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A Collections of Hindi Poems by Pushpita Awasthi
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A Collections of Hindi Poems by Pushpita Awasthi
Book Details
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ISBN9789385013577
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Pages200
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Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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संसार के किसी पर्वत की जीवन-कथा इतनी रहस्यमयी न होगी जितनी हिमालय की है। उसकी हर चोटी, हर घाटी हमारे धर्म, दर्शन, काव्य से ही नहीं, हमारे जीवन के सम्पूर्ण निश्रेयम् से जुडी हुई है। संसार के किसी अन्य पर्वत की मानव की संस्कृति, काव्य, दर्शन, धर्म आदि के निर्माण में ऐसा महत्त्व नहीं मिला है, जैसा हमारे हिमालय को प्राप्त है। वह मानो भारत की संश्लिष्ट विशेषताओं का ऐसा अखंड विग्रह है, जिस पर काल कोई खरोंच नहीं लगा सका।
वस्तुतः हिमालय भारतीय संस्कृति के हर नए चरण का पुरातन साथी रहा है। भारतीय जीवन उसकी उजली छाया में पलकर सुन्दर हुआ ये, उसकी शुभ्र ऊँचाई छूने के लिए उन्नत बना है और उसके हृदय से प्रवाहित नदियों में घुलकर निखरा है।
हमारे राष्ट्र के उन्नत शुभ्र मस्तक हिमालय पर जब संघर्ष की नील-लोहित आग्नेय घटाएँ छा गईं, तब देश के चेतना-केन्द्र ने आसन्न संकट की तीव्रानुभूति देश के कोने-कोने में पहुँचा दी।
धरती की आत्मा के शिल्पी होने के कारण साहित्यकारों और चिन्तकों पर विशेष दायित्व आ जाना स्वाभाविक ही था। इतिहास ने अनेक बार प्रमाणित किया है कि जो मानव समूह अपनी धरती से जिस सीमा तक तादात्म्य कर सका है, वह उसी सीमा तक अपनी धरती पर अपराजेय रहा है। आधुनिक युग के साहित्यकार को भी अपने रागात्मक उत्तराधिकार का बोध था। इसी से हिमालय के आसन्न संकट ने उसकी लेखनी को, ओज के शंख और आस्था की वंशी के स्वर दे दिये हैं।
Kavita Mein Banaras
- Author Name:
Rajeev Singh
- Book Type:

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ग़ालिब उसे हिन्दुस्तान का क़ाबा कहते हैं, तो कबीर कहते हैं, ‘चोवा चंदन अगर पान, घर घर सुमृति होत पुरान’, तुलसी के लिए वह ‘परमारथ की खान’ है। भारतेन्दु के लिए वहाँ के ‘लोग निकम्मे भंगी गंजड़, लुच्चे बे-बिसवासी’ हैं तो बेढब बनारसी कहते हैं कि बनारस की कोई शान ही नहीं रह जाएगी जिस दिन गलियों में पान की दुकानें नहीं दिखेंगी। श्रीकान्त वर्मा की काशी में ‘जिस रास्ते जाते हैं शिव, उसी रास्ते आता है शव’, तो वली दकनी का दिल जोगी बनकर इसी बनारस में वास करना चाहता है।
यह काशी है, वाराणसी, बनारस जिसे दुनिया के प्राचीनतम नगरों में गिना जाता है। यह अपनी विलक्षणताओं से हर किसी को आकर्षित करता है। भौतिक सुखों से उकताए यूरोप-अमेरिकावासियों से लेकर मोक्ष और अध्यात्म को जीवन का लक्ष्य मानने वाले अनपढ़ ग्रामीण भारतीयों तक।
कवि, लेखक, कलाकार, फ़िल्मकार भी उसके लगभग रहस्यमय आकर्षण में बिंधे उसकी तरफ़ खिंचे चले जाते हैं। संसार में बहुत ही कम ऐसे शहर होंगे जो कविताओं, फ़िल्मों और कलाओं में एक मिथक की तरह बार-बार आते रहते हैं। वे सिर्फ़ शहर नहीं होते, मानव की वृहत् इतिहास यात्रा के पड़ाव होते हैं। बनारस भी उन्हीं में से एक है जिसकी साक्षी है यह पुस्तक।
इसमें उन कविताओं को इकट्ठा किया गया है, जो अलग-अलग भाषाओं के कवियों ने अपने-अपने समय के बनारस को देख और जी कर लिखीं। लगभग छह सौ साल का विराट समय-पट्ट और उस पर अंकित ये कविताएँ!
