा है कि “कहानी तो नाटक में भी होती है पर वह कहानी जैसी नहीं होती। अपनी वर्णनात्मकता के लिए प्रसिद्ध वक्तव्य या निबन्ध नाटक में भी होते हैं पर उनमें नाट्यतत्त्व गुँथा हुआ होता है। वे वहाँ नाट्य-विधा के अनुरूप ढले हुए होते हैं। कविता में भी गद्य को कविता के लिए ढालना इसलिए चुनौती है, क्योंकि ‘तुक’ को छन्द अब नहीं समझा जाता। आज कविता को गद्य की जिस लय और श्वासानुक्रम की ज़रूरत है, वही उसका छन्द है। तुलसी ने कविता को ‘भाषा निबन्ध मति मंजुल मातनोति’ कहा है। अर्थात भाषा को नए ढंग से बाँधने का उपक्रम कर रहा हूँ। बोली जानेवाली भाषा भी श्वासाधारित है। अत: भाषा बाँधना भी हवा बाँधने की तरह का ही मुश्किल काम है।”
लीलाधर जगूड़ी की कविता की यह भी विशेषता है कि वे अनुभव की व्यथा और घटनाओं की आत्मकथा इस तरह पाठक के सामने रखते हैं कि उनका यह कथन सही लगने लगता है कि—‘कविता का जन्म ही कथा कहने के लिए और भाषा में जीवन-नाट्य रचने के लिए हुआ है।’ वे अक्सर कहते हैं कि ‘कविता जैसी कविता से बचो।’ 24 वर्ष की उम्र में उनका पहला कविता-संग्रह आ गया था। 1960 से यानी कि 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध से 21वीं सदी के दूसरे दशक बाद भी उनकी कविता का गद्य समकालीन साहित्य की दुनिया में किसी न किसी नए संस्पर्श के लिए प्रतीक्षित है और पढ़ा जाता है। उनके कविता-संग्रहों के प्राय: नए संस्करण आते रहते हैं। कविता न बिकने और न पढ़े जाने के बदनाम काल में बिना किसी आत्मप्रचार के लीलाधर जगूड़ी की कविताएँ अपने पाठकों का निर्माण करती चलती हैं। वे अपनी कविता की मोहर बनाकर बार–बार एक जैसी कविताओं से उबाते नहीं हैं। वे पहले की तरह आज भी प्रयोग और प्रगति के पक्षधर हैं। लीलाधर जगूड़ी की कविताओं में विषय–वस्तुओं का जो अद्वितीय चयन और प्रस्तुतीकरण होता है, वह अपनी ही उक्ति के अनुसरण से लगातार बचते रहने की सजग कोशिश के कारण भी आकर्षित करता है। इनकी कविताओं की निरन्तर परिवर्तनशील पद्धति समीक्षा और आलोचना को भी अपना स्वभाव बदलने के लिए प्रेरित करती है। इनकी कविता के ज़मीन–आसमान कुछ अलग ही रंग के हैं।
‘जितने लोग उतने प्रेम’ की कविताएँ भी कविता के शिल्प और प्रेम के रूप को रूढ़ि नहीं बनने देतीं। उक्ति वैचित्र्य और कथन विशेषता के कारण इन कविताओं में उद्धरणीयता का गुण प्रचुर मात्रा में है। ये कविताएँ 21वीं सदी की कविता को नई दिशा देंगी और आलोचकों को नए सन्दर्भ।
Sadho ! Jag Baurana
- Author Name:
Mukesh Kumar
- Book Type:

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Description:
मुकेश कुमार टेलीविज़न की दुनिया का एक जाना-माना नाम है। साहित्य से जुड़े तमाम लोग उन्हें दूरदर्शन पर डॉ. नामवर सिंह के साथ पुस्तक चर्चा के अत्यन्त चर्चित कार्यक्रम ‘सुबह-सवेरे’ के माध्यम से, ‘हंस’ में पिछले आठ सालों से प्रकाशित उनके स्तम्भ ‘कसौटी’ के कारण तथा कई टेलीविज़न चैनलों को शुरू करके उन्हें सफल बनानेवाले एंकर के रूप में भी जानते-समझते रहे हैं। लेकिन उनके बहुविध व्यक्तित्व के बहुत से पहलू लोगों से अभी तक क़रीब-क़रीब छिपे हुए रहे हैं जिनमें उनका व्यंग्यकार, कथाकार तथा कवि रूप भी शामिल है।
टेलीविज़न की दुनिया में रहकर अपने परिवार तक के लिए समय निकाल पाना मुश्किल हो जाता है और हड़बड़ी की इस दुनिया में अपनी संवेदनाएँ बचाना प्राय: असम्भव ही होता है। अत: आश्चर्य होता है कि इस दुनिया में लगातार रहकर ख़ासकर कविता के लिए समय उन्होंने कैसे और कहाँ से निकाल लिया होगा? और यों ही अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के लिए कविता के नाम पर कुछ भी लिख देना तो सम्भव या आसान है मगर कविता के आधुनिक मुहावरे को समझते हुए अपने पेशेवर काम से एक बिलकुल ही अलग दुनिया रच देना अगर असम्भव नहीं तो बेहद मुश्किल और जटिल है।
मुकेश की विशेषता सिर्फ़ यह नहीं है कि वे कविताएँ लिखते हैं, यह भी है जैसा कि ऊपर कहा गया, वे इसमें संवेदनाओं की एक अलग दुनिया रचते हैं। यह दुनिया दैनिक और हर घंटे या हर दस मिनट बाद टीवी के पर्दे पर आनेवाली ज़्यादातर सतही और कामचलाऊ ख़बरों और उनके विश्लेषण की दुनिया से बिलकुल ही अलग है। इन कविताओं को पढ़ते हुए पाठकों को याद ही नहीं आएगा कि यह वही मुकेश हैं जिन्हें रात के समय समाचारों का कोई कार्यक्रम प्रस्तुत करते हमने-आपने देखा है, हालाँकि वहाँ भी उनका तीखापन कहीं खोता नहीं जैसे कि ‘हंस’ के उनके स्तम्भ में भी यह बेधड़क ढंग से व्यक्त होता है। इन कविताओं में से कम कविताओं में ही आज की राजनीति से सीधे-सीधे रूप से कवि वाबस्ता है। ये कविताएँ उनके कोमल और लड़ाकू दोनों पक्षों को एक साथ उजागर करती हैं। वे चाँद की बात इनमें करते हैं, साथ ही समुद्र की, नदियों की, स्मृतियों की, साँकल की (जो जीवन से प्राय: खो चुकी है), प्यार की, अपने और बच्चों के बचपन की, आत्मनिर्वासन की और ऐसी ही कई-कई बातें करते हैं। वे कई ताज़े टटके बिम्ब रचते हैं। दूज का चाँद उन्हें बिना मूठ का हँसिया नज़र आता है जो तारों की फ़सल काटने के काम आता है। इन कविताओं में नदी अपनी आत्मकथा लिखती पाई जाती है। इनमें कवि स्मृतियों के घर में रहता हुआ पाया जाता है। और मुकेश यह सारा काम टेलीविज़न की अत्यन्त शब्दस्फीत दुनिया से अलग पर्याप्त भाषा संयम से करते हैं।
उनकी कविताएँ छोटी हैं, स्पष्ट हैं और लगभग उतने ही शब्दों का इस्तेमाल करती हैं जितने का प्रयोग करना अनिवार्य है और यह अनुशासन हासिल करना आसान नहीं है। कई नामी कवि बेहद शब्दस्फीत हैं। उनमें कहीं-कहीं एक गहरा आक्रोश भी है तो कहीं एक गहरा आत्मविश्वास भी, इसलिए कितना भी घना क्यों न हो अँधेरा जितना जान पड़ता है उतना घना नहीं होता अँधेरा। और ऐसे आत्मविश्वास का अर्थ तब ज़्यादा है जब कवि को पता है कि—जिन्हें पूजा हो गए पत्थर, पूजते-पूजते लोग भी हो गए पत्थर, देवता भी पत्थर, पुजारी भी पत्थर, सब पत्थर पत्थर ही पत्थर। जब सब तरफ़ पत्थर ही पत्थर हों, हमारे आदर्श देवता और पुजारी तक जब पत्थर हो चुके हों, तब रचने की चुनौती ज़्यादा गम्भीर है क्योंकि रचना के स्रोत भी पथरा चुके हैं। ऐसे कठिन समय में सरल-आत्मीय कविताएँ रचनेवाले मुकेश कुमार के इस संग्रह की तरफ़ आशा है सबका ध्यान जाएगा, हालाँकि स्थितियाँ साहित्य से जुड़े लोगों के भी पथरा जाने की हैं।
Pani ka Pta Puchh Rahi Thi Machhali
- Author Name:
Kamleshwar Sahu
- Book Type:

- Description: Poems
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