इन कविताओं से गुज़रना बनारस के इतिहास और संस्कृति के साथ-साथ उसके अव्याख्येय और कालातीत सौन्दर्य से साक्षात्कार करना भी है। कबीर, रैदास, भारतेन्दु, प्रसाद, शमशेर, त्रिलोचन, श्रीकान्त वर्मा, केदारनाथ सिंह, राजेश जोशी, ज्ञानेन्द्रपति, अष्टभुजा शुक्ल और व्योमेश शुक्ल सहित उनतालीस हिन्दी कवियों और वली दकनी, ग़ालिब, अकबर इलाहाबादी और नज़ीर बनारसी सहित पन्द्रह उर्दू शायरों के साथ बांग्ला के राजा जयनारायण घोषाल, शंखघोष और विश्वप्रसिद्ध स्पेनिश कवि होर्हे लुईस बोर्हेस की कविताएँ इसमें शामिल हैं। कहने की ज़रूरत नहीं कि बनारस-प्रेमी पाठकों के लिए यह एक दस्तावेज़ी और संग्रहणीय पुस्तक है।
Asweekar Se Bani Kaya
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Rajesh Kamal
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Taaron Kee Dhool
- Author Name:
Krishna Mohan Jha
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- Description: तारों की धूल कृष्णमोहन झा का नया कविता-संग्रह है जो उनके पहले संग्रह के लगभग दो दशकों के बाद पाठकों के सामने आ रहा है। उनकी कविता इस दुनिया को स्मृति की दृष्टि से देखती है। इस तथ्य को, कि स्मृति एक भरा-पूरा संसार है, वह इतने गाढ़े रंगों में अंकित करती है कि उसे छुआ जा सके, उसमें रहा जा सके जैसे हम प्रकृति के साथ, उसके बीच उसके तमाम सजीव स्पर्शों के साथ रहते आए हैं। प्रकृति और मनुष्य का यह साहचर्य उत्तरोत्तर क्षीण हुआ है, यह वह दुख है जो उनकी कविताओं में सतत मौजूद रहता है। उनकी कविता हमें बीते हुए को अपने भीतर सँजोए हुए इस पृथ्वी पर रहना सिखाती है, यह पृथ्वी जहाँ पानी है, हवा है, वनस्पति है, चिड़ियाँ हैं, जुगनू हैं, आकाश और उसमें गुच्छों-के-गुच्छे लटकते तारे हैं, और कविताएँ हैं। उनकी कविता हमें महसूस कराती है कि इन सबके साथ, उनकी सजीवता को स्वीकार करते हुए मनुष्य ने कैसे रहना शुरू किया होगा, और कैसे हम रह सकते हैं ताकि आगे भी रह सकें। वे एक आठवें दिन की कल्पना करते हैं, एक ऐसा दिन जिस पर न ख़ून का एक छींटा हो, न आँसू का कोई निशान। जिस चीज़ को ये कविताएँ क़तई महिमामंडित नहीं करतीं, वह है आगे-ही-आगे चलते चले जाना, और वह भी उसी महापथ से जहाँ विस्मरण हमारी तमाम अकृतज्ञताओं और अमनुष्यताओं को कवच की तरह ढके रहता है। ये हमें याद दिलाती हैं, और आज के समय में यह एक बड़ा कार्यभार है, जिसे ये कविताएँ अपनी आन्तरिक ज़िद और बाह्य शिल्प, दोनों से जैसे शपथपूर्वक करती हैं।
Use Laut Aana Chahiye
- Author Name:
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मुझे अपनी कविताओं के प्रति मोह बिलकुल नहीं है, ऐसा कहना ग़लत होगा। मैं शायद ज़रूरत से ज़्यादा सतर्क और सजग अपनी कविताओं के बारे में हूँ—इसलिए उनसे डरता रहता हूँ। फिर भी यदि कविता लिखता हूँ तो लगता है, ऐसी बातें तो मैं कह चुका हूँ, दूसरे शब्दों से उन्हीं बातों को सहलाना भी मेरे चुक जाने की ही निशानी है। ऐसा नहीं कि मेरे पास विचार या जीवनानुभवों का टोटा पड़ गया है—अभी भी किसी विचार, किसी घटना, छोटी-बड़ी बात से परेशान हो उठता हूँ, कभी-कभी महीनों तक जूझता रहता हूँ। पर उनसे निकलने के लिए कविता मेरे लिए अब आसान रास्ता नहीं रह गई है।
मैं सोचता हूँ कि लेखन में कोई इसलिए आता है कि उसे अपने दिए हुए संसार में बने रहना नाकाफ़ी लगता है। उसके आस-पास जो लोग हैं, सिर्फ़ उनसे रूबरू होकर उसका काम नहीं चलता। वह ऐसे लोगों से बातचीत करना चाहता है जिन्हें वह जानता भी नहीं है, जो दूसरे नगरों में रहते हैं, जो शायद मर चुके हैं या अभी पैदा भी नहीं हुए हैं। वह अपने आस-पास की सांसारिकताओं में ही मशगूल हो जाता है, या दीगर दिलचस्पियों में खप जाता है तो उसकी मानसिकता में दूर, मनचाहे से, अज्ञात से रिश्ते जोड़ने की सामर्थ्य नहीं बची रहती। जितने मनोरथ मैंने उठा रखे हैं, वे ही अब मुझसे नहीं सधते—क्या किया जाए?
देश में और समाज में तमाम तरह की उत्तेजनाएँ हैं। करोड़ों लोग अपनी ज़िन्दगी के थोड़े-बहुत सार्थक को भी बचा रख पाने के लिए दारुण संघर्ष में लगे हुए हैं। काफ़ी लोग बदलाव के लिए बेचैन हो रहे हैं। यह देश और दुनिया ऐसी बने रहने के लिए अभिशप्त नहीं है। तमाम लोग लगे हैं, इसे बदलने के लिए। इस बात से कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता कि एक कवि चुक गया है या उसका वक़्त आ गया है। हो सकता है कि ठीक अज़ाँ सुनने पर वह भी अपना क़फ़न फाड़कर बाहर निकल ही आए। अपनी छोटी-सी भूमिका निभाने में शायद वह और कोताही न करे। मूक बोलने लगे और पंगु गिरि को लाँघने लगे, ऐसा नामुमकिन नहीं है।
— सुदीप बॅनर्जी
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